कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
२३८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ रक्षिका है उसी शिवा का आराधना किया था। उसने अष्टमी में उपवास करके नवमी तिथि में मोदकों, बलियों, पिष्टों और पायसों तथा गन्ध और पुष्पों से चैत्र मास से आरम्भ करके सत्ताईस वर्ष तक प्रतिदिन शुचि होकर पुत्र की इच्छा से भली भाँति पूजा की थी। गंगा में औषधियों के प्रस्थ में मृत्तिका से परिपूर्ण मूर्ति का निर्माण करके पूजा करती थी। किसी समय तो बिना ही आहार के रह जाती थी और किसी समय व्रत धारण करने वाली होती थी। शिवा में अपने मन को विन्यस्त कर देने वाली उस मेनका देवी ने जो परम भक्ति की इच्छा रखने वाली थी, सत्ताईस वर्ष व्यतीत किए थे। सत्ताईस वर्षों के अन्त में जगत् की माता जगन्मयी परम प्रसन्न हो गई थी और प्रत्यक्ष में प्राप्त होकर बोली। देवी ने कहा-हे देवी! आपने जो प्रार्थना की थी वह अब मुझसे याचना करो। मैं तुमको सभी कुछ दे दूँगी जो भी तुम्हारे हृदय में वांछित मनोरथ होवे। इसके अनन्तर मेनका देवी ने प्रत्यक्ष में समागत हुई कालिका का दर्शन करके उसने देवी को प्रणाम किया था। इसके अनन्तर वह बोली। देवी, मैंने इस समय आपके प्रत्यक्ष स्वरूप का दर्शन प्राप्त किया है। हे शिवे! यदि आप मुझ पर सुप्रसन्न हैं तो मैं आपकी स्तुति करना चाहती हूँ। इसके अनन्तर सबको मोहित करने वाली कालिका 'माता'-यह कहकर फैली हुई बाहुओं से मेनका का उसने आलिंगन किया था। इसके उपरान्त उन मेनका देवी ने अभीष्ट वाणियों के द्वारा प्रत्यक्ष रूप में विराजमान शिवा का स्तवन किया था। मेनका ने कहा-जगत् के धामों को प्रेरणा करने वाली, लोकों को धारण करने वाली चण्डका जगत् की धात्री और सब कामों और अर्थ को धारण करने वाली को मैं प्रणाम करती हूँ। नित्य आनन्द वाली, ज्ञान से परिपूर्ण योगनिद्रा, जगत् को प्रसूत करने वाली, शूद्रा, शिवा, विधाता, शौरि और शिव के स्वरूप वाली को मैं प्रणाम करती हूँ। मायामती, महामाया, भक्तों के शोक का विनाश करने वाली, काम की वनिता, चिति, शिवा आपको मैं नमस्कार करती हूँ।
൵०२ श्रीकालिका पुराण ൵०२ २३९ सत्त्व के उद्रेक से मिथ्या जो यहाँ पर होने वाली है और जो नित्य प्राणियों की बुद्धि के स्वरूप वाली है वही आप यतियों के बन्धन को छेदन करने हेतु हैं। ऐसा कौन है जो मुझ जैसे द्वारा आपका प्रभाव कहने के योग्य होवे। अर्थात् प्रभाव को कोई भी मुझ सरीखा नहीं कह सकता । जो आप सामों की सिद्धि की शक्ति हैं तथा जो आप अथर्ववेद की हिस्सा हैं वह आप नित्यकामा हैं और मेरे इष्ट को करें। नित्या नित्य, भागहीन, पुरस्थ जिन तन्मात्राओं से भूतों का स्वर्ग पतित होता है उनकी सदा नित्यरूपा शक्ति आप ही हैं। कौन सी स्त्री है जो आपके योग्य कथन करने से समर्थ हो । आप जगत् को धारण करने वाली हैं जिनके द्वारा ब्रह्मा वश में किया जाता है वह आप नित्या मुझ पर, हे माता! प्रसन्न होवें। आप जगत वेद में रहने वाले शक्ति के स्वरूप वाली हैं, सूर्य के किरणों की दाह करने वाली शक्ति आप ही हैं, आप चन्द्रिका की आह्लाद करने वाली शक्ति हैं आपका मैं स्तवन करती हूँ और अम्बिका को प्रणाम करती हूँ। योषित् के प्रेमियों की आप योषा हैं, आप ऊर्ध्वरेताओं की विद्या हैं, आप समस्त जगतों की वाञ्छा हैं और आप ही भगवान् हरि की माया हैं। जो नित्य ही अनेक स्वरूपों को धारण कर के सृष्टि और प्रलय करने वाली हैं। आप ही ब्रह्मा, अच्युत और शिव के शरीरों के हेतु हैं। आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइए। मैं आपको पुनः प्रणाम करती हूँ। इसके अनन्तर वह जगतों की माता कालिका पुनः मेनका देवी से बोली थी कि जो भी आपका अभीष्ट वर हो उसका वरण कर लो। इसके अनन्तर यशस्विनी मेनका ने सबसे प्रथम तो सौ पुत्रों के उत्पन्न होने का वरदान माँगा था जो पुत्र वीर्य, पराक्रम और आयु से संयुक्त होवें और ऋषि-सिद्धि से भी युक्त होंगे। इसके अनन्तर एक कन्या के उत्पन्न होने का वरदान चाहा था जो सुन्दर रूप वाली गुण गणों से शोभायमान, दोनों कुलों का आनन्द करने वाली और तीनों भुवनों में दुर्लभ होवे। इसके पश्चात् मुनियों के समान मेनका से भगवती ने कहा था जो मन्द मुस्कान पूर्वक उसके मनोरथ को पूर्ण करती हुई थीं। देवी
२४० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ने कहा-आपके एक सौ पुत्र होंगे जो बल वीर्य से समन्वित होंगे। उनमें मुख्य एक बलवान् सबसे प्रथम होगा। और आपकी पुत्री देवों, मनुष्यों और राक्षसों के हित के लिए तथा सम्पूर्ण जगतों की भलाई के लिए मैं होऊँगी। आप सुखपूर्वक प्रसव करने वाली तथा नित्य ही पतिव्रता, अम्लान रूप से सम्पन्न और सुभगा होंगी। इस रीति से इतना कहकर जगत् की धात्री वहीं पर अन्तर्धान हो गई थी। मेनका परम प्रसन्नता की प्राप्ति करके अपने स्थान में प्रवेश कर गई थी। इसके उपरान्त काल के सम्प्राप्त होने पर मेनका ने अचलों में अत्युत्तम मैनाक पर्वत को प्रसूत किया था। जो आज तक पंखों के सहित सागर के मध्य निवास किया करता है। ये सभी पुत्र महान् वीर्य वाले महान् सत्त्व से समन्वित और सभी गणों से सुसम्पन्न थे। इसके उपरान्त वह जगन्मयी योगनिद्रा कालिका देवी जिसने