कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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गूढार्थचिन्तामणिकोश ।
अम निवर्तक दृष्टांत—बिम्बप्रतिबिम्ब, लोहित स्फटिक, घटकाश रज्जू सर्प, कनक कुंडल ॥
| महायज्ञ— | देव, | ऋषि, | पितर, | मनुष्य, | भूत, |
|---|---|---|---|---|---|
| यम— | अहिंसा, | सत्य, | ब्रह्मचर्य, | अपरिग्रह, | अस्तेय, |
| योगभूमिका, | क्षेप, | विक्षेप, | मूढ, | एकाग्र, | निरोध, |
| पांच ब्रह्म. | सोहृ, | ररकार, | औकार, | अकार, | पराशक्ति |
| पाण्डव पांच | युधिष्ठिर | भीम, | अर्जुन, | नकुल, | सहदेव |
| कन्या | अहल्या. | द्रौपदी, | तारा, | कुंती, | मंदोदरी |
| रामपंचायतन, | राम | जानकी | भरत | लक्ष्मण, | शत्रुहन |
| पंच मकार (तंत्रशास्त्रके) मधु, | मांस, | मत्स्य, | मैथुन | मुद्रा |
॥ पदार्थ बद्धविधि ॥
आनादि पदार्थ ६ १ जीव २ ईश, ३ शुद्धचैतन, अविद्या, ४ चैतन, और अविद्याके सम्बन्ध, ५ तिनका परस्पर भेद ॥
| अरिवर्ग,—काम | क्रोध | (द्वेष) | लोभ, | मोह, | मद | मत्सर, |
|---|---|---|---|---|---|---|
| अवस्था शरीरका— | शिशु, | कौमार, | पौर्गंड, | किशोर, | युवा, | जरा, |
| ईश्वरके गुण— | समग्रऐश्वर्य | समग्रधर्म, | समग्रयश | समग्रश्री, | समग्रज्ञान | समग्रवैराग |
| ईश्वरके ज्ञान— | उत्पत्ति | प्रलय, | गति | आगति, | विद्या, | अविद्या, |
| उर्मि धर्म— | जन्म, | मरण, | क्षुधा, | तृष्णा, | हर्ष, | शोक, |
| कर्म नित्य— | स्नान, | जप, | ह्रीम, | अर्चन, | आतिथ्य, | वैश्वदेव |
| कौशिक (अन्नमय कौशिकेपदार्थ) | वक्, | मांस, | रुधिर, | मेद, | मज्जा, | अस्ति, |
| प्रमाण— | प्रत्यक्ष | अनुमान, | उपमान, | शब्द, | अर्थापत्ति, | अनुपलब्धि |
| ध्रम— | कुल, | गोत्र, | जाति, | वर्ण, | आश्रम, | नाम |
| रस— | मधुर, | अम्ल, | लवण, | कटु, | कृषाय | तिक्त, |
| लिंग— | उपक्रम | उपसंहार, | अभ्यास, | अपूर्वता, | फल, | अर्थवाद, |
| विकार— | जन्म, | अस्तित्ता, | बुद्धित्ता | विपरिणामता, | अपक्षीयता, | विनाशना |
| वेदांत— | शिक्षा, | कल्प, | व्याकरण, | निरुक्त | छंद, | ज्योतिष |
| षट्संभति— | शम, | दम, | उपरम, | तिलिक्षा, | श्रद्धा, | समाधान |
शास्त्र—१ सांख्य (कपिलकृत) २ योग पातंजल (पतंजलिकृत) ३ न्याय गौतमकृत ४ पूर्वमिमांसा (जैमिनिंकृत) ५ वैशेषिक (कण्वा मुनिकृत) ६ वेदांत वा उत्तर मीमांसा (व्यास वा ब्राह्मणकृत) ॥
स्वभाव प्राणीका—छाजन, भोजन, चक्र ६ आचारचक्र चार दल कमल, ३ मणिपूरक चक्र १० दलकमल
मैथुन, भय, निद्रा, मोह ॥ १ स्वाधिष्ठान चक्र छः दल कमल, ४ अनाहतचक्र १२ दल, ५ विशुद्धाख्य चक्र १६ दल, अज्ञाख्य पद्म अज्ञाथके २ दल ॥
| दर्शनभेद—योगी, | जंगम, | सेवडा, | संन्यासी, | दवश | ब्राह्मण ॥ |
|---|---|---|---|---|---|
| जैनियोंके—द्रव्य | जीव, | बुद्धि, | आकाश, | कालस्वर्ग, | मोक्ष ॥ |
| तंत्र क्रिया—भारण, | मोहन, | वशीकरण, | उच्चटन, | स्तम्भन, | तारण ॥ |
न्यायोक्त जीव के छः विशेष गुण—१ बुद्धि, २ सुख, ३ दुख, ४ इच्छा, ५ द्वेष, ६ प्रयत्न