कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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सुलतानबोध
भूखे प्यासे जमीन पर सोता और दुःख उठाता फिर रहा है । पूज्य पिताजी ! एक चीज को छोड़कर मनुष्य दूसरी वस्तुको उन्नति की आशासे स्वीकार करता है । आपने तो उलटा प्राप्त सुख को भी खोकर अपनी ऐसी दशा बना ली है जिसे देखकर मुझे शरम आती है और आपकी यह प्यारी प्रजा आठ आठ आसूं रो रही है । इसी लिये मैं आपसे पूछता हूँ कि, आपको इस त्याग में क्या प्राप्त हुआ है ? ।
बेटेकी बातको सुनकर उसे कुछ उपदेश देने के विचारसे सुलतान ने कहा, बेटा ! मैंने जो कुछ कमाया है वह तो पीछे बतलाऊंगा पहले तू बतला कि, बादशाही पाकर तूने अपनी उन्नति कहाँ तक की है ? बापकी बात को सुनकर बेटा हँसकर बोला कि, देखिये आपके राज्य छोड़कर चले जानेके पश्चात् मैंने अमुक अमुक देश अपने बाहु बलसे जीतकर स्वाधीन कर लिया है और अमुक अमुक सुधार राज्य में फैलाया है । मेरे अधिकारमें क्या नहीं है ? जिसको चाहूँ आज गरीब बना हूँ जिसको चाहूँ आज कुबेर कहला हूँ । जिसको चाहूँ उसका जान बखशी कर हूँ जिसको चाहूँ मार डालूँ । मेरे नाम को सुनकर शत्रु डरते हैं । मेरी आज्ञा को कोई तोड़ नहीं सकता ।
इतना सुनकर सुलतानने कहा कि, बेटा ! अगर सच मुच तुममें ऐसी सत्ता आगयी है तो ले मेरी यह सुई इस तलाब मेंसे निकलवा दे । इतना कहकर गुदडी सीनेकी सूईको तालाबमें फेंक दिया ।
यह देखकर बेटा ( बादशाह ) ने हँसकर कहा यह कौन-बड़ी बात है । एक नहीं लाखों सुई आपको मँगवा देता हूँ । सुलतान ने कहा मुझे दूसरी सुई नहीं चाहिये मुझे तो मेरी ही सुई चाहिये ।