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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

( ११३ )

बादशाह ने उसी समय वजीर को आज़ादी और आनन फानन में देखते ही देखते हजारों पानी में डुबकी मारनेवाले और जाल डालने वाले हाजिर हो गये। यद्यपि सूर्यका निकाल लेना बादशाह सहल काम समझता था तथापि सब उपाय करने पर भी सूर्यका पता नहीं लगा। तालाब के तह में जमें हुए सब काँदों कीच साफ हो गये। मगर सूर्यका पता नहीं लगा। तब तो बादशाह अपने मनमें शरमाकर पिताके पास जाकर कहने लगा कि, वह सूर्य तो नहीं मिली उसका मिलना असम्भव है दूसरी सुइयाँ हाजिर हैं जितनी चाहिये लीजिये। सुलतान हन्नाहीमने कहा कि, बेटा तूने यह क्या उन्नति की कि, एक सूर्य भी तालाबसे नहीं निकलवा सकता? खैर अब मेरी कमाई को भी देख और अपनी कमाई से मिला। इतना कहकर सुलतान ने आँख बन्द करली एक क्षण के बाद आँख खोल कर तालाबकी ओर देखा तब अगनित जलचर मछली आदि जीवधारियों को किनारे जलमें खड़ा देखा। बादशाहने उनसे कहा प्यारी ईश्वरकी स्तुतिकी मछलियों! क्या तुम मेरा एक काम कर सकोगी? सब जलचरोंने एक जवान होकर कहा जो आपकी आज़ा हो करने को तैयार हैं। जलचरों को बोलते सुनकर बादशाहसे प्रजा तक सब आश्चर्य में आगये। सुलतानने मछलियोंसे कहा कि मेरी एक सूर्य पानीमें है उसे दूँढकर ला दो। इतना सुनते ही मछलियाँ गोता लगा गयीं। थोड़ी देरमें एक मछली सूर्य मुँहमें लिये हुई किनारे आयी। बादशाहने अपने हाथ से सूर्य लेकर देखी तो वही सूर्य थी। फिर तो वह बापके पगपर गिरकर रोते और अपनी अज्ञानता के अपराध को क्षमा कराने लगा। प्रजा

( ११४ )

सुलतानबोध

चारों ओर से जय जयकार वाणी उच्चारने लगी । इतने में सुलतान इब्राहीम अद्वमसाहब वहाँ से अन्तरध्यान हो गये ।

वार्ता ८

कहते हैं कि, जब सुलतान इब्राहीम अद्वम मक्का के निकट पहुँचे तब सुना कि मक्काके पुजारी और यात्री लोग उनकी अगुवानी को आ रहे हैं । तब वो जमात से निकल कर अलग होकर आगे चले गये जिसमें उनको कोई पहचान न सके मक्का के महात्माओंके सेवक लोग जो अपने अपने मालिकों से आगे आरहे थे पहले सुलतान इब्राहीम अद्वमसे मिले । उन लोगोंने आपसे पूछा क्या सुलतान इब्राहीम अद्वम यहाँसे नजदीक हैं ? सब महात्मा लोग उनसे मिलनेको आरहे हैं । आपने उत्तर दिया कि, वे उस अधर्मीसे क्या चाहते हैं ? सेवकोंने गाली देते सुनकर आपको खूब मारा और गरदनियां दीं और कहने लगे कि, तू ऐसे महात्मा को अधर्मी कहता है ? असलमें तूही अधर्मी है । आपने कहा हाँ भाई सोई तो मैं भी कह रहा हूँ वे सब तो आपको मारकूटके आगे बढे और आप अपने मनसे कहने लगे कि, क्यों ओ दुष्ट तूने अपने किये का फल पाया या नहीं ? अभी कैसा खुश हो रहा था कि, मक्का के महात्मा लोग हमारी अगुवानी को आ रहे हैं । इसी प्रकार से आप ही आप अपने मनको समझा रहे थे इतने में लोग आगये और आपको पहचान कर आपसे क्षमा मांगने लगे । फिर आप मक्का में जाकर बहुत दिनों तक रहे । आपके बहुत से चेले भी हो गये । आपके चेले गुदड़ी ओढते और खड़ी टोपी पहनते थे ।

