कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 216, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें२१८ 𑁍 श्रीकालिका पुराण 𑁍 मार्कण्डेय महर्षि ने कहा—सुरों में सबसे बड़े ब्रह्माजी के इस वचन का श्रवण करके भगवान शंकर ने उसी क्षण से जल के ऊपर ही शरभ शरीर को त्याग दिया था। महात्मा शंकर ने त्याग किये हुए उस देह के आठ पद अष्ट मूर्ति के आठों में सेवित किए थे। सबसे आदि में होने वाला दक्षिणपाद शीघ्र ही आकाश को चला गया था। उसके वाम पाद को मिहिर ने सेवित किया था और पीछे दक्षिणज विधि में रहा था। वाम पाद ने ज्वलन का सेवन किया था। पदगत पृष्ठाग्र ने क्षिति का सेवन किया था जो पृष्ठ का अग्र वाम था उसने सलिल का सेवन किया था। इसके पश्चात् वह दक्षिण को गया था। वामपाद ने सर्वतोमुख होता का सेवन किया था। इस प्रकार से उन अष्टमूर्तियों ने उसी क्षण में आठ पादों में उसी भाँति सेवन किया था और अपने-अपने तेज ने पद को प्राप्त किया था। मध्य जो शरभकाय का था वह महात्मा शंकर चण्ड स्वरूप वाला परम दुरापद कपाली भैरव हो गया था। वे अग्नि में मस्तिष्क भेद से युक्त माँस का हवन करते हैं। ब्रह्मकपाल के पात्र में स्थित सुराओं से देव पूजन किया करते हैं। मनुष्य के माँस के बलि देते हैं और सदा रुधिर का पान किया करते हैं। यज्ञ में सुरा से पारण करते हैं तथा कपालोद्भर को धारण करते हैं। व्याघ्रचर्म का परिधान और त्रिवली वृत धारण करते हैं। जो कपाल वृत के धारण करने वाले हैं। उनका कपाली भैरव देव नित्य ही पूज्य हुआ करता है। जो यह श्मशान भैरव है और महाभैरव के नाम वाला है। वह भैरव कैसे स्वरूप वाले हैं, यह भी बतलाते हैं। उनका बालसूर्य के समान प्रकाश होता है, सदा अठारह बाहुओं को विभ्राजमान रहते हैं, उनके नेत्र रक्तवर्ण वाले हैं, वे सर्वदा नायिकाओं के समूहों के साथ नित्य क्रीड़ा किया करते हैं जिनमें काली और प्रचण्डा मुख्य हैं। वे तुरन्त ही दग्ध करके माँस का प्रश्न किया करते हैं। लोहित आहार करने वाले और सदा प्रेत के आसन पर विराजमान रहा करते हैं। उनका मुख स्थूल तथा ओष्ठास्र्व हैं और ह्रस्व स्थल पद के आलय वाले हैं। वे परम विनोद करने वाले तथा लोक में वादन वाले