कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
जनधर्मबोध
( ४७ )
दिन औ राति कोइ जाने । रवि शशि उड्डुगण सकल डुराने॥ चन्द सूर नूर प्रचण्डा । पारिजात आमा नौ खंडा ॥ दरदर पर सुरतरु वर लागे । सकल नारि नर सुखमें पागे ॥
पूरबी बोल-छन्द बरवै
दमक देव डुम बमकै महि शशि सूर । गममि रहल चहुँ ओरवा चमकै नूर ॥ पूरन धरनि अकसवा जोति अपार । यक समान दिन रतिया नहिँ अँधियार ॥ छपे सुरतरुकी जोतिया लगनमें मन्द । एक न दीख नखतिया नहिँ रवि चन्द ॥ नर तिय सकल जुगलिया सब निस पाप । पुण्य पाप कछु नाहीं कर्म न थाप ॥ तब नहिँ बोध बिचरवा नहिँ गुरु शिष्य । कतहुँ न वरणाश्रम वासव सम दिष्य ॥ कतहुँ उग्र न सदवों रंक न राव । नर सुर विचर धरनिया कछु न बराव ॥ हिल मिल दोउ दल रहते जनु सँग भाय । भोग भूरि कल्पडुम काम पुराय ॥ महि सुख छाय स्वरगवा छबि सरसाय । हीरा लाल कि स्वनियां कविको गाय ॥ नहिँ कछु वेदन बानी नहिँ श्रुति छंद । धर्म न कछु अधरमवा सहजानन्द ॥
इति
अथ चौथा कालवर्णन
सोरठा-लागत चौथा काल, सुरतरुजबही लोप हो । नर गह न्यारी चाल, कृत चली कृतकाल तिहि ॥
नं. ९ कबीरसागर - ३
( ४८ )
बोधसागर
चौपाई
चौथा काल लगे जब आई । तबसे रात्रि द्यौस बिलगाई ॥ कल्पवृक्ष तब जाहि लुपाई । चन्द्र सूर तारे दरशाई ॥ जिहि औसर निशदिन बिलगाना । भिन्नभाव तब जगको जाना ॥ तब मानुष ऊपरको देखे । चकिंत होय सब कहैं विशेषे ॥ यह क्या हमरी नजरमें आयो । जो हम काहू देखि न पायो ॥ तब कुलकर ब्यौरा कहि देही । चन्द्र सूर तारे हैं येही ॥ कुलकर सोई नाम धरावै । जो मानुष कुलको बिलगावै ॥ जाति वर्ण कुल न्यारा करही । तिहि अनुसार धर्म आचरही ॥ राजनीति सब भाषै ओई । खेती कर्म सिखावै सोई ॥ जब मानुष सुरतरु नहि राखै । कुलकर तबहि कूसानी भाषै ॥ तबते कृतक रही सब लोगू । अन्न उपायके भोजन भोगू ॥ जबहि देव दुम गयो दुगई । ईश्व उगी मानुष सुखदाई ॥ भांति भांतिके ऊख गन्ना । जिवको दुख दरिद्र सबभन्ना ॥ कल्पवृक्षके बदले ईखा । प्रथमहि जाको मानुष चीखा ॥ ताकी खेती प्रथमहि चाला । कुलकरकी आज्ञा सबपाली ॥ कुलकर अनुभव ज्ञान गहाई । सब जीवनको राह बताई ॥ कुलकर आदि भूप इक्ष्वाका । प्रथम चली जग जाकीशाका ॥ इक्ष्वाकू कुलकर कहलाये । प्रथम जो नरको ईश्व चुसाये ॥ अर्थ सहित यह नाम कहाया । इक्ष्वाकू जिन ईश्व चुसाया ॥ तिहि अवसर गुणदोष विभागा । पुण्यपाप मानुषको लागा ॥ कर्म दोष गुण तबते पागे । प्रकट करे कुल करके आगे ॥ कछु औगुन जब नरमें पावै । निहि कुलकर धिक वचन सुनावै ॥ सो धिक वचन सुने नर नारी । निजुमनमें अति होहि दुखारी ॥ यतनमें अस लज्जा माना । तजे तुरंत आपनो प्राना ॥
जनधर्मबोध
( ४९ )
अस कहि नर छोडे निजचोला । आज हमें कुलकर धिकबोला ॥ कछु दिस बीते मनुष दिठाई । धिक बोलीसे सो मल जाई ॥ जब धिक वचनसे राह न धरही । बहुरिधिकाधिककुलकर करही ॥ यतनेहु पर जब शर्म न माने । अधिक दंड तब कुलकर ठाने ॥ कमही क्रम औगुन अधिकाई । बेडी बांसके दे ठहराई ॥ झूली फासो दण्ड प्रचंडा । लगा होन पृथ्वी नौ खंडा ॥
इति
अथ वर्णविभाग वर्णन—चौपाई