बोधसागर

(११५)

वार्ता ९

जब आप बलख छोड़ कर फकीर हुए थे उस समय आपका एक छोटा पुत्र था जब वह लड़का बड़ा हुआ तब उसने अपनी मांसे पूछा कि मेरा बाप कहाँ है ? माने सब हाल कह सुनाया और यह भी कहा कि सुननेमें आता है कि, आजकल मक्कामें रहते हैं । लड़केने मांसे कहा “अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं भी मक्का जाऊँ तीर्थ भी करूँगा और पिताको दूँढकर उनका दर्शन भी करूँगा” माने कहा अकेले तू क्यों जायगा मैं भी मक्का की जेयारत को जाऊँगी । फिर तो लड़केने वजीरों को हुकम दिया कि, शहर भर में ढौड़ीं पिटवा दा कि, जिसको मक्का चलना हो वह चले उसका सब खर्च मेरी ओरसे दिया जायगा । फिर चार हजार आदमी मक्का जाने को तैयार हुये । सबको साथ लेकर लड़का मक्का पहुँचा । वहाँ जाकर गुदडी वाले फकीरों की एक जमात देख कर उनसे पूछा कि, तुम लोग इब्राहीम अद्दम साहब को जानते हो ? उन्होंने कहा वे तो हमारे गुरु हैं । फिर पूछा वो कहाँ हैं ? उत्तर मिला कि वो लकड़ियों के गढ़ठे लाने जंगलमें गये हैं । क्योंकि जब वो जंगल से लकड़ी लेकर आयेंगे और बेचकर रोटी लायेंगे तब हम लोग खायेंगे । इतना सुनकर लड़का जंगल की ओर रवाना हुआ । आगे जाकर एक बुढ़ठे को लकड़ियोंका गढ़र शिर पर रखे हुए आते देखा । लड़का मुलतानकी वह दशा देखकर रोने लगा । फिर उनके पीछे पीछे बाजार तक गया । जहाँ जाकर उन्होंने लकड़ी रखकर पुकारा कि कोई है जो माल हलाल (सुकृति की कमाई) को माल हलालके बदले लेवे । एक आदमी आया उसने

( ११६ )

सुलतानबोध

आपसे लकड़ियाँ लेलीं और उसके बदले में रोटियाँ दे दीं । आप रोटी लेकर जमातमें आये और साथियों के आगे रख दीं । लोग रोटी खाने लगे और आप भजन में लगे ।

सुलतान इब्राहीम अह्मद साहेब सदा अपने चेलोंसे कहा करते थे कि, 'देखो बेदाढी मूँछके लड़के और स्त्रियों से सदा सचेत रहना उनकी ओर कभी ध्यान देकर मत देखना" । उनके शिष्यवर्ग सदा उनकी आज्ञाका पालन करते थे ।

काबाकी परिक्रमाके समय संयोगसे सुलतान इब्राहीम अह्मद का लड़का उनके सन्मुख आगया । आपने दृष्टि भरकर उसकी ओर देखा । शिष्य लोग उनके उस कामसे आश्चर्यमें आये । जब परिक्रमा कर चुके तब आपके शिष्योंने आपसे हाथ जोड़कर विनय किया कि दीनबन्धु हमको तो आपने आज्ञा दी है कि बिना मूँछ डाढी वाले बालकों और स्त्रियोंकी ओर दृष्टि मत करना किन्तु परिक्रमाके समय आपने स्वयम् एक बालककी ओर टकटकी लगाकर देखा था इसका क्या कारण है ?

