कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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सत्यनाम ।
कबीरपंथी-शब्दावली
कबीराश्रमाचार्ये परमार्थी वंश भारत पथिक
स्वामी श्री. युगलानन्द
बिहारी निर्मित ।
मुद्रक एवं प्रकाशकः
खेमराज श्रीकुण्डासाTM
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकुण्डासा मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.
संस्करण : सितंबर २०१६, संवत् २०७३
मूल्य ७०० रुपये मात्र।
मुद्रक एवं प्रकाशक:
खेमराज श्रीकृष्णदासTM
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,
मुंबई - ४०० ००४.
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सतसुकृत आदि अदली अजर अंचित पुरुष मुनीन्द्र करुणामय कवीर सुरतियोगसंतायन धनी, धर्मदासकी दया बचन बंश प्रतापी आचार्य—
१ चूराभणिनाम, २ सुदर्शननाम, ३ कुलपतिनाम, ४ परमोद्य गुरु बालापीरनाम, ५ कमलनाम, ६ अमोलनाम, ७ सुरतिसनेहीनाम, ८ हवकनाम, ९ पाकनाम, १० प्रगट नाम, ११ धीरजनाम, १२ उग्र- नाम, १३ दयानाम साहबकी दया.
वर्तमान बचन बंश प्रतापी आचार्य कवीर साहबके अधिकारी आचार्य शिरोमणि १०८ श्रीमहंत काशीदासजी साहबकी तथा सर्व संत महंतोंकी दयासे कवीरपंथी शब्दावली प्रारंभः ।
धर्मरक्षक सिद्धान्त ।
शब्द कहै सो कीजिये, गुरुवा बडे लबार । अपने अपने स्वार्थको, ठौर ठौर बटमार ॥
अथ भूमिका प्रारम्भः ।
✻
सत्यलोकके सत्यपुरुष, ज्ञानी सोइ अनूप । जोगजीत प्रभु आप हैं, आदिरूप अनुरूप ॥ १ ॥ सत्यनाम सतसुकृत्य विश्व, अदली आदि अकाम । अजर अचिन्त पुरुष अहै, नाम मुनीन्द्र अनाम ॥ २ ॥ करुणामय कवीर गुरु, धर्मदासके पीर । देह धरि आय जगतमें, साइ विदेह शरीर ॥ ३ ॥ पच्छा पच्छमें जग फँसी, भूल सत्यकी राह । दोउ दीनके जीवको, आय लगावन थाह ॥ ४ ॥ सत्य पंथ परगटकरी, स्वसम्बेदकी रीति । भूल पाखण्ड छुडाइके, सत्यलखायीनीति ॥ ५ ॥ नीति लखायी सत्यकी, वचन वंश परकाश । वचन मानु सो वंश है, प्रगट कहा अविनाश ॥ ६ ॥ नाशमान सब जगत है, जहाँ लग दृष्टि-विकास । वचन वंशकी शरणते, होय सत्यको भास ॥ ७ ॥ सत्य भासे जब जीवको, सत्य नाम आधार । काल भासे तब छूटई, आवे सत्य विचार ॥ ८ ॥ सत विचार परतापते, परखे काल दयाल । बिना परख न मुक्ति है, बन्धन सदा विशाल ॥ ९ ॥ जड़ चैतन दो दृश्य हैं, जामे अटके जीव । वचन वंश निज गुरु अहै, देइ बताई पीव ॥ १० ॥ मूल लखे जब जगतको, परखे मान गुमान । भूल मिटे तब जीवको, पावे सत्य अमान ॥ ११ ॥ सत्य ज्ञानकी चाह जिहिं, धर्मदास तिहिं नाम । बोधे सो गुरु देव है, सत्य कवीर अकाम ॥ १२ ॥ बोध पाई गुरु पद गहे, धर्मदास निज रूप । इन्द्री ब्यालिस बोधिके, वंश ब्यालिस भूप ॥ १३ ॥ वचन गहे सो वंश है, बिना वचन नहिं वंश । वंश अंश सब वचन है, बिना वचन विध्वंश ॥ १४ ॥ प्रकट कही गुरु कवीरने, वचन लखायो आप । बिना वचन कस होवई, सत्य असत्यको माप ॥ १५ ॥
भूमिका
(३)
सत्य असत्यके मापको, शब्दकीन आधार । मुक्तामनि सोई अहै, जाने जाननहार ॥ १६ ॥ विना शब्द अन्धे भये, सूक्ष्म वाट ना बाट । काल जाल अरुझाइके, पड़े जगतके ठाट ॥ १७ ॥ ठाट वाटमें जगतके, भूले सत्य सुराह । गुरु छाड़ि गुरुवा गहै, कौन कहै अवगाह ॥ १८ ॥ गुरुवा रूप जगत धरी, काल फँसावे जीव । पक्षवादमें डालिके, सत्य छुडावे पीव ॥ १९ ॥ सत्य छाड़ि असत गहि, सत औगुनकी खान । शब्द विना परखे नहीं, पावे दुःख निदान ॥ २० ॥ दुःख मिटावन कारने, सत कवीर कहि दीन । शब्द रूप मैं जगतमें, डोलों सदा परवीन ॥ २१ ॥ शब्द शब्द बहु अंतरा, सार शब्द मथि लेहु । सार शब्द गरहन करी, त्याग असारको देहु ॥ २२ ॥ शब्द विनु सुरति आंधरी, कहू कहाँ को जाय । द्वार न पावे शब्द को, फिरि फिरि भटका खाय ॥ २३ ॥ शब्द हमारा आदिका, सुनि मति जाहु सरखि । जो चाहो निज तत्वको, शब्दे लेहु परखि ॥ २४ ॥ शब्दे मारा गिरपडा, शब्दे छाडा राज । जिन जिन शब्द विवेकिया, तिनका सँवैरा काज ॥ २५ ॥ शब्द कहै सो कीजिये, गुरुवा बडे लबार । अपने अपने स्वार्थको, ठौर ठौर बटमार ॥ २६ ॥ ताते धर्मनि कर परचारा । विना शब्द नहीं जीव उवारा । शब्द गहे सो पंथ चलावे । विना शब्द नहि सत्य लखावे ॥ शब्द गहे सो भवजल पारा । विना शब्द बूडे मँझधारा ॥ ताते वंशन देहु चिताई । जो चाहैं निज हित वह भाई ॥ शब्द हुकुम नहि टारें कबहीं । आनन्द राज सुख विलसैं तबहीं ॥ कहैं लगि कहों सुनो धर्मदासा । आगम भेद कियो परगासा ॥
