भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( १०७ )

माया तजे तो क्या भया, मानहिं तजा न जाय । मानहिं बड सुनिवर गले, मान सबन को खाय ॥ कविरा अपने जीवते, ये दो बातों धोय । मान बडाई कारने, अच्छता मूल न खोय ॥

वार्ता ३

शाह इब्राहीम अद्वम संसार त्याग देनेके पश्चात् मस्त फकीरों के वेषमें इधर उधर फिरा करते थे। न कोई उनका विशेष वेष था न चिह्न। इसलिये लोग उनको पहचान नहीं सकते थे। एकबार ऐसेही फिरते हुए किसी अमीर आदमीने उन्हें पकड़कर अपने बाग में माली के काम पर लगा दिया। सदगुरु की इच्छा जानकर वे अच्छी तरह बाग का काम करने लगे। एक वर्ष जब बागवानी करते उनको होगया तब एकदिन बाग का मालिक अपने कई मित्रोंको साथ लिये हुए बागमें आया। शाह इब्राहीम साहबने उस समय बागमें जितने फल फूल थे सबमें से थोडा थोडा लेकर एक डाली बनायी और मालिक बेगके पास ले गये। जब उस अमीर ने डाली में से अनारों को लेकर खाया तब सब अनार खट्टे निकले। उसने शाहसाहब को बुलाकर पूछा कि, मेरे लिये ये खट्टे अनार क्यों लाया ? उन्होंने जवाब दिया कि, मुझे खट्टे मीठे की कुछ खबर नहीं है। उस अमीरने कहा कि, तुम कितने दिनसे इस बाग में रहते हो ? उन्होंने कहा एक वर्षसे। अमीरने कहा एक वर्षसे बागवानी करके भी तुमने आजतक बागके खट्टे मीठे अनारों को नहीं पहचाना ? शाह इब्राहीमने उत्तर दिया तुमने मुझे बागकी रक्षा करने के लिये रखा था कि, फलों को खाने के लिये ? अमीरने