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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

२१८ 𑁍 श्रीकालिका पुराण 𑁍 मार्कण्डेय महर्षि ने कहा—सुरों में सबसे बड़े ब्रह्माजी के इस वचन का श्रवण करके भगवान शंकर ने उसी क्षण से जल के ऊपर ही शरभ शरीर को त्याग दिया था। महात्मा शंकर ने त्याग किये हुए उस देह के आठ पद अष्ट मूर्ति के आठों में सेवित किए थे। सबसे आदि में होने वाला दक्षिणपाद शीघ्र ही आकाश को चला गया था। उसके वाम पाद को मिहिर ने सेवित किया था और पीछे दक्षिणज विधि में रहा था। वाम पाद ने ज्वलन का सेवन किया था। पदगत पृष्ठाग्र ने क्षिति का सेवन किया था जो पृष्ठ का अग्र वाम था उसने सलिल का सेवन किया था। इसके पश्चात् वह दक्षिण को गया था। वामपाद ने सर्वतोमुख होता का सेवन किया था। इस प्रकार से उन अष्टमूर्तियों ने उसी क्षण में आठ पादों में उसी भाँति सेवन किया था और अपने-अपने तेज ने पद को प्राप्त किया था। मध्य जो शरभकाय का था वह महात्मा शंकर चण्ड स्वरूप वाला परम दुरापद कपाली भैरव हो गया था। वे अग्नि में मस्तिष्क भेद से युक्त माँस का हवन करते हैं। ब्रह्मकपाल के पात्र में स्थित सुराओं से देव पूजन किया करते हैं। मनुष्य के माँस के बलि देते हैं और सदा रुधिर का पान किया करते हैं। यज्ञ में सुरा से पारण करते हैं तथा कपालोद्भर को धारण करते हैं। व्याघ्रचर्म का परिधान और त्रिवली वृत धारण करते हैं। जो कपाल वृत के धारण करने वाले हैं। उनका कपाली भैरव देव नित्य ही पूज्य हुआ करता है। जो यह श्मशान भैरव है और महाभैरव के नाम वाला है। वह भैरव कैसे स्वरूप वाले हैं, यह भी बतलाते हैं। उनका बालसूर्य के समान प्रकाश होता है, सदा अठारह बाहुओं को विभ्राजमान रहते हैं, उनके नेत्र रक्तवर्ण वाले हैं, वे सर्वदा नायिकाओं के समूहों के साथ नित्य क्रीड़ा किया करते हैं जिनमें काली और प्रचण्डा मुख्य हैं। वे तुरन्त ही दग्ध करके माँस का प्रश्न किया करते हैं। लोहित आहार करने वाले और सदा प्रेत के आसन पर विराजमान रहा करते हैं। उनका मुख स्थूल तथा ओष्ठास्र्व हैं और ह्रस्व स्थल पद के आलय वाले हैं। वे परम विनोद करने वाले तथा लोक में वादन वाले

௬ श्रीकालिका पुराण ௬ २१९ और अट्टहास से युक्त भैरव हुआ करते हैं और वे महादेव इस प्रकार से भैरव के स्वरूप को धारण करने वाले हैं । महान् भुजाओं वाले वे मध्य शरम्भ काय के द्वारा काम को धारण करते थे । वह देव फिर हर के प्रथमों की ओर गये थे । वह भैरव अपने गणों के साथ आकाश में क्रीड़ा किया करते हैं ।

कामाख्या देवी वर्णन

मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- वह श्रीमान् राजा नरक जो चिरंजीवी और महान् भुजाओं वाला था । मानुष भाव से ही चिरकाल पर्यन्त राज्य किया था । त्रेता युग के व्यतीत हो जाने पर द्वापर के शेष में शोणितपुर में वाण नाम वाला महान् असुर हुआ करता था । उसका अग्नि दुर्ग नगर तथा और वह बलवान् शम्भु का सखा था । उसकी एक सहस्त्र बाहु थीं और वह बहुत दुर्धर्ष था तथा राजा बलि का प्रिय पुत्र था । उसकी नरक के साथ बड़ी मित्रता हो गई थी । नित्य ही गमन और आगमन से तथा परस्पर अनुग्रह से उन दोनों में पवन और अनल की भाँति महती प्रीति हो गई थी । उस बाण ने जगत के प्रभु भगवान् शम्भु की समाराधना की थी और वह बिना भय वाला होकर असुर भाव से विचरण किया करता था । हे द्विजो! वह फिर ब्राह्मणों का पूजन नहीं करता था जैसे कि पहले भी नहीं किया करता था और वह यज्ञों और दान देने में भी पूर्व भी भाँति प्रसन्न नहीं होता था । पूर्व की तरह भगवान् विष्णु के समीप गमन नहीं किया करता था और वह पृथ्वी का भी अर्चन नहीं करता था । उस अवसर पर कामाख्या में उस भाँति की भक्ति उसकी नहीं हुई थी । इस बीच में विधाता के पुत्र मुनियों में श्रेष्ठ वसिष्ठ कामाख्या का दर्शन करने के लिए प्राग्ज्योतिष पुर में गये थे । दुर्ग के अन्दर व्यवस्थित उस नीलकूट देवी का दर्शन करने के लिए जाने को वसिष्ठ मुनि को नरक की निन्दा करते हुए कठोर वचन बोले । वसिष्ठ मुनि ने कहा- कैसे पृथ्वी का पुत्र और वराह का सुत अचानक ही ब्राह्मण

[Header] २२० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ को देवी के दर्शन करने के लिए स्वागत नहीं करता है। हे धरा के पुत्र! तेरे कुल में उचित कर्म क्या है ? जिसको तू कर रहा है । प्राग्ज्योतिष पुर में जाकर मैं देवी का पूजन करूँगा । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके उपरान्त उस मुनि ने कुपित होकर राजा नरक को शाप दिया था। वशिष्ठ मुनि ने कहा-हे वराह के कुल को कलंकित करने वाले! हे पापी! जिससे अभी उत्पन्न हुआ है। उसी मानुष रूप से मारण को प्राप्त होगा। तेरे मृत हो जाने पर जगतों की प्रभु महादेवी कामाख्या को मैं पूजित करूँगा। हे पापी! तुम यहाँ स्थित रहो मैं अपने निवास स्थान को चला जाऊँगा। हे पापी! जब तक जीवित रहेगा तब तक जगत् की स्वामिनी यह कामाख्या देवी भी सब परिकरों के साथ अन्तर्धान हो जावे । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-वह ब्रह्माजी के पुत्र मुनि इतना कहकर अपने स्थान को चले गये थे। उस भूमि के पुत्र के द्वारा निरस्त किए हुए मुनि वसिष्ठ बहुत ही अधिक कुपित हो गये थे। वसिष्ठ मुनि के चले जाने पर नरक शीघ्र ही विस्मय से संयुक्त होकर नीलकूट महान् गिरि पर देवी के भवन में चला गया था। वहाँ जाकर उसने कामरूप वाली कामाख्या देवी को नहीं देखा था। उसके योनिमण्डल को और सब परिकारों को भी नहीं देखा था। इसके उपरान्त वह बहुत ही उदार हो गया था और माता पृथ्वी का उसने स्मरण किया था। नरक ने अविनाशी जगत् के नाथ प्रभु पिता का भी स्मरण किया था। हे द्विजो! उस समय वे दोनों ही उसके सामने प्रत्यक्ष रूप से प्रकट नहीं हुए क्योंकि वह समय का व्युत्क्रमण करने वाले और शम्भु के लिए नीति से विहीन हो गया था। उस समय वज्रध्वज वह विष्णु भगवान् और पृथ्वी को न प्राप्त करने वाला होकर शोक से युक्त हो अपने घर में चला गया था। अपने घर को जाते हुए भूमि के पुत्र ने अपनी पुरी को देखा था जो अपनी पूर्व की श्री से परित्यक्त थी और मलिन वनिता के ही समान हो रही थी। उस देवी के अन्तर्धान हो जाने पर उस पुर को उसने वेद-वाद से रहित और पवित्र दाराजनों के स्वल्प रह जाने वाला ही पाया था। वहाँ पर न तो देवगण जाते हैं और न

൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ २२१ प्रिय तथा महर्षि गण की जाया करते हैं। उसका नगर बहुत ही कम यज्ञों की क्रिया तथा उत्सवों वाला हो गया था। बहुत सी ईतियाँ उस समय हो गई थीं (विनाश करने वाली ६ प्रकार की ईतियाँ होती हैं) और बहुत से जन मर गये थे। उस समय में लौहित्य नदों का राजा भी बहुत कम जल वाला हो गया। उस समय बहुत से विपरीत होने वाले कार्यों को देखकर वह नरक ब्राह्मण के पुत्र के शाप से आपने आप का मरण भी आया हुआ मानने लगा था। इसके अनन्तर प्राग्ज्योतिष नगर का स्वामी नरक शोक से विह्वल चेतना वाला होकर मन से चिन्तन करता हुआ बलि के पुत्र अपने मित्र बाण के समीप में चला गया था। वह इसको प्राणों के समान रखा था। ये दोनों निरन्तर परस्पर एक दूसरे की रक्षा करने में तत्पर रहा करते थे। ये दोनों बाण और नरक स्वर्ग के वैद्य अश्विनी कुमारों के ही सदृश थे। इसी बीच शम्भु का सखा बलवान् मित्र बाण महान् बुध था और मन्त्र प्रदान के द्वारा अनुकूल रहने वाला था। इस वज्रकेतु की उस समय से ऐसी अचल मति हुई थी। उसने बाण ने नरक की ओर दीप्ति दूत को प्रेषित किया था। वह शीघ्र गमन करने वाले रथ का वृन्तात शीघ्र ही बाण के लिए निवेदन कर दिया था। जिस प्रकार से वसिष्ठ मुनि ने शाप दिया था और जैसे अम्बिका अन्तर्धान हो गई थी और जैसे प्राग्ज्योतिष नाम वाले पुर में विघ्न उत्पन्न हो गया था। भूमि और माधव का समय जिस तरह से व्यतिक्रान्त हुआ था अर्थात् समय का अतिक्रमण दिया गया था-यह सब भूमिपुत्र के उस दूत ने बलि के पुत्र बाण से कह दिया था। उसके समान आकार वाले मित्र का यह पराभव जो दैव के ही द्वारा हुआ था उसे भली भाँति जानकर वह ईश्वर नरक को समझने अर्थात् सान्त्वना देने के लिए वहाँ स्वयं ही गया। वह सुवर्ण से रचित विचित्र अंगों वाले, तीन सौ अश्वों से युक्त, लोहे के पहियों वाले, व्याघ्र, मधुर ध्वज से भूषित, सुवर्ण के दण्ड वाले सितछत्र से समाच्छादित, किंकिणी गणों से समन्वित, अनेक रत्नों से समूह से

२२२ ॐ श्रीकालिका पुराणे ॐ निर्मित महान् रथ पर वह समारूढ़ हुआ था। वह एक सहस्त्र भुजाओं वाला-श्रीमान् चतुरंगिणी सेनाओं से युक्त होकर भौम (नरक) के पुर प्राग्ज्योतिष में शीघ्र आ पहुँचा। उसके समीप पहुँचकर महाबाहु बाण ने प्राग्ज्योतिष में शीघ्र आ पहुँचा। उसके समीप पहुँचकर महाबाहु बाण ने प्राग्ज्योतिष नगर के स्वामी को पूर्व श्री से हीन मित्र को और उस नगर को देखा था। पृथ्वी के सुत द्वारा यथा उचित रीति से वह पूजित किया गया था अर्थात् उसका समुचित सत्कार किया था। और उसने पूछा था कि किस कारण से तुम्हारा यह पुर श्रीहीन हो गया था। बाण ने कहा-आपका यह शरीर भी जैसा पहले था वैसा शोभित नहीं हो रहा था। आपका मन भी पहले के समान प्रसन्न नहीं है-इसमें क्या कारण है, वही मुझे कृपा कर बतलाइये।

नरकासुर उपाख्यान

मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस प्रकार से बहुत से प्रश्न पूछे गये। भूमि के पुत्र उस नरक को जिस तरह से वशिष्ठ मुनि ने शाप दिया था वह सभी उसको कह दिया था। भूमि के पुत्र से जो भी सुना था वह पहले ही दूत के द्वारा आवेदित था। भूमि के पुत्र से जो भी सुना था वह उस वज्रध्वज से पुनः बोला। वाण ने कहा-आपको क्रोध नहीं करना चाहिए। शरीरधारियों को सुख और दुःख चक्र की ही भाँति परिवर्तित हुआ करते हैं अर्थात् सुख के बाद दुःख से कोई भी हीन हुआ करता है। परन्तु धीर पुरुषों को विभूति के लिए उसमें प्रतिकार करना ही चाहिए। आपको भी अब उसका प्रतिकार करना योग्य हे अर्थात् आपको भी प्रतिकार करना ही चाहिए। पृथ्वी में यह मनुष्य असाधारण विभूतियों से वर्धित होता है। ऐसा सभी को होता है चाहे कोई दानव हो दैत्य हो अथवा असुर हो, राक्षस हो अथवा किन्नर हो। इन्द्र भी उसको सहन नहीं किया करता है और जिस किसी भी प्रकार से उसकी श्री को भ्रष्ट करके उसे विनष्ट कर दिया करता है। उसके परम इष्टतम देव सनातन विष्णु भगवान् हैं। वे इन्द्र का थोड़ा सा भी अनिष्ट कभी नहीं किया करते हैं।

