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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(१११)

द्वितीया और न भाई। चुंडित मुंडित मौन जटाधरि तिनहुं कहां सिधि पाई॥ ज्ञानी गुनी स्मर कवि दाता ये जो कहहिं वड हमहीं। जहंसे उपजे तहहिं समाने छूटि गये सब तबहीं ॥ बाँये दहिने तजो विकारे निजुके हरिपद गहिया। कहै कवीर गुंगे गुर खाया पूछे सो का कहिया ॥ ३८ ॥

शब्द ४२७-ऐसे हरि सो जगत लरतु है। पंडुर कतहुं गुरुठ धरतु है॥टे०॥ मूस विलारी कैसनि हेतू। जम्बुक कर केहरि सो खेतू॥ अचरज यक देखा संसारा। सोनहा खेद कुंजर असवारा॥ कह कवीर सुनो संतो भाई। यह संधी कोह बिरले पाई ॥ ३९ ॥

शब्द ४२८-पंडित बाद बदौ सो झूठा। रामके कहे जगत गति पावै खांड कहै मुख मीठा॥टेक॥ पावक कहै पांव जो दाहै जल कहै तिरषा बुझाई। भोजन कहे भूख जो भाजे तो दुनिया तरि जाई॥ नरके संग सुवा हरि बोले हरि प्रताप नहिं जानै। जो कबहुं उडि जाय जंगलको तौ हरि सुरति न आने❧ ॥ बिनु देखे विनु अरस परसके नाम लिये का होई। धनके कहे धनिक जो हो तो निर्धन रहत न कोई ॥ सांची प्रीति विषय माया सों हरि भगतनकी हांसी। कह कवीर यक नाम भजे विनु बांधे जमपुर जासी ॥ ४० ॥

शब्द ४२९-पण्डित देखौ मनमों जानी। कहुधौं छूत कहांते उपजी तबहि छूति तुम मानी॥टेक॥ नादे बिन्दु रुधिर यक संगै घटहीमें घट सजै। अष्ट कमलकी पुहुमी आई यह छूति कहांते उपजै ॥ लख चौरासी बहुत बासना सो सब सरि भौ मांटी। एकै पाट सकल बैठारे सींच लेत धौं काटी ॥ छूतिहिं जेवन छूतिहिं

  • देखो सुवाबतीसी।

(९१२)

कवीरपंथी—

अचवन छूतिहि जग उपजाया । कह कवीर ते छूति बिर्वाजित जाके संग न माया ॥ ४१ ॥

शब्द ४३०—पंडित सोधि कहहु समुझाई । जाते आवागमन नशाई ॥ अर्थ धर्म औ काम मोक्ष फल कौन दिशा बस भाई ॥ टेक ॥ उत्तर दछिन पूरब पच्छिम सरग पतालके माही । विन गोपाल ठौर नहिं कतहुं नरक जात धौं काही ॥ अनजानेको नरक सरग है हरि जानेको नाहीं । जेहि डरको सब लोक डरतु है सो डर हमरे नाहीं ॥ पापपुन्यकी शंका नाहीं सरग नरक नहिं जाहीं । कहैं कवीर सुनो हो संतो जहैं पद तहां समाहीं ॥ ४२ ॥

शब्द ४३१—पंडित मिथ्या करो विचारा । ना ह्लां सृष्टि न सिरजनहारा ॥ टेक ॥ थूल स्थूल पवन नहिं पावक रवि शशि धरनि न नीरा । ज्योति स्वरूपी काल न उहवां बचन न आहि शरीरा ॥ धरम करम कछुवो नहिं उहवां ना कछु मंत्र न पूजा । संजम सहित भाव नहिं एको सो तो एक न दूजा ॥ गोरख राम एको नहिं उहवां ना वर्हिं भेद विचारा । हरि हर ब्रह्म नहीं शिव सकती तिरथौं नहीं अचारा ॥ माय बाप गुरु जाके नाहीं सो दूजा कि अकेला । कह कवीर जो अबकी समझैं सोइ गुरु हम चैला ॥ ४३ ॥

शब्द ४३२—बूझहु पंडित करहु विचारी, पुरुष अहे कि नारी ॥ टेक ॥ ब्राह्मन केरे ब्रह्मनी होती जोगी के घर चेली । कलमां पठि पठि भई तुरकिनी कलिमें रहै अकेली ॥ वर नहिं वरै व्याह नहिं करई पुत्र जनम होनिहारी । कारे मूडे एक नहिं छाडे अबहुं आदि कुवारी । मायिक न रहै जाइ न ससुरे साईं संग न सोवे ॥ कह कवीर वे जुग जुग जीवे जाति पांति कुल खोवे ॥ ४४ ॥

शब्द ४३३—कौन सुआ कह पंडित जना । सो समुझाय कहौ

शब्दावली

(११३)

मोहि सना ॥ ८० ॥ मूये ब्रह्मा विष्णु महेशा । पार्वती सुत भये गनेशा ॥ मूये चन्द्र मुखे रवि केता । मुखे हनुमत जिन बांधी सेता ॥ मूये कृष्ण मुखे करतारा । यक न मुआ जो सिरजन हारा ॥ कहैं कवीर मुआ नहीं सोई । जाको आवागमन न होई ॥ ४५ ॥ शब्द ४३४-पंडित अचरज यक बड़ होई । यक मरमुखे अन्न नहीं खाई यक मर सीझ रसोई ॥ ८० ॥ करि अस्नान तिलक करि बैठे नौ गुण कांध जनेऊ । हांडी हाड हाड थारी मुख अब षट करम बनेऊ ॥ धरम कथे जहं जीव बचे तहं अकरम कर मेरे भाई । जो तोहरेको ब्राह्मन कहिय तो केहि कहिय कसाई ॥ कह कवीर सुनो हो संतो भरम भूलि दुनियाई । अपरम पार पार पुरुषोत्तम यह गति विरलै पाई ॥ ४६ ॥

