भारतकोश
कादम्बरी (पूर्वार्ध - चन्द्रकला-विद्योतिनी संस्कृत-हिन्दी टीका)

कादम्बरी (पूर्वार्ध - चन्द्रकला-विद्योतिनी संस्कृत-हिन्दी टीका)

Kadambari (Purvardha) with Sanskrit-Hindi Commentary

बाणभट्ट / पं. कृष्णमोहन शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished709 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 709 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 54

संक्षिप्त-कथासार

कथासरित्सागरीय-मकरन्दिकोपाख्यान

काञ्चनपुरीमें 'सुमना' नामक एक बड़ा प्रतापी राजा राज्य करता था। किसी समय वह अपने दरबारमें बैठा था कि चाण्डालाधिपकी कन्या 'मुक्तालता' एक शुक (तोते) को पिजड़े में रखकर अपने भाई 'वीरप्रभ'के साथ राजा से मिलने आई । द्वारपाल द्वारा अनुमति प्राप्त होने पर मुक्तालताने सभामें उपस्थित हो राजाका अभिवादन कर निवेदन किया—

महाराज ! यह 'शास्त्रगञ्ज' नामका शुक समस्त कलाओं और विद्याओं में निपुण है तथा वेदोंका मार्मिक अभिज्ञ है। आप इसे स्वीकार कीजिए, यों कह कर उसने द्वारपाल को वह शुक दे दिया । द्वारपाल उसे राजा के समीप ले गया । शुकने वहाँ निम्नलिखित श्लोक पढ़ा—

'राजन् ! युष्मदिदं सदैव यदयं देवस्य संधुक्ष्यते धूमश्याममुखो द्विषद्विरहिणीनिःश्वासवातोद्गमैः । एतत्त्वद्भुतमेव यत्परिमवाहाष्पाम्बुपूर्णाक्षैरासां प्रज्वलतीह दिक्षु दशसु प्राज्यः प्रतापानलः॥'

पुनः उसने कहा—'राजन् ! आदेश दीजिए किस शास्त्रका कौनसा प्रमेय कहूँ।'

राजा अत्यन्त आश्चर्यचकित हुआ । मन्त्रीने कहा—'पृथिवीनाथ ! प्रतीत होता है कि पूर्व जन्मके किसी शापवश तिर्यग्योनिमें ये कोई मुनि हैं, तपःप्रभावसे इन्हें पूर्वजन्मके समस्त शास्त्रों का स्मरण है।'

राजाने शुकसे पूछा—तुम्हारा जन्म कहाँ हुआ ? तिर्यग्योनिमें तुम्हें शास्त्रज्ञान कैसे हुआ ? आखिर तुम कौन हो ? अपना पूरा वृत्तान्त सुनाओ ।'

शुककी आँखें डबडबा गयीं। उसने कहा—'महाराज ! यद्यपि मेरी दशा कहनेके योग्य नहीं, तथापि आपका आदेश शिरोधार्य कर कहता हूँ। सुनिए :

'हिमालयके निकट अतिविशाल वृक्ष पर एक शुक अपनी स्त्री के साथ कोटर बनाकर रहता था। मैं उसीका पुत्र हूँ। उत्पन्न होते ही मेरी माता चल बसी। वृद्ध पिता अत्यधिक खिन्न हुए। वे आस-पास रहते वाले शुकों के जूठे फलों को स्वयं खाते और मुझे भी खिलाते। अपने पंखों की ओटमें रख वे मेरा पालन-पोषण करते।

एक समय वहाँ बहुत से शवर (भील) शिकार खेलने आए। दिन भर अनेक पशुपक्षियोंको मारते रहे। सायङ्काल एक वृद्धशबर किसी पशु-पक्षीको न पाकर मेरे वृक्षके समीप आया। पक्षियोंका शब्द सुन कर वह उस पर चढ़ा और शुकों तथा अन्य पक्षियोंको कोटरोंमें से निकल मार-मार कर पृथिवी पर पटकने लगा। उसे समीप आता देख मैं भयभीत हो पिताके पंखोंमें छिप गया । इतनेमें उसने मेरे कोटरमें भी हाथ डाल मेरे पिता को निकाल लिया और उन्हें मारकर पृथिवी पर पटक दिया। पिताके पंखोंमें चिपका मैं भी उनके साथ ही पृथिवी पर गिर पड़ा और पंख से निकल कर वहीं गिरे सूखे पत्तोंमें आत्मरक्षार्थ घुस गया ।

शबर समस्त पक्षियों को मार वृक्ष से नीचे उतरा। वहीं उसने कुछ पक्षियोंको अग्नि में भून खा डाला और शेष पक्षियों को लेकर अपने साथियोंके साथ चला गया ।

उसके चले जाने पर मैं निर्भीक तो अवश्य हो गया किन्तु वह रात्रि अत्यधिक कष्टमें बीती । प्रातः सूर्योदय होने पर प्याससे व्यग्र होनेके कारण अपने पंखोंको फैला मैं समीपवर्ती पद्मसर नामक सरोवरके निकट धीरे-धीरे गया। वहाँ मरीचि मुनि स्नान करने के लिए आए थे। तृषित देख उन्होंने मेरे मुंहमें जल की बूँदें डालीं और मुझे दोनेमें रखकर अपने आश्रम ले गये । वहाँ मुझे देख महर्षि पुलस्त्यजी के मुख पर मुस्कुराहट छा गई। उपस्थित अन्य तपस्वियोंने उनसे पूछा—'भगवन् ! इस शुक को देख आप क्यों मुस्कराये ?'

५ का० भू०

कादम्बरी (पूर्वार्ध - चन्द्रकला-विद्योतिनी संस्कृत-हिन्दी टीका) · पृष्ठ 54, कुल 709 में से · BharatKosha