कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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द्वितीया और न भाई। चुंडित मुंडित मौन जटाधरि तिनहुं कहां सिधि पाई॥ ज्ञानी गुनी स्मर कवि दाता ये जो कहहिं वड हमहीं। जहंसे उपजे तहहिं समाने छूटि गये सब तबहीं ॥ बाँये दहिने तजो विकारे निजुके हरिपद गहिया। कहै कवीर गुंगे गुर खाया पूछे सो का कहिया ॥ ३८ ॥
शब्द ४२७-ऐसे हरि सो जगत लरतु है। पंडुर कतहुं गुरुठ धरतु है॥टे०॥ मूस विलारी कैसनि हेतू। जम्बुक कर केहरि सो खेतू॥ अचरज यक देखा संसारा। सोनहा खेद कुंजर असवारा॥ कह कवीर सुनो संतो भाई। यह संधी कोह बिरले पाई ॥ ३९ ॥
शब्द ४२८-पंडित बाद बदौ सो झूठा। रामके कहे जगत गति पावै खांड कहै मुख मीठा॥टेक॥ पावक कहै पांव जो दाहै जल कहै तिरषा बुझाई। भोजन कहे भूख जो भाजे तो दुनिया तरि जाई॥ नरके संग सुवा हरि बोले हरि प्रताप नहिं जानै। जो कबहुं उडि जाय जंगलको तौ हरि सुरति न आने❧ ॥ बिनु देखे विनु अरस परसके नाम लिये का होई। धनके कहे धनिक जो हो तो निर्धन रहत न कोई ॥ सांची प्रीति विषय माया सों हरि भगतनकी हांसी। कह कवीर यक नाम भजे विनु बांधे जमपुर जासी ॥ ४० ॥
शब्द ४२९-पण्डित देखौ मनमों जानी। कहुधौं छूत कहांते उपजी तबहि छूति तुम मानी॥टेक॥ नादे बिन्दु रुधिर यक संगै घटहीमें घट सजै। अष्ट कमलकी पुहुमी आई यह छूति कहांते उपजै ॥ लख चौरासी बहुत बासना सो सब सरि भौ मांटी। एकै पाट सकल बैठारे सींच लेत धौं काटी ॥ छूतिहिं जेवन छूतिहिं
- देखो सुवाबतीसी।