भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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सुलतानबोध

चारों ओर से जय जयकार वाणी उच्चारने लगी । इतने में सुलतान इब्राहीम अद्वमसाहब वहाँ से अन्तरध्यान हो गये ।

वार्ता ८

कहते हैं कि, जब सुलतान इब्राहीम अद्वम मक्का के निकट पहुँचे तब सुना कि मक्काके पुजारी और यात्री लोग उनकी अगुवानी को आ रहे हैं । तब वो जमात से निकल कर अलग होकर आगे चले गये जिसमें उनको कोई पहचान न सके मक्का के महात्माओंके सेवक लोग जो अपने अपने मालिकों से आगे आरहे थे पहले सुलतान इब्राहीम अद्वमसे मिले । उन लोगोंने आपसे पूछा क्या सुलतान इब्राहीम अद्वम यहाँसे नजदीक हैं ? सब महात्मा लोग उनसे मिलनेको आरहे हैं । आपने उत्तर दिया कि, वे उस अधर्मीसे क्या चाहते हैं ? सेवकोंने गाली देते सुनकर आपको खूब मारा और गरदनियां दीं और कहने लगे कि, तू ऐसे महात्मा को अधर्मी कहता है ? असलमें तूही अधर्मी है । आपने कहा हाँ भाई सोई तो मैं भी कह रहा हूँ वे सब तो आपको मारकूटके आगे बढे और आप अपने मनसे कहने लगे कि, क्यों ओ दुष्ट तूने अपने किये का फल पाया या नहीं ? अभी कैसा खुश हो रहा था कि, मक्का के महात्मा लोग हमारी अगुवानी को आ रहे हैं । इसी प्रकार से आप ही आप अपने मनको समझा रहे थे इतने में लोग आगये और आपको पहचान कर आपसे क्षमा मांगने लगे । फिर आप मक्का में जाकर बहुत दिनों तक रहे । आपके बहुत से चेले भी हो गये । आपके चेले गुदड़ी ओढते और खड़ी टोपी पहनते थे ।