कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
चौपाई
चौथा काल लगे जब आई । तबसे रात्रि द्यौस बिलगाई ॥ कल्पवृक्ष तब जाहि लुपाई । चन्द्र सूर तारे दरशाई ॥ जिहि औसर निशदिन बिलगाना । भिन्नभाव तब जगको जाना ॥ तब मानुष ऊपरको देखे । चकिंत होय सब कहैं विशेषे ॥ यह क्या हमरी नजरमें आयो । जो हम काहू देखि न पायो ॥ तब कुलकर ब्यौरा कहि देही । चन्द्र सूर तारे हैं येही ॥ कुलकर सोई नाम धरावै । जो मानुष कुलको बिलगावै ॥ जाति वर्ण कुल न्यारा करही । तिहि अनुसार धर्म आचरही ॥ राजनीति सब भाषै ओई । खेती कर्म सिखावै सोई ॥ जब मानुष सुरतरु नहि राखै । कुलकर तबहि कूसानी भाषै ॥ तबते कृतक रही सब लोगू । अन्न उपायके भोजन भोगू ॥ जबहि देव दुम गयो दुगई । ईश्व उगी मानुष सुखदाई ॥ भांति भांतिके ऊख गन्ना । जिवको दुख दरिद्र सबभन्ना ॥ कल्पवृक्षके बदले ईखा । प्रथमहि जाको मानुष चीखा ॥ ताकी खेती प्रथमहि चाला । कुलकरकी आज्ञा सबपाली ॥ कुलकर अनुभव ज्ञान गहाई । सब जीवनको राह बताई ॥ कुलकर आदि भूप इक्ष्वाका । प्रथम चली जग जाकीशाका ॥ इक्ष्वाकू कुलकर कहलाये । प्रथम जो नरको ईश्व चुसाये ॥ अर्थ सहित यह नाम कहाया । इक्ष्वाकू जिन ईश्व चुसाया ॥ तिहि अवसर गुणदोष विभागा । पुण्यपाप मानुषको लागा ॥ कर्म दोष गुण तबते पागे । प्रकट करे कुल करके आगे ॥ कछु औगुन जब नरमें पावै । निहि कुलकर धिक वचन सुनावै ॥ सो धिक वचन सुने नर नारी । निजुमनमें अति होहि दुखारी ॥ यतनमें अस लज्जा माना । तजे तुरंत आपनो प्राना ॥