शिष्योंकी बातको सुनकर आपने उत्तर दिया कि जिस समय मैं बलख छोड़कर चला था उस समय मेरा एक छोटा लड़का था मुझे इस लड़केको देखते ही ऐसा जान पडा कि यह वही लड़का है । आपकी बात सुनकर आपके शिष्योंमें से एक शिष्य यात्रियोंके स्थानमें गया और बलखके यात्रियोंको दूँदते दूँदते आपके पुत्रके पास पहुँचा । उस समय वह लड़का अपने खीमें बैठा हुआ पुस्तक पढ़ रहा था और रो रहा था उस शिष्यने जाकर उस लड़केसे पूछा कि आप कहाँसे आये हैं । लड़केने कहा—बलखसे आया हूँ । फिर उसने पूछा आप

बोधसागर

( ११७ )

किसके लड़के हैं ? उत्तर मिला कि, इब्राहीम अब्दमके उसने पूछा कि, आपने उनको देखा है ? लड़केने कहा कलके सिवाय मैंने उनको कभी नहीं देखा किन्तु मुझे यह भी निश्चय नहीं है कि, जिनको मैंने देखा है वह मेरे पिता हैं कि, नहीं । उनसे इस डरके मारे कि वो तो हम ही लोगोंसे भाग कर यहाँ आये हैं कहीं हमको जानकर यहाँसे भी कहीं भाग न जावे कुछ न पूछा । आपके उस शिष्यने कहा कि, आप मेरे साथ आइये मैं आपको आपके पितासे मिला दूँ । फिर तो दोनों माँ बेटे और बहुतसे आदमी उस शिष्यके साथ चले जब सब आपके सामने आये तब आपकी स्त्रीने आपको देख लिया देखते ही वह विकल होगयी और रोने लगी । फिर लड़केसे बतलाया कि, देखो तुम्हारे बाप यही हैं ? लडका भी रोने लगा । उस समयकी दशा ऐसी करूणापूर्ण थी कि आपके सब शिष्य भी उनके साथ रोने लगे । मोहने करूणाके स्वरूपमें सबके ऊपर अपना जाल फैलाया ।

लडका रोते रोते बेहोश होकर गिर पडा जब चेतमें आया तब बापके पग पर गिरकर प्रणाम किया । आपने उसे गले लगाया फिर उससे उसके पढने लिखने और धर्मकी बातोंको पूछकर आपने चाहा कि, वहाँसे उठकर चले जावें किन्तु आपके स्त्री और पुत्रने न छोडा तब थोडी देरतक चुप रहनेके बाद आपने आसमानकी ओर मुहँ करके कहा हे प्रभु ! तू मेरी सहायता कर आपका इतना कहना था कि, पुत्र आपहीके गोदमें मृत्युको प्राप्त हुआ ।

शिष्योंने लडकेको मरते देखकर पूछा या सतगुरु ! यह क्या हुआ ? आपने कहा जिस समय मैंने इस लडके को गले

( ११८ )

मुलतानबोध

लगाया था उस समय मेरे हृदयमें मोहका संचार हो आया था तब परमात्माकी ओरसे आज्ञा हुई थी कि, ऐ इब्राहीम तू मेरे प्रेम और भक्तिका दम भरता है और स्नेह दूसरोंसे करता है । जिस बातके लिये शिष्योंको सबसे अलग रहनेको कहता है उसीको तू आप पकड़ता है । जब मैंने यह सुना तब मैंने आशीर्वाद किया कि, हे प्रभु मेरी रक्षा तेरे ही हाथमें है, यदि मेरे पुत्रका मोह सुझे तुझसे अलग करनेवाला है तो सुझे मृत्यु दे दे या उसीको । बस जो कुछ साहबने किया सब ठीक किया । इतना कहकर आप वहाँसे शिष्यों सहित उठकर चले गये बलखवाले लोग रोते पीटते लाशको दफन करनेके लिये ले गये *

