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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीर चरित्रबोध

( १८१७ )

मनुष्योंको अपने सम्मुख आनेकी आज्ञा दे दी । उसी दिन यह कहावत भी प्रसिद्ध हुई ।

हरिको भजे सो हरिका होय । जाति पांति पूछे नहीं कोय ॥

बादशाहका दोवार कबीर साहबका परचा देखना और उनपर पूर्ण विश्वास करना

यह कौतुक देखकर वैरियोंके दांत खट्टे हो गये और जिह्वा बंद हो गयी तब फिर सब ब्राह्मण और काजी जो कबीरसाहबसे द्वेष रखते थे बादशाहसे फरियाद करने लगे कि, यह कबीर बड़ा काफिर है । इसने जादूसे रामानंद स्वामीको जीवित किया है । और हिंदू तथा मुसलमान दोनों दीनोंका खण्डन करता है और अपनेको परमेश्वर कहता है । प्रत्यक्षमें ही पुकारता फिरता है कि, मैं समस्त संसारका रचयिता हूँ और सदैव कुफ्र बकता रहता है । तब बादशाहने कबीर साहबसे पूछा ।

शाह सिकंदर बोलता, कह कबीर तू कौन । गरीबदास गुजरे नहीं, कैसे बैठा मौन ॥

उत्तर कबीर साहबका

हमही अलख अल्लाह हैं, कुतुब गौस गुरु पीर । गरीबदास मालिक धनी, हमरो नाम कबीर ॥ मैं कबीर सर्वज्ञ हूँ, सकल हमारी जात । गरीबदास पिण्ड प्राणमें, युगन युगनसँग साथ ॥ शाह सिकंदर देखकर, बहुत भए मिसकीन । गरीबदास गति शेरकी, थरकी दोनों दीन ॥

जब कबीर साहबने सर्व साधारणके सामने बादशाही इजला- गमें अपने परमेश्वर होनेका दावा किया और खुल्लमखुल्ला

( १८१८ )

बोधसागर

३४

कहा कि, मैं समस्त सृष्टिका रचयिता हूँ । तब बादशाहने एक गाय मैंगवायी और सामने हलाल करवाकर कबीर साहबसे कहा कि, यदि आप परमेश्वर हो तो इस गायको जीवित करो । कबीर साहबने बादशाहसे कहा क्या ईश्वरकी परीक्षा इसीसे होती है तुम्हारे पीरने तुम्हें यही उपदेश किया है ? इतना कहकर-

चुटकी तारी थाप दे, गऊ जिलाई बेग ।

गरीबदास दूहन लगे, दूध भरी है देग ॥

जब शाहने गायको हलाल करवाय और कबीर साहबसे कहा कि, इस गऊको जीवित करो तब कबीरसाहबने उस गायको थापी दिया, चुटकी मारा, उसी समय वह गाय उठ खड़ी हुई और उसका सब घाव तथा दर्द मिट गया । उसका स्तन दूधसे भर गया और उसके दुग्धसे बरतन भर गये जिसको ( उस दुग्धको ) पीकर लोग अत्यन्त हर्षित हुए । और शाह सिकन्दर तथा उसके सभासदगण इस कौतुकको देखकर अत्यन्त आश्चर्यान्वित हुए । बादशाहने विशेष श्रद्धा विश्वास किया ।

शेखतकीका क्रोध और कबीर साहबकी कसनी

जब शाह सिकन्दरके पीर शेखतकीने देखा कि, अब तो शाह सिकंदरने कबीर साहब पर बहुत विश्वास किया और उनकी अत्यन्त प्रतिष्ठा तथा मर्यादा करता है तब वह जल मरा, कारण यह कि, वह बड़ा ही द्वेषी तथा ईर्षा करनेवाला था । तब उसने बादशाहसे कहा कि ऐ सिकन्दर ! आपने जोलाहेने प्रेम तथा मुझसे वैर किया । तब बादशाहने कहा कि, ऐ गुरुजी ! आप तो मेरे पीर हो और वह एक दुरवेश ( साधु ) है । आपने आज्ञा दिया था कि, गुरु तथा फर्क

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कबीर चरित्रबोध

( १८१९ )

स्वयम् परमेश्वर हैं। आप और कबीर एक ही हैं। मैं जलनकी बीमारीसे मर रहा था, मेरे जाते हुए प्राण उसने रख लिये और मैंने घातक रोगसे आरोग्य लाभ किया।

जब बादशाहने ऐसा कहा तब शेखतकी चुपचाप अपने डेरोंको चले गये। शेखतकी और बादशाहसे जो जो बातें हुईं उन सबोंका पता लगाकर वैरियोंने अपने मतलबका अवसर पाया। जब शेखतकी अपने डेरोंमें बैठे तब वे लोग शेखतकीके पास आकर एकत्रित हुए। और ब्राह्मण तथा मुल्ला सब मिलकर कहने लगे कि, यह कबीर बड़ा काफिर है। यह हिन्दू तथा मुसलमान दोनोंकी निन्दा करता है। हम लोग गुरु तथा देवताके नामपर जो बलिप्रदान करते अथवा कुरबानी चढ़ाते और बकरी सुरगा चढ़ाते हैं उसको देखकर यह हम लोगोंको कसाई कहता है। इसको समस्त काशीवासी मानते हैं और हमारी कोई बात नहीं पूछता, यदि यह जोलाहा किसी प्रकार मारा जावे तो हमारी छातियोंपर का भारी बोझा टल जावे।