(आगम संदेश)
(४)
भूमिका ।
इसी प्रकार सद्गुरु कबीर, आदिसे अंत तक, जीवोंको कालसे वचनेके लिये, शब्दकी पारख करनेकी शिक्षा देते हैं। संसारमें शब्द जालही ऐसा जाल है जिसमें फँसकर जीव सुखदुख आवागमन जन्म मरण आदि द्वंद्वजमें पडकर अनन्त कष्ट भोगा करते हैं। इसी लिये सद्गुरुने उन शब्दजालोंको काटनेके लिये सत्य शब्द प्रकट कर जीवोंको दुखसे छूटनेका मार्ग बतलाया है। जिस प्रकार लोहेको काटनेके लिये लोहे की ही छेनी हथोड़ा और निहायकी आवश्यकता होती है, उसी प्रकार शब्दोंसे ही शब्दकी परख कर, उसकी कोर कसर को निकाल हंसके समान सारवस्तु को ग्रहण करनेका आदेश सद्गुरुने दिया है। किन्तु काल और कर्मके प्रतापसे, सत्यकी ओर बहुत कम लोगोंका झुकाव होता है और मायिक संसारमें लोग विशेष प्रवृत्त होकर काल कर्म कोही सत्य मानकर यथार्थ सत्यकी उपेक्षा करते हैं। यद्यपि यह दशा देखकर, उत्साह भंग हो जाता है, वृत्ति इस ओर जानेसे अटकती है, तथापि सद्गुरुके आदेश “धर्मदास मैं—तोहि सुनावा। कै कै बार जिवन पर आवा ॥ जीवनकाज फिरौं में जाई। जे चीन्हें तेहि लोक पठाई ॥ तुम क्यों चिन्ता मनमें आनो। आपन काज करो मन मानों ॥” के अनुसार उसने जो कार्य सौंपा है सो करना प्रत्येक का कर्तव्य है। सद्गुरुने जन्मसेही मुझे कबीरपंथी वाणीके प्रकाशन और ग्रन्थोंके जीर्णोद्धारका कार्य सौंपा है। उसीकी आज्ञा और सहायता से आजतक मैंने निष्काम वृत्तिसे अनेक ग्रन्थोंका प्रकाशन किया कराया है, इस ग्रन्थके भी प्रकाशनमें सद्गुरुकी दयाकाही हाथ है। विशेष प्रस्तावनामें देखना चाहिये।
कवीराश्रम खरसिया स्टेशन जि० विलासपुर सी० पी० हाल कुबेरभवन राष्ट्रियशाला रोड विले पारले, बंबई. ता० २७-१०-३१
भवदीय
श्रीयुगलानन्द विहारी (आचार्य कवीराश्रम)
सत्यनाम
प्रस्तावना
संगलाचरण ।
सत सुकृत सतयुग किये, सत्यनाम परचार । अगनित चिंताय जीव जग, रहे काल ऋषमार ॥ १ ॥ नाममुनीन्द्र सुविदित है, श्रेता युगके मार्हि । दुआपरमें कृत्तनामय, कलियुग कबीर कहाँहि ॥ २ ॥ जासुचरण बन्दन करी, पाई शब्द निशान । धर्मदास निजवंश सह, जगत गुरु परमान ॥ ३ ॥ ता कबीरके चरणमें, युगल दास शिरनाय । बार बार बन्दन करै, सतगुरु होहु सहाय ॥ ४ ॥ युगलदास के साथपर, सतगुरु दीना हाथ । युगल आनन्द पाइके, भये अनाथ सनाथ ॥ ५ ॥ वचन वंशाहि परगटकरी, दीना सत्य लखाय । शब्द लखे सो पारखी, पारख मार्हि समाय ॥ ६ ॥ पारख पाई जगतमें, हंस रूप होय आप । आपन पौ सम्मुख रखै, मिटै सकल संताप ॥ ७ ॥ संताप मिटै तब जीवका, हंस रूप जब होय ॥ षटकी रेखा तब मिटै, निज स्वरूप लखि जोय ॥ ८ ॥ निज स्वरूपके लखतही, मिटै आस अरु भास । आसा बासा कल्पना, सब ही होय विनास ॥ ९ ॥ माया ब्रह्म अरु जीवलों, ईश जगत परमान । सबही कल्पना छिनकमें, भेटे होय अमान ॥ १० ॥ मान मिटै जब जीवका, प्रत्यक्ष गुरु दरसाय । सत्य लोक सोइ जानिये, कह्यो कबीर समझाय ॥ ११ ॥
सद्गुरु कबीर अमर अविनाशी अजन्मा और विदेही होनेपरभी, कर्णा-स्वरूप होनेके कारण, सदा कर्णाकर जगतमें जीवोंको चेताने और काल जालसे छुडानेके लिये, विचार और मननका उपदेश दे सत्यसुकृतमें लगा, स्वकृत सत्य-नामको प्राप्त करा, कर सुखी किया करता है और गुप्त रूपसे सर्व कालमें सबके
१ षटकी रेखाको जाननेके लिये, “पंचदेहकानिर्णय” इसी ग्रन्थके पृष्ठ ५६० से ५६४ तक देखो ॥ और शरीरके अस्तित्व जायते आदि षट विकार ॥
( ६ )
प्रस्तावना ।
संग रहकर, गुरु रूपसे प्रकट हो, उपदेश देता रहता है। तथापि विशेष रूपसे सम्भवत १४५६ वि० के जेठ पूर्णिमा को काशीमें प्रकट होकर सत्यका डंका बजा, जीवोंको चेताना आरम्भ किया और अपने उपदेश और कथनको विशेष रूपसे, निज श्रद्धालुओंके हृदयमें दृढीभूत करानेके हेतु, अन्तिम लीला करनेके लिये, सम्भवत १५७५ में मगहरको गमन किया था ।