चौथा काल आनि जब लागा । तबते मानुष जाति विभागा ॥ तीन वर्ण प्रथमहि तब कीने । छत्री वैश्य शूद्र कहि दीने ॥ दोय प्रकार शूद्र पुनि कीना । एक लीन भौ दुतिय मलीना ॥ तबते जाति बरन ठहराई । कुलकर भिन्न २ बिलगाई ॥ दोय प्रकारके लोग कहाये । यक नर यक विद्याधर गाये ॥ मानुष भू गोचरी बखानो । विद्याधर खगोचरी मानो ॥ भूगोचरी भूमि पग डाले । उडि अकाश विद्याधर चाले ॥ जाति वर्ण दोनोमें कीना । नर विद्याधर धर्म धुरीना ॥ नर विद्याधर जैनी सारे । तिरथंकर सेवा चित थारे ॥ पंचम काल लगे जब आई । तब मिथ्यात्र फैल अधिकाई ॥ जबते मिथ्या मत सरसाने । तबते विद्याधर बिलगाने ॥ चौथे काल माहँ परिपाका । प्रकटे तिरसठ पुरुष शलाका ॥ एक सौ उनहत्तर जिव सारा । चौथे काल माहँ औतारा ॥ मुक्तिपात्र कहिये नर जोई । चौथे काल प्रकटे सब सोई ॥ प्रकटे तबहि तिरथंकर देवा । सुर नर मुनि कर जाकी सेवा ॥ सुर सुरपति पृथ्वीपर आवे । तिरथंकरकी अस्तुति गावै ॥
बो० सा० ९
( ५० )
बोधसागर
ऋषभनाथ है आदि तिर्यंकर । तिनके पुत्रभे भरथ भूपवर ॥ चक्रवर्ति थे भरथ भुवाला । चौथा वर्ण कीन तिहि काला ॥ सब मानुषकी पारख लीन्हें । दायावंत अधिंक जिहि चीन्हे ॥ ब्रह्म चीन्हि जिन दाया धारा । तिनको भिन्न कियो तिहि बारा ॥ ब्रह्मन तिनको नाम पुकारी । जिनके हृदये दाया भारी ॥ चौथा वर्ण भरथ नृप थापा । तबते चार बरणकी छापा ॥ ऋषभनाथकी केवल बानी । तिहि औसर असकहैं बखानी ॥ भरथ विप्र थापे हैं जाको । चलै जगतमें तिनकी साको ॥ पञ्चम काल जाहि दिन ऐहै । ब्रह्मन जैन विरोधी ह्वैहै ॥ जैन विरुद्ध कर्म सब करिहैं । द्रोह सदा जैनीसे धरिहैं ॥ कछुदिन यहिविधि गयोसिराई । मन मत ब्रह्म न वेद बनाई ॥ जैन विरुद्ध कर्म सब ठाना । हिंसा कर्म करहिं विधि नाना ॥ अश्वमेध गोमेध रचाई । अजामेध नरमेध बनाई ॥ ब्राह्मणजातिकी अधिक प्रशंसा । लिख्यो ताहि ब्रह्माको वंसा ॥ अपने मन सब शास्त्र बनाये । सबते आपको श्रेष्ठ बताये ॥ करि प्रपंच सब थाप अचारा । जैन विरुद्ध पाखंड पसारा ॥ चौथा काल बहुरि जब ऐहै । फेर न ब्राह्मण वर्ण थपैहै ॥ बहुरि प्रतिष्ठा देय न ओही । थपै न जैन धर्मको द्रोही ॥ जाति वर्णकी बात बखानी । अब पुरुषनकी कहो कहानी ॥
छंद त्रिभंगी
चौबिस तीर्थकर जैनी शंकर बस कम कंकर धूल कियौ । गुण ज्ञान गहंत मुक्ति लहंत अरि हंतअतिचूल कियौ ॥ दाया उपदेशं रहित कलेशं मोह न लेशं धर्मधनी । कुल पद बत्तीशं बानी दीशं जैन मुनीशं भर्म भनी ॥
जनधर्मबोध
( ५१ )
अथ चौबीस तीर्थकरके नाम वर्णन
दोहा-ऋषभ नाथ प्रथमै कहो, अजित नाथ कह फेर । शंभो अभिनंदन कहो, सुमतिनाथजी टेर ॥ पदम प्रभू क्षुपारसो, चंद्र प्रभू बखान । पुष्पदंत शीतल श्रेयस, वासपुञ्ज पुनि जान ॥ बिमल अनन्तो धर्मनाथ, शांतिकुन्थ नाथोय । अर्हनाथ अरु मल्लजी, मुनि सुवृत्त कह जोय ॥ निमनाथो नेमनाथ कह, पारसनाथ कहोय । महावीर नाथो कहो, अन्त तिर्थकर सोय ॥
इति
अथ बारह चक्रवर्तियोंके नाम
दोहा-भरथ सगर मघवा कहो, सनतकुमार गनाय । सांतिनगधकुंथनाथजी, अर्हनाथ कहवाय ॥ पुनि सुभूमि पञ्चो विजय, हरिखेनो ब्रह्मदत्त । सारी पृथ्वी बश करे, कर निज्ज चक्र गहत्त ॥
अथ नौ बलिभद्रके नाम
दोहा-विजय अचलजी धर्मधर, बहुरि सुप्रभुजी होइ । फेर सुदर्शन जानिये अरु सुनन्द कहै जोइ ॥ नन्दमित्र पुनि लेखिये, रामचंद्र पुनि जान । पञ्च फेर कहि मानिये, नौ बलिभद्र प्रमान ॥
अथ नौ नारायणके नाम
दोहा-प्रथम दुपिष्ट तृपिष्टजी, बहुरि स्वयंभू गाय । पुरुषोत्तम नरसिंहजी, पुण्डरीक बतलाय ॥ केवल दत्त बखानिये, फेर लक्ष्मण मान । कृष्णचन्द्र नौमैं कहो, यदुकुल दीपक जान ॥
( ५२ )
बोधसागर
अथ नौ प्रतिनारायणके नाम
दोहा-अश्वग्रीव तारक मेरक, मधु निशुम्भ प्रहलाद । बलि रावण जरासंध नव, प्रतिनारायण बाद ॥
इति
अथ तिरसठ शलाकापुरुषके नाम-चौपाई
तिरसठ पुरुष शलाका येही । जन जान अति उत्तम तेही ॥ मात पिता तिरथंकर करो । अरतालीस जीव सो हेरो ॥ चौबिस कामदेव नौ नारद । चौदह कुलकर बुद्धिविशारद ॥ ग्यारह रुद्र यक सौ उनहतर । मुक्तिपात्र अवश्य येते नर ॥ इतने इतर और अधिकाई । केवल ज्ञान गहि मुक्त कहाई ॥