पूर्व में सती के रूप का त्याग कर दिया था जन्म ग्रहण करने के लिए मेनका के समीप में गयी थीं। भय के अनुसार मेनका के उदर से शिवा ने समुद्भूत होकर सागर से लक्ष्मी की ही भाँति समुत्पत्ति ग्रहण की थी। बसन्त के समझ नक्षत्र के योग से नवमी तिथि में देवी आधी रात्रि में राशि के मण्डल से गंगा के ही समान समुत्पन्न हुई। उसके समुत्पन्न होने पर सभी दिशाएं प्रसन्न हो गयीं थी। उस अवसर पर परम शुभ सुगन्धित और गम्भीर वायु बहने लगी। उस समय पुष्पों की वर्षा हुई थी और जल की वृष्टि भी हुई। जो अग्नियां शान्त थीं वे प्रज्वलित हो गई थीं और घन गम्भीर गर्जन करने लगे थे। उस देवी के समुत्पन्न होने मात्र से सबने स्वास्थ्य की प्राप्ति की थी। नील कमलों के दलों के समान समुत्पन्न हो श्यामा थी, देवी मेनका अतीव हर्षित होकर परम आनन्द को प्राप्त हुई थी और देवों ने भी उस समय बारम्बार अतुल हर्ष की प्राप्ति की। गन्धर्व और अप्सराओं के समुदाय आकाश में स्थिर होकर स्तवन कर रहे थे। हिमवान् की सुता को 'काली' नाम से बुलाया था तथा काली नाम से गिरिनन्दनी कीर्त्तिका की गई थी। इसके उपरान्त वह वर्षा के समय गंगा तथा शरत्काल में चाँदनी के समान बड़ी होने लगी।
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २४१ प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त हुई वह सुन्दरी चन्द्रबिम्ब की कला ही की भाँति शोभा धारण करने लगी अर्थात् वह दिनों दिन विशेष सुन्दरी होती चली गयी थी । वह बालिका भाव को प्राप्त हुई क्रीड़ा करती सखियों के साथ परम प्रसन्नता को प्राप्त होती थी। जिस प्रकार से सरिताओं के समुदायों से कालिन्दी विपुलता को प्राप्त किया करती हैं। षड्गुणों ने स्वयं ही उस देवी के पूर्व जन्म के वशीकृतता को प्राप्त कर लिया था। हे द्विज श्रेष्ठों! वे षड्गुण वर्षा को कालिका के ही समान स्वयं ही उसके समीप आ कर उपस्थित हो गये थे। उस देवी ने अपने गुणों से देवी की कन्याओं का भी अतिक्रमण कर दिया था अर्थात् देव कन्याओं से भी अधिक गुणों वाली हो गई थी। अपने रूप लावण्य से अब अप्सराओं से भी अधिक थी। वह बाल्यकाल में ही निरन्तर बन्धु वर्ग की प्रिय और शुभ थी। उसने सद्गुणों के द्वारा अपने बन्धुओं के द्वारा अपने बन्धुओं को माता और पिता कर दिया था। वह जगन्माता नित्य ही अपनी माता का स्तवन करने वाली थी और अपने पिता के यजन करने में तत्पर रहा करती थी। वह सर्वदा अपने भाइयों के साथ रहने वाली, वह सम्पूर्ण जगती की माता सर्वदा कन्या के स्वरूप में समुपस्थित हुई थी। जिस तरह से विभावसु के समीप में कालिन्दी निवास किया करती है उसी भाँति वह भी सदा अपने पिता के समीप निवास किया करती है। इसके अनन्तर एक बार हिमवान् गिरि उसे अपने पास रखकर अपने पुत्रों के साथ संगत होकर परम कौतुक से स्थित हुए थे। इसके उपरान्त देवलोक से नारद मुनि वहाँ पधारे। उन्होंने हिमवान् को सुतों के साथ सुखपूर्वक आसीन देखा था। उनके निकट उन्होंने सूर्य से कालिका के समान ही काली का भी अवलोकन किया था जैसे चन्द्रमा की चाँदनी हो जो कि शरत्काल की रात्रि में भली भाँति बढ़ी हुई हुआ करती है। उस गिरिराज के द्वारा उन नारद मुनि का अभ्यर्चन किया गया था और उनको आसन आसीन होने के लिए दिया गया। उस आसन पर बैठे हुए देवर्षि नारदजी ने सबसे प्रथम उस पर्वतराज से
२४२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ कुशल प्रश्न और वृत्तान्त पूछा। बोलने में महान् कुशल देवर्षि नारदजी ने जब सम्पूर्ण वृत्तान्त जान लिया तो बहुत ही हर्षित हो मेनका से बोले-यह आपकी पुत्री बहुत सुन्दर है और चन्द्रमा की आद्यकाल के ही समान वर्धित हो गई है। हे शैलराज! यह आपकी कन्या समस्त सुलक्षणों से शोभायमान है। यह सदा हर के अनुकूल भगवान् शम्भु की दयिता होने वाली है। यह तपस्विनी चित्त को अपने वश में कर लेगी और वे भगवान् शम्भु भी इसके अतिरिक्त अन्य किसी स्त्री के साथ विवाह नहीं करेंगे। इन दोनों का जैसा प्रेम है वैसा दूसरे किसी का नहीं होगा। इसके द्वारा बहुत से सुरों के कार्य होंगे। हे गिरियों में श्रेष्ठ! इसी के द्वारा भगवान् हर अर्ध नारीश्वर हैं। और इसी को चन्द्रमा की ज्योत्स्ना के ही तुल्य परम सौहार्द होगा। वह भगवान् शिव के आधे शरीर को अपने आस्पद में करेगी। तप के द्वारा भगवान् हरि के प्रसन्न होने पर यह विद्युत के समान तुम्हारी पुत्री काली हो जायेगी। इसके पीछे यह गौरी इस नाम से लोक में ख्याति को प्राप्त करेगी। शिव के अतिरिक्त अन्य किसी के भी लिये इसके प्रदान करने को आप अपना मन करने योग्य नहीं है। देवर्षि नारदजी के वचन का श्रवण कर विशारद हिमवान् ने मुनि से कहा-वे महादेवजी सङ्ग को त्याग किये हुए हैं और संयत आत्मा वाले हैं। वे तो देवों के अगोचर उपांशु तप का समाचरण कर रहे हैं। हे देवर्षि! वे ध्यान के मार्ग में समाधिस्त है और अपना मन परब्रह्म में अर्पित कर रखा है। वे उससे किस प्रकार भ्रष्ट होंगे। इसमें मुझे बड़ा भारी संशय हो रहा है। वह परब्रह्म अक्षर हैं और प्रदीप की कालिका के ही समान हैं। वे सर्वत्र अन्दर ही देखा करते हैं और बाहर के पदार्थों को कभी भी नहीं देखते हैं। हे द्विज! यह बात नित्य ही किन्नरों के मुख से सुनी जाती थी। जिनका अन्तःकरण इस प्रकार का है वे हर कैसे ध्यान भ्रष्ट किए जा सकते हैं। विशेष रूप से यह सुना गया है कि भगवान् शम्भु ने दाक्षायणी के साथ पूर्व में प्रणयन किया था। उसे मैं कहता हूँ मुझसे आप श्रवण कीजिए। शिव ने दाक्षायणी से कहा था।
