कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
जल छोड़े कमल गयो कुंभिलाय । कहैं कवीर जो अबकी बिछरे बहुरि मिलै कब आय ॥ ३३ ॥
शब्द ४२२-हरि जन हंस दशा लिये डोलैं। निर्मल नाम चुनि चुनि बोलैं ॥ टे० ॥ सुकताहल लिये चाँच लोभावैं। मौन रहै कि हरिगुन गावैं ॥ मानसरोवर तटके बासी। राम चरण चित अन्त उदासी ॥ काग बुद्धि निकट नहिं आवै। प्रतिदिन हंसा दर्शन पावै ॥ नीर छीर को करै निबेरा। कहैं कवीर सोई जन मेरा ॥ ३४ ॥
शब्द ४२३-हरि मोर पीव मैं राम की बहुरिया। राम मोर बडो मैं तन की लहुरिया ॥ टे० ॥ हरि मोर रहैंटा मैं रतन पिउरिया। हरि को नाम लै कातल बहुरिया ॥ छः मास ताग वरष दिन कुकुरी। लोग कहल भल कातल बपुरी ॥ कहैं कवीर सूत भल काता। रहैंटा न हाय सुकति कर दाता ॥ ३५ ॥
शब्द ४२४-हरि ठग ठगत ठगौरी लाई। हरि वियोग कस जियहु रे भाई ॥ टे० ॥ को काको पुरुष कवन काकि नारी। अकथ कथा जम जाल पसारी ॥ को काको पुत्र कवन काको बापा। को रे मरै को सहे सन्तापा ॥ ठगि ठगि मूल सबन को लीन्हौं। राम ठगौरी विरलै चीन्हौं ॥ कहैं कवीर ठग सो मन माना। गई ठगौरी ठग पहिचाना ॥ ३६ ॥
शब्द ४२५-हरि ठग ठगत सकल जग डोलै। गवन करत मोसे मुखहु न बोले ॥ टे० ॥ बालापनके मीत हमारे। हमैं छोड़ि कहैं चले सकारे ॥ तुम अहु पुरुष हौं नारि तुम्हारी। तुम्हरी चाल पाहनहुंते भारी ॥ माटिक देह पवनको शरीरा। हरि ठग ठग सो डरल कवीरा ॥ ३७ ॥
शब्द ४२६-हरि विनु भरम बिगुरन गन्दा। जहं जहं गये अपनपौ खोये तेहि फंदे बहु फन्दा ॥ टे० ॥ जोगी कहै जोग है नीको