इन्द्र का अनिष्ट करने वाला जो कोई भगवान् विष्णु की समाराधना किया करता है उसको सच्छिद्र वरदान देकर उसका विनाश करते हैं। चिरकाल आराधना किए हुए भगवान् विष्णु अभीष्ट काम प्रदान करते हैं और शरीर से कष्ट सहकर पूजा करने पर वे परम प्रसन्न हो जाया करते हैं। इष्ट देवता की भी पूजा के बिना कौन पुरुष अतुल विभूति को प्राप्त किया करता है अर्थात् कोई भी नहीं। पुराने समय में ऐसा कहीं भी कोई पुरुष नहीं सुना गया है। तुमने पूर्व में ब्रह्मा अथवा भगवान् विष्णु की आराधना नहीं की है। इसी कारण तुमको आप ही विघ्न समुत्पन्न हुए हैं। भगवान् विष्णु जो स्वभाव से ही अनुकम्पा करने वाले हैं तुम्हारे पालन करने वाले नहीं हो रहे हैं किन्तु तुमने पृथिवी के कथन से पुनः उनकी आराधना की थी। आपको द्विजों का अपराध नहीं करना चाहिए अन्यथा इससे आप हतश्री हो जायेंगे- ऐसा हमने सुना हैं। आपने परम श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनि का अपराध किया है। हे भूप! इसीलिए उस स्मरण मात्र से पृथिवी और विष्णु नहीं पधारे। हे मित्र! इस कारण से आप भगवान् की बुद्धि की कुटिलता को समझ लीजिए। हे भौम! इस समय आपकी उदासीन आकृति का होना ठीक नहीं। जो तुम्हारे मन में यह है कि यह मेरे तात हैं ऐसा विश्वास है तो दूसरे लोक में चले गये हैं क्योंकि वाराह ही आपके पिता थे। वह चले गये हैं। वाराह भी हरि भगवान् का ही अंश है जिनका आप सेवन किया करते हैं। शम्भु भगवान् के प्रसन्न होने पर ये सभी शीघ्र ही क्षय को प्राप्त हो जायेंगे। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-उस समय बाण के वचन से नरक को पूर्ण विश्वास हो गया था। वह बहुत ही प्रसन्न होकर धीरता से घर्घर ध्वनि करता हुआ यह वचन बोला। भौम ने कहा-हे मित्रों पर प्यार करने वाले! जो भी अपने कहा है वह मेरा हितकर है अर्थात् भलाई करने वाला है। अब मैं तुरन्त ही उत्तम तपश्चर्या करूँगा। मुझे भगवान् विष्णु की आराधना नहीं करनी चाहिए क्योंकि उसमें हेतु बतला दिया है। उसी भाँति शम्भु भगवान की भी आराधना नहीं करनी चाहिए क्योंकि वे मेरे पुर में अन्तर्गुप्त हैं।

इस कारण ब्रह्माजी की ही आराधना करनी चाहिए ऐसा ही हे मित्र! आपका भी कथन है। हे महाबाहो! उनके पुत्र लौहित्य के जल की सन्निधि में आपके द्वारा में अध्यापति किया गया हूँ जिस तरह से गुरु के द्वारा शिष्य को पढ़ाया जाता है। हे धीर! जैसे मित्र को मित्र परम वाल्गु साम से किया करता है। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इतना बाण से कहा-इतना बाण से कहकर महाबाहु वज्रध्वज ने यथावत उस मित्र की पूजा की क्योंकि वह मित्रों पर प्यार करने वाला था। क्षिति की पूजा की क्योंकि वह मित्रों पर प्यार करने वाला था। क्षिति के पुत्र नरक ने यथोचित् रूप से अर्चन करके और बलि के पुत्र को विदा करके अत्यन्त उग्र रूप से ब्रह्माजी की आराधना करने की इच्छा की थी। वह महात्मा लौहित्य के तट पर जो कि नदों का राजा था ब्रह्माचल पर स्थित होकर तप श्रर्या करने के लिए उपस्थित हो गया। उस क्षिति के पुत्र ने मनुष्यों के मान से सौ वर्ष तक जन के आहार के व्रत से पितामह की अर्चना की थी। लोकों के पितामह सौ वर्ष तक तप करने के अन्त में परम सन्तुष्ट हुए थे और प्रत्यक्ष नरक के सामने समुपस्थित हो गये। हे सुव्रत! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। मैं तुमको वरदान दूँगा। जो भी चाहो वर माँग लो। उन भगवान् कमलासन ने इस अवसर पर नरक से कहा था। उस नरक से समस्त लोकों के स्वामी कमलासन प्रभु का प्रत्यक्ष दर्शन करके उसने उनको प्रणाम किया था और फिर दोनों को कर जोड़ विनय से अवनत कन्धरा को करके बोला हे सुरश्रेष्ठ! आप मुझे एक वरदान यह दीजिए कि मैं देवों असुरों से-राक्षसों से और सभी देव योनियों में अवध्य होऊँ अर्थात् वध होने के योग्य न रहूँ। मेरी सन्तति भी विच्छिन्न न होवे और वह तब तक रहे जब तक ये चन्द्र दिवाकर रहें। हे लोकेश्वर! तभी तक मेरी सन्तति कायम बनी रहे-यही मेरा दूसरा वरदान है। तिलोत्तमा आदि जो देवियाँ सुन्दर रूप और गुणों से समन्वित हैं वे-वे सब सोलह सहस्त्र मेरी दयिता हो जावें। मुझे अजेयत्य की प्राप्ति होवे अर्थात् मैं किसी विजित न होऊँ और श्री मुझको कभी भी परित्याग न

६०८३ श्रीकालिका पुराण ६०८३ २२५ करें। हे पितामह! ये मेरे पाँच वर हैं जो आपसे मैंने आज वरण करने की इच्छा प्रकट ही है। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- वह नरक माया से मोहित हो गया था और मुनि के शाप को विस्मृत कर दिया था। मुनि का शाप उसी भाँति स्थित था। उसने अन्य वरदानों की याचना की थी। पितामह ने 'ऐसा ही होवे'- ऐसी रीति से उन सब वरों को देकर यह कहा था-द्वापर के अन्त में सन्ध्या में तिलोत्तमा आदि सुर कन्याएं भूतल में तेरी पत्नियाँ होंगी। हे वृषध्वज! जब तक देवर्षि नारद तेरे पुर में नहीं जाते हैं। हे क्षिति के पुत्र! तब तक आपको उनके साथ मैथुन कर्म नहीं करना चाहिए। इतना ही कहकर सब लोकों के ईश एक ही क्षण में अन्तर्धान हो गये थे। नरक भी परम प्रसन्नता की प्राप्ति करके अपने स्थान को गया। इसके अनन्तर वह उस प्रसन्न लोगों वाले नगर को चला गया था। वह नगर श्री से निषेवित था और सदा ही उत्साह से परिपूर्ण था तथा ईतियों के विघ्नों से रहित था। वह नगर देवराज की दयिता अमरावती ही के समान पशुओं के समुदायों से ओर अश्व-गज कुम्भकों से परिपूर्ण हो गया था। बाण ने नरक को उत्तीर्ण तप वाला तथा दिये हुए वरों वाला श्रवण करके उस समय में वह वज्रध्वज के समीप में पुनःस्वयं समुपस्थित हो गया था। उस बाण ने नरक के प्राग्ज्योतिष नामक नगर में गमन करके फिर अपने मित्र नरक से तपश्चर्या का हाल पूछा। आपने तप कहाँ किया था अथवा आपने किन व्रतों को किया था। आपने किस प्रकार का वर प्राप्त किया था यह सभी आप मुझ से कहने के योग्य हैं। अब मैंने आपके पुर को सम्पूर्ण रूप से प्रसन्न जनों से संकुल देखा है। अश्व, गज और रत्नों के समूहों से तथा मंगल ध्वनियों से भरा है। आज आपके द्वारा पालन के योग्य प्रजा एवं भूमि शस्त्रों से परिपूर्ण और रोगरहित देखी जा रही है। आप बतलाइए ब्रह्माजी ने कैसे आपको वरदान दिया था ? नरक ने कहा-पर्वत के रूप को धारण करने वाले ब्रह्माजी स्वयं कामेश्वरी को धारण करने के लिए यहाँ पर अवतीर्ण हुए

