कादम्बरी (पूर्वार्ध - चन्द्रकला-विद्योतिनी संस्कृत-हिन्दी टीका)
Kadambari (Purvardha) with Sanskrit-Hindi Commentary
बाणभट्ट / पं. कृष्णमोहन शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५२ | कादम्बरी- | [ कथामुखे- |
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सा क्षितितल-निहित जानु-करतला 'यथाज्ञापयति देवः' इति शिरसि कृत्वाज्ञां यथादिष्टमकरोत् ।
अथ मुहूर्त्तादिव वैशम्पायनः प्रतीहार्या गृहीतपञ्जरः कनकवेत्रलतावलम्बिना किञ्चिद्वनतपूर्वकायेन सितकञ्चुकाच्छन्नवपुषा जराधवलितमौलिना गद्गदस्वरेण मन्दमन्दसञ्चारिणा विहङ्गजातिप्रीत्या जरत्कलहंसेनेव कञ्चुकिनानुगम्यमानो राजान्तिकमाजगाम ।
क्षितितल-निहितकरतलस्तु कञ्चुकी राजानं व्यज्ञापयत्—'देव ! देव्यो विज्ञापयन्ति,
संति । सा प्रतीहारी क्षितितले भूमितले विहितौ स्थापितौ जानू ऊरुपर्वणी करतले पाणितले च यया सा तथोक्ता, एतेन विनयविशेषो ध्वनितः, यथा येन प्रकारेण आज्ञापयति आदिशति देवो भवान् इत्यभिधाय शिरसि मस्तके आज्ञाम् आदेशं कृत्वा विधाय स्वमस्तके करतलं स्थापयित्वेत्याशयः, यथा येन प्रकारेण राज्ञा आदिष्टम् आज्ञापितं तथा अकरोत् विदधौ ।
अथेति । अथ अन्तःपुरप्रवेशानन्तरं मुहूर्त्तादिव क्षणविलम्बादिव । गृहीतम् आत्तं पञ्जरं लौहशलाकानिर्मितपक्षिनिलयो यस्य स तथोक्तः । कनकेन सुवर्णेन खचिता या वेत्रलता वेतसयष्टिः तामवलम्बते धारणं करोतीत्येवं शीलो यः स तेन तथोक्तेन, इतः प्रभृति तृतीयान्तपदानि कञ्चुकिनेत्यस्य विशेषणानि बोध्यानि । किञ्चित् ईषत् भवनतः वार्धक्यवशादानम्रः पूर्वकायो नामेरूर्ध्वभागो यस्य तेन तादृशेन, सितकञ्चुकेन शुभ्रकूर्पासकेन आच्छन्नम् आच्छादितं वपुर्देहो यस्य स तेन तादृशेन, जरया वृद्धावस्थया धवलितः स्वच्छीकृतः मौलिः केशसमूहो यस्य तेन तादृशेन, गद्गदः अस्फुटः स्वरः कण्ठध्वनिर्यस्य स तेन तादृशेन, कञ्चुकिना—
'अन्तःपुरचरो वृद्धो विप्रो गुणगणान्वितः । सर्वकार्यार्थकुशलः कञ्चुकीत्यभिधीयते ॥'
इत्युक्तस्वरूपेण सौविदल्लकेनेत्यर्थः, मन्दं मन्दं शनैः शनै सञ्चरितुं शीलं यस्य स तेन तादृशेन विहङ्गजातिप्रीत्या पक्षिनेहेन जरत्कलहंसेनेव वृद्धराजहंसेनेव अनुगम्यमानोऽनुबध्यमानः, 'कलहंसस्तु कादम्बे राजहंसे नृपोत्तमे' इति मेदिनी, वैशम्पायनः शुकः राजान्तिकं नृपसमीपम् आजगाम आययौ । इह 'जरत्कलहंसेनेव' इत्युपमा ।
क्षितीति । क्षितितले धरणीतले 'धरा धरित्री धरणी क्षोणिर्ज्या काश्यपी क्षितिः' इत्यमरः, निहितं स्थापितं करतलं हस्ततलं येन स कञ्चुकी पूर्वोक्तलक्षणः राजानं भूमिपं व्यज्ञापयत् न्यवेदयत्—
राजा वहाँ पहुँच कर पलंग पर बैठ गया। उसकी तलवार लेकर साथ-साथ चलने वाली सेविका भी तलवार को गोद में रखकर फर्श पर बैठ गयी और नये कमल की पंखड़ियों के समान कोमल हथेलियों से धीरे-धीरे राजा का पैर दबाने लगी। वहाँ मिलने के लिए आने योग्य (विशिष्ट, जिसकी पहुँच दरबार खास-तक थी) राजाओं, मन्त्रियों और मित्रों के साथ तरह-तरह की बातें करते हुए राजा ने कुछ देर विश्राम किया।
फिर निश्चिन्त होकर उस सुग्गे का जीवन-वृत्तान्त पूछने की उत्सुकता से उसने समीप ही में खड़ी प्रतिहारी को आदेश दिया—रनिवास से वैशम्पायन को ले आओ !
प्रतिहारी ने भूमि पर घुटने टेक तथा हाथ से भूमि को छूकर 'श्रीमान् की जैसी आज्ञा' कहती हुयी हाथ को मस्तक पर रख लिया मानो राजा के आदेश को माथे चढ़ा लिया ओर वह आज्ञा के अनुसार सुग्गे को लाने के लिए रनिवास की ओर चल पड़ी।
एक क्षण के भीतर ही वैशम्पायन का पिंजड़ा हाथ में लिये हुए प्रतीहारी राजा के पास आ पहुँची । उसके पीछे-पीछे श्वेत कंचुक (जामा) से ढका हुआ तथा शरीर का ऊपरी भाग झुक जाने के कारण सोने की मूठ लगी बेंत की छड़ी का सहारा लेकर धीरे-धीरे चलनेवाला एक वृद्ध ब्राह्मण कंचुकी भी था। बुढ़ाती के कारण उसके बाल सन हो गए थे और स्वर अत्यन्त गद्गद (अस्पष्ट) हो गया था। वह ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पक्षी जाति के प्रति ममत्व होने के कारण कोई वृद्ध कलहंस वहाँ आ गया हो।
कंचुकी ने हाथ से भूमि छूकर राजा से निवेदन किया—'देव ! देवियों ने निवेदन किया है कि श्रीमान् के
१. मुहूर्त्तादेव । २ आनत···। ३. अवच्छन्न, अवच्छिन्न । ४. चारिणा । ५. विहितकरतलस्तु, निहितकरस्तु । ६. व्यजिज्ञापयत् ।