ൠൡ श्रीकालिका पुराण ൠൡ २४३ ︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾ हे प्रिये! हे सति! तुम्हारे बिना मैं अन्य किसी भी वनिता को अपनी भार्या बनाने के लिए ग्रहण नहीं करूँगा। यह सर्वथा सत्य है जिससे मैं आपको बता रहा हूँ। अब उस सती के मृत को जाने पर वे कैसे अन्य स्त्री का ग्रहण करेंगे। देवर्षि नारदजी ने कहा हे गिरिराज! इस विषय में आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिए। आपकी पुत्री सती ही उत्पन्न हुई है और यह हर के लिए ही जन्म धारण करने वाली हुई है। इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है। इतना कहकर ही देवर्षि नारदजी ने गिरिराज से यह सभी कहकर सुना दिया था जिस तरह से सती मेनका के उदर से समुत्पन्न हुई थी। गिरिराज ने वह सब पूर्व में घटित वृत्तान्त नारदजी के मुख से श्रवण किया तो वह अपने पुत्रों और द्वारा के सहित संशयहीन हो गये। उस अवसर पर काली ने नारद जी के मुख से यह कथा का श्रवण किया था और वह लज्जा से नीचे की ओर मुख वाली हो गई थी और मन्द मुस्कान में विस्तृत सुख वाली हो गई थी। गिरि हिमवान् ने उस सती को हाथ से पकड़कर और मुख को ऊपर की ओर उठाकर उसके मस्तक पर आघ्राण करके उसको अपने ही आसन पर बिठा लिया था। इसके अनन्तर नारदजी ने पुनः शैलराज की पुत्री से कहा था। जिससे गिरिराज और तनयों के सहित मेनका को बड़ा हर्ष हो रहा था। हे शैलराज! आपके इस सिंहासन से इनको क्या होगा। इसका आसन तो सदा ही भगवान् शम्भु के ऊरु होगा। अर्थात् आपके द्वारा दिया हुआ सिंहासन का आसन इसके लिए कोई महत्व की बात नहीं है क्योंकि यह तो शम्भु के ऊरुओं पर बैठने वाली होगी। हे गिरि! हर के ऊरुओं का आसन प्राप्त करके इसे अन्य किसी भी आसन पर तुष्टि की प्राप्ति नहीं हो सकती हैं। देवर्षि नारदजी ने परम आदर वचन शैलराज से कहा था और देवयानों के द्वारा वे उसी क्षण स्वर्ग चले गये। गिरिपति भी चिन्ता, हर्ष और सम्मोह से संयुत होकर अपनी अचला भार्या के सहित पद्म गर्भ अन्तःपुर में प्रवेश कर गये।
२४४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ भगवान शिव का हिमवान में निवास वहीं पर परम से पर अक्षर अपने आत्मा को तथा नित्य ही ज्ञानमय चित्त एवं निरामय और निराकुल ज्योतिरूप, प्रदीप की आभा वाले, जगन्मय, द्वैत से हीन, विशेष रूप से एकाग्र होकर भर्ग भगवान् शिव चिन्तन करने लगे। कुछ दूसरे नन्दी, भृङ्गी आदि जो गण थे वे महाभाग द्वारों पर स्थित थे किन्तु ध्वनि नहीं होती थी। वे सभी शब्दहीन होते हुए संस्थित थे अन्य गण वहाँ से सुदूर अन्तर पर स्थिर होकर क्रीड़ा कर रहे थे। कुसुमों, दलों, भक्तों और गिरि के झरनों से रत्नों को खोजते हुए गैनिकों से भूषित वे गण थे। गिरिराज गणों के सहित गए हुए भगवान् हर का विलोकन करके गणों के सहित अपने स्थान औषधिप्रस्थ से निर्गत होकर पूजा के लिए उपस्थित हुए थे और यथोचित रूप से उनका अभ्यर्चन किया था। भगवान् शम्भु ने भी पराश्रद्धा से संयुक्त होकर उसकी अर्चना ग्रहण की थी। ध्यान योग में स्थित मुस्कराते हुए से उस गिरिराज से ईश्वर ने कहा-मैं आपके इस प्रस्थ पर तप का समाचरण करने के लिए ही इस एकान्त स्थल में समागत हूँ। मेरे समीप में कोई भी न आये ऐसी व्यवस्था कर दीजिए। आप महान् आत्मा वाले हैं आप जगत् के धाम है और मुनियों के सदाश्रय हैं। देवों, राक्षसों, यक्षों और किन्नरों तथा द्विजातियों के सद् आवास, हे गिरिश्रेष्ठ! मैंने वहाँ पर आश्रय ग्रहण किया है सो अब जो योग्य हो वह सब करिये। इतना कहकर जगतों के स्वामी वृषभध्वज चुप हो गये थे। उसी समय गिरिराज ने भगवान शम्भु से प्रणय पूर्वक यह कहा था। हे परमेश्वर! आप तो जगतों के स्वामी हैं। आपने मुझे पवित्र कर दिया है कि आपने इस मेरे देश में समागम किया है। इससे आगे जो भी मेरा कर्त्तव्य हो वह मुझे उपदेश कीजिए। आप तो महान् तप के द्वारा यत्नों में परायण देवों के द्वारा भी प्राप्त नहीं हुआ करते हैं। हे जगन्नाथ! मेरा बड़ा सौभाग्य है कि आप स्वयं ही यहाँ पर पदार्पण कर उपस्थित हो गये हैं। मैं तो यही समझता हूँ कि मुझसे अधिक धन्य कोई भी नहीं हैं। और न मुझसे अधिक कोई पुण्यशाली