जब शेखतकीने ब्राह्मणों तथा मुसलमानोंसे ऐसा सुना तब अत्यंत प्रसन्न हुए और कहने लगे कि, जोलाहेसे और मुझसे तो पहलेसे ही वैर हो रहा है और अब तुम लोग इस बातपर उद्यत हो तो मैं निश्चय कबीरका वध करूँगा उसे कदापि जीवित न छोड़ूँगा। मेरा नाम शेखतकी है और मैं बादशाह सिकंदरका पीर हूँ। देखूं तो वह मेरे हाथसे किस प्रकार बचता है। चाहूँ तो नदीमें डुबवाऊं, चाहूं तो अग्निमें दहन कर दूं, चाहूं तो दीवारमें चुन दूं, चाहूं तो टुकड़े टुकड़े काटकर चूरा करूं और यदि चाहूं तो देगमें चुरा डालूं

( १८२० )

बोधसागर

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यदि चाहूं तो तोपके सामने रखकर उड़ाऊं, चाहूं तो कुएँमें बंद कर दूँ और चाहूं तो हाथीसे चिरवा डालूं ।

यह बात सुनकर काजी तथा पण्डितगण अति प्रसन्न हुए और शेषतकीकी स्तुति करने लगे कि, क्यों न हो ? वाहवाह आपसे सब कुछ होगा, अब आप कृपा करें कि, यह जोलाहा किसी प्रकार मारा जावे ।

यह बात सुनकर शेषतकी बादशाहके पास चले और जाकर कहा कि, ऐ सुलतान ! तू मेरा कहना मान ले और इस जोलाहेके कल्लकी आज्ञा दे । इसने बड़ा कुफ्र मचाया है, यदि तू इसको मरवा न डालेगा तो मैं तुझकोशाप दूंगा जिससे तेरा सत्यानाश हो जायगा ।

यह बात सुनकर शेषतकीको बादशाहने समझाया कि, ऐ पीरजी ! आपने तो मुझसे कई बेर कहा था कि पीर फकीर स्वयम् परमेश्वर हैं तब आप क्योंकर कबीर साहबके प्राणघातके निमित्त आग्रह करते हैं, उन्होंने तो आपकी कोई हानि नहीं की फिर आपने क्यों ऐसा कुफ्र मचाया ?

शाह सिकन्दर वचन

कहो कबीरके मारन ताई । कुछ न हमारो यहाँ बसाई । पीर फकीर जात अछाहा । मेरो जोर न पहुँचे ताहा ॥ जो वह होते रैयत, तो हम करते जोर । वह अलमस्त फकीर है, तहाँ न फावै मोर ॥ तुमहूँ कही समझाय, पीर फकीर अछाह । अब तुम कहते मारने, यह न होय हम पाह ॥ अहो पीरजी तुम वह एका । अपने मनमें करो विवेका । इन कुछ तुमरो नाहिं बिगारा । काहे तुमने कुफ्र पसारा ॥

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कबीर चरित्रबोध

( १८२१ )

बुजुर्ग सब नेकी फरमावे । जोर जुल्म कुछ ताहि न भावे ॥ कहा हमारा कीजिये, छोड़ दीजिये शर । सुलह कुल्ह दे बैठिये, अच्छा ओर निहार ॥

शेखतकी वचन

कहे तकी सुलतान सुन, तुझे नहीं कछु दोष । जो मैं कहूं सो मानिये, कर मेरो सन्तोष ॥

सिकन्दर वचन

कहे सिकन्दर पीर सुन, मेरो शिर बरु लेहु । फकड़ कबीर न मारिये, यह माँगे मोहि देहु ॥ सुन्ते ही तकी कोथ प्रचारा । शिरसे ताज जमीपर मारा ॥ निपट विकल देखा तेहि भाई । तब हम शाहसे कहा बुझाई ॥

कबीर वचन

कहे कबीर सुनो सुलताना । करो पीरको वचन प्रमाना ॥ पीर कहै सो करो तुम, हमै नहीं कछु त्रास । हमहूं कहैं सत नाम बल, कहैं कबीर सुदास ॥

सिकन्दर वचन

कहै सिकन्दर सुनो जी पीग । मन मानै सो करो कबीरा ॥ डारो मार कबीरको, हम नहिं मानैं ऊन । ताका कबहुँ न भला हो, जो करे फक्कड़ खून ॥

शेखतकी वचन

शेखतकी तब कहे रिसाई । है कोई बाँध कबीरा भाई ॥ गंगामें डुबाया जाना

शेखतकी आपै उठै, काजी पण्डित झार । बाँध बाँध सब कोइ कहे, कोई न करे गोहार ॥ बाँह बाँध पग बाँधके, बोर गंगजल नीर ।

( १८२२ )

बोधसागर

३८

नहीं संशय निश्चित होइ, निर्भयदास कबीर ॥ गंगाजलपर भइ आसन, बंद परे खहराय । जन कबीर सत नाम बल, निर्भय मंगल गाय ॥ शाह सिकन्दर देखही, औ ठाढ़े सब लोग । धन्य कबीर सब कोइ कहै, शेखतकी भा सोग ॥ शेखतकी तब मीजै हाथा । सूखे सुहँ नहीं आवे बाता ।

