कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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सुलतानबोध
कहा रक्षाके लिये ? उन्होंने कहा तब मैं फल कैसे खा सकता था ? अगर रक्षक भक्षक बन जाय तब तो रक्षाका नामही संसारसे उठ जाय । आपकी बातको सुनकर वह अमीर बड़े आश्चर्य में आया । फिर जाँच करने पर उस अमीरको मालूम हुआ कि, वह तो शाह इब्राहीम अह्मद हैं तब तो वह हाथ जोड़कर उनके पैर पर गिर पड़ा और अपना अपराध क्षमा कराने लगा । तब वे हँसकर उस अमीरको उपदेश देकर चल दिये ।
वार्ता ४
कहते हैं कि, बादशाहत त्याग देने के पश्चात् सुलतान इब्राहीम अह्मद शाह दस वर्ष तक नेशापुर जंगल की एक गुफा में रहकर भजन करते रहे । आठवें दिन गुफा से निकल कर जंगलकी लकड़ियाँ इकट्ठी करके वस्तीमें ले जाकर बेच आते और उससे जो कुछ मिलता उतनेही में आठ दिनके भोजन का सामान खरीद कर ले आते और आठ दिनतक बैठे भजन करते.
लिखा है कि, इस दस वर्षकी तपस्या और एकान्त बाससे उन्होंने अपने मन तथा इंद्रियोंको पूर्ण रीतिसे जीत लिया था । इसके प्रमाणमें लिखा है कि, जब नेशापुरसे शाह इब्राहीम अह्मद रवाना हुए तब एक जहाज पर चढ़ कर अरब को चले । संयोगसे उस जहाज पर एक अमीर भी जा रहा था । उस अमीरके साथ सब अमीराना सामान नाचराग वगैरह थे । ठट्ठा मसखरीसे अमीरों को खुश करने वाले भांड भी उसके साथ थे । एक रातको भाँड़ोंने कहा अगर कोई आदमी मिलता तो उसपर से हमलोग अपनी मसखरी उतारते । उस अमीरने हुक्म दिया कि, देखो