अथ जैनशास्त्र संख्या प्रमाण-चौपाई
जैन शास्त्र संख्या परमाना । ऐसे ताको सुनो बखाना ॥ बत्तिस पद सब शास्त्र कहावै । ऐसे ताको लेख लगावै ॥ प्रतिपद ढाई सौ मन स्याही । यक पद पूरन लिखिये ताही ॥ यक चावल कजल जौं लीजै । यकश्लोक पूरण तिहि कीजै ॥ बत्तिस पद यह लेख लगाई । सर्व शास्त्र ताते लिखि पाई ॥ कजल आठ सहस मन लागे । केवल वैन जैनपति जागे ॥ केवल वानी जैनको जोई । अंथ प्रमाणिक इनमें सोई ॥
अथ अष्टकर्म विधान वर्णन
दोहा-अष्टकर्म जो जैन कह, ताके बंधन जीव । भवसागर भोगे सदा, पावे नहिं निजु पीव ॥ ज्ञानी बरनी प्रथम कह, दर्शना बरनी फेर । बहुरि बेदनी जानिये, महा मोह पुनि टेर ॥
जैनधर्मबोध
( ५३ )
आयू कर्म बहुरि कहो, नाम कर्म पुनि भाष । गोत कर्म अंतराय कर्म, बरनौ तिनकी शास्त्र ॥ कर्म एकही जानिये, आठभांति सो दीस । प्रकृत जैन बानी कहै, एक सौ अरतालीस ॥
इति
अथ ज्ञानावर्नी कर्मकी पंच प्रकृति वर्णन--चौपाई
मति ज्ञानावर्नी जो कर्मा । सो आवरि राख्यो मतिधर्मा ॥ श्रुति ज्ञानी वरनी जब होई । शुभश्रुति ज्ञान फुरे नहिं कोई ॥ औध ज्ञान आवर्नी जबही । औध ज्ञान हिय होय न तबही ॥ मन पर्जय अबरन उगि आवै । सो मन पर्जय ज्ञान छपावै ॥ प्रकटे केवल ज्ञाना वरनी । केवल ज्ञान गोप तिह करनी ॥ मतिश्रुति औधअरुमनपरजाई । केवल ज्ञान पंच विधि गाई ॥ मति ज्ञान सो नाम बताई । मति बुधिते जेती चतुराई ॥ कारीगरी अरु गुन गन जेते । मति ज्ञान करि ल्हिये तेते ॥ द्वितिये श्रुति ज्ञानजिहि कहई । सर्व शास्त्र मुख पाठ जो रहई ॥ तीन काल देखे श्रुति द्वारा । जाने सकल अचार विचारा ॥ श्रुति केवल ज्ञानी कह सोई । पूरन जो श्रुति ज्ञान ते होई ॥ श्रुतिके बली जो पंडित पूरा । श्रुति द्वारे संशय कर दूरा ॥ तृतिये औध ज्ञान जब होई । मनकी बात जाने सब सोई ॥ जाके मनमें जो कछु भासा । सब औधते होय प्रकाशा ॥ चौथे कह मन परजय ज्ञाना । जो मनकी परजायको जाना ॥ जहाँ जहाँ मन छन २ करदौरा । जो कछु फुरै जाय जिहि ठौरा ॥ मन परजय सो सबही जानो । सूक्ष्म गति मन कछु नदुरानो ॥ पंचम केवल ज्ञान कहावै । ताकी उदय मुक्ति जिव पावै ॥ केवल ज्ञान जो हृदय प्रकाशा । सकल भर्म भयकेर विनाशा ॥
( ५४ )
बोधसागर
केवल ज्ञानी साधू जोई । गुप्त बस्तु तिनते नहीं कोई ॥ पंच पौरि जो ज्ञानको कहिया । ताको ऐसो लेखा लहिया ॥ मति ज्ञान जिहि पूरन होई । श्रुतिज्ञान अधिकारी सोई ॥ श्रुति ज्ञानते औध गहावै । औधते मन पर्जय जगिश्नावै ॥ मन परजयते केवल ज्ञाना । मतिश्रुतिऔधजोप्रथमबखाना । तीन पौरि लो भ्रम नहीं दूटै । चौथ पौरिते पंचम जूटै ॥ तीन ज्ञान लो हो अरु जाई । मन पर्जय नहीं फिर बिनशाई ॥ मन परजय अरु केवल ज्ञाना । होके बहुरि न कबहुँ लुपाना ॥ याहुमें विधि बहुत बखाना । पौरिहुको नहीं कछु बंधाना ॥ अकसमात कबहुँ अस होई । बिना औध केवल लह लोई ॥ बिन मन पर जयकेवल ज्ञाना । निर्णय जैन धर्मपर माना ॥ ज्ञानावर्ण ते ज्ञान न होई । अवरन भंजि लाभ हो सोई ॥ ज्ञानावरनी पंच बताओ । बहुरि दर्शना वरनी गावो ॥
इति
अथ दर्शना वरनी कर्मकोना प्रकृति वर्णन--चौपाई
द्वितिय दर्शना वरनी पहारा । जाके ओट अलख कर तारा ॥ चक्षु दर्शना वरनी जो बंध । जोजिव करै होयसो अंधा ॥ अक्षर दर्शना वरनी जाही । शब्द परसरस व्यौरा नाही ॥ औध दर्शना वरनी उदोता । विमल औध दर्शन नहीं होता ॥ केवल दर्शना वरनी जाहा । केवल दर्शन होय न ताहा ॥ ध्यान अरुझि निद्रामें परई । सो प्रानी विशेष बल करई ॥ उठि उठि चले करे कछु बाता । करे प्रचंड कर्म उत्तपाता ॥ निद्रा निद्रा उदय पुकारी । सके न सो जिव पलकउघारी ॥ प्रचला प्रचला जबलो गहई । चंचल अंग लार मुख बहई ॥ निद्रा उदय जीव दुःख भरता । उठै चले बैठै गिर परता ॥
