कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजनधर्मबोध
( ४९ )
अस कहि नर छोडे निजचोला । आज हमें कुलकर धिकबोला ॥ कछु दिस बीते मनुष दिठाई । धिक बोलीसे सो मल जाई ॥ जब धिक वचनसे राह न धरही । बहुरिधिकाधिककुलकर करही ॥ यतनेहु पर जब शर्म न माने । अधिक दंड तब कुलकर ठाने ॥ कमही क्रम औगुन अधिकाई । बेडी बांसके दे ठहराई ॥ झूली फासो दण्ड प्रचंडा । लगा होन पृथ्वी नौ खंडा ॥
इति
अथ वर्णविभाग वर्णन—चौपाई
चौथा काल आनि जब लागा । तबते मानुष जाति विभागा ॥ तीन वर्ण प्रथमहि तब कीने । छत्री वैश्य शूद्र कहि दीने ॥ दोय प्रकार शूद्र पुनि कीना । एक लीन भौ दुतिय मलीना ॥ तबते जाति बरन ठहराई । कुलकर भिन्न २ बिलगाई ॥ दोय प्रकारके लोग कहाये । यक नर यक विद्याधर गाये ॥ मानुष भू गोचरी बखानो । विद्याधर खगोचरी मानो ॥ भूगोचरी भूमि पग डाले । उडि अकाश विद्याधर चाले ॥ जाति वर्ण दोनोमें कीना । नर विद्याधर धर्म धुरीना ॥ नर विद्याधर जैनी सारे । तिरथंकर सेवा चित थारे ॥ पंचम काल लगे जब आई । तब मिथ्यात्र फैल अधिकाई ॥ जबते मिथ्या मत सरसाने । तबते विद्याधर बिलगाने ॥ चौथे काल माहँ परिपाका । प्रकटे तिरसठ पुरुष शलाका ॥ एक सौ उनहत्तर जिव सारा । चौथे काल माहँ औतारा ॥ मुक्तिपात्र कहिये नर जोई । चौथे काल प्रकटे सब सोई ॥ प्रकटे तबहि तिरथंकर देवा । सुर नर मुनि कर जाकी सेवा ॥ सुर सुरपति पृथ्वीपर आवे । तिरथंकरकी अस्तुति गावै ॥
बो० सा० ९