२२६ ६०८ श्रीकालिका पुराण ६०८ थे। वहीं पर मैं अकेला जल के बाहर करने वाला सौ वर्ष तक तपस्या करने वाला रहा। लौहित्य का तट प्राण वायु से सेवित था वह परम मनोहर था और प्राणियों को सुख प्रदान करने वाला था। वहीं पर तपस्या करने में प्रवृत्त हुए मुझे सुखपूर्वक सौ वर्ष एक वर्ष की ही भाँति समागम हुए थे। इनके उपरान्त ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये थे और प्रत्यक्ष होकर उन्होंने मेरे हित के वचन कहे। उन्होंने मेरे सामने होकर मुझ से कहा था-मैं तुझ पर प्रसन्न हो गया हूँ और जो भी तुझे अभीष्ट होगा वही पर तुझको दूँगा-तुम मुझसे वर ग्रहण कर लो। मैंने उनसे पाँच वरदानों की याचना की थी-सुर योनि से मेरी अवध्यता होवे, मेरी सन्तति कभी भी छिन्न न होवे, अजेयता मुझे प्राप्त रहे, विभूति सदा ही बनी रहे और कभी भी तेरा परित्याग न करे और परम श्रेष्ठ नवयौवन से समन्वित मेरी नारियाँ होवे, यही पाँच वरदान मैंने माँगे थे। उन्होंने भी सभी वरदानों को प्रतिश्रुत किया था और फिर वे अपने स्थान को चले गए थे। इसके उपरान्त मैं प्रसन्नता से अपने नगर में प्राप्त हो गया था। फिर मैंने मन्त्रियों में श्रेष्ठों के सहित पुनः उन नगर निवासियों को गणों के सहित दान और भोजन के द्वारा प्रसन्न किया था। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस तरह उसके वचन श्रवण करके बलि का पुत्र उस क्षण प्रसन्न नहीं हुआ और उस समय उसने भूमि के पुत्र से यह वचन कहा था वह वचन उस काल के युक्त था। बाण ने कहा-हे मित्र! उस समय विधाता के आगे आपकी बुद्धि मुनि ने शाप का अतिक्रमण करने की नहीं हुई थी। यहाँ पर आपका कल्याण कैसे होगा। हे भूमिपुत्र! जो होनहार है वह नित्य ही अवश्यम्भावी है। दैव से अधिष्ठित कर्म का कारण नहीं है। जो होनहार है वह अवश्य ही होगी, उसमें ब्रह्मा भी बाधक नहीं हो सकते। इस कारण आप बहुत महान् वीर असुरों को सन्धि करके उन्हें आगे करो और मन्त्रियों के पदों पर उनको नियुक्त करो। जो देवों को भी दुरापद हों ऐसे वीरों को द्वार पर संस्थापित करो। आप यदि वरदान

६००४ श्रीकालिका पुराण ६००४ २२७ प्राप्त किए हुए हैं तो देवेश्वर का भी अतिक्रमण करो । विधाता ने जो वर दिया है आपके लिए वह परीक्षण है । अपुत्र आपो जाया में आत्मजा को जन्म दो । इतना कहकर वाण पूजित होकर वहाँ से चला गया । नरक ने भी अपने मित्र द्वारा कहे वचनों के अनुसार ही कार्य करना आरम्भ किया । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- काल के सम्प्राप्त होने पर भूमि के पुत्र भगदत्त, महाशीर्ष, मदवन्त और सुमाली इन चार पुत्रों को समुत्पन्न किया था जो कि महान सत्व वाले, महान वीर्य, पराक्रम वाले और अन्य वीरों के द्वारा दुरासद थे । इसके अनन्तर वाण के वचन के अनुसार हयग्रीव तथा मुरु को बुलाकर उसके साथ सन्धि करके अपनी सेना के अधिपत्य पदों पर अभिषिक्त कर दिया था । भौम के द्वारा नियुक्त किए हुए मुरु और हयग्रीव को सुनकर उस समय में जो-जो भी भूमि पर असुर थे वे भी सब संगत हो गये । नरक के द्वारा समागत मुरु और हयग्रीव को सुनकर सेना के सहित निसुन्द और नाम वाले तथा दैत्य विरूपाक्ष उस समय में ये सभी समागत हो गये थे इसके अनन्तर उस नरक ने सेना के साथ पश्चिम द्वार पर मुरु को द्वार पर नियुक्त किया । पूर्व द्वार पर निसुन्द को और विरूपाक्ष को दक्षिण द्वार पर नियुक्त किया । मध्य में पंचजन सुन्द को सेनापति के पद पर नियुक्त किया था । मुरु, क्षुरान्त और पाशों को छः सहस्रों को योजित किया था । द्वार पर भूमि पुत्र के द्वारा पुर की रक्षा के लिए इनका सत्कार किया गया । इस प्रकार से जो पूर्व में थे तथा उससे भी पहले थे उन अच्छे मन्त्रियों को हटा दिया था । वह असुर निरन्तर असुरों ही साथ से परम प्रसन्न हुआ था । उस भूमि के पुत्र ने पूर्व में ग्रहण किए हुए भाव का परित्याग कर दिया था । वह असुर भाव प्राप्त कर देवों को बाधा दिया करता था । वह न तो देवों को, न मुनियों को और न किन्हीं की सेवा किया करता था । सुरेश्वर को शीघ्र ही उसने हयग्रीव की सहायता से जीत लिया । इस प्रकार से वह आसुर भाव को बढ़ाता हुआ ही पृथ्वी पर विचरण