जनधर्मबोध
( ५५ )
रहै आँखि प्रचलाते बांधी । आधी बंद खुली रह आधी ॥ सोवत माहँ सुरति कछु रहई । बार बार लछु निद्रा गहई ॥
इति
अथ वेदिनी कर्म द्विविधिवर्णन--चोपाई
कर्म वेदिनी द्वे विधि हुवा । साता एक असाता दूवा ॥ साता कर्म उदय जब होई । जीव विषय सुखवेदक होई ॥ कर्म असाता उदय जो होई । जिव वेदै दुख खेदत होई ॥
इति
अथ मोहनी कर्म द्विविधि वर्णन--चोपाई
दो विधि मोहनी कर्म बखानी । यक दर्शन यक चारित हानी ॥ दर्शन मोह दुविध उच्चार । चारित मोह पचीस प्रकारा ॥ प्रथम मोह मिथ्या ती होई । जिव जब और कि और गहोई ॥ दूजे मोह मिश्रकी चाला । सत् असत् गहै समकाला ॥ तृतीय मोह समकित कहीदीनी । जिन मलीन सम कितकह कीनी ॥ दर्शन मोह त्रिविध यह भाषा । सुन पचीस अबचारितशाखा ॥ प्रथमै सोलह कहो कषाई । फिर नौविधिको लेखलखाई ॥ प्रथम कषाय क्रोध कहि दीजै । जाकी उदय क्षमा गुन छीजै ॥ द्वितीय कषाय मान परचण्डा । बिनय बिनाश करे सतखण्डा ॥ द्वितीय कषाय है माया रूपी । जाकी उदय सरलता गूपी ॥ चौथे लोभ कषाय प्रकाशा । जासु उदय संतोष बिनाशा ॥ येही चार कषाय कहीजै । अनुक्रम सूक्ष्म थूल गहीजै ॥ सो चारो चौगुना करीजै । ताते सोलह भेद भनीजै ॥ अनन्ता अनबाँधिया कषाई । तासु उदै नहिं समकित थाई ॥ जाको कहिये प्रत्याख्यान । तहां सर्व संयमकी हानी ॥ उदय अप्रत्याख्यान होई । सो पञ्चम गुन थान करखोई ॥ जोत ज्वलन नाम कहलावै । यथा ख्यात चारित विनशावै ॥
( ५६ )
बोधसागर
क्रोध मान माया अरु लोभा । चारो चार चार विधि शोभा ॥ यह कषाय षोडश विधि बाना । नौकषाय अबनिज चितधरना ॥ राग द्वेषकै हासी होई । हास्य कषाय कहावै सोई ॥ मगन होय जबजिव सुखमाही । रति कषाय रस बरनौ ताही ॥ कछु न सोहाय जीवको जहवाँ । अरति कषाय बोलिये तहवाँ ॥ थर हर जहाँ जीव कँपाई । भय कषाय सो नाम धराई ॥ रुदन विलाप वियोग दुखारी । जहाँ होय सो सोग विचारी ॥ जहँ गलानि उपजै मनमाही । सो दुग्धा रोग कहाही ॥ त्रिविधि वेद स्थिति वर्णों सोई । नर अरु नारि नपुंसक जोई ॥ प्रथमैं सोई करिये वर्णन । जीव पुरुष वेदीको लक्षण ॥ यथा अग्नि तृण मूला केरी । शिखा उत्तंग तासुकी हेरी ॥ अल्पकाल अति आतप ताई । अल्पै काल माह विनसाई ॥ पुरुष वेद धारी जिव ऐसे । धर्म कर्ममें रह नित जैसे ॥ महा मगन तप संयम माहीं । तन तावै तनको दुःख नाहीं ॥ चित औदार उद्भूत परमाना । पुरुष वेद धर आतमरामा ॥ बनिता वेदी बहुरि कहींजै । जिमि कोइलाकी अग्नि गहीजै ॥ जिमि कोइलाकी अग्निहोतीखी । परकट धुवाँ न तामैं दीखी ॥ सिलिगिसिलिगि उरअंतरदाहा । रहै निरन्तर अति अवगाहा ॥ तिमि बनिता वदी नर होई । मीठी बोल बोलता सोई ॥ बाहर ताकी मधुरी बानी । भीतर कपट छिद्रछल सानी ॥ कपटलपट करिके अधिकारी । निजगलकुगतिको बंधन डारी ॥ पापकर्म औरनको सिखई । सबको अंध करे सो विषई ॥ आपा हनि औरनको हनता । निज कुमंत्र बहुतनते भणता ॥ बनिमा वेदी ऐसो गुनिये । तृतीय नपुंसक वेदी सुनिये ॥ नगनदाह सम प्रकट न दीसा । गुप्त पजावा अग्नि सरीसा ॥
जनधर्मबोध
( ५७ )
जैसे हो करसीकी आगी । रहै सदा उर अंतर लागी ॥ महाकलुषता नित उर जेही । वेद नपुंसक धर नर येही ॥ नर अरु नारि नपुंसक माही । भविधि मदनमद जैन कहाही ॥ प्रथम तीन मिथ्यात बखाना । बहुरि पचीस कषाय विधाना ॥ दोनों मिलि अद्रठाइस होई । मोह प्रकृत जानिये सोई ॥
इति
अथ आयुकर्म चारप्रकार वर्णन-चौपाई