शब्द ४३५-पंडित बूझ पियो तुम पानी । जा माटीके घरमें बैठे तामें सुछि समानी ॥ छप्पन कोटि जादव जहं विनशे सुनि जन सहस अठासी । परग परग पैगम्बर गाडे ते सरि माटी मासी ॥ मच्छ कच्छ घरियार वियाने रुधिर नीर जल भरिया । नदिया नीर नरक बहि आवै पशु मानुष सब सरिया ॥ हाड झरो झरि गूद गली गलि दूध कहातै आयो । सो तुम पांडे जेवन बैठे मटिअहि छूत लगायो ॥ बेद किताब छोड दिहु पांडे ई सब मनके करमा । कहैं कवीर सुनो हो पांडे ई सब तुम्हरे धरमा ॥ ४७ ॥

शब्द ४३६-पंडित देखौ हृदय विचारी । कौन पुरुष को है नारी ॥ ८० ॥ सहज समाना घट घट बोले वाको चरित अनूपा । वाको नाम का कहि लीजे ना बहि वरन न रूपा ॥ तैं मैं क्या कोर नर बौरै क्या तेरा क्या मेरा । राम खुदाय सकति शिव एकै कहु धौ काहि निवेरा ॥ बेद पुरान कुरान कितेबा नाना भांति बखानी । हिन्दू तुरुक जैन ओ जोगी एकल काहु न जानी ॥

(११४)

कवीरपंथी—

छः दरशनमें जे परवाना तासु नाम मन माना । कहै कवीर हमहीं हैं बौरै ई सब खलक स्याना ॥ ४८ ॥

शब्द ४३७-बुझ बुझ पंडित पद निर्बाना । सांझ परे कहंवा बस भाना ॥ ८० ॥ नीच ऊंच पर्वत ढेल न भीत । विन गायन तहवां उठ गीत ॥ ओस न प्यास मन्दिर नहिं जहंवां । सहसौ घेनु दुहावै तहवां ॥ नितै अमावस नित संकांती । नित नित नव ग्रह बैठे पांती ॥ मैं तोहि पूछौ पंडित जना । हृदया ग्रह न लागु केहि खना ॥ कह कवीर इतनो नहिं जान । कौन शब्द गुरु लागा कान ॥ ४९ ॥

शब्द ४३८-बुझ बुझ पंडित विरवा न होई । अध बस पुरुष अधा बस जोई ॥ ८० ॥ विरवा एक सकल संसारा । सरग शीश जर गेल पतारा ॥ बारह पखुरी चौबिस पाता । घन बरोह लागी चहुं घाता ॥ फलै न फूलै वाकि है बानी । रैन दिवस विकार जुव पानी ॥ कह कवीर कछु अच्छलो न जहिया । हरि विरवा प्रतिपालत तहिया ॥ ५० ॥

शब्द ४३९-बुझ बुझ पंडित मन चितलाय । कबहिं भरल वहे कबहि सुखाय ॥ ८० ॥ खन ऊबे खन डूबे खन अवगाह । रतन न मिले पाव नहिं थाह ॥ नदिया नाहिं सरस बहे नीर । मच्छ न मरे केवट रहे तीर ॥ पोहकर नहीं बांधल तहं घाट । पुरइनि नहीं कमल महि बाट ॥ कहै कवीर यह मनका धोखा । बैठारहै चला चह चोखा ॥ ५१ ॥

शब्द ४४०-बूझ लीजे ब्रह्म ज्ञानी । घुरि घुरि बरषा बरषावै परिया बुंद न पानी ॥ ८० ॥ चीटीके पग हस्ती बांधे छेरी बीगै खायो । उदधि मांहते निकसि छांछरी चौड़े गेह करायो ॥ मेढुक सर्प रहै इक संगे बिछी स्वान बियाही । नितउठि सिंह सियार सों

शब्दावली

(९१५)

डरपै अद्भुत कथो न जाही ॥ (कौने) संशय भूगा तन वन घेरे पारथ बाना मेले । शायर जरे सकल वन ढाहै मच्छ अहेरा खेले ॥ कह कवीर यह अद्भुत ज्ञाना को यहि ज्ञानहि वूझे । विनु पंखै उड़ि जाय अकाशे जीवहि मरन न सूझे ॥ ५२ ॥

शब्द ४४१-वह विरवा चीन्है जो कोय । जरा मरन रहितै तन होय ॥ टे० ॥ विरवा एक सकल संसारा । पेड एक फूटल तिन डारा ॥ मध्यके डार चारि फल लागा । साखा पत्र गनत को बागा ॥ वेलि एक त्रिभुवन लपटानी । बांधेते छूटिहि नहि प्रानी ॥ कहहि कवीर हम जात पुकारा । पंडित होय सो करे विचारा ॥ ५३ ॥

शब्द ४४२-साईके संग सासुर आई । संग न सूती स्वाद न मानी गौ जौबन सपनेकी नाई ॥ टे० ॥ जना चार मिलि लगन सोधाई जना पांच मिलि मंडप छाई । सखी सहेली मंगल गावै दुख सुख माथे हरदि चढाई ॥ नाना रूप परी मन भांवरि गांठी जोरि भई पतियाई । अरघै दैदै चली सुवासिनि चौकहि रांड भई संग साई ॥ भयो विवाह चली बिन दूलह बाट जात समधी समझाई । कहै कवीर हम गौने जैबे तरव कन्त ले तूर बजाई ॥ ५४ ॥

शब्द ४४३-नलको ढाढस देखो आई । कछु अकथ कथा है भाई ॥ टे० ॥ सिंहसारदूल यक हर जोतिनि सीकस बोइन धाना । बनकी खुलइया चाखुर फेरे छागर भये किसाना ॥ छेरी बाघहि व्याह होत है मंगल गावै गाई । बनके रोझ धै दाइज दीन्हों गोह लोकंदै जाई ॥ कागा कपडा धोवन लागे बकुला किररे दांता । मांछी मूँड सुडावन लागी हमहुं जाब बराता ॥ कहहि कवीर सुनो हो सन्तो जो यह पद अर्थौवै । सोई पंडित सोई ज्ञाता सोई भक्त कहावै ॥ ५५ ॥

शब्द ४४४-नलको नहि परतीति हमारी । झूठे बनज कियो

(९१६)