वार्ता १०

एकवार हजरत इब्राहीम अल्लमके पास कोई आदमी एक हजार दिरम लाया और विनय पूर्वक प्रार्थना की कि आप इसे स्वीकार कर लीजिये आपने उससे कहा कि मैं मँगतोंसे कुछ नहीं लेता । उस आदमीने कहा मैं मँगता नहीं हूँ बल्कि बड़ा धनवान हूँ । तब आपने उससे पूछा कि, जितना तेरे पास है उससे अधिक मिलनेकी इच्छा तेरे हृदयमें है कि नहीं ? उसने कहा हाँ अधिक तो जरूर चाहता हूँ । तब आपने कहा कि, तब तो तू बड़ा भिखमैंगा है इसलिये मैं तुझसे कुछ नहीं ले सकता । मैं उसीसे लेता हूँ जो इतना पूरा है कि, कुछ नहीं चाहता ।

  • वर्तमानके त्यागके अभिमानी साधु और महंतोंको विचार करना चाहिये क्यों कि, ये भी तो अपनेको मुलतान इब्राहीम अल्लमसे बढ़कर त्यागी बतलाते हैं ।

बोधसागर

( ११९ )

वार्ता ११

एकबार एक आदमी दसहजार अशरफियाँ लेकर आपके पास आया और उनको स्वीकार करानेके लिये हठ करने लगा। आपने उससे कहा कि, तू इस थोड़ेसे सोनेके बदले मेरी साधुता मोल लेके मुझे त्यागियोंकी जमाअतसे निकलवाना चाहता है ? इतना कहकर आप वहाँसे उठकर चले गये।

धन्य है इस त्यागको। आजकलके वैरागी भी अपनेको महान त्यागी मानते हुए भी एक एक पैसाके लिये संसारी तुच्छ जीवोंके पास दीनता करते और झूठी खुशामद किया करते हैं क्या कोई सच्चा विचारवान उन्हें वैरागी कह सकता है कदापि नहीं।

वार्ता १२

एक आदमी ने आपसे विनय किया कि, आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये जिसपर अमल करके मैं सन्त पदवी को पा सकूँ। आपने उससे कहा-सन्त बनने के लिये सबसे पहली बात यह है कि, लोक और परलोक दोनोंसे चित्त उठा करके-वल साहबमें लगादे। साहब के सिवाय अपने हृदयसे दूसरा सब कुछ निकाल दे। दूसरे-हरामकी कमाई छोड़कर सुकृति कमाईसे उदर निर्वाह कर। क्योंकि जिसका आहार शुद्ध है उसका हृदय शुद्ध होता, और जिसका हृदय शुद्ध होता है, उसीके अन्तःकरणमें साहबका सच्चा प्रकाश प्रकट होता है जिसने अपना आहार शुद्ध किया है वह अवश्य अपने पदको पहुंचा है। तीर्थ व्रत और नाना प्रकारके ऊपरी तपस्यासे चित्त शुद्ध नहीं होता बरन आहार शुद्ध होनेसे ही अन्तःकरण शुद्ध होता है।

( १२० )

सुलतानबोध

वार्ता १३

एक बार लोगोंने हजरत इब्राहीम अख्दमसे कहा कि अमुक सन्त बड़ा सिद्ध और ईश्वरतक पहुँचा हुआ है। वह सदा ध्यान में ही रहता है और दूर दूर देशकी बातोंको कह देता है। और सदा तपस्या में ही रहता है। आपने उन लोगोंसे कहा कि, मुझे उसके पास लेचलो मैं उसका दर्शन करूँगा। लोग आपको उसके पास ले गये। आपने वहाँ जाकर देखा कि, वह उससे भी बढकर सिद्धिवाला है। उस सिद्धिने आपसे प्रार्थना की कि; आप तीन दिन तक यहाँ रहिये आप रह गये। उसके व्यवहारको देखकर आपने विचार किया तो मालूम हुआ कि, उसका भोजन आदि निर्वाह दम्भकी कमाईसे चलता है। तब आपको उसकी दशा पर दया आयी। तीन दिनके बाद आपने उस सिद्ध को नेवता देकर अपने कुटी पर बुलाया जब वह आप के पास आया तब दूसरे ही दिन उसकी सिद्धि लुप्त होने लगी तीसरे दिन तो वह कोरा सन्त रह गया। तब उसको बड़ा आश्चर्य हुआ उसने आपसे कहा कि आपने मेरे ऊपर क्या कर दिया मेरा सब चमत्कार जाता रहा ? आपने उसको उत्तर दिया कि; पहले तुम हरामकी कमाईसे अपना पेट भरते थे इस कारण कालने तुम्हारे हृदयमें प्रवेश करके तुम्हें अनेक प्रकारकी सिद्धिका लालच दिखाकर साहब के देशसे काल देशमें लेगया था। अब तुम तीन दिनसे सुकृति की कमाई का भोजन करते हो इस कारण कालका राज्य तुम्हारे हृदयसे उठ गया है। अब तुम चाहो तो साहिबका भजन कर सत्य लोक का साधन कर सकते हो।

