कादम्बरी (पूर्वार्ध - चन्द्रकला-विद्योतिनी संस्कृत-हिन्दी टीका)
Kadambari (Purvardha) with Sanskrit-Hindi Commentary
बाणभट्ट / पं. कृष्णमोहन शास्त्री द्वारा
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प्रलापिनी, क्वचिदुन्मत्तेव वायुवेग-कृत-तालशब्दा, क्वचिद्विधवेव उन्मुक्ततालपत्रा, क्वचित् समरभूमिरिव शर-शत-निचिता, [क्वचिदमरपति-तनुरिव नेत्रसहस्र-सङ्कुला, क्वचि-न्नारायणमूर्त्तिरिव तमालनीला, क्वचित् पार्थरथपताकेव वानराक्रान्ता, क्वचिदवनिपति-द्वार-भूमिरिव वेत्रलताशतदुष्प्रवेशा, क्वचिद्विराटनगरीव कीचकशतावृता, क्वचिदम्बरश्रीयिव
प्रलपितुम् उन्मत्तवशात् अनर्थकं वक्तुं शीलं यस्याः सा, पक्षे-कोकिलकुलस्य पिकमण्डलस्य कलप्रलापो-ऽस्फुटमञ्जुलध्वनिरस्या अस्तीति सा तादृशी ।
क्वचिदिति । उन्मत्ता उन्मादवातःव्याधियुक्ता स्त्रीव, वायुवेगेन व्याधिरूपपवनबाहुल्येन कृता विहिताः तालशब्दाः करतलध्वनयो यया सा, पक्षे-वायुवेगेन पवनाधिक्येन कृताः तालानां तालतरूणां शब्दाः यस्यां सा तादृशी ।
क्वचिदिति । विगतो विनष्टो धवः पतिर्यस्याः सा सुन्दरीव, उन्मुक्तं स्वामिमरणाद् परित्यक्तं ताल-पत्रं ताटङ्कः कर्णाभरणविशेषो यया सा तादृशी, पक्षे-उन्मुक्तानि युगान्तपवनाधिक्येन पतितानि तालानां तालतरूणां पत्राणि पर्णानि यस्यां सा तादृशी 'पत्रं पलाशं छदनं दलं पर्णं छदः पुमान्' इत्यमरः ।
क्वचिदिति । समरो युद्धं तस्य भूमिः स्थानमिव, शराणां मुञ्जवृन्दानां बाणानाञ्च शतेन समुदायेन निचिता व्याप्ता ।
क्वचिदिति । अमराणां देवानाम् 'अमरा निर्जरा देवा' इत्यमरः, पतिः प्रभुः इन्द्रः तस्य तनुः शरीर-मिव, नेत्राणां लोचनानां तरुमूलानाञ्च यद्वा-जटानां सहस्रं तेन सङ्कुला व्याप्ता । जटांशुकयोर्नेत्रम्' इत्य-मरः, 'नेत्रं मध्यगुणे वस्त्रभेदे मूले द्रुमस्य च' इति मेदिनी ।
क्वचिदिति । नारायणस्य श्रीकृष्णस्य मूर्त्तिः शरीरमिव, तमालं तापिच्छं तद्वच्छीला श्यामवर्णा, पक्षे-तन्नामकवृक्षैः नीला ।
क्वचिदिति । पार्थोऽर्जुनः तस्य रथस्य पताका वैजयन्ती 'पाताका वैजयन्ती स्यात्' इत्यमरः वानरेण हनूमता वानरैः शाखामृगैश्च आक्रान्ता अधिष्ठिता ।
क्वचिदिति । अवनिः पृथ्वी तस्याः पतिः स्वामी राजेत्यर्थः, तस्य द्वारभूमिरिव, वेत्राणि चेतसा लता, यष्ट्यश्च तासां शतं समूहस्तेन द्वारपालहस्तवेत्रयष्टिसमूहेनेत्यर्थः, दुष्प्रवेशा दुःखेन प्रवेष्टुं योग्या अन्य-पक्षेऽपि तुल्यम् ।
क्वचिदिति । विराटस्य मत्स्याधिपतेः नगरी पुरीव, कीचकशतेन स्वप्रियवान्धवकीचकसमूहेन राज-श्यालकेन, पक्षे-कीचकाः सरन्ध्रवेणवः छिद्रेषु वायुप्रवेशेन शब्दायमानवंशगणा इत्यर्थः, तैः आवृता व्याप्ताः 'वेणवः कीचकास्ते स्युर्ये स्वनन्त्यनिलोद्धताः' इत्यमरः ।
क्वचिदिति । अम्बरम् आकाशं तस्य श्रीलक्ष्मीखिव, व्याधेन व्याधरूपधारिणा शिवेन अनुगम्यमानम्
उस दहाड़ से डर कर रोमाञ्चित सी प्रतीत होती थी, कहीं मधु पी-पीकर मतवाली कोयलें मधुर कूक मचाए रहती थीं जिससे वह मदिरा पीकर बड़बड़ानेवाली मतवाली स्त्री के समान प्रतीत होती थी, कहीं वायु के थपेड़ों से ताड़ के पत्ते खड़खड़ाया करते थे जिससे वह बात-बात में तालियाँ पीट-पीट कर ठट्ठा मारने वाली पगली के समान प्रतीत होती थी, कहीं ताड़ वृक्षों के पत्ते टूट-टूटकर गिर पड़े थे जिससे वह कर्णफूल से रहित विधवा के समान प्रतीत होतो थी, कहीं सैकड़ों शरपत्रों (सरकण्डा नाम का पौधा) से भरी होने के कारण वह बाणों से भरी युद्धभूमि के समान दिखाई पड़ती थी, कहीं हजारों नेत्र नाम के वृक्षों के कारण वह हजार नेत्रों वाले भगवान् इन्द्र के शरीर के समान प्रतीत होती थी, कहीं चारों ओर तमाल वृक्षों की घनी नीलिमा के कारण भगवान् नारायण की मूर्ति के समान प्रतीत होती थी, कहीं बन्दरों से भरी होने के कारण बन्दर की छाप लगी अर्जुन के रथ की पताका के समान प्रतीत हो रही थी, कहीं बेंतों की लताओं के कारण उसमें प्रवेश पाना अत्यन्त कठिन था जिससे वह सैकड़ों बेंतधारी द्वार-पालों से घिरी राजमहलों की देहली के समान प्रतीत होती थी, कहीं सैकड़ों बाँसों की झाड़ियाँ लगी हुई थीं जिससे वह कीचकों से भरी विराट् की नगरी के समान प्रतीत होती थी, कहीं घने जंगलों में बहेलिये रूप से चञ्चल नेत्रोंवाले हरिनों का पीछा करते थे
१. कम्प्राक्रान्ता, कप्याक्रान्ता । २. अमरपति । ३. कीचकावृता, कोचकाकुला ।