श्रीकालिका पुराण २४५ ही है। जो कि आप तपश्चर्या करने के लिए हिमवान् के प्रस्थ पर स्वयं ही समुपस्थित हो गये हैं। हे परमेश्वर! मैं तो अपने आपको देवेन्द्र से भी अधिक मानता हूँ कि गणों के सहित आपके द्वारा स्वेच्छा से जिस समय में मैं प्राप्त हो गया हूँ। इतना कहकर गिरिराज पुनः अपने घर में आ गये थे। और उसने नियम के लिए अपने परिवारों को तथा गणों को आदेश दिया था। आज से कोई भी गंगावतरण पर नहीं जायेगा। मेरे शासन के बिना जो कोई भी वहाँ पर गमन करेगा उसको मैं दण्डित करूँगा। उस गिरिराज हिमवान् ने इस रीति से अपने लोगों को नियमित करके तिल, पुष्प, कुशा और फल लेकर शीघ्र ही अपनी ही पुत्री के साथ भगवान् शम्भु के समीप गमन किया था। इसके अनन्तर ध्यान में परायण जगन्नाथ शम्भु के समीप में गमन करके सब गणों से समन्विता काली अपनी पुत्री से प्रणाम करवाया। जो तिल पुष्प आदि थे वह सभी उससे उनके आगे रख दिया था। फिर अपनी पुत्री को आगे करके उस शैलों के राजा ने भगवान् शम्भु से यह कहा—हे भगवान्! मेरी पुत्री आपकी आराधना करने के लिए समादिष्ट है और आपकी आराधना की इच्छा से यहाँ पर लाई गई है। यदि आपका मेरे ऊपर अनुग्रह है तो आप इसको सेवा करने के लिए अनुज्ञा प्रदान कीजिए। इसके अनन्तर भगवान् शंकर ने उसका अवलोकन किया था कि वह प्रथम यौवन में आरूढ़ थी और उसके विकसित कमलों के सदृश एवं उसका मुख पूर्णचन्द्र के समान था। वह समग्र केशों के समूह से वेश विजृम्भिका को प्राप्त हुई थी। उसकी ग्रीवा कम्बु के समान थी। उसके नेत्र विशाल थे और उसके दोनों कानों का जोड़ा परम सुन्दर एवं उज्जवल था। मृणाल के सदृश आयत पर्यन्त बाहुओं के युग्म से वह परम मनोहर थीं। उसके कुण्डलों के स्थान में कमल थे और पीन एवं उन्नत स्तनों से शोभित थी। सुन्दर और क्षीण मध्यभाग के धारण करने वाले थी और उसके दोनों पादों से वह परम मनोरम थी। मध्य भाग से क्षीण, महान् सत्त्व वाली स्थूल
और धन वृत्त से उज्जवल थी। उसकी जंघायें सुन्दर थीं। नाग के समान उसकी नासिका थी तथा वह निम्न नाभि से भूषित थी। उसकी जंघाओं के अग्रभाग सुवृत्त और सुन्दर थे। तीन संस्थाओं में गम्भीर और छः स्थानों में समुन्नत थी। सभी सुलक्षणों से सम्पन्न वह तीनों लोकों में दुर्लभ थी। ध्यान के पिंजर में बंधे हुए मुनियों के मन को भी दर्शन करने ही से भ्रष्ट करने में समर्थ वह योषितों के समूह की शिरोमणि थी। उस मनोहर को देखकर तपश्चर्या के लिए नित्य ध्यान करने वालों को विघ्नों का हेतु और अनुराग को बढ़ाने वाली तथा कामरूपी थी। उस गिरिराज के वचन से उसकी पुत्री को भगवान् शंकर ने जो गौरव से भी गौरव थे सेवा करने के लिए स्वीकार कर लिया था। भगवान् शम्भु ने कहा था कि शैलराज! यह आपकी पुत्री अपनी सखियों के साथ नित्य ही मेरी सेवा करने के लिए निर्भीक होकर स्थित रहे। यह कहकर भगवान् हर ने उस देवी को सेवा के लिए ग्रहण कर लिया था। यही महान् धैर्य है कि विघ्न बाधा न कर डालें। विघ्न रहित विघ्न के हेतु को पराभूत करके जो प्रवृत्त होता है, वह तपों का महत्व है और तपस्वियों की धीरता है। इसके अनन्तर गिरिराज अपने परिचारकों के सहित अपने पुर में आ गया था और भगवान् शम्भु ध्यान के योग से परेशा का चिन्तन करने के लिए स्थित हो गये। काली अपनी सखियों के साथ महादेव चन्द्रशेखर की सेवा करती हुई गमन और आगमनों के द्वारा स्थित हो गयी थी। किसी समय वह सखियों के सहित भगवान् शंकर के आगे शुभ गीत का विस्तार करती हुई पञ्चम स्वर में गान किया करती थी। किसी समय वह भगवान् हर के लिए कुश, पुष्प, आदि समिधा और जन से सखियों के सहित स्नान का सत्कार करती हुई उस समय वहाँ पर निवास करती थी। किसी समय नियत रूप से शिव के मुख का वीक्षण करती हुई सकाम होकर उनके विषय में चिन्तन करती थी तब भी वह हर के मुख का चिन्तन किया करती थी। किस समय यह भूतेश्वर मेरा पाणिग्रहण करेंगे और अनेक सद्भावों की भावनाओं से
80 श्रीकालिका पुराण 08 २४७ मेरे साथ रमण करेंगे। इसी चिन्ता में परायण होती हुई काली स्वप्न में परमेश्वर का अर्चन करती हुई सदा नहीं परम प्रभु की चिन्ता में तत्पर रहा करती थीं। आगे काली जब महेश्वर का ध्यान करती थी तब भगवान् भूतेश ने उसको स्वभाव में परिस्थित हुए जाना था। किन्तु उस समय में गर्भवत बीजों से युत देह वाली है। इससे उस समय में उसको गिरीश ने अधृत व्रत वाली को भार्या बनाने के लिए ग्रहण नहीं किया था। महादेवजी ने उस समय उसे देखकर यही सोचा था कि यह गिरि की पुत्री किस प्रकार से तपश्चर्या के व्रत को करेगी। किए हुए व्रत से और संस्कारों से गर्भबीज से वर्जित काली को जो निजा और अति दूषिता है अपनी प्यारी भार्या के रूप में ग्रहण करूँगा। व्रत से और संस्कारों से गर्भ के बीज की विमुक्ति होती है। इससे जैसे भी यह काली व्रत करे, यह कैसे युक्त होवे। भूतेश शम्भु यह चिन्तन करते हुए समय में मन लगाने वाले होकर संस्थति हो गये थे। ध्यान में समासक्त होने से अन्य कोई भी चिन्ता न हुई थीं। काली प्रतिदिन भक्तिभाव से शम्भु की अत्यधिक सेवा किया करती थी और उस महात्मा के स्वरूप का निरन्तर चिन्तन किया करती थी। ध्यान में परायण हर नित्य ही प्रत्यक्ष हुई काली को भूलकर पूर्व वृत्तान्त को देखते हुए भी नहीं देखते थे। इसी बीच में दैत्यों का राजा तारक ब्रह्माजी के वरदान से बहुत ही घमण्डी होकर देवों और सभी लोकों को बाधा दे रहा था। तीनों लोकों को अपने वश में करके वह स्वयं ही इन्द्र बन गया था। उसने सब देवों को भगा कर उनके पदों पर अपने दैत्यों का नियोजन कर लिया था। उसके राज्य में यम अपनी इच्छा से लोकों का नियोजन नहीं करता था। उसके भय से सूर्य भी लोक को ताप नहीं दिया करता था। चन्द्रदेव तो अपनी किरणों के द्वारा उनका नम्र साचिव्य किया करता था अर्थात् दास होकर वह रात-दिन उनकी सेवा में ही निरत रहता था। वायु सदा ही सुगन्ध गम्भीरता और शीतलता से एवं स्निग्धता से समन्वित होकर उस नृप के शासन से उसको वीजित करता हुआ ही वहन किया करता