सुलतान इब्राहीम की बात उस समय तो उसको अच्छी नहीं

बोधसागर

( १२१ )

लगी परन्तु जब वह लौटकर अपने स्थानपर आया और सुल- तान इब्राहीम अह्म साहेब के आचार विचार को अपने कर्तव्यों से मिलाने लगा तब उसे प्रत्यक्ष ज्ञात होगया कि, वह तो अपने उचित परिश्रम द्वारा अपनी संसार माया चलाते हैं और वह अपनी संसार यात्राके लिये नाना प्रकार के वेश और दम्भकी बातोंसे संसार को बहकाकर अपना नाम बढ़ाता है। जिन बातोंके भेदको वह स्वयम् नहीं जानता उसको जानने का डौल बनाकर लोगोंको ठगता और भ्रममें डालता है। इस प्रकार से बोध होते ही उसने पश्चात्ताप करके अपने सब स्वाँगों को तिल्लौजली देकर काल देशसे निकलने और सत्यराज्य में प्रवेश करनेके लिये सच्चे संतोंका संग करना आरम्भ किया।

वार्ता १४

एक दिन परिश्रम करने पर भी आपको भोजन नहीं मिला। आपने साहिब को धन्यवाद दिया। इसी प्रकार सात दिन तक आपको भोजन नहीं मिला और बराबर आप साहिब को धन्यवाद करते रहे। आठवें दिन निर्बलता बहुत बढ़ गयी तब आपके मनमें कुछ भोजन मिलने की इच्छा हुई। साहिब की कृपासे एक मनुष्य आकर खड़ा हुआ और विनय करने लगा कि, आप मेरे यहाँ भोजन करने चलिंये उसके प्रेम और भक्ति भावको देखकर आप उसके साथ गये जब आप उस आदमी के घर पर पहुँचे तब उसके अमीराना ठाट और मकानात के देखनेसे मालूम हुआ कि, कोई बड़ा धनी आदमी है। उसने आपको एक सजी हुई कोठरीमें ले जाकर बैठाया फिर वह आपके पैरों पर गिरकर विनय पूर्वक कहने लगा कि, मैं

( १२२ )

सुलतानबोध

आपका मोल लिया हुआ दास हूँ सो यह सब वैभव आपकी सेवा में अर्पण करता हूँ, इसे स्वीकार कीजिये । आपने उसी समय उससे कहा कि, आजसे मैं तुझे दासत्व से स्वतंत्र करता हूँ और यह सब माल असबाब भी तेरे ही को देता हूँ । इतना कहकर आप वहाँसे उठकर जंगल में चले आये और साहिबसे प्रार्थना करने लगे “हे प्रभु ! आजसे तेरे सिवाय दूसरा कुछ न चाहूँगा । तू तो टुकड़े रोटीके बदले संसार भरकी माया मेरे गले बाँधना चाहता है” । कहते हैं कि, आपने मनका दण्ड देनेके लिये कई दिनों तक और भी भोजन नहीं किया ।

