कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजनधर्मबोध
( ४७ )
दिन औ राति कोइ जाने । रवि शशि उड्डुगण सकल डुराने॥ चन्द सूर नूर प्रचण्डा । पारिजात आमा नौ खंडा ॥ दरदर पर सुरतरु वर लागे । सकल नारि नर सुखमें पागे ॥
पूरबी बोल-छन्द बरवै
दमक देव डुम बमकै महि शशि सूर । गममि रहल चहुँ ओरवा चमकै नूर ॥ पूरन धरनि अकसवा जोति अपार । यक समान दिन रतिया नहिँ अँधियार ॥ छपे सुरतरुकी जोतिया लगनमें मन्द । एक न दीख नखतिया नहिँ रवि चन्द ॥ नर तिय सकल जुगलिया सब निस पाप । पुण्य पाप कछु नाहीं कर्म न थाप ॥ तब नहिँ बोध बिचरवा नहिँ गुरु शिष्य । कतहुँ न वरणाश्रम वासव सम दिष्य ॥ कतहुँ उग्र न सदवों रंक न राव । नर सुर विचर धरनिया कछु न बराव ॥ हिल मिल दोउ दल रहते जनु सँग भाय । भोग भूरि कल्पडुम काम पुराय ॥ महि सुख छाय स्वरगवा छबि सरसाय । हीरा लाल कि स्वनियां कविको गाय ॥ नहिँ कछु वेदन बानी नहिँ श्रुति छंद । धर्म न कछु अधरमवा सहजानन्द ॥
इति
अथ चौथा कालवर्णन
सोरठा-लागत चौथा काल, सुरतरुजबही लोप हो । नर गह न्यारी चाल, कृत चली कृतकाल तिहि ॥
नं. ९ कबीरसागर - ३