कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कबीर चरित्रबोध
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बरतन रख दो, फिर कबीर साहबने उस बछियाकी ओर देखा तो उसके स्तनोंसे दूध निकलने लगा जिससे बरतन भर गया वही दूध लेकर नीरूने कबीर साहबके मुँहके सामने रख दिया। फिर तो नीरू नित्य उसी प्रकार प्रतिदिवस किया करता था।
जब कबीर साहब कुछ बड़े हुए और छोटे-छोटे लड़कोंके साथ खेलने लगे तब आप उन लड़कोंसे ब्रह्मज्ञानकी बातें किया करते थे। वे बेसमझ लड़के कबीर साहबकी बातको तनिक भी नहीं समझते बल्कि जब वह उन्हें समझाने लगते तब वे मुँह देखने लग जाते। फिर कुछ दिनोंके पश्चात् आप साधुओं के साथ ज्ञानगोष्ठी करने लगे। जब साधु लोग आपका ज्ञान सुनते तब अत्यन्त चकित होते कि, यह छोटा बालक इस प्रकारकी बातें कैसे करता है। इन बातोंकी सुधि तो किसी साधुको भी नहीं है। तब साधुओंको विदित हो गया कि, यह बालक नहीं बरन् कोई सिद्ध ही लड़केके वेषमें प्रकट हुआ है।
कबीर साहबकी बालकपनके अनेक लीलाओंका विवरण ग्रंथोंमें लिखा है-उस समय जलनके रोगका काशीमें प्रकोप था। एक बूढ़ा स्त्री आई और कबीर साहबसे बोली कि, मैं जलन रोगसे व्यथित हूँ, आप धूल मिट्टी खेल रहे थे। कबीरजी बोले, यदि तेरी इच्छा हो तो मैं आरोग्य लाभ करूँ। तब कबीर साहबने उस स्त्रीपर थोड़ीसी धूल डाल दी और वह आरोग्य हो गयी जिसपर वह प्रसन्न होती चली गयी। इस प्रकारकी बातोंका कुछ विवरण हो नहीं सकता।
कुछ दिवसोंके उपरांत समस्त जुलाहे एकत्रित होकर कहने लगे कि, ऐ नीरू! अब तुम अपने पुत्रका सुम्रत ( मुस-
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बोधसागर
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ल्मानी ) कराओ । फिर एक दिन सुकरूर करके जुलाहे एकत्रित हुए और काजीको बुलाया । जब नाई उस्तारा लेकर कबीर साहबके सामने गया तब आपने पांच लिंग उसको दिखलाये और उससे कहा कि, इन पाँचोंमेंसे जिसको चाहे तू काट ले । यह अवस्था देखकर नाई तो भयभीत होकर भाग गया और आपका सुन्नत नहीं हुआ ।
एक दिन आप छोटे-छोटे बच्चोंके साथ खेल रहे थे, उस समय काजीने गोवधका प्रबंध किया और गऊके जबह करनेका समय आया तब आपने सब वृत्तांत जान लिया कि, काजी गऊके जबह करनेके विचारमें है । ऐसा जान करके बालकोंके साथका खेलना छोड़कर गऊकी ओर दौड़े । जबतक गायके समीप पहुँचे तबतक तो काजीने गऊको समाप्त कर दिया । कबीर साहब आकर उस काजीको उपदेश देने लगे जिससे लज्जित होकर काजी अपने अपराधके निमित्त क्षमाका प्रार्थी हुआ । फिर कबीर साहब उस गऊको जीवित करके और आप अंतर्धान हो गये ।
जब आप अंतर्धान हो गये तब जुलाहा जुलाही आपको दूँदने लगे । जब कई दिनों तक कबीर साहब उन्हें नहीं मिले तब उनको बड़ा दुःख हुआ और वे फूट-फूट कर रोने लगे । समस्त नगरमें दूँद डाला पर आप कहीं नहीं मिले । उसको तीन दिन भूखे प्यासे बीत गये, अन्नजल कुछ भी उसके मुँहमें नहीं गया । वे अत्यन्त निर्बल तथा अशक्त हो गये । जब आपने उन दोनोंको नितांत ही विह्वल पाया तब आप उनके सामने प्रकट हो गये । आपको देखते ही वे प्रसन्न होकर चरणोंपर गिर पड़े और कहने लगे कि, आप किधर चले गये ? हम
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कबीर चरित्रबोध
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टूँढते-टूँढते हैरान हो गये ? तब कबीर साहबने उत्तर दिया कि, तुमने महापाप किया कि, गऊको जबह करवाया । जोलाहा जोलाही अनेक सौगंधें खाने लगे कि, हमने यह कार्य नहीं करवाया बरन् हमें इस बातकी तनिक भी सुधि नहीं है, यह कार्य काजीका है जब उन दोनोंने बहुत कुछ प्रार्थना तथा बिनती की तब कबीर साहबने दोनोंको निर्दोष समझकर उनके घर पर गये ।
