कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
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बादशाह ने उसी समय वजीर को आज़ादी और आनन फानन में देखते ही देखते हजारों पानी में डुबकी मारनेवाले और जाल डालने वाले हाजिर हो गये। यद्यपि सूर्यका निकाल लेना बादशाह सहल काम समझता था तथापि सब उपाय करने पर भी सूर्यका पता नहीं लगा। तालाब के तह में जमें हुए सब काँदों कीच साफ हो गये। मगर सूर्यका पता नहीं लगा। तब तो बादशाह अपने मनमें शरमाकर पिताके पास जाकर कहने लगा कि, वह सूर्य तो नहीं मिली उसका मिलना असम्भव है दूसरी सुइयाँ हाजिर हैं जितनी चाहिये लीजिये। सुलतान हन्नाहीमने कहा कि, बेटा तूने यह क्या उन्नति की कि, एक सूर्य भी तालाबसे नहीं निकलवा सकता? खैर अब मेरी कमाई को भी देख और अपनी कमाई से मिला। इतना कहकर सुलतान ने आँख बन्द करली एक क्षण के बाद आँख खोल कर तालाबकी ओर देखा तब अगनित जलचर मछली आदि जीवधारियों को किनारे जलमें खड़ा देखा। बादशाहने उनसे कहा प्यारी ईश्वरकी स्तुतिकी मछलियों! क्या तुम मेरा एक काम कर सकोगी? सब जलचरोंने एक जवान होकर कहा जो आपकी आज़ा हो करने को तैयार हैं। जलचरों को बोलते सुनकर बादशाहसे प्रजा तक सब आश्चर्य में आगये। सुलतानने मछलियोंसे कहा कि मेरी एक सूर्य पानीमें है उसे दूँढकर ला दो। इतना सुनते ही मछलियाँ गोता लगा गयीं। थोड़ी देरमें एक मछली सूर्य मुँहमें लिये हुई किनारे आयी। बादशाहने अपने हाथ से सूर्य लेकर देखी तो वही सूर्य थी। फिर तो वह बापके पगपर गिरकर रोते और अपनी अज्ञानता के अपराध को क्षमा कराने लगा। प्रजा