२४८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ था। कुबेर भी तारक की इच्छा से यत्नपूर्वक सावधान होकर उसकी सेवा किया करता था। तारक के शासन से अगिन रसोइया हो गया था उस समय उसकी इच्छा से ही सदा भोज्य व्यञ्जनों को दिया करता था। निर्ऋति समस्त राक्षसों के सहित निरन्तर भय से अश्व, गज और वाहनों को चराता था। वह तारक सुरों से द्वेष रखता था और नृत्य करती अप्सराओं के स्तवन करने वाले सूत और मागधों का गान करने वाले गन्धर्वों के साथ भली भाँति क्रीड़ा किया करता था। इस रीति से तीन लोकों में देवों के जो भी सार-सार थे उन सबका उसने ग्रहण कर लिया था। उसने सभी देवों को जिनमें इन्द्र प्रमुख थे अभिवाधित कर दिया था। तब सब देवगण अनाथ होते हुए भी उत्तम नाथ ब्रह्माजी की शरण में प्राप्त हुए थे। उन देवों ने प्रणाम करके जिन सब में पुरहूत अगुआ थे महान् आत्मा वाले सब लोकों के पितामह से यह बोले। देवों ने कहा-हे लोकों के स्वामिन्! दैत्य तारक आपके दिये हुए वरदान से बहुत ही घमण्डी हो गया है। बलपूर्वक उसने हम सबको निरस्त करके हमारे देशों को स्वयं ही ग्रहण कर लिया है। हम लोग जहाँ-तहाँ पर स्थित हैं वह हमको दिन-रात बाधा दिया करता है। हम लोग भागे हुए हैं और सभी दिशाओं में तारक को ही देखा करता है। अग्नि, यम, वरुण, निर्ऋति, वायु और मनुष्य धर्म वाला सब परिकारों से युक्त है। हे ब्रह्मन्! ये सब देवगण उसके द्वारा पीड़ित हैं और उसके ही शासन से उसके ही अनुजीवी होकर उसके कार्यों में इच्छा न होने पर भी निरत रहा करते हैं। जो स्वर्ग में देवों की वनितायें, अप्सराओं के समुदाय तथा लोकों में सार पदार्थ है इन सबको तारक दैत्य ने ग्रहण कर लिया है। इस समय न तो यज्ञ ही हो रहे हैं और न तापसगण तपश्चर्या ही किया करते हैं तथा दान धर्म आदि कुछ भी लोकों में प्रवृत्त नहीं हो रहे हैं। उसका सेनापति पापी क्रौञ्च दानव है। वह पाताल में जाकर प्रजा को रात-दिन बाधा दिया करता है। हे पितामह! उस तारक ने यह सम्पूर्ण त्रिभुवन को हृत कर लिया है। यह सम्पूर्ण जगत् उसी
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २४९ के द्वारा हरण किया हुआ है। इस पापी से आप हमारा परित्राण करिए। हम लोग जहाँ पर जाकर स्थित रहेंगे उस स्थान को बतालइए। हे लोकनाथ! आप तो जगत् के गुरु हैं उनके द्वारा हम सब स्थान से भ्रष्ट कर दिए गए हैं। आप ही हम लोगों की गति हैं, शास्ता हैं, आप ही हमारे रक्षक पिता और प्रसूत करने वाले हैं। आप ही भुवनों के स्थापक, पालन करने वाले और कृती हैं। हे प्रजापते! जब तक हम लोग तारक नाम वाली अग्नि में भस्म होकर दग्ध न होवें अब आपको वैसा ही करना समुचित है अर्थात् वैसा ही करने के लिए आप योग्य हैं। ब्रह्मलोक में पितामह ने सुरों के इस वचन का श्रवण कर उन समस्त सुरों से कहा। ब्रह्माजी ने कहा-मेरे ही वरदान से तारक समृद्ध हुआ है। हे देवगणों! अब मेरे ही वरदान से मरण मुझ से होना युक्त नहीं होता है। आपका भी प्रतिकार होना ही चाहिए किन्तु मैं आपके द्वारा प्रेरित होकर भी भली भाँति कुछ भी प्रतिकार कर नहीं सकता हूँ। इस कारण से जैसे भी तारक स्वयं ही विनाश को प्राप्त हो वैसा आप लोग मुझसे समझ लेवें। मैं तो उपदेश ही कर देने वाला हूँ। मेरे द्वारा तारक वध नहीं होगा और वनमाली प्रभु के द्वारा भी वह वध के योग्य नहीं होगा, न हर के द्वारा तथा अन्य सुरों और मनुष्यों के द्वारा वह मारा जा सकता है। उसको तपश्चर्या करते हुए ही वरदान मैंने दे दिया था। हे सुरोत्तमो! इसका एक उपाय मैंने सोच लिया है उसे ही आप करिये। पूर्व समय में सती दाक्षायणी ने देह का त्याग कर दिया था और अपने जन्म धारण करने के लिए शैलराज की मेनका देवी के यहाँ गयी थी। गिरिराज ने उसको मेनका के उदर में समुत्पादित किया था। वह पहले साक्षात् लक्ष्मी की ही भाँति प्रसिद्ध हुई थी कि महादेव अवश्य उसका पाणिग्रहण कर लेंगे। हे सुरो! जिस प्रकार से वह शीघ्र ही उसमें अनुराग करने वाले हो जावें, उसी भाँति आप करें। उनका तेज ही आप सबका प्रतिकार करने वाला है। वे शम्भु भगवान् ऊर्ध्वरेता हैं। उनके वीर्य को वह प्रच्युत करने वाली है। उसी की ऐसी सामर्थ्य
२५० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
है दूसरी कोई भी अन्य बाला ऐसी शक्तिशाली नहीं है। उससे जो भी
पुत्र उत्पन्न होगा वह ही इस तारक नामक राक्षस का हनन करने वाला
है, अन्य कोई भी नहीं है। वह गिरिराज की पुत्री इस समय में समारूढ़
यौवन वाली अर्थात् पूर्ण युवती है। गिरि के प्रस्थ पर तप श्रर्या नित्य
ही करने वाले उन भगवान् के वाक्य से ही अपनी सखियों के साथ
ध्यान में स्थित परमेश्वर सर्वज्ञ की वह सेवा कर रही है।
अपने आगे विद्यमान रहने वाली तीनों लोकों में वरवर्णिनी के
ध्यान में समासक्त महादेव मन से भी यही चाहते हैं। चन्द्रशेखर जिस
रीति से भी उस काली को अपनी माया बनाना चाहें, हे देवगणों! आप
लोग वैसा ही यत्नपूर्वक शीघ्र ही करें। आप लोगों को स्वर्ग अपना
स्थान है। उससे मैं तारक को भी निवृत्त कर दूँगा। मैं उसके साथ संगत
होऊँगा। आप लोग दुःखों से रहित होकर ही यहाँ से गमन कीजिए।