सिकन्दर वचन

शाह सिकन्दर जोर कर, कहै सुनो तुम पीर । किसको बाँध डुबावहु, निर्भयदास कबीर ॥

जब शेखतकीने कबीर साहबको इस प्रकार लोहेकी शृंखलामें जकड़कर गंगामें डाल दिया उस समय जज्जीरें गलकर जलके नीचे बैठ गईं और कबीर साहब जलके ऊपर आसन मारकर बैठे मंगल गा रहे थे ।

यह कौतुक देखकर काशीके लोग धन्य कबीर २ कहने लगे । शाह सिकंदरने अपने पीरसे कहा कि ऐ पीरजी ! आप किसको जलमें डुबाते हैं; कबीर साहब तो अच्छे जलके ऊपर बैठे हैं । उस समय शेखतकीका मुँह सूख गया और मुँहसे बात नहीं निकली । तब शेखतकीने कहा मैं जानता हूँ कि कबीरने जादू किया, इस कारण वह नहीं डूबा । यदि अबकी मैं कबीरको पाऊँ तो अग्निमें जला दूँ-यदि वह अग्निसे बच जावेगा तो मैं उसको परमेश्वरका सत्य अंश समझूंगा ।

उसी समय कबीर साहब गंगासे बाहर निकल आये और शाह सिकन्दरके निकट गये । आपको देखते ही शाह उठ खड़ा हुआ और अत्यन्त मान संभ्रम सहित कबीर साहबको अपने बराबर आसन पर बैठाया । यह देखके शेख अत्यन्त

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कबीर चरित्रबोध

( १८२३ )

कुछ हुआ, उसके नेत्र रक्तवर्ण हो गये। उसने कहा ऐ कबीर ! तूने जादू किया इसी कारण जलमें नहीं डूबे। तब कबीर साहबने कहा कि ऐ शेखजी ! जैसे आप हो वैसा मुझको मत समझो, मैं जादू क्या जानूँ; मुझको तो केवल साहब नामका आधार है।

आगमें जलाया जाना

तब शेखने कहा अब आगसे बचो तब मैं आप पर विश्वास करूँगा। तब कबीर साहबने कहा कि जो आपकी इच्छा हो सो करो, अब आगमें जलाओ। तब शेखजीने बहुत सा काष्ठ मँगवाया और कबीर साहबका हाथ पाँव बाँधकर आगमें डाल दिया। उसी समय वह अग्नि बुझ गयी और बिलकुल ठंडी हो गयी।

तलवारसे काटा जाना

फिर शाहसिकन्दरने अपने पीरको बहुत समझाया कि ऐ पीरजी ! अब कबीर साहबसे आप वैर छोड़ दीजिये, पर शेखजीने इस बातको ग्रहण नहीं किया। फिर शेखजी तलवार लेकर अपने हाथसे काटने लगे-कबीर साहबकी शरीरसे तलवार इस प्रकार बाहर निकल जाती थी कि जैसे हवा, अथवा आकाशसे कृपाण निकलकर पार हो जाय। कबीर साहबके शरीर पर तनिक चिह्न भी नहीं हुआ-और न कोई रोम मैला हुआ। शेखजी मारते-मारते थक गये।

देगमें चुराया जाना

तब शेखजीने कबीर साहबको एक देगमें बंद करके और देगका सुँह भली भाँति बन्द करके अग्निपर धर दिया और स्वयं खड़ा हो देगके नीचे अग्नि जलवाने लगा। उस समय

( १८२४ )

बोधसागर

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बादशाहने समाचार भेजा कि पीरजी ! आप किसको आँच दिलाते हैं; कबीर साहब तो मेरे पास बैठे हैं । तब शेखने देगका सुँह खोला तो उसको खाली पाया ।

तोपपर उड़ाया जाना

फिर शेखने कबीर साहबको तोपपर बाँधकर उड़ाया, तोपमें जल भर गया ।

हाथीसे चिराया जाना

फिर हाथीसे चिरवाया और वह हाथी चीख मारकर भाग गया ।

कुएँमें डुबाया जाना

फिर शेखने आपको कुएँमें डाल दिया और उस कुएँको ईंट तथा पत्थरोंसे भर रहे थे और कबीर साहब शाह सिकन्दरके समीप जा बैठे । तब शाह सिकन्दरने अपने पीरके पास समाचार भेजा कि पीरजी ! आप किसको कुएँमें बंद कर रहे हो कबीर साहब तो मेरे निकट बैठे हुए हैं ।

जब शाहने समाचार भेजा तब शेखतकी शाहके पास आया और वहाँ कबीर साहबको बैठा देखकर लज्जित हुआ ।

कमालका प्रकट होना

तब शाह सिकन्दरने कबीर साहबका बड़ा सम्मान किया और आपको अपने साथ लेकर इलाहाबाद गया । एक दिन गंगातटपर बादशाह, कबीर साहब और शेख बैठे थे, उस समय गंगामें एक बालककी लाश बही जाती थी । शेखने कहा कि ऐ कबीर साहब ! गंगामें जो सुरदा बहा जाता है उसको आप जीवित करो । तब कबीर साहबने कहा कि ऐ मुर्दे ! “उठ कुदरतके कमालसे” तब वह उठ खड़ा हुआ ।