आयू कर्महै चार प्रकारा । नरपशु देव नारकी धारा ॥ उदय मनुष आयू नरभोगा । पशुआयूते पशु संयोगा ॥ सुरआयू सुरपदको जाता । नारक आयू नरक निपाता ॥
इति
अथ नामकर्मको तिवानव प्रकृतवर्णन- चौपाई
छठये नाम कर्म कहलावै । जीवको मूरतवंत बनावै ॥ नाम कर्म यह चतुर चितेरा । मूरतखंच रंच नहिं फेरा ॥ पिंडप्रकृत चौदह परतारा । अद्रठाईस अपिंड विस्तारा ॥ पिंडभेद पुनि चौसठ भाषा । अद्रठाईस अपिंड मिलिसाखा ॥ ते दूनों तिरानवे होई । पिंड अपिंड बयालिस जोई ॥ सो तिरानवे करो बखाना । श्रवण लायके सुनो सयाना ॥ प्रथमहि पिण्डप्रकृत गतिनाना । सुरनर पशु नारकदुखधाना ॥ देवदेह सुरगति उद्यौता । नरशरीर नरगतिसे होता ॥ पशुगतिसे जिव पशुतन पावै । नरक गती ले नरक बसावै ॥ चहुगति पूरबी चारो गनिये । द्वितिये पिंडप्रकृतअब सुनिये ॥ मरनसमय तनतज जिवजबही । परभवगौन तौनकर तबही ॥ पूर्वप्रकृत ल्यावै तिहि प्रेरी । भावी गतिमें ल्यावै घेरी ॥ करे पूरबी आनि सहाई । धरि नवीनतन जिव प्रकटाई ॥
( ५८ )
बोधसागर
तृतीये प्रकृत इंद्री अधिकारा । यक द्वै त्रै चौ पंच प्रकारा ॥ परस जीव नासा हग काना । यथायोग जिव नाम बखाना ॥ सूक्ष्म इंद्री धरे जो कोई । मुखनासा हग कान न होई ॥ सो एकेंद्री थावर काया । भू जल अग्नि बनपती बाया ॥ जाको तन रसनायुत बादी । जलचर शंख जौं क गेडुवादी ॥ ऐसे जंत अनंत जो दीसा । ते द्वै इंद्री कह जैनीशा ॥ जाके तन मुख नाक हजुरा । घुन पमील अरु कान खजुरा ॥ ये सब जिव त्रै इंद्री भाषो । आंखिकानयुत रसजिनचाखो ॥ जाके तन मुख नासा आंखी । बीछूशलभ टीडी अलिमाखी ॥ यहि प्रकारके जिव जो नाना । सो चौ इंद्री जैन बखाना ॥ त्वच रसना नासा हग काना । ज्योंके त्यों पंचेद्रिय जाना ॥ नर नारकी देव पशुचारी । ये पंचेद्री करो बिचारी ॥ चौथी प्रकृत शरीर उचारी । औदारिक बसकिय वपुधारी ॥ औदारिक जो उदरसे होई । नर पशु योनि जानिये सोई ॥ देव नारकी भय किय देही । गर्भवास करते नहिं येही ॥ सुर नारक वय किय वपु धरते । देव देह मुनि तपबल करते ॥ जस प्राकृत तैसो तन गहेऊ । चौथी पिंड प्रकृत यह कहेऊ ॥ तनबंधन संघातन दोई । प्रकृत पंचमी छट्ठी होई ॥ बंधन उदय काय बंधाना । संघातनते हठ संधाना ॥ दोहुकी द्वै साखा द्वै खंधा । यथायोग काया सनबंधा ॥ अब सातमी प्रकृतको कहिये । सांगोपांग तीन मन लहिये ॥ कहो आठमी प्रकृत विचारा । षटविधि रूप शरीराकारा ॥ जो सर्वांग चारु परधाना । सो तनसम चतुरंश बखाना ॥ ऊपर थूल अधोगति ठामा । सोनिगोद पर मंडल नामा ॥ हेठ थूल ऊपर कृश होई । शांतिक नाम धरावै सोई ॥
जनधर्मबोध
( ५१ )
कूबर सहित वक्र वपु जांको । कुबजाकार नाम है ताको ॥ लघुस्वरूप लघुजाहि निहारो । तासु नाम बावन वपु धारो ॥ जो सरवंग असुंदर भुण्डा । ताको नाम कहावै हुण्डा ॥ अष्टम प्रकृत भेद षट भाषा । अब नौमे कह अस्थिकि साखा ॥ प्रथम बखान अस्थि आरंभा । सो षट विधिसै तनको थंभा ॥ वज्र कील कीलित संधाना । ऊपर वज्र पट्ट मंडाना ॥ अन्तर हाड वज्रमय राचा । सो कह वज्र ऋषभ नाराचा ॥ दुतियों हाडजह वज्र सो होई । वज्र मेखते अविचल सोई ॥ ऊपर बैठन रूप समाना । ताहि वज्र नागच बखाना ॥ तृतिये हाड जहवज्र सो देखो । रहित वज्र पट ऊपर लेखो ॥ नहीं वज्रकी लीजो होई । नाम नराच कहावै सोई ॥ चोथे हाड जो वज्र सो नाही । अर्धबेध कीली न तेहि माही ॥ ऊपर बैठन वज्र न जाही । अर्धन राव बोलिये ताही ॥ पंच महाडन वज्रसो जिनको । नहि पटबंधन कीली तिनको ॥ कीलित तब हट्ट बंधन धारे । नाम कीलका तासु उतारे ॥ छठी अस्ति अब वर्णन करही । जो यहि काल जीव सब धरई ॥ जहाँ हाडते हाड न बंधा । अमिल परस्पर संधिन संधा ॥ ऊपर नसा जाल अरु चामा । ताको कहिये छेवट नामा ॥ दशमी प्रकृत गमन आकाशा । शुभ अशुभ दो भेद प्रकाशा ॥ शुभ उग जीवकर्म शुभ करई । अशुभके उगे कुमारग धरई ॥ जैसी प्रकृत उदय जिहि होई । तैसा कर्म करे जिव सोई ॥ कहाँ ग्यारही प्रकृत बिचारा । ताको भेद पंच परकारा ॥ श्वेत अरु दुति पीत कहीजै । हरित श्याम पांचोगति लीजै ॥ जिहि जो संगप्रकृत उगि आवै । ताको तैसा बरण बनावै ॥ प्रकृत बारहीको रसनामा । पंच मकार देखिये तामा ॥