उस समय समस्त भारतवर्षमें आपकाही डंका बज रहाथा, इस हेतु आपके काशी छोडतेही वर्तमान कालके समान रेल तार और डाक आदिका प्रबन्ध न रहते हुए भी, आपके मगहर जानेका समाचार समस्त भारतवर्षमें तत्कालही फैल गया और देश देशान्तरोंसे संत महात्मा सिद्ध साधुओंके झुन्डके झुंड मगहरमें इकट्ठे होने लगे और वहां बहुत बड़ा भारी मेला लग गया । यद्यपि बिजलीखां नवाब, राजा बीरसिंह बघेल आदि बड़े बड़े राजा महाराजा तथा बड़े बड़े धनाढ्य साहुकार लोग, जो आपके श्रद्धालु सेवक थे, वे संत महंतोंकी सेवामें सब प्रकारसे तत्पर थे तथापि, मगहरमें पानीका इतना अभाव था कि, बहुत उपाय करनेपरभी पानीकी कमीसे सबको बड़ा कष्ट होने लगा । उस समय नवाब बिजलीखां आदिकी प्रार्थनापर सदगुरु कवीरकी दया दृष्टिसे आभी नदी प्रकट हुई, जिससे सबका कष्ट निवारन हुआ और अबतक होता है ।
उसी समय लेखक के पुरुषा श्री दक्ष नाम साहबभी, जो गोरखपुरमें रहकर परमार्थ प्राप्तिके लिये, योगका साधन कर रहे थे, मगहर गये और सदगुरु कवीरके दर्शन और उपदेशसे कृतार्थ हो आपको गुरु धारणकर लिया । तबहींसे बराबर आजतक, कवीर पंथकाही धारण, लेखकके वंशमें चला आता है । उसी सिलसिले में, गोरखपुरके घासी कटरे, देवरिया, नव तन, मलहपुरवा, हातामठिया, भरवट-टोला, आदि स्थान इस समयभी वर्तमान है । इसीसे पाठक समझ सकते हैं कि, कवीर साहबके सिद्धान्त और वाणी वचन, वंश परम्परासे सीनें पसीनें चले आनेके कारण, कितना, और किस रूपमें लेखकसे सम्बद्ध है । इतना होनेपर भी, लेखकके पुरुषाओंने कोई विशेष पंथ नहीं चलाया, न विशेष अपना कोई अलग वेध बनाया । इसका कारण यही है कि, पंथ चलानेका अधिकार तो केवल धर्मदासजीको ही है । धर्मदासजीके समानही जो सदगुरुके वचनमें पूर्ण श्रद्धा रखकर कमाई करे वह वचन वंश कहला सकता है किन्तु पंथके अधिकारी तो धर्मदासजी ही हैं । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि, आज भारतमें क्या संसार भरमें कवीरके नामसे जितने वचन वाणी प्रचलित हैं सबका सम्बन्ध धर्मदासजीसे जरूर है । सबसे पहले धर्मदासजीनेही सदगुरुकी वाणीको संग्रहकर उसकी व्याख्या आरम्भ की और उसी
प्रस्तावना ।
(७)
क्रममें सैकड़ों ग्रन्थोंकी रचना हो गयी । आपकी आत्मिक शक्ति और गुरु भक्ति तथा गुरु वचनमें दृढ़ताका ही प्रताप है कि, आजतक भी प्रायः जो वाणी वचन बनते हैं सबमें कवीरके साथ धर्मदासजीका नाम किसी न किसी रूपमें अवश्य आता है ।
धर्मदासजीके लिखे भविष्य कथन भी, चाहे वह किसीके लिये क्यों न हो, ऐसा अटल है कि, तिल प्रमाण भी फरक नहीं पड़ता । और तो और आपने अपने बंशोंके विषयमें भी कवीर मुखसे जितनी भविष्य वाणी लिखी है, वह भी अक्षर अक्षर सत्य उत्तरा है और आगे भी सत्य उतरेगा । इसके प्रमाणके लिये ग्रन्थ “आगम संदेश” कवीराश्रम खरसिया से मंगाकर देखना चाहिये ।
एक तो मेरे पुरुषा स्वतः कवीर साहबके शिष्य हुए थे, दूसरे वह पंथ पंथा-इयोंके झगडेसे अलग रहकर सदा सत्यका आश्रय करके, आत्म तत्वके विचारमें मग्न रहा करते थे । इसका परिणाम यह हुआ कि, सहस्रोंग्रंथोंका संग्रह हो गया जो, मेरे पिता श्री १०८ गोस्वामी वख्शी गोपाललालजीके पुस्तकालयसे मुझे प्राप्त हुआ ।
इसके अतिरिक्त सम्बत् १९४६ में जब मेरी आयु केवल १६ वर्षकी थी तवहीं में वंशप्रतापी बेलवतियाके महंत श्री १०८ श्रीमान गोस्वामी श्याम बिहारी दासजी साहबकीशरणमें प्राप्त हुआ, तबसे और भी सहायता मिली और छीत्तीस-गढसे विशेष सम्बन्ध जुटा । फिर तो थोडेही दिनोंके पश्चात् श्री १०८ पंश्रीउग्रनाम साहबका दर्शन रेगनिया स्थानमें हुआ ।
उसके थोडे दिनोंके पश्चातही मुझे सदगुरुके आदेशसे, सदगुरुके समान पिताश्रीकी आज्ञा लेकर, देश भ्रमणको निकलना पड़ा । जिसका संक्षेप वृत्तांत “सत्य कवीर की साखी” की प्रस्तावना में दिया है, जिसको देखना हो श्री बैंकटेश्वर प्रेस बम्बई” से मंगाकर देख सकता है ।
देश भ्रमणसे लौटने पर सबसे प्रथम वाणियों के प्रकाशनका कार्य मैंने सम्बत् १९५३ में लेखनऊसे आरम्भ किया था—उस समय मूलरमैनीकवीरसंग्रह, (१०८ अंगकी साखी) आदि प्रकाशित करके जो निवेदन निकाला था सो यह है ।
निवेदन जो सबसे पहले ग्रन्थ प्रकाशनके पश्चात् निकाला ।
॥ सत्गुरु कवीरसाहबकी दया ॥
बारों तन मन धन सबै, पद परखावन हार ।
युग अनन्त जो पवित्र, बिनगुरु नहि निस्तार ॥
(८)
प्रस्तावना ।
महाशय !