कबीरपंथी—

झूठे सन पूंजी सबै मिलि हारी ॥ टेक ॥ षट दरशन मिलि पंथ चलायो तिरदेवा अधिकारी । राजा देश बडो परपंची रैयत रहत उजारी ॥ इतते उतरहु उतते उतरहु जमकी साट सवारी । ज्यों कपि डोर बांधि बाजीगर अपने खुशी परारी ॥ यहै पैठ उतपति परलयको विषया सबै विकारी । जैसे स्वान अपावन राजी त्यों लागी संसारी ॥ कहैं कबीर यह अद्भुत ज्ञाना मानो बात हमारी । अजहूं लेहुं छोडाय कालसों जो घट सुरति संभारी ॥ ६६ ॥

शब्द ४४५—न हरि भजसि न आदत छूटी । शब्दै ससुझि सुधारत नाही अंधरे भये हियेकी फूटी ॥ टे० ॥ पानी माहि पषानकी रेखा ठोंकत उठै भभूका । सहस घडा नितहीं जल ढारे फिर सूखेका सूखा ॥ सेते सेते सेत अंग भौ सैन बढो अधिकाई । जो सन्निपात रोगि यहि मारे सो साधुन सिधि पाई ॥ अनहद कहत कहत जग विनसे अनहद सुधि समानी । निकट पयाना जमपुर धावै बोलहि एकै बानी ॥ सतगुरु मिलै बहुत सुख लहिया सतगुरु शब्द सुधारे । कहैं कबीर सो सदा सुखारी जो यहि पदहि विचारे ॥ ६७ ॥

शब्द ४४६—नरहर लागी दाव विकार विन ईधन मिलै न बुझावन हारा । मैं जानों तोही ते व्यापै जरत सकल संसारा ॥ टे० ॥ पानी माहि अग्नि को अंकुर मिलन बुझावन पानी । एक न जरे जरे नौ नारी जुगति न काहू जानी ॥ सहर जरे पहरू सुख सोवै कहे कुशल घर मेरा । पुरिया जरे वस्तु निज उबै बिकल राम रंग तेरा ॥ कुबिजा पुरुष गले यक लागी पूजि न मनकी साधा । करत विचार जनम गौ खीसा ई तन रहत असाधा ॥ जानि बूझ जे कपट करत है तेहि अस मन्द न कोई । कहे कबीर सब नारि रामकी मोते और न होई ॥ ६८ ॥

शब्दावली

(११७)

शब्द ४४७-माया महा ठगनी हम जानी। निरगुन फ्रांस लिये कर ढोलै बोलै मधुरी बानी ॥ टेक ॥ केशवके कमला है बैठी शिवके भवन भवानी। पंडाके मूरति है बैठी तीरथमें भइ पानी ॥ जोगीके जोगिन है बैठी राजाके घर रानी। काहूके हीरा है बैठी काहूके कौडी कानी ॥ भगतनके भगतिन है बैठी ब्रह्माके ब्रह्मानी। कहै कवीर सुनो हो संतो यह सब अकथ कहानी ॥ ५९ ॥

शब्द ४४८-माया मोह मोहित कीन्ह। ताते ज्ञान रतन हरि लीन्ह ॥ टेक ॥ जीवन ऐसो सपना जैसो जीवन सपन समाना। सबद गुरु उपदेश दियो तैं छाव्यो परम निधाना ॥ जोतिहिं देखि पतंग हुलसे पशु नहिं पेखै आगी। काम क्रोध नल सुगुध परेहैं कनक कामिनि लागी ॥ सग्यद सेख किताब नीरेखे पंडित शास्त्र बिचारे। सत गुरुके उपदेश विना तुम जानिकै जीवहि मारे ॥ करौ विचार बिकार पीर हरौ तरन तारने सोई। कह कवीर भगवंत भजन करु द्वितिया और न कोई ॥ ६० ॥

शब्द ४४९-मरिहौ रे तन काले करिहौ। प्राण छुटै बाहर लै धरिहौ ॥ टे० ॥ काया विगुरचनि अनवनि बाटी। कोइ जारे कोइ गाडै माटी ॥ हिंदू लै जारे तुरुक लै गाडै। यहि बिधि अन्त दुनौ घर छाडै ॥ करम फ्रांस जम जाल पसार। ज्यों धीमर मछरी गहिमारा ॥ राम विना नल हैहो कैसा। बाट माझ गोबरौरा जैसा ॥ कह कवीर पाछे पछतैहौ। या घरसे जब वा घर जेहौ ॥ ६१ ॥

शब्द ४५०-माइ मैं दूनों कुल उजियारी। बारह खसम नेहरे खायो सोरह खायो ससुरारी ॥ टेक ॥ सासु ननद मिलि पटिया बांधल भंझुरा परलौ गारी। जारों मांग मैं तासु नारि की सरिवर रचल हमारी ॥ जनाँ पांच कोखियामें राखों औ राखों दुइ चारी। पार परोसिनि करों कलेवा संगहिं बुधि महतारी ॥ सहजै बपुरी

(११८)

कबीरसंथी-

सेज बिछायो सुतलों पांव पसारी । आउं न जाउं मरों नहिं जीवों साहब मेटल गारी ॥ एक नाम मैं निज के गहिह्यो तो छूटल संसारी । एक नाम मैं बढिके लेखौ कहै कवीर पुकारी ॥ ६२ ॥

शब्द ४५१-मैं कासों कहौ को सुने को पतियाय । फुलवाके छुवत भँवर मरिजाय ॥ टेक ॥ गगन मँडल बिच फुल यक फूला । तर भो डार उपर भो मूला ॥ जोतिय न बोइये सिचिय न सोह । बिन डार बिन पात फुल यक होह ॥ फुल भल फुलल मालिनि भल गांथल । फुलवा विनसि गयल भँवर निरासल ॥ कह कवीर सुनो सन्तो भाई । पंडित जन फुल रहै लुभाई ॥ ६३ ॥