जब आप छोटे २ बालकोंके साथ खेलते थे तब “राम राम” “गोविंद गोविंद” “हरि हरि” कहा करते थे तब सुसलमान लोग सुनकर कहते थे कि, यह बालक कट्टर काफिर होगा । तब उनको कबीर साहब यह प्रत्युत्तर देते थे कि, काफिर वह होगा जो दूसरोंका माल लूटता होगा, काफिर वह होगा जो कपट-भेष बनाकर संसारको ठगता हो, काफिर वह है जो निर्दोष जीवोंका प्राणनाश करता होगा, काफिर वह होगा जो मांस खाता होगा, काफिर वह होगा जो मदिरा पान करता होगा और काफिर वह होगा जो दुराचार तथा बटमारी करता होगा मैं किस प्रकार काफिर हूँ ।
साखी-कबीर साहब
गला काटकर बिसमिल करें, ते काफिर बेबूझ ।
औरनको काफिर कहैं, अपना कुम्भ न सूझ ॥
कुछ दिनके बाद कबीर साहबने गलेमें यज्ञोपवीत डाल लिया और अपने माथेपर तिलक लगा लिया, तब ब्राह्मण देखकर कहने लगे कि, यह तो तेरा धर्म नहीं है तूने वैष्णव वेष कैसे बनाया ? तू राम राम गोविंद गोविंद नारायण नारायण कहता है-यह तो मेरा धर्म है तेरा धर्म नहीं । तब कबीर
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बोधसागर
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साहब ब्राह्मणोंको उत्तर देते कि, हम तो ताना तनते हैं, जनेऊ तुम्हारा किस प्रकार हुआ ? और गोविंद और राम तो हमारे हृदयमें बसते हैं, तुम्हारे कैसे हुए । तुम तो गीता पढ़ते हो और सांसारिक धनके निमित्त सदैव धनाढ्योंके द्वार द्वार पर दौड़ते और भटकते रहते हो, हम तो गोविंदके अतिरिक्त और किसी अन्यको नहीं जानते हैं । इतना सुनकर ब्राह्मण निरुत्तर हो जाते फिर तो हिन्दू तथा मुसलमान दोनों आपके साथ वाद विवाद किया करते और सब परास्त होने लगे । जब साधुओंने देखा कि, यह लड़का तो बड़ा ज्ञानी है, तब वे लोग पूछते कि, कबीरजी आपका गुरु कौन है, उस समय तो आपका कोई गुरु नहीं था-इस प्रश्नपर आप निरुत्तर निस्तब्ध हो जाते । तब साधु लोग आपको ताना मारते कि, बिना गुरुके तुम्हारा ज्ञान किसी काम नहीं आवेगा-और न बिना गुरुके किसीको मुक्ति मिलेगी, तुम्हारा यह सब वार्तालाप तथा ज्ञान व्यर्थ है । जब साधु लोग कबीर साहबपर इस प्रकार कटाक्ष करने लगे तब आपने रामानंद स्वामीको गुरु करनेका संकल्प किया । जिस समय आपने स्वामी रामानंदको गुरु करनेका संकल्प किया उस समय आपको प्रकट हुए पूरे पाँच वर्ष हो चुके थे और आपकी प्रसिद्धि भारतके बहुत भागोंमें हो चुकी थी ।
आप रामानन्द स्वामीके पास गये और विनय किया कि, स्वामीजी ! मुझको दीक्षा देकर अपना शिष्य कीजिये और मुझसे गुरुदक्षिणा लीजिये मुझपर कृपा कीजिये । यह बात सुनकर स्वामीजीने उत्तर दिया कि, मैं श्रद्धको दीक्षा नहीं देता ।
रामानन्द स्वामी और कबीर साहबकी वार्तालापका वृत्तान्त
भक्ति द्रावड देश थी, यहाँ नहीं एक विरक्ष ।
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कबीर चरित्रबोध
( १८०१ )
ऊत भूतको ध्यावना, पाखंड और परपञ्च ॥ रामानन्द अनन्द भये, काशी नगर मैझार । देश द्राविड छाड़िके, आये पुरी विचार ॥ योग युक्ति प्राणायाम करि, जीता सकल शरीर । तिरवेणीके घाटमें, अटक रहे बलवीर ॥ तीर्थ वरत एकादशी, गंगोदक अस्नान । पूजा विधि विधानसों, सर्वकलासों गान ॥ करे मानसी सेव नित, आत्मतत्त्वको ध्यान । षट पूजा आदि भेद गति, धूप औ दीप विधान ॥ चौदह सौ चेले किये, काशीनगर मैझार । चार सम्प्रदा चलत हैं, और हैं बावन द्वार ॥ पांच बरषके जब भये, काशीमाहि कबीर । दास कबीर अजीबकला, ज्ञानध्यान गुण थीर ॥ गुल भया काशी पुरीमें, अटपट बैन विहंग । दास गरीब गुणी थके, सुनि जोलहा परसंग ॥ रामानंद अधिकार है, सुनि जोलहा जगदीश । दास गरीब बिलम्बना, ताहि नवावत शीश ॥ रामानंदको गुरु कहै, तनसे नहीं मिलाप । दास गरीब दरस मये, पैयन लगी जो लाप ॥ पन्थ चलत ठोकर लगे, राम नाम कहि दीन । दास गरीब कसर नहीं, सीख लिये बरबीन ॥ आड़ा परदा देइके, रामानन्द बुझन्त । दास गरीब उलंग छबि, अघर डाक कूदंत ॥ कौन जाति कुल पंथ है, कौन तुम्हारा नाउँ । दास गरीब अधीन गति, बोलतही बलि जाउँ ॥