जबसे कलियुग ने अपना राज्य पाया, तब से भारत वर्ष से सत्य धर्म और विचार विद्याका लोप होने लगा और अनेक प्रकारके हिंसा और दम्भ युक्त स्वार्थ साधक मत फैलने लगे, जिससे सत्यपुरुष, सच्चिदानन्द सदगुरुकी सेवाको छोड़, बहुतसे हिंसक देवताओंकी कल्पना कर, उनके बहानेसे नित्य प्रति करोड़ों जीवोंकी हिंसा होने लगी, जिससे लोगोंकी बुद्धि तमोगुणी हो, सत्य धर्मके समझनेमें असमर्थ हो गयीं ॥ वेद शास्त्रका पढ़ना विचारना जाता रहा, सत्यमार्गका लोप होने लगा और उसकी यहाँ तक बूढ़ी हुई कि, भारत वर्षके लाखों आदमी अपने पवित्र सनातनधर्मको छोड़ (अपने धर्मके प्रभावको न जाननेके कारण) परमधर्म को स्वीकार करने लगे ॥
परन्तु इस प्रवाहको रोकनेवाला, बादशाह सिकन्दर लोदीके पहिले तक, कोई खड़ा नहीं हुआ सिकन्दरके समयमें सदगुरु सत्यकवीर साहेब प्रकट हुए और इतने प्रसिद्ध हुये कि, भारत वर्षका एक बच्चा भी आज कल उनके नामको जानता और उनके पदोंको गाय गायकर आनन्द प्राप्त करता है बड़े बूढ़ोंका तो कहनाही क्या है । उन्होंने उस समय उन नानाप्रकारके, पाखण्ड हिंसा युक्त धर्मोंमें पड़े जीवोंको, सत्य विचार हीन हो दुःख भोगते देख, कर्णुणकर सर्वके हितका शोच किया ।
संसारी पारख बिना कैसे पावें ठौर ।
विविध युक्ति अनमिल सबे भोगर्वाहि और के और ॥
और सत्यका उपदेश देना आरम्भ कर दिया ।
और सरल देश भाषामें वेद शास्त्रोंके सिद्धांत तथा लोक परलोकमें सुख देनेवाले अनेक ग्रन्थ तथा सहस्रशः शब्द पर भजन आदिकी रचनाकर लोगोंको सत्य मार्ग सुझाया और पाखण्डको दूर किया ।
जिसका फल यह हुआ कि, सहस्रों मनुष्योंने फिर अपने पवित्र धर्मकी तरफ लौट कर पर धर्मको छोड़ अपने हिन्दू धर्मको ग्रहण किया ।
जिसका सबूत यद्यपि उपस्थित है कि, सहस्रशः मुसलमान कवीर पंथी, जिनका व्यवहार वर्तमान है, चाल-चलन, आचार-विचार सब हिन्दू के समान और अहिंसक, मद्यमांस त्यागी तो ऐसे हैं कि, मद्य मांसाहारियोंके साथ भोजन तक नहीं करते ।
और इसी प्रभावके ऊपरसे कवीरपंथकी भी स्थापना हुई और तबसे सन्तों ने बहुतसे ग्रंथ आदि रचना किया, जिससे हिन्दू धर्मका बहुत बड़ा उपकार हुआ ।
प्रस्तावना ।
(९)
इन सब उपकार तथा दयाको न विचार, आज कल बहुतसे महाशयोंने, विना तहकीक किये विना शोचे अनेक कपोल कल्पित बातें गढ़ंत कर, उन ग्रन्थों तथा वचनोंका निरादर तथा निन्दा करना आरम्भ कर दिया है ।
परन्तु ये लोग ऐसा क्यों करते हैं ? इसका कारण क्या है ? क्या वे जान कर निन्दा करते हैं ? इन प्रश्नोंके उत्तरको यदि हम विचार कर देखें तो केवल यही उत्तर देंगे कि, नहीं वे जानकर निन्दा नहीं करते, परन्तु सुनी सुनाई बातों के ऊपर आक्षेप करते हैं, जिनमें प्रायः बही बातें होती हैं । कि, जो कोई २ बुद्धिहीन असारप्राही पक्षपाती अपने स्वभावानुसार एक दूसरेकी निन्दामें कहा करते हैं । और इसी तरह से सब धर्मों के विषय में कहा जा सकता है । और उन्होंने सुनी सुनाई बातोंके ऊपर न जाकरके सच्चे दिल से पक्ष छोड़ विचार किया है, वे कभी निन्दा का नाम नहीं लेते जैसा नाभा जी अपने भक्तमाल में लिखते हैं ॥
छप्पय ।
भक्ति बिमुख धर्म सब अधर्म करि गायो ।
योग यज्ञ व्रत दान भजन बिनु तुच्छ बतायो ॥
हिन्दू तुरुक परमाण रमैनी शब्दे साखी ।
पक्षपात नहीं करी सबनके हितकी भाखी ॥
आरुढ दशा होय जगतमें मुख देखी नाहि न भनी ।
कबीर कानि राखी नहीं बर्ण आश्रम षट दशनी ॥
अब इसका विचार करना कि, क्या कारण है कि, आज कलके लोग कबीर साहेब के आशयको न समझ कर, निन्दा पर कमर बांधके खड़े होते हैं ? इसका कारण सिवाय इसके कि, उन्होंने ग्रन्थ तथा सद्गुरु कबीर साहेबकी वाणी का विचार नहीं किया है, दूसरा कुछ नहीं हो सकता ॥