शब्द ४५२-जोलहा हो बिनहु हहिमाना । जाके सुर नर सुनि धैर ध्याना ॥ टेक ॥ ताना तने को अउठा लीन्हे चर्खी चारिहु वेदा । सर खुंटी इक राम नरायण पूरन परगटे भेदा ॥ भवसागर यक कठवत कीन्हो तामे माडी सानी । माडीको तन माडिरह्यो है माड़ी विरला जानी ॥ त्रिभुवन नाथ जो मंज्जन लागे स्याम सुरार या दीना । चांद सूर दोय गोडा कीन्हो मांझ दीप किय तीना ॥ पाई करिके भरना लीन्हों वे बान्धैको रामा । वय भरी तिहुं लोके बांधैं कोह न रहै उबामा ॥ तीन लोक यक करिगह कीन्हो दिग मग कीन्हो ताना । आदि पुरुष वैठावन बैठे कविरा ज्योति समाना ॥ ६४ ॥

शब्द ४५३-जोगिया फिर गयो नगर मझारी । जाय समान पांच जहाँ नारी ॥ टेक ॥ गये देशांतर कोई न बतावे । जोगिया बहुरि गुफा नहिं आवे ॥ जरिगौ कंथ ध्वजा गौ टूटी । भजिगो दंड खपर गौ फूटी ॥ कह कवीर यह कलि है खोटी । जो रह करवा निकसे टोटी ॥ ६५ ॥

शब्दावली

(११९)

शब्द ४५४-जोगियाकी नगरि बसै मत कोई । जोरे बसै सो जोगिया होई ॥ ६० ॥ वहि जोगियाको उल्टा ज्ञाना । कारा चोला नाहिं म्याना ॥ प्रकट सो कंथा गुप्ता धारी । तामें मूल सजीवनि भारी ॥ वा जोगियाकी जुगुति जो बूझे । राम रमै सो त्रिभुवन सूझे ॥ अमृत बेली छन छन पीवै । कह कवीर सो जुग जुग जीवै ॥ ६६ ॥

शब्द ४५५-जोपै बीजरूप भगवाना । तौ पंडितका बूझो आना ॥ ६० ॥ कहैं मन कहाँ बुद्धि अहंकारा । रज सत तम गुन तीन प्रकारा ॥ विष अमृत फल फूल अनेका । बहुधा वेद कहै तरवेका ॥ कह कवीर ते मैं का जानों । को धौ छूटल को अरुझानो ॥ ६७ ॥

शब्द ४५६-जो चरखा जरि जाय बढैया ना मरै । मैं कातों सूत हजार चरखला ना जरे ॥ ६० ॥ बाबा व्याह करायदे अच्छा बरहि तकाहु । अच्छा बर जो ना मिलै तुमहि मोहिं विवाहु ॥ प्रथमै नगर पहुँचते परिगो शोक सन्ताप । एक अचंभो हौं देखा बेटी व्याहै बाप ॥ समधीके घर समधी आयो आयो बहुको भाइ । गोड चूल्हौने दैरहे चरखा दियो दिढाइ ॥ देवलोक मरि जाहिंगे एक न मरै बढाय । यह मन रंजन कारने चरखा दियो दिढाय कह कवीर संतो सुनौ चरखा लखै न कोई । जाको चरखा लखि परा आवागमन न होई ॥ ६८ ॥

शब्द ४५७-जंत्री जंत्र अनूपम बाजै । वाके अष्ट गगन मुख गाजै ॥ ६० ॥ तूही गाजै बाजै तुही लिये कर डोलै । एक शब्दमें राग छत्तीसो अनहद बानी बोलै ॥ मुखको नाल सरवनको तुम्बा सतगुरु साज बनाया । जिह्वा तार नासिका चरही माया मोम लगाया ॥ गगन मंडल मां भौ उजियारा उल्टा फेर लगाया ॥ कह कवीर जन भये विवेकी जिन जंत्री मन लाया ॥ ६९ ॥

शब्द ४५८-जस मांसु नलकी तस मांसु पशुकी रुधिर रुधिर

(१२०)

कवीरपंथी—

यक सारा जी । पशुको मांस भखे सब कोई नलहिं न भखे सियारा जी ॥ ८० ॥ ब्रह्मकुलाल मेदिनि भरिया उपजि बिनसि कित गइया जी । मांस मछरिया जोपै खैया जो खेतनमें बोइया जी ॥ माटीको करि देवी देवा जीव काटि काटि देइया जी । जो तेरा है सांचा देवा खेत चरत किन लइया जी ॥ कहैं कवीर सुनो हो सन्तो राम नाम नित लिया जी । जो कटु कियो जिह्वाके स्वरथ बदल पराया देइया जी ॥ ७० ॥

शब्द ४५९—चात्रिक कहाँ पुकारै दूरी । सो जल जगत रहा भरपूरी ॥ ८० ॥ जेहि जल नाद बिन्दुका भेदा । षट्कर्म सहित उपान्यो वेदा ॥ जेहि जल जीव सीवका बासा । सो जल धरनि अमर प्रकाशा ॥ जेहि जल उपजे सकल शरीरा । सो जल भेद न जान कवीरा ॥ ७१ ॥

शब्द ४६०—चलहु का टेढो टेढो टेढो । दसौं द्वार नरकमें बूढे तू गंधीको वेढो ॥ ८० ॥ फूटे नैन हृदय नहिं सूझे मति एको नहिं जानी । काम क्रोध तृष्णाके मारे बूडि सुये विन पानी ॥ जारै देह भसम हँ जाई गाडे कीम किट खाई । सूकर स्वान कागके भोजन तनकी यहै बडाई ॥ चेत न देखु सुगुध नल बोरे तूते काल न दूरी । कोटिन जतन करे बहुतरे तनकी अवस्था धूरी ॥ बालूके घरवामें बैठे चेतत नाहिं अजाना । कह कवीर यक राम भजे विन बूढे बहुत सयाना ॥ ७२ ॥

शब्द ४६१—फिरहु क्या फूले फूले फूले । जो दस मास उरध मुख झूले सो दिन काहेक भूले ॥ ८० ॥ ज्यों माखी स्वादे लहि विहैर सोचि सोचि धन कीना । त्योही पीछे लेहु लेहु कर भूत रहनि कछु दीना ॥ देहरी लौं बर नारी संग है आगे संग सहेला । मृतक थान संग दियो खटोला फिर पुनि हंस अकेला ॥ जारे