सद्गुरु ने सबसे अधिक मनके ऊपर ही ध्यान रखने को बारंबार कहा है । यथा—

साखी—मनके मते न चालिये, छाड़ि जीवकी बानि । कतवारीके सूत ज्यों, अलटि अपूठा आन ॥ मनके मते न चालिये, मनका मता अनेक । जो मनपर असवार है, सो साधू कोइ एक ॥ चिंता चित विसारि कै, फिरी न बूझिये आन । इन्द्री पसारा मेटिये, सहज मिले भगवान् ॥ मनको मारो पटकिके, टूक टूक है जाय । टूटे पीछे फिर जुटे, बीच गाँठ रहि जाय ॥

मनका विशेष वर्णन मन बोध ग्रन्थमें देखनेसे मालूम होगा

वार्ता १५

सुलतान इब्राहीम अह्मसाहबको निद्रा नहीं आती थी । एक बार बहुतसे आदमियोंने मिलकर इस बातकी परीक्षा ली । आपने पूछा कि, आपको निद्रा क्यों नहीं आती ? आपने उत्तर दिया जिस कालने बड़े बड़े ऋषि, सुनि, पीर, पैगम्बर

बोधसागर

( १२३ )

और औलियाओंको साहबसे विमुख कर दिया । वह सदा जाग कर सत्यपथके जीवोंको भटकानेकी युक्ति रचता रहता है, तब हमको सोनेकी फुरसत कैसे मिल सकती है ?

सच है । साहबने कहा है ।

काल खड़ा शिर ऊपरे, जागु बिराने मीत ।

जाको घर है गैल में, सो कस सोवै निर्वित ॥

वार्ता १६

एक बार सुलतान इब्राहीम अह्म साहब एक टूटे हुये मकानमें ठहरे हुए थे। उसमें और भी बहुतसे मुसाफिर उतरे थे। रातको ठंढी ठंढी हवा और साथ ही साथ पानीके छींटे भी पड़ने लगीं ।

उस मकानका द्वार टूटा हुआ था । इससे मकानके अन्दर ठंढी हवा और पानी आकर मुसाफिरोंको कष्ट पहुँचा रहे थे । आपसे उनका कष्ट देखा न गया । आप चुपचाप उठकर द्वार पर जाखड़े हुए । जिससे अन्दरके मुसाफिरोंको तो आराम हुआ किन्तु आप ठंडसे ठिठुर गये । सबेरा होनेपर लोगोंने देखकर पहचाना और आगसे सेकनेपर जब आपको होश आया, तब लोगोंने पूछा कि, आपने ऐसा क्यों किया ? तब आपने कहा कि, बहुत सी जानोंको बचानेके लिये एक का जान काममें आवे और बहुतोंकी तकलीफ दूर करनेके लिये एकको थोड़ी तकलीफ उठानी पड़े तो इससे बढ़कर अच्छा काम क्या होसकता है । इसलिये मैं द्वार पर खड़ा हो गया जिससे एक मेरी तकलीफ के बदले इतने मुसाफिरों को आराम होवे । सच है ।

दया भाव जाने नहीं, ज्ञान कथे बेहद ।

तेनर नरकै जायँगे, मुनि मुनि साखी शब्द ॥

( १२४ )

सुलतानबोध

वार्ता १७

सहलविन इब्राहीम नामक संतने कहा है कि एकबार वो सुलतान इब्राहीमके साथ सफर में थे, संयोगसे वो बीमार पड़ गये। सुलतानके पास जो कुछ बस्त्रादि था बेंचकर उनकी रक्षामें लगा दिया अन्तमें जब कोई सवारी भी नहीं रही तब सहलविन इब्राहीमने कहा “ मैं बहुत कमजोर हो गया हूँ अब आगे कैसे जासकूंगा ? ” आप उन्हें अपनी गर्दनपर बैठाकर तीन मंजिल-तक लेगये, जबतक वो अच्छे भी हो गये ❁