इतना कहकर सब लोकों के स्वामी तारक नामक दैत्य के पास उपस्थित
हुए थे। उसके समीप जाकर यह वचन उन्होंने कहा। हे तारक! आप
स्वर्ग के राज्य को शासन करें। उसके लिए आपने पहले तपस्या नहीं
की थी। मैंने भी ऐसा वरदान नहीं दिया था कि मेरे द्वारा आप स्वर्ग
के राजा होवें। इस कारण स्वर्ग का परित्याग करके भूमि पर भी राज्य
के शासन को करें। हे असुर! देवों के योग्य भोगों का उपभोग करने
के लिए आपको वहीं पर भूमि में सब पदार्थ प्राप्त होंगे। इतना कहकर
सब लोकों के स्वामी ब्रह्माजी जी वहीं पर अन्तर्धान हो गये थे।
वह तारक भी स्वर्ग का परित्याग करके इसके उपरान्त भूमि पर
समागत हो गया था। वहाँ पर ही संस्थित होकर वह नित्य ही देवों को
बोधित किया करता था। उसने इन्द्र को कर देने वाला बना दिया था
और उस महान् बलवान् को अपने निर्देश में स्थित कर दिया। इन्द्र देव
उसको निरन्तर देवों के भोगने के योग्य पदार्थों को समर्पित करते हुए
भी सेवा करके उस ईश्वर को सन्तुष्ट करने में समर्थ नहीं हुआ था।
इस रीति से उसके द्वारा उत्पीड़ित हुए और क्रोध से परिपीड़ित होते हुए
देवों ने विधाता के उपदेश से भगवान् शम्भु के वंश में यत्न किया था।
६०-३ श्रीकालिका पुराण ६०-३ २५१ शम्भु सुतोत्पति हो जावे, इस कार्य के सम्पादन करने में देवगण प्रयत्नशील हो गये थे। इसके अनन्तर इन्द्र देव के साथ संङ्गत होकर ऐसा निश्चय कर लिया था कि शम्भु को सुतोत्पति के लिए उद्यत किया जावे। इन्द्र देव ने कामदेव को बुलाकर उससे यह वचन कहा था। इन्द्र देव ने कहा- आपके द्वारा इस विश्व की प्रसूति की जाती है और आपके ही द्वारा विश्व का पालन किया जाता है। पहले आप ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र की प्रीति का हेतु हुए थे। ब्रह्माजी ने किसी समय में प्रीति से जिस प्रकार से चरित व्रत वाली सावित्री का ग्रहण कर लिया था। भगवान् माधव ने लक्ष्मी का ग्रहण किया था और भगवान् हर ने दाक्षायणी का ग्रहण कर लिया था। पहले समय में देवेशों की प्रीति के लिए जैसे उनको वर दिया था उसी भाँति अब मेरी भी प्रीति करिये। आप तो सदा ही प्राणधारियों की प्रीति के करने वाले हैं। हे काम! आप स्वर्ग, पाताल और भूमण्डल में किसके प्रिय नहीं है। आप जंगल के प्राणधारियों का सभी का अभिमत हैं। देव, दानव, यक्ष, राक्षस और मनुष्यों के आप पालक तथा कर्त्ता हैं और आप सब सम्पूर्ण जगतों के हित के सम्पादन करने के लिए विशेष चेष्टा कीजिए। जिससे देव, दानव, यक्ष और महात्मा तथा मनुष्यों का हित हो वही करिये। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-मकरध्वज ने यह इन्द्र का वचन श्रवण करके उसके वचन रूपी अमृतों से बहुत ही प्रसन्न होकर देवराज से कहा। जहाँ मेरी ईशता है, हे शुक्र! वह कर्म आपको ज्ञात ही है इस कारण जो मैं कर सकता हूँ उसे मैं करूँगा। आप इसका निर्देश कीजिए। मेरे पाँच ही बाण हैं जो बहुत ही कोमल पुष्पमेध हैं। मेरा चाप भी पुष्पों से परिपूर्ण हैं और उस चाप की डोरी भ्रमरों के स्वरूप वाली हैं। रति मेरी प्यारी जाया हैं। बसन्त मेरा सचिव है। मलय से सम्भूत वायु यन्ता है और मेरा मित्र सुधानिधि चन्द्रमा है। मेरी सेना का अधिक श्रृंगार हैं और हाव तथा भाव मेरे सैनिक हैं। ये सभी मेरे सहयोगी क्रूरता से रहित और कोमल हैं और मैं भी वैसा ही मृदु हूँ। आप तो धीमान् है मेरे करने का जो भी समुचित कार्य
२५२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ हो उसका भी योजित कर दीजिए । इन्द्र देव ने कहा-जिसके कराने की इच्छा कर रहा हूँ हे मनोभव! आपसे जो भी कराना चाहता हूँ, वह आपका समुचित कर्म है । उसमें आप परिवृत हैं । आप उसमें कृतकर्मा हैं, आपको उस कर्म का अनुभव हैं। हे मनोभव! आप कृती हैं। आपको छोड़ कर अन्यों से वह कर्म दुस्साध्य है । इसी से मैं आपका नियोजन करता हूँ । यह सुना जा रहा कि हिमालय के प्रस्थ में वृषभध्वज ध्यान में स्थित हैं और वधू के लिए वे आकांक्षा से रहित हैं। पिता के वचन से काली सखियों के सहित नित्य ही हर की अनुमति में होकर अब सेवा किया करती है। वे शम्भु तपश्चर्या कर रहे हैं। यद्यपि वह समारूढ़ यौवन वाली युवती है, स्त्रियों में रत्न के समान परम दिव्य हैं और अत्यधिक सुन्दरी भी हैं किन्तु महादेवजी ध्यान में ऐसे आसक्त हैं कि उसको मन से भी नहीं चाहते हैं। अतः जिस रीति से भी आप यह कार्य करिये । इनमें देवों का और जगतों का परमहित हैं यही जानकर आप ऐसा करें । वृषभध्वज जिस प्रकार से भी उस सती के साथ अनुराग वाले होकर रमण करें, वैसा ही करें। उसके रमण करने पर हर का जो तेज प्रच्युत होगा और उससे जो भी पुत्र समुत्पन्न होगा वही हमारा इस तारक से उद्धार करेगा । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर कामदेव ने देवराज के वचन का श्रवण करके पहले ब्रह्माजी के दिये हुए शाप का काल प्राप्त हो गया है । यह स्मरण किया था । सन्ध्या करने वाले विधाता पर जिस समय अपने शस्त्र की परीक्षा की थी जो उस समय कामदेव ने पुष्प के वाणों से प्रहार किया था और उसी अवसर पर विधाता ने उसको शाप दे दिया था । हे द्विजोत्तमो ! विधाता ने कहा कि तू शम्भू के नेत्र की अग्नि से दग्ध हो जायेगा। जिस समय भगवान् हर गिरि की पुत्री को पाणिप्रणीता भार्या करेंगे उसी समय आप शरीर के द्वारा सम्पूर्णता को प्राप्त कर लेंगे । इस विधाता के शाप का स्मरण करके भयभीत कामदेव ने शुक्र के वचन से हर को काली के साथ योजित कर देने के कार्य को स्वीकार कर लिया था। और फिर उस काल के सदृश कामदेव से यह वचन कहा था।