नं. ४९ बोधसा
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बोधसागर
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जाति हमारी जगद्गुरु, परमेश्वर यह पंथ । दास गरीब लिखत परे, नाम निरंजन कंत ॥ रे बालक दुर्बुद्धि सुन, घट मठ तन आकार । दास गरीब दरदर लगे, बोले सिरजन हार ॥ तू मोमिनके पालुवा, जुलहेके घर वास । दास गरीब अज्ञान गति, एता दृढ़ विश्वास ॥ मान बड़ाई छाँड़िके, बोलौ बालक बैन । दास गरीब अथम मुखी, इतना तुम घर फैन ॥ कलियुग क्षेत्रपाल है, क्या भैरो कोइ भूत । दास गरीब विटंबना, गया जगत सब ऊत ॥ मनी मगज माया तजो, तजिये मान गुमान । दास गरीब सो बात कहि, नहीं पावेगो जान ॥ हे बालक बुधि तोरि गति, कौड़ी साखन भाँड । दास गरीबहि हदेसकरि, नहीं लेवेगे डाँड ॥ शाह शिकंदरके वधे, पग ऊपर तर शीश । दास गरीब अगाधि गति, तोर कहा जगदीश ॥ कान काट बूचा करे, नली भरत रे नीच । दास गरीब जहानमें, तुम सर जोरा मीच ॥ मरत मरत सबजग मुआ, लखै नऽस्थिर ठौर । दास गरीब जहानमें, तुमसा नीच न और ॥ नादविन्दकी देहमें, येता गर्व न कीन । दास गरीब पलक फना, जैसे बुदबुद लीन ॥ तिनकर तैसे बोलते, रामानन्द सुजान । दास गरीब कुजाति है, आखिर नीच निदान ॥ नीच मीच से ना डरे, काल कुल्हाड़ अशाश ।
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कबीर चरित्रबोध
( १८०३ )
दास गरीब अदत्त है, तैं जो कहा जगदीश ॥ जड़िहों हाथ हथकड़ी, गले तौक जञ्जीर । दास गरीब परख बिना, यह वाणी गुणगीर ॥ परख निरख नहिं तोहिको, नीच कुलीन कुजात । दास गरीब अकल बिना, तू जो कही क्या बात ॥ हे बालक नीचा कला, तुमही बोलो ऊँच । दास गरीब पलक धरि, खबर नहीं हम कूँच ॥ महँके बरन खलास करि, सुन स्वामी परवीन । दास गरीब मनी मरी, मैं आजिज आधीन ॥ मैं अविगत गतिसे परें, चार वेदसे दूर । दास गरीब दशों दिशा, सकल सिंधु भरपूर ॥ सकल सिन्धु भरपूर हूँ, खालिक हमरो नाउँ । दास गरीब अजात हूँ, तेजि कहा बलि जाउँ ॥ जात पाँत मेरे नहीं, नाहिं स्त्री नहिं गाउँ । दास गरीब अनन्य गति, नहीं हमारे नाउँ ॥ नाद बिन्द मेरे नहीं, नहीं गोद नहिं गात । दास गरीब शब्द सजग, नहीं किसीका साथ ॥ सब सङ्गी बिछरू नहीं, आदि अन्त बहु जाहिं । दास गरीब सकल बसौँ, बाहर भीतर माहिं ॥ हे स्वामी मैं सृष्टिमें, सृष्टि हमारे तीर । दास गरीब अधर बसूँ, अविगत पुरुष कबीर ॥ अनन्तकोटि सलिता बड़ो, अनन्तकोटिधर ऊँच । दास गरीब सदा रहूँ नहीं हमारे कूँच ॥ पुहमी धरनि अकाशमें, मैं व्यापक सब ठौर । दास गरीब न दूरसा, हम सम तुल नहिं और ॥
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बोधसागर
२०
मैं माया मैं काल हूँ, मैं हंसा मैं वंश । दास गरीब दयाल हम, हमहीं करें विध्वंस ॥ ममता माया हम रची, काल जाल सब जीव । दास गरीब प्राण पद, हम दासा तन पीव ॥ हम दासनके दास हैं, कर्ता पुरुष करीम । दास गरीब अवधूत हम, हम ब्रह्मचारी सीम ॥ हम मौला सब सुल्कमें, सुल्क हमारे माहिं । दास गरीब दलाल हम, हम दूसर कछु नाहिं ॥ हम मोती मुक्ताहल, हम दरिया दरवेश । दास गरीब हम नित रहें, हम तजि जात हमेश ॥ हमहीं लाल गुलाल हैं, हम पारस पद सार । दास गरीब अदालतंग, हम राजा संसार ॥ हम पानी हम पवन हैं, हमहीं धरणि अकाश । दास गरीब तत्त्वपञ्चमें, हमहीं शब्द निवास ॥ सुनु स्वामी सत भाखहूँ, झूठ न हमरो रञ्ज । दास गरीब हम रूप बिन, और सकल परपञ्ज ॥ हम रोवत हैं सृष्टिको, जो रोवति है मोहिं । दास गरीब वियोगको, और न बूझे कोइ ॥ मैं बूझूँ मैं ही कहूँ, मैं ही किया वियोग । गरीब दास गलतान हम, शब्द हमारा योग ॥ चारों रुकुनमें हम फिरेँ, नहिं आवें नहिं जाउँ । गरीब दास गुरु भेदसे, लखे हमारा ठाउँ ॥ रजगुण सतगुण तमगुण, रजबीरज हम कीन्ह । गरीब दास हम सकलमें, हम दुनियाँ हम दीन्ह ॥ लगी महम गनीम पर, काल कटक कट कन्त ।
