भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 769, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 769

बोधसागर

( २९ )

अथ बन्द

प्रथमबोलिये मूल बन्द । दुजे बोलिये कमर बन्द । तीजे बोलिये लंगोट बन्द । पाँचवे बोलिये दानिश बन्द । छठे बोलिये शब्द बन्द । सातवाँ बोलिये सहस बन्द । आठवाँ बोलिये अहूठ हाथकी काया । जाका मर्म काहू विरले पाया ॥ मक्केहिर्से मदीने छाया । औवल पीर हिन्दू कौबल वीर सुसलमान कहाया ॥ सुसलमानकी काटी चोंचनी हिन्दू के छेदे कान । बोलता ब्रह्म नहीं हिन्दू नहीं सुसलमान । दादा आदम ने गाया । बडे बडे पीरन को फरमाया । खुदाने अली पादशाह को चिताया । हिम्मते बन्दा मददे खुदाया । दुआ फकीरा रहम अछाह । कदम दवैशाँ रह बलाय । दादा आदम मामा होआ । मक्के मदीने में चढा तावा । पहिली रोटी फकीर को रवा । ना देवे रोटी तो टूटे कठवता फूटे तवा । बैठी रहो मामा होवा । कुफ्र वले अपनी रावा । इतनी सवाल रतनहाजी ने कह्यो । कहै कवीर पीर को जानी । काफिर बोध सम्पूर्ण वानी ।

इति श्री काफिरबोध प्रथम मंजिल समाप्त

फिरिशतोंका ब्यान

१ औवल फिरिशता बसर है । जैसे खुदाकी मूरत मूरत नहीं है आदि अन्त नहीं है वैसे बरसकाभी कोई रूप रेख नहीं है । खुदाने सह फिरिशता सब । जीवधारीके संग लगा दिया है जो हरएकको बतलाता है कि, देख कर चलो ठोकर मत खाओ ॥

२ दूसरा फिरिशता समंअ ( कान ) है उसके द्वारा खुदा उपदेश करता है कि, मकरूह ( बुरा ) मरगूब ( भला ) आवाज और दोस्त दुश्मन की बातको सुनो और समझो ।

१ नेत्रेन्द्रो, कर्णन्द्रो ।

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण) · पृष्ठ 769, कुल 2136 में से · BharatKosha