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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

२४८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ था। कुबेर भी तारक की इच्छा से यत्नपूर्वक सावधान होकर उसकी सेवा किया करता था। तारक के शासन से अगिन रसोइया हो गया था उस समय उसकी इच्छा से ही सदा भोज्य व्यञ्जनों को दिया करता था। निर्ऋति समस्त राक्षसों के सहित निरन्तर भय से अश्व, गज और वाहनों को चराता था। वह तारक सुरों से द्वेष रखता था और नृत्य करती अप्सराओं के स्तवन करने वाले सूत और मागधों का गान करने वाले गन्धर्वों के साथ भली भाँति क्रीड़ा किया करता था। इस रीति से तीन लोकों में देवों के जो भी सार-सार थे उन सबका उसने ग्रहण कर लिया था। उसने सभी देवों को जिनमें इन्द्र प्रमुख थे अभिवाधित कर दिया था। तब सब देवगण अनाथ होते हुए भी उत्तम नाथ ब्रह्माजी की शरण में प्राप्त हुए थे। उन देवों ने प्रणाम करके जिन सब में पुरहूत अगुआ थे महान् आत्मा वाले सब लोकों के पितामह से यह बोले। देवों ने कहा-हे लोकों के स्वामिन्! दैत्य तारक आपके दिये हुए वरदान से बहुत ही घमण्डी हो गया है। बलपूर्वक उसने हम सबको निरस्त करके हमारे देशों को स्वयं ही ग्रहण कर लिया है। हम लोग जहाँ-तहाँ पर स्थित हैं वह हमको दिन-रात बाधा दिया करता है। हम लोग भागे हुए हैं और सभी दिशाओं में तारक को ही देखा करता है। अग्नि, यम, वरुण, निर्ऋति, वायु और मनुष्य धर्म वाला सब परिकारों से युक्त है। हे ब्रह्मन्! ये सब देवगण उसके द्वारा पीड़ित हैं और उसके ही शासन से उसके ही अनुजीवी होकर उसके कार्यों में इच्छा न होने पर भी निरत रहा करते हैं। जो स्वर्ग में देवों की वनितायें, अप्सराओं के समुदाय तथा लोकों में सार पदार्थ है इन सबको तारक दैत्य ने ग्रहण कर लिया है। इस समय न तो यज्ञ ही हो रहे हैं और न तापसगण तपश्चर्या ही किया करते हैं तथा दान धर्म आदि कुछ भी लोकों में प्रवृत्त नहीं हो रहे हैं। उसका सेनापति पापी क्रौञ्च दानव है। वह पाताल में जाकर प्रजा को रात-दिन बाधा दिया करता है। हे पितामह! उस तारक ने यह सम्पूर्ण त्रिभुवन को हृत कर लिया है। यह सम्पूर्ण जगत् उसी

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २४९ के द्वारा हरण किया हुआ है। इस पापी से आप हमारा परित्राण करिए। हम लोग जहाँ पर जाकर स्थित रहेंगे उस स्थान को बतालइए। हे लोकनाथ! आप तो जगत् के गुरु हैं उनके द्वारा हम सब स्थान से भ्रष्ट कर दिए गए हैं। आप ही हम लोगों की गति हैं, शास्ता हैं, आप ही हमारे रक्षक पिता और प्रसूत करने वाले हैं। आप ही भुवनों के स्थापक, पालन करने वाले और कृती हैं। हे प्रजापते! जब तक हम लोग तारक नाम वाली अग्नि में भस्म होकर दग्ध न होवें अब आपको वैसा ही करना समुचित है अर्थात् वैसा ही करने के लिए आप योग्य हैं। ब्रह्मलोक में पितामह ने सुरों के इस वचन का श्रवण कर उन समस्त सुरों से कहा। ब्रह्माजी ने कहा-मेरे ही वरदान से तारक समृद्ध हुआ है। हे देवगणों! अब मेरे ही वरदान से मरण मुझ से होना युक्त नहीं होता है। आपका भी प्रतिकार होना ही चाहिए किन्तु मैं आपके द्वारा प्रेरित होकर भी भली भाँति कुछ भी प्रतिकार कर नहीं सकता हूँ। इस कारण से जैसे भी तारक स्वयं ही विनाश को प्राप्त हो वैसा आप लोग मुझसे समझ लेवें। मैं तो उपदेश ही कर देने वाला हूँ। मेरे द्वारा तारक वध नहीं होगा और वनमाली प्रभु के द्वारा भी वह वध के योग्य नहीं होगा, न हर के द्वारा तथा अन्य सुरों और मनुष्यों के द्वारा वह मारा जा सकता है। उसको तपश्चर्या करते हुए ही वरदान मैंने दे दिया था। हे सुरोत्तमो! इसका एक उपाय मैंने सोच लिया है उसे ही आप करिये। पूर्व समय में सती दाक्षायणी ने देह का त्याग कर दिया था और अपने जन्म धारण करने के लिए शैलराज की मेनका देवी के यहाँ गयी थी। गिरिराज ने उसको मेनका के उदर में समुत्पादित किया था। वह पहले साक्षात् लक्ष्मी की ही भाँति प्रसिद्ध हुई थी कि महादेव अवश्य उसका पाणिग्रहण कर लेंगे। हे सुरो! जिस प्रकार से वह शीघ्र ही उसमें अनुराग करने वाले हो जावें, उसी भाँति आप करें। उनका तेज ही आप सबका प्रतिकार करने वाला है। वे शम्भु भगवान् ऊर्ध्वरेता हैं। उनके वीर्य को वह प्रच्युत करने वाली है। उसी की ऐसी सामर्थ्य