( ६० )
बोधसागर
कटुम मधुर अरु तित्त बखाना । अमल कषाय पंच परमाना ॥ रसके उदय रसीली काया । निजुनिजुप्रकृतिजीवसबपाया ॥ जो प्रकृत जाको उगि आवै । तिमि सो देह रसीली पावै ॥ तेरही प्रकृत गंधमय जाना । दुविधि कुगंध सुगंध बखाना ॥ जो जिव जैसी प्रकृत बंधा । ताके तनमें तैसो गंधा ॥ परसनाम चौदही बर्नीजै । आठ शाख तिहि माहैं गनीजै ॥ चिकनी रूप कोमल कठिनाई । लघुभारी तप शीतलताई ॥ औ चिकनी प्रकृत सुभाया । तब जीव गहै चीकनी काया ॥ रूपी प्रकृति उदयहो जिनकी । रूपी काया देखो तिनकी ॥ कठिनउदयतिन कठिनविहारो । मृदुल उदय मृदु अंग निहारो ॥ तस उदय हो तप तन येही । शीतल उदय शीत सो देही ॥ भारी नाम जो प्रकृत उद्योता । सो जिव भारी तनधरि होता ॥ लघुप्रकृतिजिहिजिवकह परई । हरई काया सो तब धरई ॥ चौदह पिण्ड प्रकृति यह भाषा । कहो बहुरि तिहिपै सठ शाखा ॥ अब अपिंडको वर्णन कीजै । अट्टाइस शाखा गनि लीजै ॥ प्रकृतअगुर लघु जब उगिआवै । जीव अगुर लघु तन तब पावै ॥ जबअपु घावउदय निजअंगा । आपु दुखी नर तासु प्रसंगा ॥ जब परघात प्रकृत परकाशा । तब जिव औरकोप्राणविनाशा ॥ जब उश्वासा प्रकृत निवासा । तब जिव लेत श्वास उश्वासा ॥ आतप उदय यथा इन भानू । उदितउदय तब शशीसमजानू ॥ तिस प्रकृत जब प्रकट निहारी । जंगम तनधरि जीवविहारी ॥ थावर प्रकृति प्रकाश जो होई । थिर तनधरि जिव चलैनकोई ॥ सूक्ष्म प्रकृति जाहिको परई । औरके मारे सो नहिं मरई ॥ बादल उदय न तन पावै । सबके मारे सो मरि जावै ॥ प्रजापति प्रकृति प्रकटाई । पूरी परजापति जिव पाई ॥
जनधर्मबोध
( ६१ )
उदय अपरजा पति जिहिपाही । पूरी देहु तासुकी नाहीं ॥ प्रकृति प्रत्येक उदय जब होई । काय बनस्पति हो जिव सोई ॥ जड़ त्वचकाठ फूल फल पाता । बीज मही तरास कह साता ॥ सातभेद तन जिव तहैं एकू । सो जिव कहिये राम प्रत्येकू ॥ दो विधि प्रत्येक बनस्पति जानो । प्रतिष्ठित अपरतिष्ठित मानो ॥ धार अनंत रास जो कायक । ताहि प्रतिष्ठित कहै सुभायक ॥ जामैं नहिनि गोदको धामा । अप्रतिष्ठित प्रत्येक सो नामा ॥ काय बनस्पति कह साधारण । सूक्ष्म बादर दुविधि विचारण ॥ संग्रह एक एकही देहा । तिहि कारण निगोद कहयेहा ॥ पिंडनिगोद है रास अनंता । पूरित नभको पावै अंता ॥ सूक्ष्म बादर दोय प्रकारा । नित्य अनित्य नाम जो धारा ॥ गोलक रूपी पाँचो धामा । अँडर खँडर इत्यादिकनामा ॥ सो सब नरक पातको जानी । तिनको दुख को सकै बखानी ॥ जीव निगोध एक तन माही । एते जिव कछु वर्ण न जाही ॥ धरे जन्म सब एकै बारी । मरण एकठे मास बिचारी ॥ एक श्वास उच्छ्वासके माहीं । तिनको जन्म भरन असआहीं ॥ जन्म अठारह बारहैं जिनको । मरब अठारह बारहि तिनको ॥ एक श्वास उच्छ्वासहि काला । तिनके जन्म मरणकोख्याला ॥ एक निगोद शरीरके माहीं । एते अमित जीव तहैं आहीं ॥ तीन कालके सिद्ध जो नाना । तिनकै एक अंश परमाना ॥ जीवगोदकी कथा अनंतो । वर्णन इत न होय बुधवंतो ॥ साधारण प्रकृति जब लहई । ताते जिव निगोदतन गहई ॥ साधारण प्रकृत लो बरना । चौदह शाखा तामैं धरना ॥ शेष और जो चौदह रहई । ऐसो ताको व्यौरा कहई ॥ थिरप्रकृत तनमें थिरताई । अथिर उदैते तन अथिराई ॥