किया करता था। वाण के वचन से यह हयग्रीव की सहायता से देवों के स्वामी इन्द्र को बाधा देता था और मुनियों को भी बाधा दिया करता था। देवेश को तीन प्रकार से जीतकर अदिति के दो कुण्डलों को जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं भूमि के पुत्र नरक ने मुनि के शाप से निर्भीत होकर उन कुण्डलों का हरण कर लिया था। इस तरह से देवी को, मुनियों को और विप्रों को बाधा करता हुआ उस भूमि के पुत्र ने पाँच सहस्त्र वर्ष तक प्राग्ज्योतिष में राज्य का शासन किया था। इसी बीच में महान् भार से पीड़ित हुई पृथ्वी देवी ब्रह्मा-विष्णु प्रमुख देवों की शरणागति में अपनी रक्षा के लिए गई थी। वहाँ पृथ्वी ने ब्रह्माजी और विष्णुजी को प्रणाम करके यह कहा-दानव, राक्षस और दैत्य जो हरि के द्वारा सूदित कर दिए गये थे वे सब राजाओं के मन्दिर में इस समय में बल से गर्वित होकर समुत्पन्न हो गये। उनका अधिक भार है कि उसको सहन और वहन करने में समर्थ नहीं हूँ उनकी संख्या इतनी अधिक है कि मैं उन सबकी संख्या बतलाने में भी असमर्थ हूँ और मुझे उत्साह नहीं होता है कि मैं बतलाऊँ। उनमें मुख्य महान् बल वाले आठ सौ सहस्त्र हैं। उनमें भी अत्यधिक बल है। मैं इस समय में उनका भार वहन करने में असमर्थ हूँ। वाण-बलि का पुत्र वीर कंस, धेनुक अरिष्ट, प्रलम्ब, सुनामा, मुरु, शल, मल्ल, चारण और मुष्टिक महान् बलशाली जरासन्ध, नरक, हयग्रीव, निसुन्द और सुन्द हैं। विरुपाक्ष, पाञ्चजन्य, हिडम्ब, बक, बल, जटासुर, किर्मीर, मनायुध, अलम्बुष, सौमाख्या, जरासन्ध, बानर, द्विविद, श्रुतायुध, महादैत्य शतायुध, ऋष्य, शृंग सुत, सुबाहु, अति बाहुक, कालकस्य हिरण्य पुरवासी दैत्य इन सबके पदों के क्षोभो से मैं दिनों दिन विशीर्ण हो रही हूँ। हे सुरोत्तमो! मैं लोकों का वहन करने में असमर्थ हो रही हूँ। आप इनका विनाश करिए। यदि सुरश्रेष्ठ मेरी रक्षा नहीं करोगे तो मैं परमाधिक विशीर्ण होकर इस समय अवश होकर पाताल चली जाऊँगी। इसके अनन्तर ब्रह्मा, भगवान् विष्णु और महेश्वर ने उनके वचन का श्रवण करके कि पृथ्वी के भार का विमोचन हम करेंगे ऐसा

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २२९ कहा था। पृथ्वी देवी को विदा करके सभी देवगण सनातन माधव को भूमि के भार के उतारने के विषय में विचार करने लगे। प्रभु ने परम प्रसन्न होकर समस्त सुरों से कहा कि वे सब भूमि भार को उतारने के लिए अपने-अपने अंशों से अवतरित होवें। इतना कहकर प्रभु स्वयं भी यहाँ पर भार के अवतारण में देवकी के गर्भ में अवतीर्ण हुए थे। स्वयं भगवान् विष्णु को अवतीर्ण जानकर, जो कि सनातन हैं, उन देवगणों ने रम्भा और तिलोत्तमा आदि देवियों को उत्पादित कर दिया था। वे सब परम श्रेष्ठ नारियाँ हिमालय के पृष्ठ भाग पर क्रीड़ा करने वाली थीं। उनको भूमि के पुत्र नरक ने देखा था और बलपूर्वक उसने हरण कर लिया। उस नरक ने उन सबको घर्षित किया था और अपने प्राग्ज्योतिष नरक में उन सबको ले आया था। नरक ने मैथुन के समय उनसे प्रार्थना की थी। उन्होंने कहा हे भौम! जब तक देवर्षि नारद तेरे नगर की ओर आते हैं तब तक आप हमारी रक्षा करें और मैथुन के प्रति हमको छोड़ देवें। वे शीघ्र ही हमारी प्रात अनुग्रह करके हे वीर! आपके समीप में आयेंगे। उनके द्वारा देखी गयीं हम सब तुम्हारे साथ संगम करने के लिए आ जायेंगी। उनके द्वारा इस प्रकार से प्रार्थना किए जाने पर नरक ने उस अवसर पर ब्रह्माजी के वाक्य का स्मरण करके 'ऐसा ही होवे' -यह उसने कहा था। इसी बीच में लोकों की रक्षा करने वाले भगवान् देवकी के गर्भ से समुत्पन्न हुए थे और नन्द के घर में पालित होकर बड़े हुए। उन प्रभु ने कंस, केशी और प्रलंब आदि अनेक दैत्यों को मार कर जल से अन्दर सागर में बसी हुई द्वारका पुरी में निवास किया। वहाँ पर उन्होंने अपने धर्म से आठ कन्याओं को स्वीकार किया था। उनमें मानवी के रूप वाली कालिन्दी थी वह रमणी, नग्नजित् की पुत्री थी। सत्या, चारुहास वाली लक्ष्मणा, परम सुशील और शील से सम्पन्न सती जाम्बवती थी। बलदेव के मित्र को इन नारियों में अनुराग करते छत्तीस वर्ष व्यतीत हो गये। हे द्विज श्रेष्ठो! उसके महान् बल वाले इस प्रकार से प्रद्युम्न, साम्ब जिनमें प्रमुख थे ऐसे पुत्र समुत्पन्न हुए थे जो शास्त्र में और शस्त्र विद्या में परम पण्डित थे।