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कबीर चरित्रबोध

(१८२५)

जब कबीर साहबने उस सुरदाको जीवित किया, तब बादशाह और शेख एकदम आश्चर्यमें आकर बोल उठे कि, वाह आपने तो बड़ा कमाल किया। कबीर साहबने कहा अच्छा लो आजसे इस लड़केका नाम भी कमाल हुआ। यह जगत्में मेरा पुत्र कहलाकर प्रसिद्ध होगा। उसी दिनसे कमाल हुआ और वह कबीरका पुत्र कमाल कहलाता है।

इस प्रकार शेखने कबीर साहबसे बावन लीलाएँ देखीं तब बादशाह और शेखजी दोनों कर जोड़कर खड़े हुए और निवेदन करने लगे कि, ऐ कबीर साहब ! आप परमेश्वर हो और आपही खुदा हो और आपही हमारे गुरु तथा पीर हो। हमारा सब अपराध क्षमा करो। तब कबीर साहबने कहा कि; आपका कुछ दोष नहीं है।

सार्वी-कंध कुल्हाड अघाल, मस्तक दीना भार । गरीब शाह यों कहे, बखशो अबकी बार ॥ तहाँ सतगुरु लौलीन हो, परचा अबकी बार । गरीबदास शाह यों कहे, अछा देव दीदार ॥ सुनो काशीके पंडितो, काजी मुछा पीर । गरीबदास उस चरण गहि, अछा अलख कबीर ॥ यह कबीर अछाह है, उत्तरा काशी धाम । गरीब शाह यों कहे, झगड़ मुए बेकाम ॥ क्यों बिगड़ी डगरी दुनियां, कहत कबीर समूल । गरीबदास उस वृक्षके, अनंत कोटि रँगफूल ॥ ऐ कबीर तुम अछा हो, पलक बीच परवाह । गरीबदास कर जोरके, ऐसे कहता शाह ॥

( १८२६ )

बोधसागर

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तुम दयालु दरवेश हो, घर आये नररूप । गरीबदास शाह यों कहै, बादशाह जहाना भूप ॥ उठे कबीर करम किया, बरसै फूल अकाश । गरीबदास सेली चले, चँवर करे रैदास ॥ तीन एक चंडोलमें, रैदास शाह कबीर । गरीबदास चौरा करें, बादशाह बलवीर ॥ मुकुट मनोहर शीशघर, चढ़ै फील कबीर । गरीबदास उस पुरीमें, कोई न धरता धीर ॥

कबीर साहबके भण्डारेका वृत्तान्त

जब ब्राह्मणोंने देखा कि, अब तो कबीर साहबका माहात्म्य और भी अधिक हुआ और हम लोगोंकी कोई युक्ति नहीं चली तब आपसमें सलाह करके यह निश्चय किया कि, अब ऐसी युक्ती करनी चाहिये जिसमें कबीर साहबकी प्रतिष्ठा भंग हो जावे । तब उन लोगोंने बहुत ब्राह्मणोंको नियत किया कि, तुम लोग देश देशान्तरोंमें जाकर समाचार दो कि, असुक दिवस कबीर साहबके घर भण्डारा है, सब संत महंत कृपा करके आवे । तब उन ब्राह्मणोंने डाढ़ी मूँछ मुँडवाय वैष्णव वेष बनाया और दो दो चेले कर बाहर हुए । ये ब्राह्मण सब स्थानोंमें दौड़ गये और समस्त सन्त महन्तको समाचार पहुँचाया कि असुक दिवस कबीर साहबके यहाँ भंडारा है ।

यह बात सुनकर सन्त महंत उस दिवस कबीर साहब की कुटीपर आये बड़ी भीड़ हुई । कबीर साहबने जब ब्राह्मणोंकी धूर्तता जान ली तब अपना एकतारा लेकर वनका मार्ग लिया ।

भोजनका समय निकट होता जाता है । अनगिन्ती साधु-

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कबीर चरित्रबोध

( १८२७ )

ओंकी भीड़ कबीर साहबकी पर्णकुटीको घेरे खड़ी है किन्तु कबीर साहबका पता नहीं है । कबीर साहबके न मिलनेसे भेषमें कोलाहल होने लगा । जिनके मनमें जो आया वही बकने लगा । यह हाल देखकर विद्वेषियोंकी बन आयी, सब अपने मनही मन अपनी सफलता जान प्रसन्न होने लगे । इतनेमें रसद बाटनेके समय नौ लाख बोरि खानेकी वस्तुओंके भरकर केशव नाम वनिजारा आया और भण्डारा आरंभ हो गया । सब साधुओंकी सेवा तथा पढ़ुनाई आरंभ हो गयी । किसीको यह जान न पड़ा कि, ये कौन लोग हैं तथा कहाँसे आये हैं जो भण्डारा कर रहे हैं । पन्द्रह दिन पर्यंत बराबर भण्डारा होता रहा, इसके उपरान्त समस्त सन्त महन्तको भेंट तथा वस्त्रादि देकर केशवने विदा किया और सब धन्य कबीर धन्य कबीर और जय जय कबीर कहते हुए विदा हुए और विद्वेषी ब्राह्मण सब सँह पसारकर रह गये, कुछ न बना ।

