कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
ऋषभनाथ है आदि तिर्यंकर । तिनके पुत्रभे भरथ भूपवर ॥ चक्रवर्ति थे भरथ भुवाला । चौथा वर्ण कीन तिहि काला ॥ सब मानुषकी पारख लीन्हें । दायावंत अधिंक जिहि चीन्हे ॥ ब्रह्म चीन्हि जिन दाया धारा । तिनको भिन्न कियो तिहि बारा ॥ ब्रह्मन तिनको नाम पुकारी । जिनके हृदये दाया भारी ॥ चौथा वर्ण भरथ नृप थापा । तबते चार बरणकी छापा ॥ ऋषभनाथकी केवल बानी । तिहि औसर असकहैं बखानी ॥ भरथ विप्र थापे हैं जाको । चलै जगतमें तिनकी साको ॥ पञ्चम काल जाहि दिन ऐहै । ब्रह्मन जैन विरोधी ह्वैहै ॥ जैन विरुद्ध कर्म सब करिहैं । द्रोह सदा जैनीसे धरिहैं ॥ कछुदिन यहिविधि गयोसिराई । मन मत ब्रह्म न वेद बनाई ॥ जैन विरुद्ध कर्म सब ठाना । हिंसा कर्म करहिं विधि नाना ॥ अश्वमेध गोमेध रचाई । अजामेध नरमेध बनाई ॥ ब्राह्मणजातिकी अधिक प्रशंसा । लिख्यो ताहि ब्रह्माको वंसा ॥ अपने मन सब शास्त्र बनाये । सबते आपको श्रेष्ठ बताये ॥ करि प्रपंच सब थाप अचारा । जैन विरुद्ध पाखंड पसारा ॥ चौथा काल बहुरि जब ऐहै । फेर न ब्राह्मण वर्ण थपैहै ॥ बहुरि प्रतिष्ठा देय न ओही । थपै न जैन धर्मको द्रोही ॥ जाति वर्णकी बात बखानी । अब पुरुषनकी कहो कहानी ॥
छंद त्रिभंगी
चौबिस तीर्थकर जैनी शंकर बस कम कंकर धूल कियौ । गुण ज्ञान गहंत मुक्ति लहंत अरि हंतअतिचूल कियौ ॥ दाया उपदेशं रहित कलेशं मोह न लेशं धर्मधनी । कुल पद बत्तीशं बानी दीशं जैन मुनीशं भर्म भनी ॥