२३० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ उस समय जो भूमि के भार स्वरूप थे ऐसे अनेक दैत्यों को निहत कर दिया। फिर परम प्रसन्न होकर क्रीड़ा करते हुए उन्होंने द्वारका में निवास किया था। इसके अनन्तर उत्पीड़ित होकर वहाँ पर आये और द्वारका में भगवान् के दर्शन के लिए ही उपस्थित हुए। वहाँ लोकों के द्वारा वन्दित प्रभु कृष्ण का स्मरण करके उनके द्वारा पूजित होते हुए वह सुवर्ण के आसन पर विराजमान हो गये। इन्द्रदेव ने भगवान् हरि के लिए नरक का जो विकेष्टि था वह सब कह दिया था। जो पूर्व में हुआ था और उस समय में हो रहा है वह सभी इन्द्र ने निवेदन कर दिया था। हे महाबाहू! हे श्रीकृष्ण! जिस प्रयोजन के लिए मैं यहाँ आया हूँ उसका आप श्रवण कीजिए। मैं वह सभी कुछ निवेदन करूँगा। उसमें आप कुछ भी शंका न करिये। एक भूमि का पुत्र नरक नाम वाला असुर है जो सुरों का मर्दन करने वाला है। वह चिरंजीवी है और पहले भगवान् विष्णु और क्षिति के द्वारा पालित हुआ है। इस समय में क्षिति और भगवान् विष्णु की अवज्ञा करके वाण के वचन से उसने तप के द्वारा ब्रह्माजी को परितुष्ट कर लिया है। ब्रह्माजी से वरदानों को प्राप्त करके वह अत्यन्त घमण्डी हो गया है। वह इस समय ऐसा दर्पित हो गया है कि न तो उसने माधव का और न पृथ्वी का कभी स्मरण किया है। पूर्व में वह धर्मात्मा था, सुरों की अराधना की थी और वह व्रतधारी था किन्तु इस समय वह असुर भाव का आश्रय लेकर सबको बाधा दिया करता है। अदिति के अमृत से समुद्भूत दोनों कुण्डलों को मोह से उसने हरण कर लिया और देवगणों और ऋषियों को बाधा देता हुआ विप्रों के अप्रिय कर्म में वह रत रहता है। कामगामी, दुरासद वह मुझको भी नित्य बाधा देता है। वह सुरों और दैत्यों का जीतने वाला है तथा कोई भी देहधारी उसका वध करने में समर्थ नहीं है। आपका भी वह अन्तर पेक्षी है, उस पापी का भूमि की रक्षा के लिए वध कीजिए। सब देवगणों ने आपके लिए देवों और गन्धर्वों की कन्यायें पहले मुख्य पर्वत पर हिमालय में अवतारित की थीं। ये सोलह सहस्र हैं। वरदान के घमण्ड से भरे हुए

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २३१ पापी उसने वे सभी कन्याएँ बलपूर्वक हरण कर ली हैं। वह दुराधर्ष हैं और हयग्रीव की सहायता वाला है। सागर में भी असुरों तथा मनुष्यों का प्रमथन करके उसने लौहित्य तीर्थ के तट पर मणि पर्वत बनाया है उस पर्वत में अलका नाम वाली रम्यपुरी की रचना करके देवों और गन्धर्वों की नारियों को उसने बसाया है। वे सब एक वेणी को धारण करने वाली हैं और सम्भोग से वर्जित हैं। वे सब आपकी ही प्रतीक्षा कर रही हैं। हे कृष्ण! आप उन सबको सनाथ करें। जब तक आपके पुर में नारद मुनि आगमन करें। हे भौम! तब तक उसके साथ मैथुन करने का तुम प्रयत्न नहीं करोगे। यही दुरात्मा नरक के साथ उनकी शर्त थी। जिस समय नारद मुनि प्राग्ज्योतिष पर पहुँचे उसी समय आप नरक के हनन करने के लिए गमन करेंगे। इस कारण से उस पाप कर्म करने वाले नरक के ही सदृश नरक को मार दीजिए क्योंकि वह बहुत दुरासद है और देवों तथा मनुष्यों का कण्टक है। उसके वध कर देने से देवी पृथिवी पुत्र के शोक को प्राप्त होगी क्योंकि उसने स्वयं ही उसके वध करने के लिए देवताओं से प्रार्थना की थी। इस कारण से उस महान् पापी पुरुष नरक का वध करिए। उसका हनन करके स्त्री रत्नों को तथा अन्य रत्नों का उद्धार कीजिए। महान् आत्मा वाले इन्द्र के द्वारा इस प्रकार से जगतों के नाथ से कहा गया तो उन्होंने पृथिवी के पुत्र नरक के हनन करने के लिए प्रतिज्ञा की और उसी समय मार देने का वचन दिया था। इन्द्र के साथ भगवान् केशव ने उसके वध करने की प्रतिज्ञा कर उसी समय प्राग्ज्योतिष पुर की ओर यात्रा कर दी थी। भगवान् कृष्ण ने गरुड़ पर समारोहण किया था और उनके साथ दूसरी सत्यभामा भी थी। वे प्राग्ज्योतिष की ओर मुख करके चले गये थे और इन्द्रदेव स्वर्ग में गमन कर गये थे। देवलोक का आक्रमण करके गमन करते हुए इन्द्र और श्रीकृष्ण को जो महतीद्युति से सम्पन्न थे। यादवों ने वहाँ पर सूर्य और चन्द्र के समान ही देखा। वे दोनों गन्धर्व-देव और अप्सराओं के गणों के द्वारा स्तवन

किए हुए थे। श्रीकृष्ण और इन्द्र क्षण भर में ही आकाश में अदृश्य हो गये थे। फिर क्षण भर में ही जगत् के स्वामी गरुड़ द्वारा नरक से वशीकृत परम रम्य प्राग्ज्योतिष पुर में पहुँच गये। वह दुर्ग छह सहस्त्र भयंकर रौरव पाशों से और क्षुरान्तों से वेष्टित था और पार्श्व में मृत्यु पाशों के समान उच्छ्रिट था। उन्होंने उस पुर से उसी समय में निकलते हुए नारद को देखा था। वह देव मुनि श्रीमान् जब नरक के प्रति गये थे उस नारद को देखा था। वह देव मुनि श्रीमान् जब नरक के प्रति गये थे उस समय प्राग्ज्योतिष में गमन करके वे नारद मुनि उसके द्वारा सत्कार को प्राप्त हुए थे। उन्होंने नरक से योषितों के साथ संगम करने में उस समय कह दिया। आज चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पञ्चमी है। हे धरापुत्र! नवमी तिथि में तुम महान् आपदाओं को प्राप्त करते हो। उस समय में चतुर्दशी में यदि ये योषितें सुस्नात हों उसी समय में तुमको सुखपूर्वक सुरतों में प्रयुक्त करनी चाहिए। देवर्षि नारद जी के इस वचन का श्रवण करके नरक भय से मोहित हो गया था। उसने आसार और प्रसार नगर में निवेदित कर दिया था। भौम (नरक) ने राक्षसों से सुरक्षित नगर को सभी ओर से राज्य को सुरक्षित कर दिया था। उस अवसर में भगवान् पश्चिम द्वार पर प्राप्त हुए थे। छःसहस्त्र पाशों के क्षुरों को अनेक प्रकार से भली भाँति छेदन करके उन्होंने गणों के साथ और बान्धवों सहित मुरु दैत्य का हनन कर दिया था। जो छः सहस्त्र महान् वीर दानव द्वार पर संस्थित थे। मुरु को मार कर दूसरे जो छःसहस्त्र उसके पुत्र थे उस समय उनको चक्र से मार गिराया था और अन्य दानवों को भी खण्ड-खण्ड कर दिया था। इसके उपरान्त वहाँ पर अनेक जो शिलाओं के संघ थे उन सबका अतिक्रमण करके भगवान् जनार्दन ने गणों के सहित और अनुचरों से संयुक्त निसुन्द को मार गिराया था। जिसने अकेले सहस्त्र वर्ष तक देवों से युद्ध किया था और महान् पराक्रम वाला वीर था उसने इन्द्र पर आक्रमण किया था।