लक्ष्मीजीका कबीर साहबको लुभाने आना

विष्णुने लक्ष्मीजीसे कहा कि तीनों लोकमें तो ऐसा कोई नहीं है जो तुम्हारे नयनबाणद्वारा आहत न हुआ हो और तुम्हारी मोहिनी मूर्ति और तुम्हारी कटाक्षद्वारा आत्म विस्मृति न कर गया हो, पर जब कबीर साहबपर अपना जादू डालोगी तब मैं तुम्हारे मन-मोहन मंत्रकी प्रशंसा करूँगा, तुम काशीजीको जाओ और कबीर साहबको लुभाओ, तब लक्ष्मीजी रूप बदलकर काशीमें कबीर साहबके पास अत्यंत हावभावके साथ आयीं और कबीर साहबके सामने खड़ी होकर कहने लगीं कि, ऐ महाराज ! आप मुझको अपने घरमें रखो, मैं आपके साथ निवास किया चाहती हूँ । तब कबीर साहबने उसकी ओर दृष्टिपात भी नहीं किया

( १८२८ )

बोधसागर

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और कहा कि, ऐ लक्ष्मी ! तू मेरे समीप क्यों आयी है ? क्या स्वर्गलोक उजाड़ पड़ा है जो तू मेरे पास यहाँ आयी है, मुझे तेरी कामना नहीं है, तू यहाँसे शीघ्र चली जा तब लक्ष्मी निराश होकर वैकुण्ठको पलट गयी ।

फिर विष्णु आये और कहने लगे कि, कबीर साहब ! आप जो कुछ माँगो राजकाज धनसम्पत्ति सो सब मैं तुमको दूँ । तब कबीर साहबने कहा कि, इन सब वस्तुओंकी तो मुझको कामना नहीं है, यदि तुम्हारे पास वह नाम हो कि, जिससे आवाग-मन मिट जावे तो वह मुझको दो । विष्णुने कहा कि यह तो मेरे अधिकारसे बाहर है और धन्य कबीर धन्य कबीर कहते हुए वैकुण्ठको पलट गये ।

यह सब कौतुक जब सिकन्दरशाह आप देख चुका तब उसने कबीर साहबको उत्तम वस्त्र पहनाये और जड़ाऊ मुकुट शीशपर रक्खा और आपको हाथीके ऊपर सवार करा और सत्यगुरुके पीछे आप खड़ा हुआ चैवर करता तथा सत्य गुरुकी प्रशंसा करता हुआ अपने साथ ले चला । यह लीला देखकर समस्त काशीके लोग चकित हो रहे और ब्राह्मण और मुल्हा काजी इत्यादि सब लज्जित होकर रह गये । शाहसिकन्दर कबीर साहबको दिल्ली ले गया ।

इति श्रीकबीर चरित्रबोध प्रथम भाग समाप्त

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कबीर चरित्रबोध

(१८२९)

कबीर चरित्र

द्वितीय भाग

आश्रय चरित्रोंका वर्णन

सम्पनभक्तकी कथा

एक बार कई संतोंको साथ लिये हुए कबीर साहब सम्पन भक्तके घर गये। सम्पनकी स्त्रीका नाम नेकी और पुत्रका नाम शिव था। जिस दिन कबीर साहब सम्पन भक्तके घर गये उस दिन खानेकी कुछ भी सामग्री नहीं थी। कई घरोंमें उधार माँगने पर भी निराश होकर सम्पन अपने पुत्रके साथ किसीके घरमें चोरी करनेका विचार करके बाहर हुआ और एक साहूकारके घरमें जाकर संधमार कर शिव अन्दर गया वहाँसे आवश्यकतानुसार खानेकी सामग्री लेकर बाहर खड़े पिताको दिया। जब शिव संधसे बाहर निकलने लगा। तब महाजनने भीतरसे पांव पकड़ लिया। तब शिवने अपने पितासे कहा कि, मैं तो पकड़ा गया अब मेरी डुरमत जाती रहेगी, इस कारण तू मेरा शिर काट ले-जिसमें मैं पहिचाना न जा सकूँ। तब सम्पनने अपने पुत्रका शिर काट लिया और आटा सीधा और अपने पुत्रका शिर लेकर अपने घर आया। शिवका शव वहाँही पड़ा रहा। सम्पनने अपने बेटेके शीशको एक ताकपर रख दिया और आटा सीधा अपनी स्त्रीको देकर कहा कि, भोजन तय्यार कर रोना नहीं। यदि रोवोगी और दुःख प्रकट करोगी तो साधु भोजन नहीं करेंगे। तब नेकीने तुरंत भोजन तय्यार किया और सम्पन उन तीनों साधुओंके निमित्त भोजन ले गया तीन पतल कबीर साहबके सामने

( १८३० )

