भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 442 में से

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पृष्ठ 246

२४८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ था। कुबेर भी तारक की इच्छा से यत्नपूर्वक सावधान होकर उसकी सेवा किया करता था। तारक के शासन से अगिन रसोइया हो गया था उस समय उसकी इच्छा से ही सदा भोज्य व्यञ्जनों को दिया करता था। निर्ऋति समस्त राक्षसों के सहित निरन्तर भय से अश्व, गज और वाहनों को चराता था। वह तारक सुरों से द्वेष रखता था और नृत्य करती अप्सराओं के स्तवन करने वाले सूत और मागधों का गान करने वाले गन्धर्वों के साथ भली भाँति क्रीड़ा किया करता था। इस रीति से तीन लोकों में देवों के जो भी सार-सार थे उन सबका उसने ग्रहण कर लिया था। उसने सभी देवों को जिनमें इन्द्र प्रमुख थे अभिवाधित कर दिया था। तब सब देवगण अनाथ होते हुए भी उत्तम नाथ ब्रह्माजी की शरण में प्राप्त हुए थे। उन देवों ने प्रणाम करके जिन सब में पुरहूत अगुआ थे महान् आत्मा वाले सब लोकों के पितामह से यह बोले। देवों ने कहा-हे लोकों के स्वामिन्! दैत्य तारक आपके दिये हुए वरदान से बहुत ही घमण्डी हो गया है। बलपूर्वक उसने हम सबको निरस्त करके हमारे देशों को स्वयं ही ग्रहण कर लिया है। हम लोग जहाँ-तहाँ पर स्थित हैं वह हमको दिन-रात बाधा दिया करता है। हम लोग भागे हुए हैं और सभी दिशाओं में तारक को ही देखा करता है। अग्नि, यम, वरुण, निर्ऋति, वायु और मनुष्य धर्म वाला सब परिकारों से युक्त है। हे ब्रह्मन्! ये सब देवगण उसके द्वारा पीड़ित हैं और उसके ही शासन से उसके ही अनुजीवी होकर उसके कार्यों में इच्छा न होने पर भी निरत रहा करते हैं। जो स्वर्ग में देवों की वनितायें, अप्सराओं के समुदाय तथा लोकों में सार पदार्थ है इन सबको तारक दैत्य ने ग्रहण कर लिया है। इस समय न तो यज्ञ ही हो रहे हैं और न तापसगण तपश्चर्या ही किया करते हैं तथा दान धर्म आदि कुछ भी लोकों में प्रवृत्त नहीं हो रहे हैं। उसका सेनापति पापी क्रौञ्च दानव है। वह पाताल में जाकर प्रजा को रात-दिन बाधा दिया करता है। हे पितामह! उस तारक ने यह सम्पूर्ण त्रिभुवन को हृत कर लिया है। यह सम्पूर्ण जगत् उसी