൵ श्रीकालिका पुराण ൵ २५३ मदन ने कहा-हे इन्द्र देव! मैं आपके वचन को पूर्ण करूँगा और गिरिजा के साथ भगवान् शम्भु को संगत कर दूँगा जैसा कि पहले दाक्षायणी के साथ किया था। किन्तु शम्भु के मोहन करने में आप मेरी एक सहायता करें। जिस समय में सम्मोहन के द्वारा हर का सम्मोहन करूँ उस अवसर पर आप मेरी सहायता करें। मैं सुरभि के द्वारा प्रवेश करके अर्थात् शंकर के आश्रम में शीघ्र ही प्रविष्ट होकर सर्वप्रथम दर्पण के द्वारा मन से विकार समुत्पन्न करके फिर सम्मोहन के द्वारा दृढ़ता से वृषध्वज को मोहित कर दूँगा। आप काल के प्राप्त होने पर मेरा स्मरण करोगे और पालन का ध्यान रखोगे। हे बलसूदन! वह कार्य करने के लिए मैं जाता हूँ। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इतना कहकर वह कामदेव शंकर के आश्रम में गया। इन्द्र ने भी उस अवसर पर सब देवों से यह कहा था कि जहाँ पर कामदेव जाता है वहाँ पर आप लोग इसकी सहायता करें। वहाँ-वहाँ पर अनुगमन करके समय-समय पर मुझको बताओगे। जिस सम्मोहन के द्वारा यह कामदेव भगवान् शंकर को सम्मोहन करेगा हे सुरगणो! उस समय में मैं भी वहाँ पर जाऊँगा-ऐसा मुझको जान लो। इस प्रकार इन्द्रदेव द्वारा कहे गये देवगण कामदेव के पास चले गये थे। वह कामदेव भी गमन कर गया था जहाँ पर शम्भु गिरि के गंगावतरण स्थल में हिमाचल के शिखर पर थे। उसने सुरभि को नियोजित कर दिया था। इसके अनन्तर सुरभि के वहाँ पर पहुँचने पर जिसका कि वह लक्षण था कि शीघ्र ही भाँति-भाँति के तरु-लता और गुल्मों में पुष्प खिल गये थे। वहाँ पर किंशुक विकसित थे और मञ्जुल के तरु भी पुष्पित हो गये थे। सभी सरोवर खिले हुए पद्मों से शोभायमान हो गये थे तथा सभी तन्तुओं को विकार हो गया था। उस समय सुगन्धित वायु बहने लगी थी जिसमें पुष्पों के रेणु सम्मिलित थे। जो धीरे-धीरे सुखकर होकर मन को आकर्षित कर रहा था। सभी पक्षीगण, मृगवर्ग और जो भी प्राणधारी जीव थे और सिद्ध एवं किन्नरगण ने एकान्त भाव को विस्तृत किया था और वे नूतन बौरों के
२५४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ गुच्छों से भूषित हो गये थे। अशोक, पाटल और नागकेशर सभी विकार से समन्वित थे। हे द्विजो! भगवान् शम्भु के गण भी प्रत्यक्ष में विकार वाले हो गये थे किन्तु शम्भु के भय से इधर-उधर भ्रमण कर रहे थे। उस अवसर पर वहाँ भ्रमर कुसुमों से अद्भुत रस का पान करते हुए गुञ्जार करने वाले थे। इस प्रकार से सुरभि के प्रवृत्त हो जाने पर श्रृंगार ने अपने गणों के साथ हाव-भावों से संयुत होकर हर के समीप प्रवेश किया था। वहाँ पर कामदेव तो अपने गणों के सहित चिरकाल तक निवास करने वाला हो गया था। उस समय कोई भी ऐसा छिद्र शम्भू में नहीं देखा था जिससे वह उस समय में वह भय से विमोहित हो गया था। मदन आगे गमन करने वाला नहीं हुआ था क्योंकि रति के द्वारा वह वारित कर दिया गया था। हे द्विजसत्तमो! इस प्रकार उसको बहुत सा समय व्यतीत हो गया था। उस समय उन यति शम्भू में उसने कोई भी छिद्र नहीं प्राप्त किया। प्रज्वलित अग्नि सदृश और लाखों सूर्यों के समान प्रभा वाले ध्यान में स्थित भगवान् शंकर के पास पहुँचने के लिए कौन समर्थ था अर्थात् किसी की भी ऐसी शक्ति नहीं थी। इसके अनन्तर एक बार गिरि की पुत्री काली उनके सामने हुई थी जो करने के योग्य सेवा थी उसे करके वह सखियों के साथ प्रणत होकर स्थित हो गई थी। भगवान् शंकर भी अपने ध्यान का त्याग करके उसी क्षण समास्थित हुए थे। कृत्य में अपने गणों को योजित करते हुए वे ज्योतिस्वरूप चिन्ता से रहित थे। कामदेव ने वहीं छिद्र प्राप्त करके सबसे प्रथम हर्षण बाण के द्वारा पार्श्व शम्भु को हर्षित किया था और शृंगार सुरभि के साथ में कामदेव की सहायता कर रहा था। हर्षिणी बाण के द्वारा वे अति हर्षित होते हुए शृंगार आदि के द्वारा निषेवित हुए थे। भगवान् शंकर ने विशेष अभिप्राय के सहित काली के मुख को अच्छी तरह से अवलोकन किया था। कामदेव ने उसी छिद्र को प्राप्त करके पुष्प को चाप में नियोजित किया था। पुष्प से वृत तथा पुष्पमाला सहित सम्मोहन को छोड़ा था। उस समय उसके
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २५५ दक्षिण पार्श्व में रति थी और वाम में पुष्प से वृत तथा पुष्प माला सहित प्रीति थी। पीछे की ओर सुन्दर बसन्त तूणीर और पौष्य का समाधान करके स्थित था। जिस समय कामदेव ने संयत होकर पुष्प चाप को कानों तक खींच कर प्रस्तुत था उसी समय उसके समीप में वायु समुपस्थित हो गया था और इन्द्रिय के विकार समुत्पन्न होने वाले होकर संगम के लिए ग्रहण करने की इच्छा वाले हो गये थे। इन्द्र के सहित सब देवगण उस अवसर पर उपस्थित थे। उन्होंने कामदेव को परम सभ्य माना था क्योंकि वह देवों के कृत्य में निवेशित हो रहा था। इसके अनन्तर महादेवजी ने संस्मरण करके और उस अवसर पर मानसिक विचार को रोककर जो कि इन्द्रिय का हुआ था