बोधसागर

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रख दिये और कहा कि, महाराज ! आप तीनों साधु भोजन कीजिये । तब कबीर साहबने तीन पत्तलके छः टुकड़े किये और छः भाग करके कहा सम्मन अब तुम अपने पुत्रको बुलाओ कि, हम छः मनुष्य एक साथ भोजन करें । सम्मनने कहा कि, महाराज ! हम तीनों पीछे आवेंगे आप तीनों संत पहले भोजन कर लीजिये । कबीर साहबने कहा कि ऐसा कदापि न होगा, हम सबके सब एकत्रित भोजन करेंगे । जब सम्मन अनेक प्रकारका बहाना करने लगे, तब कबीर साहबने कहा कि, शिव तू कहाँ है ? तब शिवके शीशसे शब्द निकला कि, महाराज ! मैं किस प्रकार आऊं ? मेरा तो शीश कटा हुआ ताकपर धरा है और धड़ कहीं पड़ा है, तब कबीर साहबने कहा कि, शिर तो चोर डाकू और ठग इत्यादिके कटते हैं । भक्तोंके शीश नहीं कटते तू चला आ । जब इतना कबीर साहबने कहा तब शिवका शव आकर मस्तकसे मिल गया । और वह उसी समय जैसा था वैसा जीवित होकर प्रसन्नतापूर्वक कबीर साहबके पास आ बैठा और छः मनुष्योंने भोजन किया ।

कबीर साहबका भैंसेसे वेद पाठ कराना

एक बार कुछ वैरागी जो रामानन्दके चेले थे कबीर साहबके सहित अपने गुरुद्वारे दक्षिण देश तोतादरीको चले । एक भैंसा भी अपने साथ ले लिया । उसके ऊपर सब साधुओंने अपनी गुदड़ी तथा कठारी इत्यादि लाद ली । चलते चलते अपने गुरुद्वारे जो स्थान राजानुज स्वामीका है वहाँ पहुँच गये । रामानुज स्वामीके सम्प्रदायी आचारी हैं वे स्नानादिका बहुत ध्यान रखते हैं और अपने हाथसे परदा करके भोजन बनाते और भोजन करते हैं । यदि किसी शूद्रकी छाया भोजन

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कबीर चरित्रबोध

( १८३१ )

पर पढ़ जावे तो वे उसको नहीं खाते हैं उन लोगोमें जातीय अभिमान भी विशेष है। प्रायः वे जातिके ब्राह्मण होते हैं। उन आचार्योंने कबीर साहबको अपने बराबरमें बैठकर भोजन कराना उचित न समझा इस कारण उन लोगोंने एक बहाना निकाला और कहा कि, जो कोई वेदकी ऋचा पढ़े वह हमारे साथ बैठकर भोजन करे जिसको वेद पाठ न आवें वह हमारी पंक्तिमें न बैठे। सर्वोने वेदका कोई न कोई विशेष भाग पढ़ पढ़कर सुना दिया। उन लोगोंका मुख्य अभिप्राय यही था कि, कबीर साहब वेदपाठी नहीं हैं, इस बहानेसे हम अपनी पंक्तिमें कबीर साहबको न बैठवेंगे। जब कबीर साहबकी पारी आई तब कबीर साहबने भैंसेके शीशपर हाथधर दिया और कहा कि, ऐ भैंसे ! तू वेद पढ़। तब वह भैंसा अत्यन्त स्वच्छता और स्वरके साथ वेद पढ़ने लगा। जब उस भैंसेको वेद पढ़ते देखा तब समस्त आचारी कबीर साहबके चरणोंपर गिरे और अपना अपराध क्षमा करवाया।

रविदासका झगड़ा

कबीर साहब तथा रविदासजीसे सत्संग हुआ। तब रविदासजीका पक्षपात करनेके निमित्त देवी तथा ब्रह्मा विष्णु शिव सब आये, कबीरसाहबने सबको परास्त कर दिया।

जहांगस्तका वृत्तान्त

जहांगस्तशाह एक सिद्ध साधु था, और वह समस्त भारत की सैर किया करता था। उससे साधुओंने पूछा कि, तुमने कभी कबीरसाहबका दर्शन किया ? तब जहांगस्तशाह काशीको चले। कबीर साहबने जान लिया कि, जहांगस्त शाह आते हैं। तब कबीर साहबने एक सूवर मँगाकर अपने द्वारपर

( १८३२ )

बोधसागर

४८

बँधवा दिया । जब जहाँगस्तने दूरसे कबीर साहबकी कुटीको देखा और द्वारपर सूवर बँधा हुआ पाया तब बड़े कुद्ध हुए और झल्काकर पलट पड़े । तब कबीर साहबने पुकारा कि, ऐ जहाँगस्त ! क्यों पलटे जाते हो ? मेरे समीप आओ । इतनी बात सुनकर जहाँगस्तने मालूम कर लिया कि, कबीर साहबने जान लिया और मुझको पहचान लिया । तब उनके मनमें निश्चय हो गया कि, कबीर साहब कोई सिद्ध पुरुष हैं । वहाँ से पलटे और कबीर साहबके पास आकर कहने लगे कि, मैंने सुना था कि, कबीर साहब बड़े सिद्ध हैं इस कारण मैं आपसे भेंटके निमित्त आया था । आपने द्वारपर हराम बाँध रक्खा है, यह कैसी बात है ? यह बात सुनकर कबीर साहब ने उत्तर दिया कि, ऐ जहाँगस्तशाह ! मैंने तो हरामको अपने घरके बाहर बाँधा है आपने हारामको अपने भीतर बाँध रक्खा है । फिर बाहर निकाल देना अच्छा कि, भीतर बाँध रखना अच्छा । कारण यह कि, कोध अहंकार मद आदि सब हराम हैं सो तुम्हारे भीतर हैं । जिसको तुमने हराम समझा है वह हराम नहीं बरन् कोध हराम है । इस शिक्षासे जहाँगस्तशाह प्रसन्न हो गये संध्याका समय निकट आया तब जहाँगस्तशाहने इच्छा प्रकट की कि, मैं मक्कामें निमाज पढ़ा चाहता हूँ । कबीर साहबने एक पलमें मक्कामें प्रवेशित करा दिया । यहाँ फिर सिद्धोंके बीच जहाँगस्तसे जाया न जावे तब कबीर साहबने उनको वहाँ भी पहुँचाया, तब जहाँगस्त अधीन हुए ।

