कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 855, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
(११५)
वार्ता ९
जब आप बलख छोड़ कर फकीर हुए थे उस समय आपका एक छोटा पुत्र था जब वह लड़का बड़ा हुआ तब उसने अपनी मांसे पूछा कि मेरा बाप कहाँ है ? माने सब हाल कह सुनाया और यह भी कहा कि सुननेमें आता है कि, आजकल मक्कामें रहते हैं । लड़केने मांसे कहा “अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं भी मक्का जाऊँ तीर्थ भी करूँगा और पिताको दूँढकर उनका दर्शन भी करूँगा” माने कहा अकेले तू क्यों जायगा मैं भी मक्का की जेयारत को जाऊँगी । फिर तो लड़केने वजीरों को हुकम दिया कि, शहर भर में ढौड़ीं पिटवा दा कि, जिसको मक्का चलना हो वह चले उसका सब खर्च मेरी ओरसे दिया जायगा । फिर चार हजार आदमी मक्का जाने को तैयार हुये । सबको साथ लेकर लड़का मक्का पहुँचा । वहाँ जाकर गुदडी वाले फकीरों की एक जमात देख कर उनसे पूछा कि, तुम लोग इब्राहीम अद्दम साहब को जानते हो ? उन्होंने कहा वे तो हमारे गुरु हैं । फिर पूछा वो कहाँ हैं ? उत्तर मिला कि वो लकड़ियों के गढ़ठे लाने जंगलमें गये हैं । क्योंकि जब वो जंगल से लकड़ी लेकर आयेंगे और बेचकर रोटी लायेंगे तब हम लोग खायेंगे । इतना सुनकर लड़का जंगल की ओर रवाना हुआ । आगे जाकर एक बुढ़ठे को लकड़ियोंका गढ़र शिर पर रखे हुए आते देखा । लड़का मुलतानकी वह दशा देखकर रोने लगा । फिर उनके पीछे पीछे बाजार तक गया । जहाँ जाकर उन्होंने लकड़ी रखकर पुकारा कि कोई है जो माल हलाल (सुकृति की कमाई) को माल हलालके बदले लेवे । एक आदमी आया उसने