कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(१०९)
॥ टे० ॥ गहना एक कनक ते गहना तामें भाव न दूजा । कहन सुननको दुइ करि थाये यक निमाञ्ज यक पूजा ॥ वही महादेव वही महम्मद ब्रह्मा आदम कहिये । कोइ हिन्दू कोइ तुर्क कहावै एक जमींपर रहिये ॥ वद किताब पढैं वे खुतबा वे मोलना वे पांडे । बिगत विगतके नाम धरावे यक माटीके भांडे ॥ कहैं कवीर वै दोनों भूले रामहि किनहु न पाया । वे खसिया वे गाय कटावैं बादैं जनम गँवाया ॥ ३० ॥
शब्द ४१९-हंसा संशय छूरी कुहिया । गैया पियै बछरुवै दुहिया ॥ टेक ॥ घर घर सावज खेलै अहेरा पारथ वोटा लेई । पानी मांहिं तलफिगै भ्रुसुरि धूरि हिलोरा देई ॥ धरती वरसे बादल भीजै भीट भया पैराऊ । हंस उड़ाने ताल सुखाने चहले बीधा पाऊ ॥ जौ लगि कर डोलै पग चलई तौ लगि आश न कीजै । कहहिं कवीर जेहि चलत न दीखै तासु बचन कालीजै ॥ ३१ ॥
शब्द ४२०-हंसा हो चित चेतु सवेरा । इन्ह परपंच कयल बहुतेरा ॥ टेक ॥ पारखंड रूप रच्यो इन्ह त्रिगुन तेहि पारखंड भूलल संसारा । घरको खसम बधिक भौ राजा परजा काधौं करे विचारा ॥ भगति न जानै भगत कहावै तजि अमृत विषके लिय सारा । आगे बढे ऐसेहि बूढ़े तिनहुं न मानत कहा हमारा ॥ कहल हमारा गांठी बांधो निशि बासर रहिहहु हुशियारा । ये कलिके गुरु बड परपंची डारि ठगोरी सब जग मारा ॥ वेद किताब दोय फन्द पसारा ते फन्दे परु आप बिचारा । कहैं कवीर ते हंस न विछुरे जेहि मै मिलों छोडावन हारा ॥ ३२ ॥
शब्द ४२१-हंसा प्यारे सरवर ते जे जाय ॥ टे० ॥ जेहि सरवर बिच मोतिया चुगते बहुविधि केलि कराय ॥ सूखे ताल पुरइनि