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कबीर चरित्रबोध
( १८०५ )
गरीबदास निर्भर कहैं, जो कोई नाम जपन्त ॥ मैं बालक मैं बृद्ध हूँ, मैही जवों जमान । गरीबदास निज ब्रह्म हूँ, हमही चारों खान ॥ गगन शून्य गुसा रहूँ, हम परकट परवाह । गरीबदास घट घट बसूँ, विकट हमारी राह ॥ आवत जात न दीसहूँ, रहता सकल समीप । गरीबदास जलतरैंग ज्यों, हमहिं सागरसीप ॥ गोता लाऊँ स्वर्गमें, फिर पैठूँ पाताल । गरीबदास टूँढत फिरैं, हीरे माणिक लाल ॥ इस दरिया कङ्कर बहुत, लाल कहीं कहिं ठाउँ । गरीबदास माणिक चुगूँ, हम मरजीवा नाउँ ॥ बोले रामानन्दजी, हम घर बड़ा सुकाल । गरीबदास पूजा करें, मुकुट फई जद माल ॥ सेवा करो सम्हालके, सुन स्वामी सुरज्ञान । गरीबदास शिरधर मुकुट, माला अटकी जान ॥ स्वामी घुंडी खोलके, फिर माला गले डार । गरीबदास इस भजनको, जानत हैं करतार ॥ डचोढ़ी परदा दूरकर, लीना कण्ठ लगाय । गरीबदास गुजरी बहुत, बदनन बदन मिलाय ॥ मनकी पूजा तुम लखी, मुकुट माल परवेश । गरीबदास किनको लखे, कौन वरन क्या भेष ॥ यह तो तुम शिक्षा दयी, मान लिये मन मोर । गरीबदास कोमल पुरुष, हमरो बदन कठोर ॥ हे स्वामी तुम स्वर्गकी, छोड़ो आशा रीत । गरीबदास तुम कारणे, उतरे शब्द अतीत ॥
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बोधसागर
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सुन बच्चा मैं स्वर्गकी, कैसे छौँट्टै रीत । गरीबदास गुदड़ी लगी, जन्म जात है बीत ॥ चार मुक्ति वैकुण्ठमें, जिनकी मोरे चाह । गरीबदास घर अगमक, कैसे पाऊँ थाह ॥ हेम रूप जहाँ धरणि है, रत्न जड़े बहु शोभ । गरीबदास घर वैकुण्ठको, तन मन हमरो लोभ ॥ शंख चक्र गदा पद्म है, मोहन मदन सुरार । गरीबदास सुरली बजै, स्वर्गलोक दरबार ॥ दूधोंकी नदियां बहैं, श्वेत वृक्ष शोभान । गरीबदास मन्दिर मुकुट, सर्वगपुरी अस्थान ॥ रत्न जड़ाऊ मनुष सब, गण गँधर्व सब सेव । गरीबदास उस धामकी, कैसे छौँट्टै सेव ॥ चार वेद गावैं उसे, सुर नर मुनी मिलाप । गरीबदास ध्रुव पुर यश, मिट गये तीनों ताप ॥ नारद ब्रह्मा यश रटें, गावैं शेष गणेश । गरीबदास वैकुण्ठसे, और परे को देश ॥ सुन स्वामी निज मूलगति, कहि समझाऊँ तोहिं । गरीबदास भगवानको, राखा जगत समोहिं ॥ तीनलोकके जीव सब, विषय वासना भाय । गरीबदास हमको जपैं, तिसको धाम दिखाय ॥ कृष्ण विष्णु भगवानके, जहां गये हैं जीव । गरीबदास त्रिलोकमें, काल कर्म सर शीव ॥ सुनु स्वामी तोसों कहैं, अगम द्रीपकी सैल । गरीबदास डूबे परे, पुस्तक लादे बैल ॥ कहो स्वामी कहाँ रहोगे, चौदह भुवन बिहंड ।
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कबीर चरित्रबोध
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गरीबदास बीजक कहो, चलत प्राण और पिंड ॥ बोलत रामानन्दजी, सुन कबीर करतार । गरीबदास सब रूपमें, तुमही बोलनहार ॥ तुम साहब तुम संत हो, तुम सदगुरु हम हंस । गरीबदास तुम रूप विनू, और न पूजो वंस ॥ मैं भक्ता मुक्ता भया, किया कर्म कुल नाश । गरीबदास अविगत मिले, मेटी मनकी ध्यास ॥ दोनों ठौर मैं एक तू, भया एकसे दोय । गरीबदास हम कारणे, उतरे मगहर जोय ॥ बोले रामानन्दजी, सुनो कबीर सुजान । गरीबदास मुक्ती भयी, उधरे पिंड औ प्राण ॥ गोष्ठी रामानन्दसे, काशी नगर मँझार । गरीबदास जिन्द पीरकी, हम पाये दीदार ॥