शब्दावली

(१२१)

देह भसम है जाई गाडे माँटी खाई। काँचे कुम्भ उदक जो भरिया तनकी इहै बडाई ॥ राम न रमसि मोहमें माते परचो काल वश कूवा। कह कवीर नल आप बँधायो ज्यों नलनी भरम सूवा ॥७३॥

शब्द ४६२-जोगिया ऐसो है बदकरनी। जाके गगन अकाश न धरनी ॥८०॥ हाथ न वाके पाँव न वाके रूप न रेखा। विना हाट हटवाई लावै करै बयाई लेखा ॥ करम न वाके धरम न वाके जोग न वाके जुगती। सिंगी पत्र कछुव नहिं वाके काहेक माँगै भुगती ॥ ते मोहि जाना मैं तोहि जाना मैं तोहि माह समाना। उत्पति परलय एक नहिं होती तब कहुँ कौन को ध्याना ॥ जोगिया एक आनि किय ठाढो राम रहा भरि पूरी। औषधि मूल कछुव नहिं वाके राम सजीवनि मूरी ॥ नटवत बाजी पेखनी पेखै बाजी गरकी बाजी। कहै कवीर सुनो हो संतो भई सो राज विराजी ॥७४॥

शब्द ४६३-ऐसो भरम विगुरचिन भारी। वेद किताब दीन औ दोजरव को पुरुष को नारी ॥ माटीको घट साज बनाया नादे बिंद समाना। घट विनशे क्या नाम धरहुगे अहमक खोज भुलाना ॥ एकै हाड़ त्वचा मल सूत्रा रुधिर गूद यक मूद्रा। यक बिन्दु ते सृष्टि रच्यो है को ब्राह्मन को शूद्रा ॥ रजोगुनि ब्रह्म तमोगुनि शंकर सतोगुनी हरि सोई। कहैं कवीर राम रमि रहियो हिन्दू तुरुक न कोई ॥ ७५ ॥

शब्द ४६४-आपनपौ आपहिं विसरचो। जैसे सोनहा काँच मंदिलमें भरमत भुंकि मरचो ॥ ८० ॥ ज्यों केहरि वपु निरखि कूप जल प्रतिमा देखि परचो। ऐसेहि मदगज फटिक शिलापर दसनन आनि अरचो ॥ मरकट मूठी स्वाद न विहुरै घर घर नटत फिरचो। कह कवीर नलनीके सुवना तोहि कौने पकरचो ॥७६॥

शब्द ४६५-आपन आश कियो बहुतेरा। काहु न मरम पाव

(१२२)

कवीरपंथी-

हरि केरा ॥ ६० ॥ इन्द्री कहाँ करै विसरामा । सो कहैं गये जो कहते रामा ॥ सो कहैं गये होत स्यान । होय मृतक यहि पदहि समान ॥ रामानन्द रामरस छाके । कह कवीर हम कहि कहि थाके ॥ ७७ ॥

शब्द ४६६-अब हम जाना हो हरि बाजीको खेल । डंक बजाय देखाय तमाशा बहुरि सो लेत सकेल ॥ ६० ॥ हरि बाजी सुर नर मुनि जहँडे माया चेटक लाया । धरमें डारि सबन भरमाया हृदया ज्ञान न आया ॥ बाजी झूठ बाजीगर साँचा साधुनकी मति ऐसी । कहहिँ कवीर जिन जैसी समुझी ताकी गति भइ तैसी ॥ ७८

शब्द ४६७-कहो हो अम्बर कासों लागा । चेतन हारे चेतु सुभागा ॥ अम्बर मध्ये दीसै तारा । यक चेतै दूजे चेतवन हारा ॥ ६० ॥ जेहि खोजै सो उहवाँ नहीं । सो तो आहि अमरपद माहीं ॥ कह कवीर पद बूझै सोइ । मुख हृदया जाके यक होई ॥ ७९ ॥

शब्द ४६८-बन्दे करिले आप निवेरा । आप जियत लखु आप ठवर करु मुखे कहाँ घर तेरा ॥ टेक ॥ यहि अवसर नहिँ चेतौ प्रानी अन्त कोई नहीं तेरा । कहैं कवीर सुनो हो संतो कठिन कालको घेरा ॥ ८० ॥

शब्द ४६९-रहु रराँ मम्माकी भांती हो सब संत उधारन चूनरी ॥ ६० ॥ बालमीकि बन बोइया चूनि लिया शुक्रदेव । कर्म बेनौरा है रह्यो सुत काते जयदेव ॥ तीन लोक ताना तनो ब्रह्मा विष्णु महेश । नाम लेत मुनि हारिया सुरपति सकल नरेश ॥ विन जिह्वा गुन गाइया विन वस्तीका गेह । सूने घरका पाहुना तासों लावे नेह ॥ चार वेद कैडा कियो निरंकार किय रास । विने कवीरा चूनरी पहिरे हरिके दास ॥ ८१ ॥

शब्दावली

(१२३)

शब्द ४७०-तुम यहि विधि समझौ लोईं। गोरी सुख मंदिर बजोईं ॥ टेक ॥ एक सगुन षट् चक्रहि बेघै वित्तु वृषभ कोल्हू मांजै। ब्रह्मै पकरि अग्निमां होमै मछ गगन चटि गजै ॥ नितै अमावस नितै ग्रहन होय राहु ग्रास नित दीजै। सुरभा भच्छन करै वेद सुख घर बरसै तन छीजै ॥ पहुमिक पानी अम्बर भरिया यह अचरज को कीजै। त्रिकुटि कुंडल मध मन्दिर बाजै औघट अम्बर भीजै ॥ कहै कवीर सुनो हो संतो जोगिन सिद्धी प्यारी। सदा रहै सुख संजम अपने बसुधा आदि कुंवारी ॥ ८२ ॥