रामदासको विष्णुदर्शन

रामदास नामक धनाढ्य एक ब्राह्मण जागीरदार था । वह दक्षिण देश नर्मदा नदीके किनारेपर रहता था । एकबार कबीर साहब

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कबीर चरित्रबोध

( १८३३ )

उसके गाँवके निकट भ्रमण करते हुए पहुँचे और विश्राम करनेके लिए नदी तटपर बैठे । जब रामदास स्नान करनेके निमित्त गया तो वहाँ कबीर साहबको बैठे देखा, तब उसने निवेदन किया कि, महाराज ! आप समर्थ हो मुझको विष्णु दर्शन करवाओ । तब कबीर साहबने उससे कहा कि कल दोपहरको विष्णु तुम्हारे घरपर जावेंगे । यह बात सुनकर रामदासको निश्चय हुआ कि, कबीर साहबका वचन हुआ है । अब विष्णु निश्चय कल मेरे घर आवेंगे तब उसने अपने घर जाकर बड़ी तैयारी की दूसरे दिवस घरको भली भाँति स्वच्छ और पवित्र कराया विछोने इत्यादि विछवाये और नाना प्रकारके स्वादिष्ट भोजन पकवाये । और सिंहासन इत्यादि रखकर प्रतीक्षा करते हुए बैठे कि, अब विष्णु महाराज आया चाहते हैं । कुछ कालके उपरान्त देखा तो एक भैंसा कीचड़से लतपत आया और उस फर्शके ऊपर बैठ गया । तब रामदासको अत्यन्त क्रोध आया कि, इस भैंसेने फर्शको बिगाड़ दिया । सोटा लेकर इस भैंसेको मार भगाया जब दिवस व्यतीत हो गया कोई नहीं आया । तब वह ब्राह्मण निराश हुआ । जब प्रातःकाल वह नदी स्नानके निमित्त गया तब फिर कबीर साहबको उसी स्थान पर बैठा देखकर कहा कि, महाराज ! मुझको विष्णु महाराजका दर्शन तो न हुआ आपकी बातें मिथ्या कैसे हुईं । तब कबीर साहबने कहा कि, ऐ रामदास ! मेरे कथनानुसार विष्णु तुम्हारे घर गये परन्तु तुमने अच्छी विष्णुपूजा की, सोटे मारकर भगा दिया । यह बात सुनकर वह ब्राह्मण लज्जित तथा दुःखी हुआ । कारण यह कि, विष्णुका भक्त था इससे जान लिया कि, विष्णु भैंसाके सरूपमें थे ।

नं. ११ बोधसागर -

( १८३४ )

बोधसागर

५०

कमालीका प्रकट होना

कमालको कबीर साहबने सुरदासे जीवित किया तब शेख-तकीने कहा कि, मैं इस लीलाको नहीं मानता कारण यह कि, यह लड़का सकते मेंथा इस कारण जीवित हो गया—मेरी बेटी आठ दिवसोंसे कब्रमें मरी पड़ी है यदि आप उसको जीवित करें तब सुझे विश्वास हो । कबीर साहब सिकन्दर शाह और शेखतकी सहित उस लड़कीकी कब्रपर गये । वहाँ पहुँचकर कबीर साहबने पुकारा ‘उठ शेखतकीकी बेटी’ वह नहीं उठी; फिर कहा ‘उठ शेख-तकीकी बेटी, फिर भी वह न उठी तब तीसरी बेर कबीर साहबने कहा उठ ‘कबीरकी बेटी’ उस समय वह लड़की जीवित होकर कब्रसे निकल पड़ी । शेखतकी उसके जीवित होनेसे उसका हाथ पकड़कर अपने घरको ले चले; तब उस लड़कीने कहा कि, मैं तुम्हारे नामसे जीवित नहीं हुई हूँ—वरन् कबीर साहबके नामसे उठी हूँ । अब मैं कबीर साहबकी बेटी हूँ अब मैं इनके साथ रहा करूँगी, तुम्हारे गृहपर न जाऊँगी । वही लड़की कबीर साहबकी बेटी प्रसिद्ध हुई और उसका हृदय सत्यगुरुकी कृपासे प्रकाशित हो गया ।