कबीर वचन
रामानंद गुरुदीक्षा दीजै । गुरुदक्षिणा कुछ हमसे लीजै ॥
रामानन्द वचन
शूद्रके कान न लगौं भाई । तीन लोकमें मोर बड़ाई ॥ जब रामानंदने उत्तर दिया कि, मैं दीक्षा नहीं दूँगा, कबीर साहब चुपचाप चले आये, स्वामीजीका यह नियम था कि, चार घड़ीके तड़के गंगास्नानको जाया करते थे, एकदिन जब स्वामीजी स्नान करने चले तब कबीर साहब एक छोटे बालक- का रूप धरके स्वामीजीके पथमें जा पड़े । स्वामीजी खड़ाऊँ पहने चले आते थे, आपकी खड़ाऊँकी ठोकर कबीर साहबके शिरमें लगी, कबीर साहब रोने लगे । एक लड़केको रोते देखकर स्वामीजी खड़े हो गये, और बालकके शीशपर हाथ धरकर
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बोधसागर
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कहा कि, बच्चा रो मत राम राम कहो । तब कबीर साहब चुप हो गये और कहने लगे गुरुजी राम राम कहूँ ? स्वामीजीने कहा हाँ राम राम कहो । उस समयसे कबीर साहब बराबर राम राम कहने लगे, और गुरु शिष्यका सम्बन्ध बना लिया । जब गुरु चेले का सम्बन्ध बना चुके तब अपने घरमें जाकर सबेरे ही कंठी पहन लिया, और हाथमें तुलसीकी माला ले और मस्तक पर तिलक लगा ठीक वैष्णव मूर्ति धारण किया और राम रामकी धुन लगायी ।
जब कबीर साहबने यह रंग बनाया तब आपसे अनेक मनुष्य प्रश्न करते कि, कबीरजी ! आपने यह वैष्णवका वेष कैसे बनाया है ? तब वे सब लोगोंको उत्तर देते कि मैंने रामानंद स्वामीको गुरु बनाया है । यह दशा देखकर और सुनकर कितने ही संन्यासी तथा वैरागियोंने स्वामीजीसे जाकर कहा कि, महाराज ! आपने ऐसी मर्यादा छोड़ दी कि, जोलाहे पुत्रको शिष्य कर लिया ।
यह बात सुनकर स्वामीजीने कहा कि, मैंने चेला नहीं किया । तब लोग गये और कबीर साहबको बुला लाये । स्वामीजीका यह नियम था कि, वे मुसलमानका मुख नहीं देखते थे और कबीर साहबको नीरूके घरमें रहनेके कारण लोग मुसलमान कहते थे, इसलिये कबीर साहबको लोगोंने परदाके बाहर खड़ा किया और परदेके भीतरसे स्वामीजी बोले कि ऐ कबीर ! मैंने तुमको अपना चेला कब बनाया ? तब कबीर साहबने उत्तर दिया कि, स्वामीजी जब आप गंगा स्नानको जाते थे और मैं पथमें पड़ा था आपके खड़ाऊँकी ठोकर मेरे माथेमें लगी और मैं रोने लगा तब आपने कहा राम राम
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कबीर चरित्रबोध
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कह, उस समयसे मैं राम राम कहने लगा । तब स्वामीजीने कहा कि हाँ एक बालक तो था जिसको मेरे खड़ाऊँकी ठोकर लगी और उससे मैंने रामराम कहनेको कहा था । कबीर साहबने कहा कि, गुरुजी वह लड़का मैं ही था । स्वामीजीने कहा कि, क्या इस प्रकार कोई गुरु चेला हो सकता है ? तब कबीर साहबने कहा कि, गुरुजी वेदशास्त्रमें रामनामसे बढ़कर और दूसरा क्या है ? तब स्वामीने उत्तर दिया कि, सबसे बढ़कर यही है, उससे बढ़कर और कुछ नहीं है । फिर साहबने कहा कि, जो नाम सबसे बढ़कर है सो तो आपने मेरे माथेपर हाथ धरकर दे ही दिया-फिर गुरु और शिष्य किस प्रकार होता है ? फिर स्वामीजी बोले कि, जिस बालकसे मैंने राम नाम कहा था वह छोटा था और तू बड़ा जान पड़ता है । तब कबीर साहब वैसाही छोटा बालक बनकर स्वामीकी गुफाके भीतर देख पड़े और गुरुजीके चरणोंपर गिरकर कहने लगे कि, मैं उस समय ऐसाही छोटा था न ? यह कौतुक देखकर लोगोंको अत्यन्त आश्चर्य हुआ कि, देखो यह बालक कैसा छोटा हो गया । उस समय स्वामीजीने कबीर साहब को गले लगा लिया, उसी समयसे कबीर साहब स्वामीजीके शिष्योंके साथ रहने लगे और स्वामीजीके जितने शिष्य थे सब कबीर साहबको अपना गुरु करके मानते और अत्यन्त मर्यादा तथा प्रतिष्ठा किया करते थे और स्वयम् कबीर साहब सबसे नितान्तही नम्रतापूर्वक मिलते थे । यहाँ तक कि रामानन्द स्वामीके चौदहसौ चौरासी शिष्योंमें कबीर साहब सबके सरदार हो गये थे ।
