भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1895, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1895

३३

कबीर चरित्रबोध

( १८१७ )

मनुष्योंको अपने सम्मुख आनेकी आज्ञा दे दी । उसी दिन यह कहावत भी प्रसिद्ध हुई ।

हरिको भजे सो हरिका होय । जाति पांति पूछे नहीं कोय ॥

बादशाहका दोवार कबीर साहबका परचा देखना और उनपर पूर्ण विश्वास करना

यह कौतुक देखकर वैरियोंके दांत खट्टे हो गये और जिह्वा बंद हो गयी तब फिर सब ब्राह्मण और काजी जो कबीरसाहबसे द्वेष रखते थे बादशाहसे फरियाद करने लगे कि, यह कबीर बड़ा काफिर है । इसने जादूसे रामानंद स्वामीको जीवित किया है । और हिंदू तथा मुसलमान दोनों दीनोंका खण्डन करता है और अपनेको परमेश्वर कहता है । प्रत्यक्षमें ही पुकारता फिरता है कि, मैं समस्त संसारका रचयिता हूँ और सदैव कुफ्र बकता रहता है । तब बादशाहने कबीर साहबसे पूछा ।

शाह सिकंदर बोलता, कह कबीर तू कौन । गरीबदास गुजरे नहीं, कैसे बैठा मौन ॥

उत्तर कबीर साहबका

हमही अलख अल्लाह हैं, कुतुब गौस गुरु पीर । गरीबदास मालिक धनी, हमरो नाम कबीर ॥ मैं कबीर सर्वज्ञ हूँ, सकल हमारी जात । गरीबदास पिण्ड प्राणमें, युगन युगनसँग साथ ॥ शाह सिकंदर देखकर, बहुत भए मिसकीन । गरीबदास गति शेरकी, थरकी दोनों दीन ॥

जब कबीर साहबने सर्व साधारणके सामने बादशाही इजला- गमें अपने परमेश्वर होनेका दावा किया और खुल्लमखुल्ला