तेरह गाड़ी कागजोंका लिख जाना

बादशाहने तेरह गाड़ी सादे पुस्तकोंकी कबीर साहबके पास भेजी और कहा कि, मैं तब विश्वास करूँगा जब आप उन समस्त पुस्तकोंको ढाई दिवसमें लिख देंगे । जब वे पुस्तकें कबीर साहबके पास पहुँची तब कबीर साहबने अपनी लाठी उन सब पुस्तकोंपर फेरकर कहा कि, इन लिखी हुई किताबोंपर क्या लिखें ? बादशाहको यह लीला देखकर विश्वास हो गया कि, कबीर साहबने उन ग्रंथोंको दिल्लीमें गढ़वा दिया ।

५१

कबीर चरित्रबोध

( १८३५ )

ग्रन्थोंमें लिखा है कि, जब मुक्तामणि साहबका समय आवेगा और उनका झण्डा दिल्ली नगरीमें गड़ेगा तब वे समस्त पुस्तकें पृथ्वीसे बहिर्गत होंगी । सो मुक्तामणि साहबका अवतार वंशकी तेरहवीं पीढ़ीमें होगा । तब वंशगुरुगद्दी दिल्लीमें स्थिर होगी ।

सर्वानन्दका वृत्तान्त

सर्वानन्द ब्राह्मण भारतवर्षके समस्त नगरोंमें जाकर और पंडितोंके साथ शास्त्रार्थ करके विजयी हुआ था । कोई पंडित जब उसके सामने न ठहरा तब वह अपने घर आया और अपनी मातासे कहा कि, हे मातः ! अब तुम मेरा नाम सर्वजित् रक्खो और मेरे माथे पर विजय तिलक कर दो । क्योंकि, अब मेरा सामना करनेको कोई पंडित नहीं रहा । तब माताने कहा कि, ऐ पुत्र ! तूने काशीमें जाकर कबीर साहबके साथ भी वाद-विवाद और सामना किया था ? तब उसने कहा कि, नहीं । तब माताने कहा कि, जबलों तू कबीर साहबपर विजयी न होगा तबलों तेरा नाम सर्वजित् नहीं रक्खूँगी । तब सर्वानन्दने कहा कि, कबीर कैसा बड़ा पंडित है । मैं अब चलकर उसके साथ वाद विवाद करता हूँ । और बहुतसे ग्रन्थ और वेद इत्यादि लादकर काशीमें कबीर साहबके पास पहुँचे । कबीर साहबने कितनी लीलाएँ दिखलाईं तो भी सर्वानन्दको निश्चय नहीं हुआ । अन्तमें सर्वानन्द कबीर साहबके साथ वाद विवाद करने पर उद्यत हुए । सर्वानन्दने श्लोकोंकी झड़ी लगा दी; यद्यपि कबीर साहब समझाते पर वह न मानते । बात बात पर श्लोक, प्रमाण, तथा पुस्तकोंकी साक्षी देते । तब कबीर साहबने देखा कि, इसके पीछे तो घमंडका भयानक रोग लगा है, यह

( १८३६ )

बोधसागर

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कदापि न हटेगा और न कहना मानेगा । तब कबीर साहबने कहा कि, ऐ सर्वांनन्द अब तुम्हारी क्या कामना है और किस बातके इच्छुक हो ? तब सर्वांनन्दने कहा कि, मेरी विजय लिख दो तब कबीर साहबने कहा कि, मैं तो लिखना नहीं जानता तुम स्वयम् लिख लो तब सर्वांनन्दने लिख लिया कि, कबीर साहब हार गये और सर्वांनन्द जीत गये । भली भांति लिखकर तथा वह विजय पत्र कबीर साहब तथा अन्यान्य लोगोंको दिखलाकर अपने घरको चले और आनकर अपनी मातासे कहा कि, माता मैं कबीर साहबसे वादविवाद करके उनपर विजय पा गया हूँ । तब माताने कहा कि, ऐ पुत्र ! मुझको तो विश्वास नहीं होता कि, तुम कबीर साहबपर विजयी हुए हो । तब सर्वांनन्दने कहा कि, मैं विजयपत्र लिखवा लाया हूँ तू देख ले । तब माताने कहा कि कागज निकालो । जब कागज निकाला और पढ़ा तो उसमें लिखा था कि सर्वांनन्द परास्त हो गए और कबीर साहब विजयी हुए । यह लिखा देखकर आश्चर्यान्वित हुए कि, यह तो मेराही लिखा था यह उलटा कैसे हुआ । कदाचित् मैं लिखनेमें भूल गया और मातासे कहा कि मातः ! मैं लिखनेके समय भूल गया अब पुनः जाता हूँ और अत्यंत सावधानीपूर्वक ले आऊंगा । तब सर्वांनन्द पुनः कबीर साहबके पास आये और कहा कि, मैं लिखनेमें भूल गया अबकी बेर सँभाल कर लिखूँगा । तब कबीर साहबने कहा कि भली प्रकार सँभालकर लिखो तब फिर सर्वांनन्दने उसी विषयको भली प्रकार सँभालकर लिखा और अपनी माताके समीप आकर प्रकट किया कि अब मैं सँभाल कर लिख लाया हूँ । जब कागज खोला तो वही पूर्वकी बात लिखी पाई कि, कबीर साहब विजयी हुए तथा सर्वांनन्द