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बोधसागर
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फिर समय समय पर कबीर साहब और रामानन्द स्वामी में ज्ञान और सुक्तिके विषयमें सत्संग हुआ करता था। रामानन्द स्वामी तथा कबीर साहबकी वार्तालाप बहुत है जिसकी इच्छा हो दूँढ़कर देख ले। कबीर साहबने समय समय पर स्वामीजीको अनेक कौतुक दिखलाये सो भिन्न भिन्न ग्रंथोंमें लिखे हुए हैं।
एक बार स्वामीजी मानसिक ध्यान कर रहे थे। मानसमें ही भगवानकी मूर्ति कल्पना कर यथाविधि सब शृंगार किया किन्तु माला पहिराने भूल गये। पीछेसे याद पड़नेपर माला पहिराने लगे किन्तु सुकुटके ऊपरसे माला गलेमें नहीं जाती थी। तब स्वामीजीको बड़ी चिंता हुई कि, अब ठाकुरके गलेमें कैसे माला पहनाऊँ ? क्योंकि, यदि सुकुट उतारकर माला पहिनाते हैं तो शृंगार ब्रष्ट होता है और माला नहीं पहनाते हैं तो शृंगार अपूर्ण रहता है। तब कबीर साहब स्वामीजीके मनकी बात जानकर बोले कि, स्वामीजी ! मालाकी गाँठ खोलकर ठाकुरको माला पहनाओ।
इस प्रकारके अनेक कौतुकोंको देखकर स्वामीजीकी इच्छा हुई कि, जानना चाहिये यह कबीर कौन है जो ऐसे ऐसे कौतुक किया करता है। इस कारण स्वामीजीने ठाकुरका ध्यान किया तब ध्यानमें यह दिखाई दिया कि, ठाकुरके सिंहासन पर जो ठाकुरकी मूर्ति है उसके शिरके ऊपर कबीर साहबका सिंहासन रक्खा हुआ है। जबसे कबीर साहबकी ऐसी बड़ाई और उनका इतना प्रताप देखा तबसे स्वामी कबीर साहबकी
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कबीर चरित्रबोध
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स्तुति करने लगे । रामानन्द तो कबीर साहबकी प्रशंसा करते और कबीरसाहब अपने गुरुका गुण गाया करते थे ।
गोरखको जीतना
उस समय गोरखनाथ योगी जो बड़ा ही बलिष्ठ था और प्रायः रामानन्द स्वामीसे आकर वाद विवाद किया करता था उसका सामना कबीर साहबसे हुआ और कबीर साहबका गोरखनाथके साथ बड़ाही वाद विवाद हुआ और दोनोंही ओरसे अनेक कौतुक दिखलाई दिये जो लोगोंमें प्रसिद्ध हैं । अन्तमें गोरखनाथ परास्त हुआ और अपनी सेली और टोपी कबीर साहबके चरणोंपर चढ़ाकर तथा दंडवत् और प्रणाम करके एक ओरको चला गया ।
शाह सिकन्दरलोदीका काशीमें आना और कबीर साहबसे
मिलना तथा रामानन्द स्वामीका परलोक—गमन
सम्बत् १५४५ विक्रमीमें बहलोल लोदीका पुत्र सिकन्दर लोदी काशी नगरमें पहुँचा, बादशाहके शरीरमें कुछ दिनोंसे जलनका रोग था, रात दिन उसका शरीर जला करता था । उस रोगसे उसे तनिक भी चैन नहीं मिलता था ।
काशीमें पहुँचनेपर बादशाहने सुना कि, वहाँ रामानन्द स्वामी महासिद्ध महात्मा हैं उनके आशीर्वादसे यह रोग दूर हो जायगा । बादशाह दुःखसे कातर हो स्वामी रामानन्दजीके आश्रमको पहुँचा । स्वामीजीने अपने नियमानुसार बादशाहका मुख देखना नहीं चाहा । बादशाहने बहुत विनती की किंतु स्वामीजीने नहीं माना ।
चौपाई
आये सिकन्दर शाहसुलताना । है व्याधा बहु भेद न जाना ॥
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बोधसागर
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रामानन्दकी सुनी बड़ाई । ताते शाह आप चलि आई ॥ आये मंडप जबै सुलताना । रामानन्द तब देखि रिसाना ॥ बादशाह सम्मुख भये जबहीं । रामानन्द मुख फेरा तबहीं ॥ बार अनेक तिहिते मुख फेरा । ताकी ओर क्रोधकरि हेरा ॥
तब बादशाहने क्रोध करके तलवारसे स्वामी रामानन्दका शिर काट लिया । स्वामीका शिर काटते ही बादशाह विकल होकर वहाँही पृथ्वीपर गिर गया । लोगोंने हाथों हाथ शाहको उठाकर डेरेंपर पहुँचाया ।