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २३३ भगवान् केशव ने आक्रमण करके उस हयग्रीव का हनन किया था । महान् बलवान् भगवान् देवकी पुत्र ने मध्य में लौहित्य नामक की औदका में विरुपाक्ष और सुनन्द का हनन किया था । उसके अनन्तर फिर परमेश्वर ने वीर पञ्चजन को मारा था । इस महान् शरीरों वाले तथा महान् वीर्य वाले दुरासदों का वध करके फिर जगत् के नाथ प्राग्ज्योतिष पुर में गये थे । आकाश में स्थित देवों तथा महात्मा नारद के द्वारा जय-जयकार की ध्वनि से संस्तवन किये गए ईश्वर ने प्रवेश किया था । उन भगवान् विष्णु ने श्री समन्वित, देदीप्यमान, प्रकाश अट्टालिकाओं से विभूषित उस नगरी को ऐसा ही समझा था कि क्या यह इन्द्र की अमरावती है । वहाँ पर महान् युद्ध हुआ था । जो डरपोकों को भय देने वाला था और शूरों के हर्ष को बढ़ाने वाला था । जैसा कि देवासुर युद्ध हुआ था ठीक उसी प्रकार का यह युद्ध भी हुआ था । फिर गरुड़ पर विराजमान महान् बाहुबलों वाले जनार्दन प्रभु शांगं नामक धनुष से छोड़े गये बाणों के द्वारा उन बहुत से दानवों का हनन कर दिया था । महान् बाहुओं से समन्वित प्रभु आठ सौ सहस्त्रै असुरों को मार नर नरक के समीप में पहुँच गये थे । इसके अनन्तर उस नरक ने बहुत से असुरों को मृत सुनकर गरुड़ पर स्थित महा बलवान् महाबाहु भगवान् कृष्ण का दर्शन किया था । उसने वशिष्ठ मुनि के शाप तथा माधव के समय का स्मरण किया था । उसने देवर्षि नारदजी के वचन और विधाता के वर के छेदन का भी स्मरण किया । काल के प्राप्त हो जाने वाले ने श्रीभगवान् के साथ समागम किया था । उस समय वाण के वचन का स्मरण करते हुए उसने युद्ध करना ही परम कर्त्तव्य मान लिया था । वह सुवर्ण के रथ पर समारूढ़ हुआ था जो वज्र की ध्वजा वाला श्रेष्ठ था । वह रथ लोहे के आठ चक्रों ( पहियों ) से युक्त था । उस रथ में एक हजार अश्व थे ओर व्रज की ध्वजा से सुशोभित था । उस रथ में अनेक प्रकार शस्त्रास्त्र विद्यमान थे तथा बहुत तूणीर भी रखे थे । ऐसे रथ में बैठकर पृथ्वी का पुत्र नरक समर करने के लिए शीघ्र ही चला । वह जब युद्ध के

२३४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ लिए जा रहा था तो उसने शीघ्र ही मानुषभाव को अर्चित किया था और हरि के पूर्व वचन का स्मरण करते हुए उसने असुरभाव की निन्दा की। क्षण भर में ही उसने भगवान् कृष्ण का गरुड़ पर विराजमान हुए का दर्शन प्राप्त किया था। भगवान् कृष्ण शंख, गदा, शार्ग, धनुष, वर और असि (खड्ग) को धारण किए हुए थे। वे अच्युत थे, किरीट और कुण्डलों को धारण करने वाले थे और उन के वक्षःस्थल में श्रीवत्स का चिह्न था। कौस्तुभ मणि से समुद्भास्ति वक्षःस्थल से युत, पीताम्बरधारी हरि का उसने दर्शन किया था। उन भगवान विष्णु के साथ उस वीर ने युद्ध किया था जिसके निकट युद्ध करते हुए कलिका के समान कालिका को देखा था जिसके लाल नेत्र और मुख था, विशालकाय थी, वह उस समय में खड्ग और शक्ति को धारण किए हुए थी। उसने धात्री और मोहिनी कामाख्या का भी वह वहाँ दर्शन किया था। उस समय में जगत् को प्रसूत करने वाली उस देवी का दर्शन करके वह भय से भीत होकर बहुत विस्मित हो गया था। युद्ध तो करना ही है अतएव उस समय में नरकासुर ने युद्ध किया था। उस अवसर पर भगवान् कृष्ण ने उसके साथ ऐसा अद्भुत युद्ध किया जैसा युद्ध पहले देवों में और मनुष्यों में कभी भी नहीं हुआ था। इसके अनन्तर उस भौम के साथ भगवान् माधव ने युद्ध क्रीड़ा चिरकाल करके देवेन्द्र को हर्षित करते हुए उसका हनन कर दिया। उस समय भगवान् हरि ने अपने सुदर्शन चक्र के द्वारा उसे दो भागों में छेद कर मार गिराया था। वह नरक खण्ड-खण्ड होकर भूमि पर गिर गया था। वह खण्ड ऐसे शोभित हो रहे थे जैसे वज्र से भिन्न पर हुआ गेरिक पर्वत होवे। तनय के गिर जाने पर देवी पृथिवी ने उसके पतित शरीर का अवलोकन करके शोक के वेग को सहन कर लिया क्योंकि उसने समागत काल का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। काश्यपी अर्थात् पृथ्बी अदिति के दोनों कुण्डलों को लेकर स्वयं उपस्थित हुई थी और भगवान् गोविन्द से यह वचन कहा था—आपने वराह के रूप से पहले मेरा उद्धार किया था। उसी समय आपके गात्र के स्पर्श से यह नरक