परन्तु मैं उनका भी इसमें दोष नहीं देता क्योंकि, आज कल प्रेस होजानेसे लोगोंको छपा पुस्तकें कि, जो थोड़ेही परिश्रममें प्राप्त होती हैं देखनेको स्वभाव पड गया है, किन्तु आजतक कबीर साहेबके ग्रन्थ छपे नहीं हैं जिससे सर्व साधारण उन्हें देख, उनके आशयको समझ मिथ्या पक्षको छोड़ निन्दा विरक्त होंवें ॥
इस हेतु, ग्रन्थके मिलनेके अभावको दूर करनेके लिये, मैंने अत्यंत परिश्रम से ग्रन्थोंको इकट्ठा किया है और छपवानेको भी आरम्भ कर दिया है, जिनमेंसे कई एक पुस्तकें छपकर तैयार हो गई हैं और सब छापी जाएही हैं और क्रमशः छपती रहेंगी ॥
अब सर्व महशयोंसे केवल इतना कहना चाहता हूं कि, यदि आप सच्चे
१०
प्रस्तावना ।
धर्मके खोजी हैं, अपने सरल देश भाषामें तत्त्व ज्ञान(Philosophy) जानना चाहते हैं, हिन्दी भाषाके प्रेमी हैं, सर्व साधारणकी सरलदेशभाषा—(ठेठ हिन्दी) में हृदय बेधक भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, नीति, आदिके शब्दोंको चाहते हैं तो, जैसे और पुस्तकों में बहुत कुछ खर्च करते है, वैसे इस में भी थोड़ा लगाकर इसे भी देखिये ॥
और दो पैसे के कार्ड द्वारा अपने पता ठिकाने नाम जिला प्रांत के नाम (स्पष्ट साफ, हिन्दी, उर्दू, अंगरेजी, गुजराती, किसी अक्षरोंमें) नीचे लिखे पतेसे भेज दीजिये कि, जिसके द्वारा जब जब पुस्तक छपे तब तब उसका विज्ञापन (इशतहार, जाहिरखबर समाचार) आपके पास रवाना किया करूं ।
यदि आप सत्यगुरु कवीर साहेबके मतानुयायी हैं तो विशेष कहनेकी क्या आवश्यकता ? आप स्वयमही समझ लीजियेगा, सब धर्मवाले अपने २ गीत गारहे हैं और एक पक्ष तथा सोसाइटीको लेकर रिफारमर बनते हैं परन्तु, यह तो आपका पक्षरहित निर्पक्ष भावसे सर्वके उपकारार्थ कार्य है । उठिये, जागिये और उन्नति कीजिये, आप सुधरिये, और दुखी जीवोंको जो पाखण्डमें फंसे दुख पारहे हैं, सत्य-पथ लखाइये, पारख प्राप्त कराइये, अपने सच्चे दयालपदकी इस परोपकार द्वारा रक्षा कीजिये, अधिक क्या कहूँ । पुस्तकोंका सूचीपत्रभी साथ लगा है, उसमें लिखे पतेसे पुस्तक मंगाइये ।
इसके पश्चात सम्बत १९५७ में जब कि, मैं अहमदाबादमें साबरमतीके किनारे, भीमनाथ पर, श्रीसंतदासजी साहबकी सहायतासे, सत्यपंथका प्रचार कर रहा था, उस समय कबीरमन्शूरके हिन्दी भाषामें छपनेका समाचार पहुँचा, किसी श्रद्धालुके द्वारा एक फार्म भी देखनेको मिला । जिसे देखकर और मूल उर्दू ग्रन्थसे अनेक अंशोंमें विपरीत जानकर मुझे बड़ा कष्ट हुआ, तब फार्म लाने वालोंसे मैंने अपना विचार प्रकटकर मनो वेदना बाहर की । जिसका समाचार हिन्दी कबीरमन्शूरके आदि प्रकाशक श्रद्धालु कबीरपंथी मकनजी कुबेर पेंटर तथा उसके छापनेवाले श्रीवेंकटेश्वर प्रेसके मालिक परम वैष्णव महानसज्जन धर्म धुरन्धर श्रीसेठ खेमराज जी को भी मिली । इन लोगोंने मुझे अहमदाबाद से बुलानेका आयोजन किया, किन्तु, उस समय विशेष नियम पालन करते हुए, विशेष अवस्थामें रहनेके कारण, मैं शीघ्र बम्बई नहीं आसका, इसलिये कबीर मन्शूर छपनेका काम कुछ दिनतक बन्द रहा । पश्चात् मेरे नियम अनुष्ठानका समय पूरा हुआ और मैं बम्बई आकर घाटकोपर पर ठहरा । तब श्रीयुत मकनजी कुबेर पेंटर और श्रीयुत सेठ खेमराजजी क्रमशः मुझसे मिले तथा अनुरोधकर मुझे
प्रस्तावना ।
(११)
बम्बई ले आये और कबीरमन्शूरकी छपाई आगे चली । जो कुछ पीछे छप चुका था, वह एक ऐसे सज्जनद्वारा अनुवाद कराया गया था जिसको धर्मकी गन्धर्भी नहीं लगी थी । इसलिये आवश्यकता तो इस बात की थी कि, सब फिरसे शुद्ध करके दुबारा छपाया जाय, किन्तु, इसमें सेठजीको बहुत बड़ी हानि उठानी पड़ती थी, इस कारण मकनजीको समझा बुझाकर विशेष २ फार्म जिनमें बहुतही अशुद्धियाँ थीं छपवाकर शेष वैसेही रखना पड़ा । जो आजतक वैसेही हैं इस भेदको न जाननेवाले कतिपय महात्माओंने, मेरे ऊपर कटाक्षकर पत्रोंमें लेख भी छपवाये हैं किन्तु, मैंने उन्हें अनजान जानकर उत्तर तक नहीं दिया है । अब मैंने फिरसे कबीरमन्शूरको हाथमें लिया है और मूलसे बराबर मिलाकर, टीका टिप्पणी और प्रमाणोंसहित तैय्यार किया है, सद्गुरुकी कृपा होगी तो थोड़े दिनोंमें प्रकाशित भी हो जायगा ।
