कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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मुलतानबोध
फिर उनने कहा कि, हे प्रभु ! क्या मैं तेरा बन्दा इसका बिलहूँ और ऐसा नापाक हूँ कि, मेरे स्पर्श के पाप से इतने बड़े जहाज को डुबाकर इतने निष्पापोंका अन्त करेगा । प्रभु ! तू तो दयालु है अथम धारन है ऐसा क्यों नहीं करता कि यदि केवल मेरे ही लियेतुझे इतनी हत्या करनी पड़ती हो तो मुझको ही डुबादे अगर नहीं तो इन सबोंको वह ज्ञान दे कि ये तेरी बड़ाईको समझे और इनका हृदय दया और ज्ञानसे पूर्ण हो जावे । उनके इस प्रकार आशिर्वाद करने के पश्चात् तत्काल ही अमीर सहित समाज के सब आदमियों का हृदय शुद्ध और ज्ञान से पूर्ण हो गया । उस समय सबने उनको पहचाना । फिर तो सब उनके पगपर गिरकर क्षमा कराने लगे । उन्होंने सबको उपदेश देकर संतोष दिलाया ॥
वार्ता ५ ।
एक बार एक स्मशान में बैठे हुए शाह ईब्राहीम अख्मसे किसीने पूछा कि, बादशाही छोड़कर मरघटों में क्यों बैठते फिरते हो ? उन्होंने उत्तर दिया कि, संसार के मनुष्यों को मैं चार प्रकार का देखता हूँ ॥ १ ॥ कोई तो जीता है और संसार में मौजूद है ॥ २ ॥ कोई मांके पेटमें है ॥ ३ ॥ कोई अपना कर्म पूरा करके आनेही चाहता है ॥ ४ ॥ कोई मर गये हैं इनमें से मेरे हुए लोग पुकार रहे हैं कि ओ संसार के आदमियों ! जल्दी जल्दी मरो कि, क्यामत जल्दी हो और हमलोग कब्रकी कष्ट से छूटें । जो माताके पेट में आचुके हैं और जो आने वाले हैं वे पुकार रहे हैं कि, ओ संसार के मनुष्यों ! जल्दी संसारको छोड़ो कि, हमारे आनेको स्थान मिले । आशय यह है कि एक ओर से भागते हैं और