शब्द ४७१-भुला वे अहमक नादाना। तुम हरदम रामहि ना जाना ॥ टे० ॥ बरबस आनिके गाय पछारी गला काट जिव आप लिया। जीता जीव सुरदा करि डरि तिसको कहत हलाल किया ॥ जाहि माँसुको पाक कहत हैं ताकी उत्तपति सुनु भाई। रज वीरज सो माँस उपानी मासु नापाक जो तुम खाई ॥ अपने दोष कहत नहिं अहमक कहत हमारे बडेन किया। उसकी खून तुम्हारी गर्दन जिन तुमको उपदेश दिया ॥ सियाहा गई सफेदी आई दिल सफेद अजहूं न हुआ। रोजा निमाज बांग क्या कीजै हुजरे भीतर बैठि सुआ ॥ पंडित वेद पुरान पढे सुलना पढै सो कुराना। कह कवीर वे नरक गये जिन हरदम रामहिं ना जाना ॥ ८३ ॥

शब्द ४७२-काजी तुम कौन किताब बखाना। झंखत बकत रहौ निशि बासर मति एकौ नहिं जाना ॥ टे० ॥ सकति न मानै सुनति करतहौ मैं न बदोंगा भाई। जो खोदाय तुव सुनति करत तो आप काटि किन आई ॥ घालि जनेऊ ब्राह्मन होना मेहरीको क्या पहिराया। वो तो जन्मकी शूद्रिन परोसा सो तुम पांडे क्यों खाया ॥ हिन्दू तुरुक कहांते आये किन यह राह चलाई। दिलमें खोजु खोज दिलहीमें भिस्त कहां किन पाई ॥ ८४ ॥

(१२४)

कवीरपंथी—

शब्द ४७३—भूला लोग कहै घर मेरा । जा घरवामें फूला ढोलै सो घर नाहीं तेरा ॥ टे० ॥ हाथी घोडा बैल बाह्नो संग्रह कियो घनेरा । बस्तीमेंसे दियो खदेरी जंगल कियो बसेरा ॥ गांठी बांध खरच नहिं पठयो बहुरि कियो नहिं फेरा । बीबी बाहर हिरम महलमें बीच मियांको डेरा ॥ नौ मन सूत अरुझि नहिं सुरझै जनम जनम अरुझेरा । कहैं कवीर सुनो हो संतो यहि पदका करो निवेरा ॥ ८५ ॥

शब्द ४७४—कविरा तेरो घर कंदलामें यह जग रहत भुलाना । गुरुकी कही करत नहिं कोई अमहल महल दिवाना ॥ टेक ॥ सकल ब्रह्ममें हंस कवीरा काग न चाँच पसार । मनमत कर्म धरे सब देही नाद बिडु विस्तारा ॥ सकल कवीरा बोले बानी पानीमो घर छाया । लूटि अनन्त होत घट भीतर घटका मरम न पाया ॥ कामिनि रूपी सकल कवीरा मिरगा चरिन्दा होई । बड़ बड़ ज्ञानी मुनिवर थाके पकरि सकै नहिं कोई ॥ ब्रह्मा वरुन कुबेर पुरंदर पीपा प्रह्लाद चाखा । हिरनाकुश नख उदर विदारा तिनहुक काल न राखा ॥ गोरख ऐसो दत्त दिगम्बर नाम देव जयदेव दासा । उनकी खबर कहत नहिं कोई कहाँ कियो है बासा ॥ चौपर खेल होत घट भीतर जन्मके पास ठारा । दम दमकी कोइ खबरि न जाने करि न सकै निरुआरा ॥ चारि दिशा महिमंड रच्यो है रूप साम विच डिछी । ता ऊपर कछु अजब तमाशा मारे है जम किछी ॥ सकल अवतार जासु महिमंडल अनंत खडो कर जोरे । अद्भुत अगम अथाह रच्यो है ई सब शोभा तोरे ॥ सकल कवीरा बोलै बीरा अजहुं हो हुशियारा । कहैं कवीर गुरु सिकली दरपन हरदम करो पुकारा ॥ ८६ ॥

शब्दावली

(१२५)

शब्द ४७५—कविरा तेरो घर कन्दलामें मने अहेरा खेले । वपुवारी आनन्द मिरगा रुची रुची सर मेलै ॥ टेक ॥ चेतन रावल पावन खंडा सहजहि मूले बांधे । ध्यान धनुष धरि ज्ञान बान बन जोगसार सर साधे ॥ षट् चक्र वेधि कमल वेध्यो जब जाय उजारी कीन्हा । काम क्रोध अरु लोभ मोह ये हांकि साउजन दीन्हा ॥ गगन मध्य रोक्यो सो द्वारा जहां दिवस नहि राती । दास कवीर जाय सो पहुंच्यो सब बिछुरयो संग संचाती ॥ ८७ ॥

शब्द ४७६—सावज न होई भाइ सावज न होइ । वाको माँस भखै सब कोइ ॥ टेक ॥ सावज एक सकल संसारा अविगत वाकी बाता । पेट फारि जो देखियरे भाई आहि करेज न आंता ॥ ऐसी बाकी माँसु रे भाई पल पल मासु बिकई । हाड गोड लै धूरि पवारे आगि धुवां नहि खाई ॥ शिर औ सींग कछू नहि बाके पूछ कहां वह पाई । सब पंडित मिलि धनधे परिया कवीर बनौरी गाई ॥ ८८ ॥

शब्द ४७७—सुभागे केहि कारन लोभ लागे रतन जनम खोयो । पूरब जनम भूमिके कारन बीज काहेको बोयो ॥ टेक ॥ पानीसे जिन पिंडे साजे अभ्रिहि कुंड रहाया । दसे मास माताके गरभ कठि बहुरि लागिलि माया ॥ बालकसे पुनि त्रिध हुआ है होनी रही सो होवे । जब जम ऐहैं बांधि ले जैहैं नयन भरीभरि रोये ॥ जीवनके जनि आशा राखो काल गहैंहै स्वासा । बाजी है संसार कवीरा चित् चेति ठारो पास ॥ ८९ ॥

शब्द ४७८—संत महंतो सुमिरो सोई जो काल फांस ते बांचा होई ॥ टे० ॥ दत्तात्रेय भरम नहि जाना मिथ्या स्वाद भुलाना । सलिला मथके घृतिको काब्यो ताहि समाधि समाना ॥ गोरख पवन रखै नहि जाना जोग जुगति अनुमाना । रिद्धि सिद्धि संजम