कबीरमन्शूरके पश्चातही “कबीरोपासनापद्धति” मकनजी कुबेर पेन्टरके अनुरोधसे लिखना पड़ा था । उस समय श्री १०८ पंथी उग्रनाम साहबकी सेवामें कुदरमाल जानेकी जल्दी थी, क्योंकि इन्दौर कबीरमन्दिरके भूत पूर्व आचार्य सद्गुरु श्रीमहंत शम्भु दासजी साहबने वहां चलनेकी सूचना दीथी और भुसावलमें मिलनेकी बात निश्चित होगयी थी । इस लिये कबीरोपासनाके छापनेमें इतनी जल्दी की गयी कि, केवल आठ दिनोंमेंही ग्रन्थकी लिखाई छपाई सब होगयी और मैं कुदरमालको रवाना हो गया । पंथी उग्रनाम साहबका दर्शन तो दश बारह वर्ष पश्चात् रँगनिया मठपर हो चुका था किन्तु महंत श्री शम्भु दासजी साहबका दर्शन सबसे पहले कुदरमालमेंही हुआ । फिर तो पंथीकी आज्ञा और श्रीयुत महंत साहबकी सम्मतिसे, इस अनुचर द्वारा १५६० के कबीरपंथी संतसमागमका आयोजन हुआ । कबीरपंथमें यह समागम ऐसा था जो न भूतो न भविष्यति ।
कुदरमालकी महा संतसमागमसे लौटकर श्रीवेंकटेश्वर प्रेसमें कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन आरम्भ हुआ । जिसके परिणाम स्वरूप श्रीवेंकटेश्वर प्रेसकी सूचीमें, कबीरपंथी ग्रन्थोंका विभागही अलग हुआ । इतनेही नहीं कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन और उठाव देखकर बनारस, पटना, दर्भङ्गा, इलाहाबाद, कानपुर, नरसिंधपुर, लाहौर, स्यालकोट, अहमदाबाद, भावनगर, बडोदा, सूरत-आदि स्थानोंसेभी कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन आरम्भ होगया, जिसके परिणाम स्वरूप सैकड़ों कबीरपंथी ग्रन्थ आज बुकसेलरोंकी दूकानोंमें हाथोहाथ विकते देखे जाते हैं ।
उस समय पहले पहले जब ग्रन्थ प्रकाशित होने लगे, कबीरपंथी समाजमें
१२
प्रस्तावना ।
बड़ा भारी आन्दोलन मच गया, साधारण कवीरपंथी तो ग्रन्थोंको पाकर आनन्द मग्न होने लगे और स्वार्थी जो ग्रन्थोंको सेवक सतियोंको दिखाना भी पाप सम्भ्रान्त थे, बड़े घबराये, मुझपर उनको इतना क्रोध हुआ कि, मुझे पहले तो अदालत तक घसीटा और वहाँ जब कुछ वश नहीं चला तब, पंथी उग्रनाम साहबको सम्झना बुझाकर, मुझे ग्रन्थोंके छपानेसे रोकनेके हेतु, दामाखेड़ा बुलवा लिया, और देखा वे के लिये प्रेस भी लिया गया और प्रथम मेरे देख रेखमें रखा गया । जब मैंने ग्रन्थों के छपानेकी बात चलाई तब बड़े बड़े प्रपंचों द्वारा ग्रन्थ छपायी की बात तो क्या प्रेससेही सम्बन्ध छोड़ना पड़ा। यद्यपि प्रेसमें ग्रन्थ छपानेकेही लोभसे मैंने अपनी गांठके भी बहुत रुपये प्रेसमें लगादिया था तथापि महान अन्त्यायसे सब गबन कर लिया गया । बदलेमें दीवान हंस दास द्वारा मेरी झूठी निन्दा और बदनामी का खूब प्रचार किया गया । दीवान हंस दासकी कारवाई पूर्वके संत महंतोंमें तो चली नहीं, क्योंकि, उन्हें दामाखेड़ेवालोंका सब हाल मालूम था किन्तु, गुजरातके कतिपय, लोगोंने उनकी बातोंको सत्यमानकर द्वेषका बीज अपने अन्तः करणोंमें बोलिया जिसका अंश आजतकभी दृष्टिगोचर होता है ! अस्तु यह भी एक कालकी वाजीही थी नहीं तो साठ वासठ हजारकी लागतका प्रेस पंथी दयानाथ साहब द्वारा, कुछ मूर्खोंके कहनेसे, नौ सौमें एक विधर्मीको क्यों दे दिया जाता ?
अस्तु काल भगवानकी कृपासे ग्रंथ और वाणी वचनके प्रकाशनमें सद विघ्न होता चला आता है और सद्गुरु दयालकी दयासे मैं यथा शक्ति प्रयत्नमें लगाही हूँ । कई वर्षोंके अथक परिश्रमसे, इस वर्ष कवीरपंथी शब्दावलीका यह ग्रन्थ छपने पाया है । कवीरमन्थूरमें भी हाथ लग गया है किन्तु, काल निरंजनकी दृष्टि उसकी ओर भी पड़ी है, अनेक विघ्न आकर उपस्थित हैं देखें क्या परिणाम होता है ?