( ६२ )
बोधसागर
शुभ प्रकृतिते सब शुभ रीती । अशुभ उदैं ते अशुभ गहीती ॥ जब सुभाग प्रकृत जिव धारा । सो प्रानी हो सबको प्यारा ॥ जब दुरभाग प्रकृति उगि आवै । तिहिलखिसबको जीव घिनावै ॥ जब स्वस्वर प्रकृति प्रकटानी । होय मधुर कोकिल सम बानी ॥ जब दुःस्वर प्रकृति तनधारा । साकी धुनि स्वर मनहुँ पुकारा ॥ जब आदेय प्रकृति संजूता । ताको आदर मान बहुता ॥ अनादेय परप्रकृत जब होई । आदर मान करे नहिं कोई ॥ जब जस नामप्रकृति नर पाहीं । ताको यश कीरति जगमाहीं ॥ अयश नाम परकृत फुरानी । अपयश अपकीरति जगठानी ॥ जब निरमान चितेरा आवै । सुंदर अंग उपंग बनावै ॥ तिरथंकर प्रकृतिके भेवा । सो जिव हो तिरथंकर देवा ॥ नाम प्रकृति अब पूर्ण कीने । पिंड अर्पिंड दोउ कहि दीने ॥ पिंड प्रकृति भाषे दशचारी । ताकी पैसठ शाख उचारी ॥ अट्टठाइस अर्पिंड गति बरनो । ते सब मिलि तिरानमें धरनो ॥ तन संबंधी दश पुनि औरा । यकसौ तीन गनो यक ठौरा ॥
इति
अथ गोत्रकर्मकी दो शाखावर्णन-चौपाई
गोत्र कर्म प्रकृति है दोई । ऊंच नीच कुल ताते होई ॥ ऊंच गोत्र उद्यौत प्रमाना । पावै जिव ऊंचे कुल थाना ॥ नीच गोत्रफल संगत पाई । नीच गोत्रगहि जिव प्रकटाई ॥
इति गोत्र
अथ अंतराय कर्मकी द्वि शाखावर्णन-चौपाई
अब सुन अंतराय निरबारा । अष्टम करम परम ठगहारा ॥ अंतरायकी नौ द्वै धारा । निश्चय एकएक व्यौहारा ॥ प्रथम कहो निश्चयकी बाता । जासु उदय आतम गुणघाता ॥
जैनधर्मबोध
( ६३ )
परगुण त्याग होय नहिं जहँवा । दान कि अंतराय कह तहँवा ॥ आतम तत्त्व लाभकी हानी । लाभ कि अंतराय सो जानी ॥ जबलो आतम योग न होई । योगको अंतराय कह सोई ॥ बार बार नहिं जगि उपयोगा । उपयोग अंतराय सो भोगा ॥ अष्ट कर्मते नहिं बिलगावै । बीरज अंतराय उगि आवै ॥ निश्चय कहीं पंच परकारा । अब सुन अंतराय व्यौहारा ॥ तुच्छ वस्तु कछु देय न सकई । दान कि अंतराय बल ठकई ॥ उद्यम किये न संपति होई । लाभ कि अंतराय कह सोई ॥ विषयभोग सामग्री जाही । जीवभोग करि सकै न ताही ॥ रोग होय कै भोग न जुरई । भोग कि अंतराय बल फुरई ॥ एक भोग सामग्री सारा । भोग ताहिको बारहि बारा ॥ कीजै सो कहिये उपभोगा । ताहूको न जुरै संयोगा ॥ यह उपभोग घात बिरुयाता । बीरज अंतराय सुन बाता ॥ जीवकी शक्ति अंत बताई । सो जग दशामें रही दवाई ॥ जगमें शक्ति कर्म आधीना । कबहुँ सबल कबहु बलहीना ॥ तन इन्द्री बल फुरै न जहँवा । बीरज अंतराय कह तहँवा ॥ ताते जक्त दशा परमाना । जैन धर्मध्वज बैन बखाना ॥ यह व्योहार प्रकृतिकह पंचो । तिहि विचार भ्रम रहै न रंचो ॥ प्रकृति विचार वर्ण यह भयऊ । जन जेष्ठ जस वानी कहेऊ ॥
इति अष्टकम्
अथ अष्ट कर्मकी आयुस्थितिवर्णन—चोपाई
ज्ञानी बर्नीकी स्थिति दीशा । कोडा कोडी सागर तीसा ॥ यह उत्कृष्ट दशा परमाना । एकमुहूर्त जघन्य बखाना ॥ दुतिय दर्शना वरनी कर्मा । थित उत्कृष्ट कहो सुन मर्मा ॥ कोडा कोडी तीस समुद्रा । एक मुहूरतकी थित छुद्रा ॥
( ६४ )
बोधसागर
तीजा कर्मवेदिनी जानी । कोडा कोडी तीस बखानी ॥ यह उत्कृष्ट महाथित सोई । जघन मुहूरत द्वादश होई ॥ चौथे महामोहको मानी । थित उत्कृष्ट जैनपति बानी ॥ सागर सत्तर कोडा कोड़ी । लघु थित एक मुहूरत जोड़ी ॥ पंचम आयू कर्मशरीसा । उत्कृष्टी सागर तैंतीसा ॥ थित जाघन्न मुहूरत एका । जैन ज्येष्ठ कह सहित विवेका ॥ छठये नामकर्म निरुवारी । कोडाकोड़ी बीस विचारी ॥ यह दीरघ आयू थितधारी । जघन मुहूरत कहिये चारी ॥ गोत्र कर्म सातमा कहाये । उत्कृष्टी थित बीश बताये ॥ कोड़ाकोड़ी काल प्रमाना । लघु थित एक मुहूर्त बखाना ॥ अष्टम अंतराय जो उजागर । कोडाकोडी तीस है सागर ॥ लघु थित एक मुहूरत धर्मा । आयू विविधि भांतिसे बर्ना ॥ दीरघ मध्यम लघु कहि भाषा । काल प्रमान भांतिबहुराखा ॥