रामानन्द स्वामीके कत्ल होनेका समाचार शहरमें तुरंत फैल गया । बादशाहके जुल्मको सुनकर धर्मात्मा लोग तो ईश्वरेच्छा समझकर चुप हो रहे किन्तु अधर्मी मिथ्या धर्मके पक्षपाती लोग बढ़बढ़कर बातें करने लगे । कबीर साहबसे द्वेष रखनेवाले मुल्ला काजी और झूठे पण्डितोंने अच्छा दाव विचारा वे बादशाहको क्रोधित कराकर कबीर साहबको भी कत्ल करानेकी चिंतामें लगे ।
उधर बादशाहको भी कुछ चेति हुई तब उसने लोगोंसे पूछा कि यहाँ और कोई ऐसा नहीं है जिसकी कृपासे मेरे शरीरकी जलन दूर हो जावे । कबीर साहबके विदेशी प्रथमसेही घातमें लगे हुए थे । बादशाहके पूछते ही चट उन्होंने उत्तर दिया कि, कबीर नामक रामानन्दका एक शिष्य इस शहरमें बड़ा सिद्ध माना जाता है अगर वह आवे तो शाहकी बीमारी तत्काल अच्छी हो जावे । उन लोगोंकी बात सुनकर बादशाहने आज्ञा दी कि, पता लगावो कबीर साहब इस समय कहाँ विराजमान हैं, मैं इसी समय वहीं जाकर उनका दर्शन करूँगा । शाही नौकरोने
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कबीर चरित्रबोध
( १८१३ )
शहरमें फिरकर उसी समय पता लगाया कि, कबीर साहब रामानंद स्वामीकी मृत्युका समाचार सुनकर स्वामीजीके आश्रमपर विराजमान हैं। बादशाह तुरत फिर उसी स्थानपर पहुँचा। अब कबीर साहबके विद्वेषियोंको निश्चय हो गया कि, आज कबीर साहब अवश्य कत्ल किये जायेंगे, क्योंकि बादशाहने गुरु रामानन्दजीको कत्ल किया है इससे कबीर साहब क्रोधमें होंगे। जब गुरुघाती बादशाहको अपने सम्मुख खड़ा देखेंगे तब कबीरसाहब क्रोध किये बिना रह नहीं सकेंगे और जैसे ही कबीर साहब बादशाह पर क्रोध करेंगे वैसे ही स्वामी रामानन्दके समान बादशाह उनको कत्ल करेगा। अज्ञानी लोग ऐसे ही शोचते हुए बादशाहके पीछे पीछे रवाना हुए। मार्गमें न जाने वे क्या क्या मनोराज्य करते जाते थे।
बादशाह जैसे ही कबीर साहबके सम्मुख पहुँचा, दर्शन पाते ही उसके शरीरकी सब जलन शान्त हो गयी। केवल जलन ही नहीं जलनके साथ साथ मिथ्या धर्मद्वेष भी जो धर्मके नामसे अज्ञानियोंने उसके हृदयमें ठसा रखा था एकदम जाता रहा। कबीर साहबके दर्शनने उसका अंतःकरण ऐसा शुद्ध कर दिया कि, उसके समान कट्टर मुसलमान बादशाह मिथ्या धर्माभिमान छोड़कर एकदम दौड़कर कबीर साहबके चरणोंपर गिर पड़ा और स्वामी रामानन्दजीके कत्ल करनेके अपराध पर पश्चाताप करके क्षमाका प्रार्थी हुआ। बादशाहके पश्चाताप और आधीनताको देखकर कबीर साहबने उसके अपराधको क्षमा करके धैर्य दिलाया।
अपने विचारके विरुद्ध बादशाहको कबीर साहबके आधीन होते देखकर विद्वेषियोंके मनमें बड़ी ग्लानि आयी। उन्होंने
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बोधसागर
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अपने हाथसे दाव चूकते देखकर परस्पर विचार करके दूसरा उपाय बलवा करने और कबीर साहबके अनिष्ट करनेका शोचकर रामानन्द स्वामीके शिष्योंके पास गये । वे उस समय गुरुके वियोगसे ऐसे विह्वल हो रहे थे कि, उनकी सारासार विचारिणी बुद्धि उस समय लुप्त हो रही थी । दुष्टोंने जाकर उन्हें समझाया कि, देखो कबीर अपने गुरुघातकसे ही घुल घुलके बातें कर रहा है । जात स्वभाव कभी छूटता है ? फिर तो अपनी जातिके ऊपर गया । मुसलमान मुसलमान एक हो गये । कबीरको गुरुके मृत्युकी भी चिंता नहीं है । तुम लोग तो गुरुका शोक मना रहे हो और वह बादशाहके साथ हँस रहा है । उन दुष्ट बिगाड़ुओंकी बातने स्वामीजीके शिष्योंपर प्रभाव डाला, अखाडेके सब शिष्य और साधु एकमत होकर कबीर साहबके निकट आकर दुर्बचन बोलने और निन्दा करने लगे । प्रथम तो कबीरसाहब शान्तिसे उनके वचनको सुनते रहे पश्चात् जब उन लोगोंका क्रोध शान्त नहीं हुआ तब कबीर साहबने