वार्ता १८

सुलतान इब्राहीम अद्भमके साथ जो कोई रहनेकी इच्छा प्रकट करता था। आप उससे तीन बचन ले लेते थे तब उसको अपने साथ रखते थे।

१ पहला नियम उनका यह था कि, आप किसीसे सेवा नहीं कराकर सबकी सेवा आप ही करते थे।

२ दूसरा नियम यह था कि, भजन करनेके समय का सबको सूचना देना अपने ऊपर रखवा था।

३ तीसरा नियम यह कि, मण्डली का कोई आदमी भी सुकृति की कमाई से जो कुछ कमा के लाता था उसको मण्डली में समान उपयोगमें लगाते थे।

इन नियमोंमें से एक भी नियम जिसको अस्वीकृत होता था उसको अपनी मण्डली से बाहर करदेते थे।


  • नोट—धन्य है इस पर उपकारको। आजकलके साधुओंको ध्यान देकर इस बातको विचारना चाहिये क्यों कि, वर्तमान में साधुओंकी यह नीति हो गई है कि, सफर तो सफर किसी विशेष स्थान पर भी कोई बीमार पड़जाय तो उसे एक गिलास पानी तक देना बुरा समझते हैं। मैंने बहुतसे ऐसे दृष्टान्त देखे हैं और स्वयं भी उनके संग रहकर भोग लिया है।

बोधसागर

( १२५ )

आज कलके महंतोंको इस बात पर ध्यान देना चाहिये क्यों कि, वर्तमानके महंत या मण्डलीके मुखिया साथके साधुओंकी पूजा और भेंटको भी हड़प जाते हैं ।

वार्ता १९

एकबार किसीने सुलतान इब्राहीम अह्म साहबसे पूछा कि, आपका पेशा ( धन्धा ) क्या है ? आपने उत्तर दिया “मैंने संसारको तो उसके चाहने वालों पर छोड़ दिया है और परलोकको परलोकके चाहने वालोंके लिये । किन्तु अपने लिये मैंने केवल साहबका भजन रक्खा है । सच है साहबने कहा है ।

सार्वी-माला जपूं न कर जपूं, सुखसे कहूं न राम ।

मेरा हरी मोंको जपे, मैं पाऊं विश्राम ॥

वार्ता २०

एक बार किसीने सुलतान इब्राहीम अह्मसे पूछा कि आपने ऐसी अधीनता और दासापन कहाँसे सीखी । आपने उसे उत्तर दिया कि “एक बार मैंने एक दासको मोल लिया । जब उसे साथ लेकर अपने स्थान पर आया तो उससे पूछा कि, तेरा नाम क्या है ? उसने उत्तर दिया कि, जिस नामसे आप पुकारें वही मेरा नाम है । फिर मैंने पूछा तू खाता क्या है ? उसने कहा जो आप खिलावें । फिर मैंने पूछा कि, तू पहनता क्या है ? उसने जवाब दिया जो आप पहनावें । फिर मैंने कहा तू करता क्या है ? उसने कहा जो आप हुकम देवें । फिर मैंने कहा तू चाहता क्या है ? उसने कहा जो दास है उसको अपनी इच्छा कहाँ है ? जिसको अपनी इच्छा है वह दास ही नहीं है । आप फरमाते हैं कि, उस दासकी बातोंको सुनकर उसी दम उसको दासत्व से मोक्ष दे दिया

( १२६ )

सुलतानबोध

और उसीदम से अपना सब कुछ साहबको सौंप दिया । फिर जैसा वह चाहता है करता है । मैं न तो आधीनता करता हूँ न दासापन जो कुछ है साहबका है मेरा कुछ नहीं ।