यद्यपि मेरे पास इस समय चालीस हजारसे भी ऐसी वाणीका संग्रह है जिसमें “कहें कबीर” की छाप लगी है । इच्छा तो ऐसी होती है कि सबही छपकर प्रकाशित हो जाय किन्तु, सद्गुरुने मुझे केवल ग्रन्थ और वाणियोंके संग्रहकी योग्यता दी है जिनके पास साधन है, वह इस ओर ध्यान नहीं देते, मेरे पास साधन नहीं है तबभी बड़ी बड़ी महत्वाकांक्षा लिये बैठे हैं । यद्यपि इच्छानुसार कार्य्य नहीं होता तथापि लगे रहनेसे कुछ न कुछ तो होताही है । जिन कबीरपंथियोंके पास धन है उन्हें इसका संस्कारही नहीं, नहीं तो उन्हें यदि धनही जमा करना है तो उपस्थित धनकी वृद्धिका, यह ग्रन्थोंका प्रकाशन कितना अच्छा मार्ग है । कुछ ग्रन्थोंको छपाकरही लोगोंने लाखों रुपये कमाये हैं यदि कोई कबीरपंथी इसी
ग्रस्तावना ।
(१३)
कामको करता तो ये रुपये उसीके घर तो जाते । किन्तु काल भगवानके जाल, संसारी मान पान राग भोगसे उन्हें फुरसत ही कब है कि, इस ओर ध्यान देने । काल निरञ्जनने कबीर साहबसे कहाही था कि, ।
बिनतौ एक करौं तुहि ताता । दिठ करि मानो हमरी बाता ॥ कहा तुम्हार जीव नहिं भनि हैं । हमरी ओर होय बादबखनिहैं ॥ दिठ बन्धन में रचा बनाई । जामें जीव रहै उरझाई ॥ जो ज्ञानी जैहो संसार । जीव न माने बचन तुम्हारा ॥ पंथ एक तुम आप चलाऊ । जीवन लै सतलोक पठाऊ ॥ द्वादश पंथ करौं मैं साजा । नाम तुम्हारा ले करौं अवाजा ॥ द्वादश जन्म संसार पठैहों । नाम तुम्हार ले पंथ चलैहों ॥ यहि बिधि जीवनको भरमाऊँ । पुरुष नाम जीवन समझाऊँ ॥ द्वादश पंथ जीव जो ऐहैं । सो हमरे मुख आन समैहैं ॥
मुझे तो, ऐसे नाममात्रके कबीरपंथी, जो काल और मायामें फँस कर, केवल सांसारिक स्वार्थके लिये मर रहे हैं, उनसे वे लोग अच्छे जान पड़ते हैं जो कबीर पंथी न कहलाने पर भी चाहे व्यापारिक लाभ की ही कामना से क्यों न हो कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन करके, कबीर धर्मका प्रचार कर रहे हैं। मैं तो विशेष रूपसे श्रीवेंकटेश्वर प्रेसके मालिकोंको हृदयसे धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने दर्जनों ग्रन्थ प्रकाशित कर, तीस वर्षोंसे लाखों प्रति कबीरपन्थियों तक पहुँचाया है ।
इस ग्रन्थके छापनेके लिये यद्यपि मुझे तीन वर्षतक प्रतीक्षापूर्वक बम्बई सेवन करना पड़ा है, तथापि ज्यों त्यों करके इतना भी छप गया है । आशा तो थी कि, कबीरमन्शूर, कबीरभानुप्रकाश, कबीरकौमुदी, तालीम कबीर कलियुग आदि सहित, संग्रहित चालीसहजार शब्दोंको छपवा देता और श्रीवेंकटेश्वर प्रेसके स्वामी खुशीसे छापते जिससे उनको व्यापारिक लाभ था किन्तु वर्तमान काल और वस्तु स्थितिको देखते हुए कुछ कहा नहीं जा सकता ।
कुछ भी हो मैंने आरम्भसेही अपना जीवन इसी कार्यके लिये अर्पण कर दिया है तब “जब तक जीना तबतक सीना” वाली कहावतके अनुसार, प्रयत्नसे न रुकूँगा और एक जगह नहीं दूसरी नहीं तीसरी जहाँ होगा जमीन आस्मान एक करके ग्रन्थोंको, जहांतक हो सकेगा, छपवा करही छोड़ूँगा क्योंकि इस समय
(१४)
प्रस्तावना ।
सद्गुरुकी कृपासे कबीरपंथी ग्रंथ छपानेको बडे २ प्रेसवाले तय्यार हैं किन्तु मेरी इच्छा है कि, जबतक श्रीवेंकटेश्वर प्रेसमें मेरे ग्रंथ छपचुके तबतक दूसरेको न दूँ और अंत तक यही कार्य करते हुए संसार लीलाको समाप्त करनेका दृढ़ निश्चय कर लिया है। इसी उद्देश्यसे “कबीरधर्मदर्शनग्रन्थमाला” छपवानेका आयोजन किया है। यह ग्रन्थ उसी ग्रन्थमालाका दूसरा भाग—समझना चाहिये। प्रथम भागमें नौ मणिक और इसमें शेष मणिका रखा है। जिसमें सुमेरस्थानी मूलरमैनी जानना चाहिये, जो पृष्ठ ४८७ से ५०२ तक है। आगे आगे जैसे और और ग्रन्थ छपते जाएँगे सूचना बाहर पडती जायगी।
अब मैं उन महानुभावोंको हृदयसे धन्यवाद देता हूँ जिनसे मुझे मेरे इस काममें विशेष सहायता ग्रन्थोंद्वारा मिली है।
- (१) सद्गुरु श्री. १०८ सत्यलोकवासी महन्त श्री शम्भुदासजी साहबके संशोधित और टिप्पणीवाले शब्द आदि वर्तमान महन्त श्री. लक्ष्मण-दासजी द्वारा प्राप्त हुए हैं, इतनेही नहीं आपने सद्गुरुसाहबके कुल ग्रन्थोंके छपवानेका अधिकार भी मुझे देकर सर्व साधारण तथा मेरा बहुत उपकार किया है इसलिये आपको कोटिशः धन्यवाद है।
- (२) श्री १०८ महंत श्री तुरंतदासजी साहबने हस्तलिखित ग्रन्थोंद्वारा सहायताकी है इसलिये आप भी विशेष धन्यवादके पात्र है।
- (३) श्री १०८ महंत श्री सुखलालदासजी साहब खारी बावली-दिल्ली।
- (४) श्रीयुत महंत मंगलदासजी साहब मु० हैदर कुली दिल्ली।
- (५) श्री महंत गुरुसरनदासजी गोंदौरा जि० फतेहपुर।
- (६) श्री महंत अमर दासजी साहब जोधपुर।
- (७) श्रीयुत राम रूपदासजी साहब रोसडा।
- (८) श्रीयुत परमहंस मित्तुदासजी साहब रोसडा।
- (९) श्री महंत चंचलदासजी साहब मौजी।
- (१०) श्रीमहंत सुन्दरदासजी साहब मुदारघाट।
- (११) श्रीयुत पण्डित वसंत दासजी साहब विथान गढी।
प्रस्तावना
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(१२) श्रीमहन्त विशुनदासजी साहब नलाबाजार अजमेर । इत्यादि अनेक संत महंतोंने मेरे इस कार्यमें ग्रन्थ और वाणी आदि भेजकर सहायताकी है, सबको अत्यन्त नम्रता पूर्वक बन्दगी सहित धन्यवाद ।
इस संग्रहमें क्या क्या संग्रहित है उसका संक्षेपमें तो सूचीपत्रसे पता लग जायगा और विस्तार ग्रन्थ देखनेसे पता लगेगा । ग्रन्थ बहुत बढ़ जानेसे बड़ा सूची-पत्र नहीं छप सका तथापि इतना तो यहाँ आवश्यक कहना होगा कि, इस ग्रंथ में लगभग सात हजारसे भी अधिक वाणियोंका संग्रह है ।
इस ग्रन्थका नाम कबीरपंथीशब्दावली इसलिये रखा है कि, इसमें कबीर साहबके अतिरिक्त धर्मदासजीसे लेकर अनेक कबीरपंथी महात्माओंकी वाणी भी आयी है.