उन लोगोंसे कहा कि, तुम लोगोंकी श्रद्धा और विश्वासकी यहाँ तक ही समाप्ति हो गयी । गुरुने क्या तुम्हें यही उपदेश दिया और गुरुके उपदेशका यही परिणाम तुम लोगोंने निकाला है ? गुरुको मृतक समझने वाले तुम लोगोंकी बुद्धि स्थूल देहतक ही समाप्त हुई है । आगे भी तुम्हारे शिष्य लोग स्थूलकी ही पूजामें अपना जीवन व्यतीत करेंगे । उन्हें सत्यपदकी प्राप्ति कदापि नहीं होगी । जब स्थूलके करसे निकलकर सद्गुरुकी शरणको प्राप्त होंगे तब सत्यपदको पावोगे । यदि तुम लोगोंको स्वामीके स्थूल शरीरसेही सम्बन्ध है तो चलो स्वामीका शरीर तुम्हें जीवित दिखा
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कबीर चरित्रबोध
( १८१५ )
हूँ । इतना कहकर कबीरसाहब बादशाहको साथ लिये हुए वहाँ गये जहाँ स्वामी रामानंदका मृतक शरीर पड़ा हुआ था । वहाँ जाकर सबने देखा कि, स्वामीके दाहिने अङ्गसे खूनके बदले दूध बह रहा है और बाई ओरसे रक्त निकल रहा है । यह आश्चर्य देखकर सब चकित हो गये । बादशाहने कबीर साहबसे पूछा कि इसका क्या कारण ? लोहूके बदले दूध कैसे निकल ?
सिकन्दर वचन
पय औ रुधिर चल्यो गुरु अङ्गा । शाह कहैं यह कौन प्रसङ्गा ॥
कबीर उत्तर
जेहि तन मान्यो शब्द हमारा । तेहिते चले दूधकी धारा ॥ कीन्ह कालहू केर विचारा । आधा अंग रुधिर अनुसार ॥ अगले जन्म मुक्ति जो होई । अंकुरी जीव कहावै सोई ॥
ज्ञानसागर
रामानन्द स्वामीका पुनर्जीवन
पश्चात् कबीर साहबने एक सफेद चादर मैगाया और स्वामी-जीका शिर तथा धड़ इकट्टा जोड़कर ऊपर वही चादर ओढ़ा दी । फिर बादशाह वगैरह ऐसे लोग जिनका दर्शन करना गुरु अच्छा नहीं समझते थे वे सब लोग अलग हो गये केवल कबीर साहबके सहित सब शिष्य लोग वहाँ रह गये, तब कबीर साहबने पुकारकर कहा-हे गुरो ! हे स्वामिन् ! ! अब राम राम कहनेका समय हुआ है । देखिये सन्ध्या निकट है । शिष्यवर्ग आपके दर्शनके लिये व्याकुल हो रहे हैं, अब कृपासागर उठिये और सबको दर्शन देकर कृतार्थ कीजिये ।
कबीर साहबके इतना कहते ही रामानन्द स्वामी राम राम कहते उठ बैठे ।
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बोधसागर
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स्वामीजीके उठते ही शिष्य मण्डली आश्चर्य और आनन्दसे कोलाहल करने लग गयीं। कितने तो उपकार मानते हुए कबीर साहबके पगपर आकर गिरे कितने ही खड़े २ स्तुति करने लगे। कबीर साहबने सबसे कहा कि, यह सब गुरुकाही प्रताप समझो और गुरुकी ही चरणबंदना करो।
स्वामी रामानन्दजी शिष्योंका कोलाहल और अपने निकट दूध और पानीकी बही हुई धारको देखकर आश्चर्यसे इधर उधर देखने लगे। इतनेमें सबको कबीर साहबकी स्तुति करते देखकर वृत्तांत जाननेके लिये जो औरख मूँदके ध्यान किया तो सब हाल उनपर प्रकट हो गया। फिर तो बड़ी श्रद्धा और भक्तिसे कबीर साहबके चरणोंपर गिरने ही जाते थे कि, कबीर स्वयं झुक गये और विनय करने लगे कि, स्वामिन ! आपके योग्य यह काम नहीं है। आप मय्यादा पुरुषोत्तम हो। आपको धर्मसेतुके तोड़नेका काम करना उचित नहीं है। आपको मैंने गुरु माना है। आप गुरुपद परही स्थित रहकर सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं। मुझे दास पदमें ही आनन्द आता है। कबीर साहबकी ऐसी आधीनता, नम्रता और निरभिमानता देखकर स्वामी सहित सब शिष्य दंग हो गये।
कबीर साहबकी महिमा देखकर वैरियोंके दांत खड़े हो गये। उधर बादशाहने भी सिंहासन मंगाकर तय्यार रखा जैसे ही कबीर साहब आश्रमसे बाहर हुए वैसेही बादशाहने आपको तत्क्षत्पर बैठाया और आप हाथ जोड़के सामने खड़ा होकर स्तुति करना आरम्भ किया।
कहते हैं कि उसी दिनसे रामानन्द स्वामीने सब भ्रम और पाखण्डको अलग कर पर्दा वगैरह हटा दिया और सब जातिके