उन्होंने तुरन्त ही यह चिन्तन किया था। गिरिराज योनिजा और तपोव्रत से रहित हैं। मैं बलपूर्वक इसको पकड़ने की कैसी इच्छा कर रहा हूँ और क्यों संगम की कामना करने वाला हो गया हूँ। तप के व्रत से पवित्र अंगों वाली और तप के समाचरण से संस्कृत सती को दाक्षायणी की ही भाँति मैं स्वयं ही ग्रहण कर लूँगा। मैं इस समय में इच्छा न करते हुए भी विकारयुक्त कामवासना वाला हो गया हूँ। मैं किसी के द्वारा संगमोद्भव करने की इच्छा वाले से समाकृष्ट हो गया हूँ। इस प्रकार से इन्द्रिय के विकार के हेतु की खोज करते हुए उन्होंने बाण को संहित किए हुए कामदेव को देखा था। इसी बीच में ब्रह्मा जी समय को विज्ञात करके सुरों को देखकर अनुग्रह से अपने स्थान से उस बाण समागत हो गये। इसके अनन्तर का सन्धान किये हुए कामदेव को देखकर के शम्भु अधिक कुपित हो गये थे। वे अग्नि के समान ही प्रज्वलित हो गये थे और सबको बलपूर्वक दग्ध कर देने की इच्छा वाले हो गये थे। यह काम समय का ज्ञान करने मुझको मोहित करने की इच्छा करता है। मेरे मन को अपने वश में करना चाहता है इसलिए इसको यम को पहुँचाता हूँ। इस प्रकार चिन्तन करते हुए भगवान् शम्भु के नेत्र से उपजा तेज से जो कि बढ़ रहा था उसने अग्नि
२५६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ होकर नेत्र से क्रोध की उत्पत्ति की थी। क्रोध से निकलने वाली जातवेदा के स्वरूप वाली का ज्ञान प्राप्त करके कामदेव पुरुषों के भाग को निष्क्रमण करके कामदेव के वाणों को जान कर शक्ति से प्राणों को तथा आत्मा का आकर्षण करके विधाता ने पालन किया था और उन पितामह ने उस समय में बसन्त को उत्साहित किया था। उस समय अपनी शक्ति के द्वारा कामदेव को शम्भु के क्रोध से रक्षित करते हुए महेश्वर को क्रोधित देखकर देवगण जो आकाश में स्थित थे उन्होंने प्रार्थना की थी कि हे जगतों के नाथ! प्रसन्न होइए और कामदेव पर क्रोध का त्याग कर दीजिए। जिस प्रकार से पहले आपने शम्भुरूप में कर्म के द्वारा सृजन किया था और जिसने कर्म को आयोजित किया था उसी को कामदेव कर रहा है। इस कारण से हे शम्भो! कामदेव पर जो आपकी क्रोधाग्नि है उसका उपसंहार करिए। हे समस्त भूतों के स्वामिन्! आप प्रसन्न हो जाइए! हम लोग बड़ी ही भक्ति के भाव से आपके चरणों में प्रणत हुए हैं। इस भाँति वे देवगण कह रहे थे कि उनके कहते हुए हुओं के सामने ही शम्भु के ललाट की चक्षु से समुद्भूत अनल ने कामदेव को भस्म कर दिया था। ज्वालाओं की मालाओं से अत्यन्त दीप्त उस वह्नि ने कामदेव को दग्ध कर दिया था और वह फिर हर के समीप नहीं जा सका था। कामदेव ने भी कामदेव के शरीर से समुत्पन्न उस भस्म को लेकर अपने समस्त अंगों में उसी समय में भस्मे का लेप कर लिया था। जो लेपन करने से बची हुई भस्म थी उसका हर ने आदान कर लिया था। विधाता के द्वारा सम्मत होने पर शम्भु काली को त्याग कर गणों के सहित अन्तर्धान हो गये थे और ब्रह्माजी ने समस्त देवों को दहन करने वाली शम्भु की क्रोध की अग्नि को बड़वा कर रूप वाली देवों के आगे ही उस समय में कर लिया था। उस अवसर पर सौम्य, शुभ ज्वालामुखी बड़वा को देखकर पूर्व पीड़ित देवगण निर्विघ्न मन वाले हो गये थे। उसी समय विधाता उस ज्वालामुखी बड़वा को ग्रहण करके जगतों के स्वामी के लोकों के हित के लिए सागर में चले गये।
ब्रह्माजी सागर पर गमन कर वहाँ परिपूजित होते हुए बोले-हे विप्रेन्द्रो! महेश का क्रोध बड़कावा स्वरूप धारण करने वाला होवे और तुमको जब तक मैं विनय न करूँ तब तक ज्वालामुखी होकर सदा कार्य करना चाहिए। हे सरिताओं के स्वामिन्! जिस समय मैं समागत होकर कहूँ उस समय इस बड़वामुख क्रोध का आपको परित्याग करना चाहिए। आपका जल ही इसका भोजन होगा कि इसको यत्नपूर्वक नाप के धारण करना चाहिए कि यह किसी अन्तर को प्राप्त न होवे। इस तरह से ब्रह्मा के द्वारा कहे हुए सिन्धु ने उस समय उस क्रोध को अंगीकार कर लिया था। भगवान् शम्भु का अशक्य भी क्रोध को बड़वा के मुख में ग्रहण करने के लिए बड़वा का मुखपात्रक जलधि में प्रविष्ट हो गया था। ज्वाला की मालाओं से अत्यन्त दीपित उस अग्नि ने जल के समूहों का भली भाँति दाह करते हुए जिस समय में वह शम्भु के नेत्र से अद्भुत हुआ था उसी समय में उसने कामदेव को दग्ध कर दिया था। उस महान् शब्द से काम का दाह क्षण भर में करने वाले से समस्त आकाश परिपूरित हो गया था। ऐसा ही महान् शब्द उस समय में हुआ था। उस समय काली अपनी सखियों सहित शोक से संयुत होकर बहुत ही अधिक भयभीत हो गई थी। उस शब्द से हिमवान् भी अतीव विस्मित और चकित हो गया था। वह हिमवान् शीघ्र ही भगवान् शम्भु के आश्रम में गई हुई अपनी पुत्री काली के समीप गया। वहाँ पर पुत्री को भय और शोक से व्याकुल रुदन करती हुई अचलराज ने देखा जो शम्भु के विरह से बहुत ही आकुल हो रही थी। उस शोकाकुल दशा में अपनी पुत्री के समीप पहुँच कर हिमाचल ने अपने हाथ से उसके दोनों नेत्रों का मार्जन करते हुए कहा था-हे कालि! डरो मत और रुदन भी मत करो। यह कहकर उसको ग्रहण कर लिया था। अचलों के राजा हिमवान् उस अपनी पुत्री को अपनी गोद में बिठाकर अपने घर ले आये और उसको सान्त्वना दी। भगवान् शम्भु के अन्तर्धान हो जाने पर उनके विरह से युक्त होती