൵ श्रीकालिका पुराण ൵ २३५ मेरा पुत्र गर्भ में स्थित हुआ था। वह आपसे ही उत्पन्न व प्रतिपालित हुआ और अब वह सुत आपने ही मार गिराया है। अब आप अदिति के इन दोनों कुण्डलों को ग्रहण कीजिए जो कि सब कामनाओं के प्रदान करने वाले हैं और अब आप उसकी सन्तति का हे गोविन्द! नित्य ही प्रतिपालन कीजिए। श्री भगवान् ने कहा-हे देवी! पहले भार के अवतरण करने के लिए आपने नरक के वध की प्रार्थना की थी। इसीलिए मैंने इसका वध किया हैं। हे देवि! आपके वचन से मैं इसकी सन्तान का प्रतिपालन करूँगा इसके नाती भगदत्त का मैं प्राग्ज्योतिष में अभिषेक कर दूँगा। इस तरह कहकर भगवान् ने अन्तःपुर में प्रवेश किया था जो कि नरक के धन का आलय था। वहाँ पर उन वीर ने अनेक प्रकार के रत्न देखे थे। वे सब शुद्ध रत्न समुदाय में एकत्रित हो रहे थे जैसे कोई पर्वत शोभायमान होवे। वहाँ पर मुक्तामणि और प्रवालों तथा वैदूर्यमणि का एक पर्वत-सा ही लग रहा था तथा रत्नकूट और वज्रकूट भी माधव प्रभु ने देखे थे। सुवर्ण के सञ्चित ढेरों को, रुक्मदण्डों को और परिपूर्ण ध्वजों, विचित्र वाहनों, यानों और शयनों को देखा था। ये सभी स्वर्ण और रत्नों से संचित थे, ये महान् मूल्य वाले और बहुत बड़े थे। जो- जो भी देखा और जितना धन, रत्न और मणियाँ थीं उस प्रकार की उतनी नरक आलय के अतिरिक्त अन्य स्थान में कहीं भी नहीं देखे गये थे। जितना धन और जितने रत्न नरक के आलय में थे वैसे और उतने कुबेर, इन्द्र, यम और वरुण के यहाँ पर भी नहीं थे। भगवान् केशव वहाँ पर ही देवर्षि नारद के साथ आये हुए थे। उस अन्तःपुर के धन का अवेक्षण करके जो सार तथा सारतर था पर वीरों के हनन करने वाले ने ग्रहण करने योग्य बहुत उनमें से ले लिया था। भगवान् विष्णु ने जो वैष्णवी शक्ति दी थी उसको भौम को हनन करके देवकीसुत ने वापस ग्रहण कर लिया। पृथिवी देवी और देवर्षि नारद के सहित उस अवसर पर भगवान् केशव ने भगदत्त भौम के सुत को प्राग्ज्योतिष पुर में अभिषिक्त करके उस पुर के मध्य में निवेशित कर दिया था। पृथिवी

२३६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ने उसी भगदत्त को अभिषिक्त देखकर अपनी मुक्ति के लिए भगवान् केशव से उसी भक्ति की याचना की थी। भगवान् केशव ने भी नारदजी की अनुमति प्राप्त करके क्षिति के कहने से सुप्रसन्न मन से उस भक्ति को भगदत्त के लिए दे दिया था। जिस छत्र को वरुण को पराजित करके भौम पहले ले आया था जो कि काञ्चनका नाम से संयुक्त था उस छत्र को भगवान् हरि ने लिया था। जो आठ भार सुवर्ण को प्रतिदिन स्रवित किया करता था, जो एक कोस तक विस्तीर्ण और आधे योजन तक ऊँचा था। केशव भगवान् ने समस्त उत्तम रत्नों, तथा चार दाँतों वाले गजों और चौदह हजार पूजित प्रमदाओं को दैत्यों के समुदायों के द्वारा द्वारका के प्रति भेज दिया था। पूर्व में जो देव कन्यायें नरक के द्वारा लायी गई थीं और बलपूर्वक उनका हरण किया गया था उनके लिए हृषीकेश भगवान् ने वेणीबन्ध विमोक्षण किया था। उनको अनेक वस्त्र और दिव्य-भूषणों से सत्कृत किया था उनको विमान में बिठाकर सुदृढ़ और बली रक्षकों से रक्षित करके वे सब मुनि से अधिष्ठित द्वारका की जो भेज दी गई थीं। जो सुर कन्याओं के लिए भूमिसुत ने मणियों का पर्वत बनाया था। वह पर्वत मणियों और रत्नों के समूह से परिपूर्ण था और सूर्य के ही समान प्रभा से समन्वित था। जगन्नाथ प्रभु ने उसको उखाड़ कर गरुड़ की पीठ पर स्थापित कर दिया था। सबको समारोपित करके सत्यभामा के साथ ही सुप्रसन्न हरि समासीन होकर जगत्पति भगदत्त और पृथ्वी से सम्भाषण करके आकाश के मार्ग से ही शीघ्र ही द्वारका की ओर प्रस्थान कर गये। गरुड़ काञ्चनस्रविछत्र को, मणिपर्वत को और सत्यभामा के सहित भगवान् केशव को लेकर आकाश में से गमन करता हुआ चला गया था। शत्रुओं के हनन करने वाले केशव भगवान् क्षणभर में द्वारका पहुँच कर सब बान्धवों और गणों के साथ परमानन्द को प्राप्त हुए थे। इसी रीति से महामाया जगन्मयी कालिका नाम वाली काली,

൵श्रीकालिका पुराण൵ २३७ जगतों के नाथ, भगवान् विष्णु को जो जगत के कारणों के करने वाले हैं, ज्ञान के द्वारा जानने के योग्य हैं और जगत् से परिपूर्ण हैं उसी भाँति सम्मोहित किया करती है जो अनुराग और विराग दोनों से ही समन्वित है। जो मित्र हैं उन पर अनुग्रह किया करते हैं और जो शत्रु हैं उनको हनन किया करते हैं। वे नारियों में गूढ़ होकर रमण किया करते हैं और द्वन्द्वों से भी मोहित होते हैं। हे विप्रो! यह आपके सामने मैंने कह दिया है जैसे नरक असुर हुआ था और जिस तरह से वरदानों का लाभ उसको हुआ था और जैसा भी कुछ उसका विचेष्टित अर्थात् कृत्य था।

| नारद आगमन वर्णन |

ऋषियों ने कहा कि गिरि की पुत्री काली कैसे जगतों को प्रसूत करने वाली हुई थी। दक्ष की पुत्री ने तनु का त्याग करके हर को फिर अपना पति किस प्रकार से प्राप्त कर लिया था ? उसने पति की प्रभुता का आधा शरीर कैसे हरण किया था-यह सब हम पूछने वाले हैं। हे महामते! आप भली भाँति यह सब वर्णन कीजिए। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-हे मुनि शार्दूल तो आप लोग श्रवण कीजिए कि जिस तरह से दाक्षायणी सती हुई और फिर गिरि की पुत्री ने जैसे पूर्व में आधा शरीर किया था। पूर्व में दाक्षायणी सती ने शरीर का त्याग किया था। उसी समय में हिमवान् गिरि को मेनका मन से उत्पन्न हो गई थी। जिस समय हिमाचल पर दक्षकन्या हर के साथ खेलती थीं उस समय में मेनका उसी हितैषिणी हुई। हे द्विजो! मैं उसकी सुता होऊँ, यह मन में धारण करके उसी समय देवी ने प्राण त्याग दिये और वह हिमवान् की पुत्री हुई। जिस समय पहले दक्ष के ऊपर क्रोध करके दाक्षायणी ने प्राणों का त्याग किया था, उसी समय मेनका देवी शिवा की आराधना करने की इच्छा वाली हुई थी। उसने महामाया, जगत् की धात्री, सनातनी, योगनिद्रा, मोहिनी जो सब प्राणियों को मोहन करने वाली है और सब स्वर्गवासियों की