नोट—वर्तमान कालके दास पदवी के अभिमानी कबीर पंथी साधुओंको उपर्युक्त सुलतान के दासके वचनों पर ध्यान देना चाहिये क्योंकि, यद्यपि आजकलके कबीरपंथी साधुओंके नाममें दास शब्द अवश्य जुटा होता है और उनके मनमें भी दास शब्दका बड़ा भारी अभिमान रहता है यहाँ तक कि, यदि किसी कबीर पंथीके नाममें दास शब्द न जुटा हो अथवा किसी का नामही ऐसा हो कि, उसके नामके साथ दास शब्दका जोड़ न मिलता हो तो उस दास शब्दसे हीन सच्चे दासको भी वचनों और व्यंग्योंके मारे तंग करते रहते हैं और बल पूर्वक उसके सुन्दर प्रसिद्ध नामको बिगाड़ने का प्रयत्न करते हैं और आप दास कहलाकर भी स्वामीपनके ऐसे दम्भ और अहंकार में पड़े रहते हैं कि, अपने गुरु (जैसे माता पिता, दीक्षा गुरु आदि) से भी मान चाहते और उनसे अपना पग पुजवाते हैं । और सतगुरुके वचनका ध्यान भी नहीं रखते क्यों कि, सतगुरुका वचन है ।

गुरुको नीचा करि जानई, गुरु से चाहे मान । सो नर नरके जायगा, जन्म जन्म होय स्वान ॥ दासापन तो हृदय नहीं, नाम धरावै दास । पानीके पीये बिना, कैसे मिटै पियास ॥ नाम धरावै दास जो, दासापन हो लीन । कहै कबीर लौलीन बिनु, स्वान बुद्धि कहि दीन ॥ दासापन हृदय बसे, साधन सों आधीन ।

बोधसागर

( १२७ )

कहै कबीरा दास सो, दास लक्ष लौलीन ॥ स्वामी होना सोहरा, दोहरा होनादास । गाड़र आनी ऊनको, बांधी चरै कपास ॥ निर्वन्धन बन्धा रहै, बन्धा निर्वंध होय । कर्म करै कर्ता नहीं, दास कहावै सोय ॥

वार्ता २१

एक ने आपसे एकदिन प्रार्थना की कि, आप मुझे उपदेश दीजिये । आपने उसको कहा कि, एक साहिब को याद रख और संसार को भूल जा । एक दूसरेने भी आपसे उपदेश मांगा आपने उसे कहा कि, बन्धे को खोल और खुलेको बांध । उस आदमीने कहा मैंने इसका अर्थ नहीं समझा । तब आपने उसको समझाया कि, थैली का मुंह खोल अर्थात् जो कुछ तेरे पास है उससे परमार्थ कर और-जबान को बांध अर्थात् बहुत बोलना छोडादे । सत्य है सत्य गुरुने कहा है ।

जिह्वाको दै बन्धनै, बहु बोलना निवार । सो परखीसे संग करु, गुरुमुख शब्द विचार ॥

इसी प्रकार से सुलतान इब्राहीम अद्वम साहब के विषयमें हजारों वार्ता प्रसिद्ध है । यहाँ ग्रन्थ बढ जानेके भयसे मेरे पास जितनी वार्ताओंका संग्रह है उन सबोंको नहीं लिख सकते । आपकी जीवनीके साथ अधिक लिखने का प्रयत्न किया जायगा ।

इति सुलतान इब्राहीम अद्वम साहबका संक्षिप्त

जीवन चरित्र समाप्तः

इति बोधसागर पूर्वार्द्ध समाप्तमिदं

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प्रारंभिक पृष्ठ (समय खण्ड - बोधसागर)

श्रीः

कबीरसागर—

समय खण्ड—

बोधसागर

भारतपथिक कबीरपंथी

स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराजा श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.

नं. ७ कबीरसागर - १.

संस्करण : अप्रैल २०१९, संवत् २०७६

मूल्य : २०० रुपये मात्र ।

⊕ सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित

मुद्रक एवं प्रकाशक:

खेमराज श्रीकृष्णदास TM

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,

मुंबई - ४०० ००४.

Printers & Publishers :

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सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

A faint, stylized illustration of a seated figure, possibly a deity or saint, wearing a crown and holding a small object, set against a light background.

श्रीमद्भगवद्गीता