इस ग्रन्थमें कई चित्रभी दिये गये हैं ।
(१) चित्र सद्गुरु कबीरके जिन्दा वेषका है इसी रूपसे आपने धर्मदासजीको चेताय़ा था, क्योंकि, आप मिथ्या सांसारिक जालसे जीवोंको छुड़ाकर निरपेक्ष सत्यमार्गका उपदेश देनेको प्रकट हुए थे। यह चित्र उस समयका है जिस समय आप मगहरकी लीला करके गुप्त हो उसी शरीरसे, बांधोगढमें प्रगट होकर, धर्मदासजी और बघेलवंशके, उस समयके वर्तमान. राजा महाराजा रामसिंहको उपदेश देकर क्रुतार्थ किया था । उसी समय राजारामने आपका यह चित्र उतरवाया था जो अद्यापि उस रीवाँ के तोशाखानामें उपस्थित है । यद्यपि उस चित्रमें कफनी, नाना रंगोंके छोटे छोटे कपड़ोंके टुकड़ोंकी बनी हुई है, किन्तु फोटोमें नाना रंग न आकर काला रंग आगया है इसलिये यहाँ भी काला देख पडता है ।
(२) दूसरा चित्र कबीरपंथी वचनवंशी विन्दवंशके बारहवें आचार्य श्री १०८ पंथी उपनामसाहबका है ।
(३) तीसरा चित्र श्री १०८ पंथीदयानाम साहबका है । जिनसे, ग्रन्थोंकी भविष्यत वाणीके अनुसार वचन वंशी विन्द वंशकी समाप्ति होगयी है ।
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प्रस्तावना ।
(४) कोदरमालके कबीरपंथी महासभाका है, जो पंथी दयानाम साहबके सत्यलोक वास होनेके पश्चात, सम्बत १९८४ वि० के चैत मासमें हुई थी, उन्हींमेंके कुछ उपस्थित संतमहंतोंकी मण्डलीका फोटो लिया गया था ।
(५) श्री १०८ कबीरसाहबके अधिकारी वचन वंशके नादवंशीय प्रथम आचार्य श्रीमहंत श्रीकाशीदासजी साहबका वह चित्र है जो भागलपुर के सेवकोंने उतरवाया था.
अब मैं इस प्रस्तावनाको यहाँही समाप्त करते हुए सर्व संतमहंत तथा सत्य मार्गियोंसे प्रार्थना करता हूँ कि, इस ग्रन्थकी यह पहली आवृत्ति है और भिन्न स्थानोंसे शब्दादिकोंका संग्रह किया गया है, इससे कई शब्द दुबारा आगये हैं। कई शब्द तो आरंभ एक प्रकारसे होनेपरभी मध्यमें फेरफार होनेसे दुबारा दिये गये हैं; तथा कितनी अशुद्धियाँ भी रहगयी हैं सो सब क्षमा करके आप इसे ग्रहण करेंगे और जिन जिन सुधारोंकी आवश्यकता हो उसकी सूचना इस परमार्थी अनुचरको देंगे तो, धन्यवाद पूर्वक दूसरी आवृत्तिमें आपके नाम सहित सुधारा कर दिया जायगा हाँ—गतवर्ष इसकी, भिन्न २ ग्रन्थोंसे, कापी लिखनेमें—मुंगेर जिलेके मौजे बिहट टोले मकशशपुर निवासी कबीरपंथी सेवक भूमिहार ब्राह्मण बाबू रामखेलावनसिंहने कई महीनोंतक मेरा साथ दिया था, इसलिये वह भी मुझ सहित सर्व पाठकोंके धन्यवाद और दयाभावके पात्र हैं।
कबीर आश्रम पो० खरसिया जि० विलासपुर सी. पी.
हाल
श्रीवेंकटेश्वर धर्मादा बिल्डिंग “खेतवाडी, बम्बई नं० ४”
सर्व संतों और जिज्ञासुओंका परमार्थी अनुचर
कबीरआचार्य आत्मनिष्ठ श्री. युगलानन्द विहारी.
सत्यनाथ
जिन्दा बेषमें सत्यकवीर
A black and white portrait of an elderly man with a long, full white beard and mustache. He is wearing a dark, high-collared garment and a tall, pointed traditional cap (pheta) with vertical ridges. He has a calm expression and is looking directly at the camera. The background is a plain, light color.
॥ यिरीषादवीर नाथ यिरीषादवीर नाथ । यिरीषादवीर नाथ । यिरीषादवीर नाथ ॥
सत्ययुग सत्पुङ्गव सतनाथा । जेता सुनीध जात कर धात्ता ॥
इसी बेषमें सद्गुरुने धर्मदासजीको चेताया था ।