(१२६)

कवीरपंथी

बहुतेरा पारब्रह्म नहि जाना ॥ बसिष्ठ सिष्ठ विद्या सम्पूर्ण राम ऐसे शिष्य साखा । जाहि रामको करता कहिये तिनहुंको काल न राखा ॥ हिन्दू कहै हमै ले जरवै तुलुक कहै मोर पीर । दूनौ आइ दीनमों झगरेँ ठाढै देखैँ हंस कवीर ॥ ९० ॥

शब्द ४७९-जो देखा सो दुखिया देखा तन धरि सुखी न देखा उदय अस्तकी बात कहत हौं ताकर करहु विवेखा ॥ टेक ॥ बाटे बाटे सब कोइ दुखिया क्या गिरही वैरागी । शुक्राचार्य दुखहीके कारन गरभै माया त्यागी ॥ जोगी दुखिया जंगम दुखिया तापसको दुख दूना । आशा तृष्णा सब घट व्यापै कोइ महल नहि सूना ॥ साच कहौं तो सबै जग खीझै झूठ कहो नहि जाई । कह कवीर तेई भै दुखिया जित यह राह चलाई ॥ ९१ ॥

शब्द ४८०-ता मनको चिन्हौ रे भाई । तन छूटै मन कहाँ समाई ॥ टे० ॥ सनक सनन्दन जयदेव नामा । अम्बरीष प्रहलाद सुदामा ॥ भक्त सही मन उनहुं न जाना । भगति हेतु मन उनहुं न ज्ञाना ॥ भरथरि गोरख गोपी चंदा । ता मन मिलि मिलि कियो आनन्दा ॥ जा मनको कोइ जान न भेवा । ता मन मगन भये शुक्रदेवा ॥ एकल निरंजन सकल शरीरा । तासे भ्रमि भ्रमि रहल कवीरा ॥ ९२ ॥

शब्द ४८१-बाबू ऐसो है संसार तिहारो ये कलि है व्यवहारा । को अब अनख सहे प्रति दिनको नाहिं न रहनि हमारा ॥ टे० ॥ सुमृति सुभाव सबै कोइ जाने हृदया तत्त्व न बूझे । निरजिव आगै सरजिव थापै लोचन कछुव न सूझे ॥ तजि अमृत विष काहे को अंचवै गांठी बांधो खोटा । चोरनको दिये पाट सिंहासन साहुनको कीन्हो ओटा ॥ कह कवीर झूठे मिलि झूठा ठगहीं ठग व्यवहारा । तीन लोक भरि पूरि रहो है नाहीं है पतियारा ॥ ९३ ॥

शब्दावली

(१२७)

शब्द ४८२-कहौ निरंजन कवनी वानी । हाथ पांव मुख सरवन नहीं जिह्वा का कहि जपहु हो प्रानी ॥ टेक ॥ जोतिहिं जोति जोति जो कहिये जोति कोन सहिदानी । जोतिहिं जोति जोति दे मारे तब कहं जोति समानी ॥ चार वेद ब्रह्मा निज कहिया तिनहुं न या गति जानी । कहैं कवीर सुनो हो संतो बूझहु पंडित ज्ञानी ॥ ९४ ॥

शब्द ४८३-को अस करै नगर कोतवलिया । मास फैलाय गिध रखवरिया ॥ मूस भौ नाव मंजार कंडहरिया । सोवै दाडुर सरप पहरिया ॥ बैल विलाय गाय भइ बांझा । बछवै दुहिया तिन नित सांझा ॥ नित उठि सिंह सियार सो जूझै । कविरके पद जन विरला बूझै ॥ ९५ ॥

शब्द ४८४-का कहिये रोवहुगे बहु तेरा । बहुतक गये फिरै नहीं फेरा ॥ टे० ॥ हम रोया तब तै न संभारा । गरभवासकी बात विचारा ॥ अब तैं रोया क्या तैं पाया । केहि कारन तैं मोहि रोवाया ॥ कहैं कवीर सुनो नर लोई । कालके वसहिं परी मत कोई ॥ ९६ ॥

शब्द ४८५-अछह राम जिव तेरी नाई । जन पर मेहर होहु तुम साईं ॥ टे० ॥ का मूडी भूमि शिर नाये का जल देह नहाये । खून करै मिसकीन कहावै अवगुन रहै छिपाये ॥ क्या भो वज्जू मज्जन कीन्हे का मसजिद शिर नाये । हृदया कपट निमाज गुजारे कहा भौ मक्का जाये ॥ हिंदू एकादशि चौविस रोजा मुस- लिम तीस बनाये । ग्यारह मास कहो किन टारो, एकहि माहिं समाये ॥ पूरब दिशा हरिको बासा, पच्छिम अछह मुकामा । दिलमें खोज दिलमें देखो, यहाँ करीमा रामा ॥ जो खुदाय मसजिद बसतु है, और मुलुक केहि केरा । तीरथ मूरत राम

(१२८)

कवीरपंथी-

निवासी, दुहुमें किनहु न हेरा ॥ वेद कितेब कहो किन झूठा, झूठा जो न विचारे। सब घट एक एक करि लेखे, भौ दूजा करि मारे ॥ जेते औरत मरद उपाने, सो सब रूप तुम्हारा। कवीर पोगरा अलह रामका, सो गुरु पीर हमारा ॥ ९७ ॥

शब्द ४८६-आव बे आव सुझे हरिको नामा। और सकल तजु कौने कामा ॥ टेक ॥ कहैं तब आदम कहैं तब होआ। कहैं तब पीर पैगम्बर हुआ ॥ कहैं तर जमी कहैं अशमाना। कहैं तब वेद किताब कुराना ॥ जिन दुनियामें रची मसीद। झूटे रोजा झूठी ईद ॥ सांच एक अल्लहको नामा। ताको नय नय करहु सलामा ॥ कहु घौ बिहिस्त कहाँ ते आई। किसके कहे तुम छुरी चलाई ॥ करता किरतम बाजी लाई। हिंदू तुरुक दुई राह चलाई ॥ कहाँ तब दिवस कहैं तब राती। कहैं तब किरतिमकी उत्पाती ॥ नहीं वाकि जात नहीं वाकि पांती। कहहि कवीर वाके दिवस न राती ॥ ९८ ॥