इति
अथ सागरप्रमाणवर्णन—चौपाई
सागरको अब करों बखाना । जैनधर्मको सुनो प्रमाना ॥ योजन दोय केर चौकोरा । सागर नाम ताहिको शोरा ॥ दोय सहस्र कोश जिहि माहीं । योजन पक्वा कहिये ताही ॥ सोई योजन सुनो प्रमाना । ताका यह चौकोर बखाना ॥ भेडरोमके तहाँ लेआई । ताका यह चौकोर बनाई ॥ रोमखंड अस करे जो कोई । खंड एक पुनि खंडन होई ॥ रोमभाग सब यकठे करिये । सो सब तिहि सागरमें भरिये ॥ रोमखंड जब पूरन कीजै । सागर ऐसो कठिन भरीजै ॥ दाबि दाबिके ऐसे भरना । परमकठिन सो सागर करना ॥ चक्रवर्त सेना समुदाई । तिहि सागरपरसे लंघि जाई ॥
जनधर्मबोध
( ६५ )
दवै न हेठ भारसो पाईं । रोमखण्ड पूरण कठिनाई ॥ ऊपर हेठ रोम तहाँ भाली । रश्मिहु कतहूँ रहै न खाली ॥ अस पूरण चौकोर जो होई । सागर नाम बखानो सोई ॥ जितने खण्ड रोम गनि लीजै । तितने वर्ष प्रमान करीजै ॥ ऐसे कठिन पूर्ण लखि जाको । सागर एक नाम है ताको ॥ कोड कोड पर ताको गुनिये । कोडा कोडी सागर सुनिये ॥ तीस कोड अरु तीसै कोडो । सोलह सुन्न ताहिमें जोड़ो ॥ कोडा कोडी तीस कहीजै । यों सागरको लेखा लीजै ॥ कोडा कोडी सागर बनते । मानुष आयू ताते गनते ॥ एते कोडा कोडी जीये । ता पीछे तन त्याग सो कीये ॥ ऐसहि कूप समुद्र कहानी । जिमि सागरको लेखा जानी ॥ विविधि भांतिसे कीना लेखो । जैन धर्म सो निर्णय देखो ॥ लघु दीर्घ आयू बहुतेरी । यथाकाल बल तैसो हेरी ॥ जबलौं आगे कर्म न टूटै । तबलौं जीव योनिमें जूटै ॥ अष्टकर्म रिपु जो संहारे । तासु नाम अरिहंत पुकारे ॥ जब ये कर्म जीवते टलके । तिमिर विहाय रूप तब झलके ॥
इति
अथ बारह भावनी अथवा आत्मगुण वर्णन
दोहा—प्रथम अथिर अशरण जगत, एआन असुचान । आश्रय संबर निरजुरा, लोकबोध दुलभान ॥
चौपाई
जक्तवस्तु कछु थिर नहिं परसै । देहरूप आदिक जो सरसै ॥ थिर बिन प्रीति कौनते कीजै । अथिर जानि ममता तजिदीजै ॥ अशरण तोहि शरण कोइ नाही । देखो तीन लोकके माहीं ॥
बो० सा० ९
( ६६ )
बोधसागर
तेरो कोइ न राखनहारा । कर्मके वश चेतन निरधारा ॥ यहि संसार भावनी येहा । पर दर्बनसे कीजै नेहा ॥ तू चेतन ये जड सरबंगा । ताते तजो पराया संगा ॥ जीव अकेला आपतकाला । अर्ध मध्य भौन पाताला ॥ दूजा कोइ न तेरे साथा । सदा अकेला फिरै अनाथा ॥ भिन्य सद पुदगलसे रहई । भर्मभाव करि जडता गहई ॥ ये पुदगल रूपीके खंथा । चिदानंद तू सदा अबंधा ॥ अशुचि देखि देहादिक अङ्गा । कौन कुवस्तु लागि तेहि संगा ॥ हाड मांस रुधिरो गदगेहा । निरखि सूत्र मल तजो सनेहा ॥ असै परसे कीजै प्रीती । ताते बन्ध बढै विपरीती ॥ पुदगल तोहि अपन कोइ नाही । तू चेतन ये जड सबआहीं ॥ संवरपर रोकनको भाऊ । सुख होनेको यही उपाऊ ॥ चिदानंद हो निर्मल आपू । मिटै सहज परसंग मिलापू ॥ गहि लीजिये आपनो कर्मा । जाते प्रकट होय निज धर्मा ॥ थिति पूरी हो खिरखिर जाई । निरज्वर भाव बढै अधिकार्ई ॥ लोकमाहैं तेरो कछु नाही । लोक आन तू आन लखाहीं ॥ है यह षट्दर्बनको धामा । चिदानंद तू आतम रामा ॥ धर्म सुभाव आपनो जानो । आप सुभाव धर्म सो मानो ॥ जब तोहि धर्म प्रकट है आवै । तब परमात्म पदै लखि पावै ॥ दुर्लभ पर दर्बनको भाऊ । आपा नहिं दुर्लभ सुन राऊ ॥ जाँ तेरो है ज्ञान अनूपा । तौ नहिं दुर्लभ शुद्ध स्वरूपा ॥
इति
अथ जनयतिके अट्टाईस मूलगुण वर्णन
सोरठा-पञ्च महाव्रत सञ्च, सुमति पञ्च परकार है । इंद्रियाणि दम पञ्च, षट् अचार पृथ्वी शयन ॥