शब्द ४८७-अब कहैं चलेहु अकेले भिता। उठि किन करहु घरहुकी चिता ॥ टे० ॥ खीर खांड घृत पिंड सँवँरा। सो तन लै बाहर करि डारा ॥ जेहि शिर रचि रचि बाँधो पागा। सो शिर रतन बिडारहि कागा ॥ हाड जरे जस लकडी झूरी। केस जरे जस त्रिनकी कूरी ॥ आवत संग न जात संघाती। काह भये दल बाँधे हाती ॥ मायाके रस लेहु न पाया। अंतर जम बिलारि होय आया ॥ कहकवीर नल अजहुँन जागा। जमका मोगरामध शिर लागा ॥ ९९ ॥

शब्द ४८८-देखो लोगो हरिकि सगाई। माय धरै पुत धिया संग जाई ॥ टे० ॥ सासु ननद मिलि अदल चलाई। मादरियाके घर बैठी आई ॥ हम बहनोई राम मोर सारा। हमहीं बाप हरि पुत्र हमारा ॥ कहै कवीर हरिके बूता। राम रमेते कुकरिक पूता १०० ॥

शब्दावली

(९२९)

शब्द ४८९-देखि देखि जिय अचरज होई । यह पद बूझे बिरला कोई ॥ टे० ॥ धरती उलटि अकाशे जाई । चींटीके मुख हस्ति समाई ॥ विन पवने जहँ परवत ऊडे । जिया जंतु सब बिरछा बूडे ॥ सूखे सरवर उठे हिलोल । विनु जल चक्वा करे कलोल ॥ बैठा पंडित पढे पुरान । विन देखे का करै बखान ॥ कहहि कवीर जो पदको जान । सोई संत सदा परमान ॥१०१॥

शब्द ४९०-हो दारि की ले देहुँ तोहि गारी । तुम समुझ सुपंथ विचारी ॥ टेक ॥ घरहुके नाह जो अपना । तिनहुँ सो भेट न सपना ॥ ब्राह्मन औ क्षत्री बानी । तिनहुँ कहल न मानी ॥ जोगी औ जंगम जेते । आपु गये हैं ते ते ॥ कहहि कवीर इक जोगी । भरमि भरमि भौ भोगी ॥ १०२ ॥

शब्द ४९१-लोगो तुम मतिके भोरा । ज्यों पानीमें पानी मिलिगौ, ज्यों दुरि मिलै कवीरा ॥ टे० ॥ जो मैथिलको सच्चा बास । तो मरन होय मगहर पास ॥ मगहर मरे मरन नहि पावै । अनत मरे तो राम लजावै ॥ का काशी का मगहर उत्सर, (जोपै) हिरदय राम बसु मोरा । जो काशी तन तजे कवीरा, रामे कौन निहोरा ॥ १०३ ॥

शब्द ४९२-कैसे के तरो नाथ कैसे के तरो, अब बहु कुटिल भरो ॥ टेक ॥ कैसी तेरी सेवा पूजा, कैसो तेरो ध्यान । ऊपर ऊजर देखो, बग अनुमान ॥ भाव तो भुवंगम देखो, अति बिभिचारी ॥ सुरति सचान तेरी, मति तो मंजारी ॥ अतिरे विरोधी देखो, अतिरे दिवाना । छौ दरशन देखो, भेष लपटाना ॥ कहहि कवीर सुनो नल बंदा । डाइन डिम्भ सकल जग खंदा ॥१०४॥

शब्द ४९३-यह भरम भूत सकल जग खाया । जिन जिन

कवीरपंथी शब्दावली ३०

(९३०)

कबीरपंथी—

पूजा तिन जहंढाया ॥ टेक ॥ अंड न पिंड प्रान नहिं देहा । काटि काटि जिव केतिक एहा ॥ बकरी मुर्गी कीन उछेहा । आगिल जनम उन अवर लेहा ॥ कहहिं कवीर सुनो जन लोई । भुतवाके पुजले भुतवे होई ॥ १०६ ॥

शब्द ४९४—भैवर उड़े बग बैठे आया । रैन गयी दिवसो चलि जाया ॥ हल हल कांपे बाला जीव । ना जानो का करिहै पीव ॥ कांचे बासन टिकै न पानी । उडिगौ हंस काया कुंभिलानी ॥ काग उडावत भुजा पिरानी । कह कवीर यह कथा सिरानी ॥ १०६ ॥

शब्द ४९५—खसम विनु तेलिके बैल भयो । बैठत नाहिं साधुकी संगति, नाधे जनम गयो ॥ टेक ॥ बहिबहि मरै पंचे निज स्वारथ, जमके दंड सहो । धन द्वारा सुत राज काज हित, माथे भार गहो ॥ खसमहिं छाडि विषय रंग माते, पापके बीज बयो । झूठ मुकुति नर आशु जीवनकी, प्रेतको जूठ खयो ॥ लख चौरासी जीव जोइनमें शायर जात बहो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, स्वानकी पूछ गहो ॥ १०७ ॥

शब्द ४९६—अब हम भैल बहिर जल मीना । पूरब जनम तप कामद कीना ॥ टे० ॥ तब मैं अच्छलों बन बैरागी । तजलों कुटुम्ब राम रट लागी ॥ तजलों काशी मैं मति भोरी । प्राननाथ कटु को गति मोरी ॥ हम चलि गेलौ तुम्हरी सरना । कतहुँ न देखलौ हरिजिको चरना ॥ हमहिं कुसेवक कि तुमहिं अयाना । दुइ महाँ दोष काहि भगवाना ॥ हम चलि गेल तुम्हारे पास । दास कवीर भल कैल निराशा ॥ १०८ ॥

शब्द ४९७—लोग बोले दुरि गये कवीर । या मति कोइ जाने धीर ॥ टेक ॥ दशरथ सुत तिहुँ लोकहिं जाना । राम नामको मरनमें आना ॥ जेहि जिय जान परा जस लेखा । रजुको कहै