२५० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ॐॐ है दूसरी कोई भी अन्य बाला ऐसी शक्तिशाली नहीं है। उससे जो भी पुत्र उत्पन्न होगा वह ही इस तारक नामक राक्षस का हनन करने वाला है, अन्य कोई भी नहीं है। वह गिरिराज की पुत्री इस समय में समारूढ़ यौवन वाली अर्थात् पूर्ण युवती है। गिरि के प्रस्थ पर तप श्रर्या नित्य ही करने वाले उन भगवान् के वाक्य से ही अपनी सखियों के साथ ध्यान में स्थित परमेश्वर सर्वज्ञ की वह सेवा कर रही है। अपने आगे विद्यमान रहने वाली तीनों लोकों में वरवर्णिनी के ध्यान में समासक्त महादेव मन से भी यही चाहते हैं। चन्द्रशेखर जिस रीति से भी उस काली को अपनी माया बनाना चाहें, हे देवगणों! आप लोग वैसा ही यत्नपूर्वक शीघ्र ही करें। आप लोगों को स्वर्ग अपना स्थान है। उससे मैं तारक को भी निवृत्त कर दूँगा। मैं उसके साथ संगत होऊँगा। आप लोग दुःखों से रहित होकर ही यहाँ से गमन कीजिए। इतना कहकर सब लोकों के स्वामी तारक नामक दैत्य के पास उपस्थित हुए थे। उसके समीप जाकर यह वचन उन्होंने कहा। हे तारक! आप स्वर्ग के राज्य को शासन करें। उसके लिए आपने पहले तपस्या नहीं की थी। मैंने भी ऐसा वरदान नहीं दिया था कि मेरे द्वारा आप स्वर्ग के राजा होवें। इस कारण स्वर्ग का परित्याग करके भूमि पर भी राज्य के शासन को करें। हे असुर! देवों के योग्य भोगों का उपभोग करने के लिए आपको वहीं पर भूमि में सब पदार्थ प्राप्त होंगे। इतना कहकर सब लोकों के स्वामी ब्रह्माजी जी वहीं पर अन्तर्धान हो गये थे। वह तारक भी स्वर्ग का परित्याग करके इसके उपरान्त भूमि पर समागत हो गया था। वहाँ पर ही संस्थित होकर वह नित्य ही देवों को बोधित किया करता था। उसने इन्द्र को कर देने वाला बना दिया था और उस महान् बलवान् को अपने निर्देश में स्थित कर दिया। इन्द्र देव उसको निरन्तर देवों के भोगने के योग्य पदार्थों को समर्पित करते हुए भी सेवा करके उस ईश्वर को सन्तुष्ट करने में समर्थ नहीं हुआ था। इस रीति से उसके द्वारा उत्पीड़ित हुए और क्रोध से परिपीड़ित होते हुए देवों ने विधाता के उपदेश से भगवान् शम्भु के वंश में यत्न किया था।

६०-३ श्रीकालिका पुराण ६०-३ २५१ शम्भु सुतोत्पति हो जावे, इस कार्य के सम्पादन करने में देवगण प्रयत्नशील हो गये थे। इसके अनन्तर इन्द्र देव के साथ संङ्गत होकर ऐसा निश्चय कर लिया था कि शम्भु को सुतोत्पति के लिए उद्यत किया जावे। इन्द्र देव ने कामदेव को बुलाकर उससे यह वचन कहा था। इन्द्र देव ने कहा- आपके द्वारा इस विश्व की प्रसूति की जाती है और आपके ही द्वारा विश्व का पालन किया जाता है। पहले आप ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र की प्रीति का हेतु हुए थे। ब्रह्माजी ने किसी समय में प्रीति से जिस प्रकार से चरित व्रत वाली सावित्री का ग्रहण कर लिया था। भगवान् माधव ने लक्ष्मी का ग्रहण किया था और भगवान् हर ने दाक्षायणी का ग्रहण कर लिया था। पहले समय में देवेशों की प्रीति के लिए जैसे उनको वर दिया था उसी भाँति अब मेरी भी प्रीति करिये। आप तो सदा ही प्राणधारियों की प्रीति के करने वाले हैं। हे काम! आप स्वर्ग, पाताल और भूमण्डल में किसके प्रिय नहीं है। आप जंगल के प्राणधारियों का सभी का अभिमत हैं। देव, दानव, यक्ष, राक्षस और मनुष्यों के आप पालक तथा कर्त्ता हैं और आप सब सम्पूर्ण जगतों के हित के सम्पादन करने के लिए विशेष चेष्टा कीजिए। जिससे देव, दानव, यक्ष और महात्मा तथा मनुष्यों का हित हो वही करिये। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-मकरध्वज ने यह इन्द्र का वचन श्रवण करके उसके वचन रूपी अमृतों से बहुत ही प्रसन्न होकर देवराज से कहा। जहाँ मेरी ईशता है, हे शुक्र! वह कर्म आपको ज्ञात ही है इस कारण जो मैं कर सकता हूँ उसे मैं करूँगा। आप इसका निर्देश कीजिए। मेरे पाँच ही बाण हैं जो बहुत ही कोमल पुष्पमेध हैं। मेरा चाप भी पुष्पों से परिपूर्ण हैं और उस चाप की डोरी भ्रमरों के स्वरूप वाली हैं। रति मेरी प्यारी जाया हैं। बसन्त मेरा सचिव है। मलय से सम्भूत वायु यन्ता है और मेरा मित्र सुधानिधि चन्द्रमा है। मेरी सेना का अधिक श्रृंगार हैं और हाव तथा भाव मेरे सैनिक हैं। ये सभी मेरे सहयोगी क्रूरता से रहित और कोमल हैं और मैं भी वैसा ही मृदु हूँ। आप तो धीमान् है मेरे करने का जो भी समुचित कार्य

२५२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ हो उसका भी योजित कर दीजिए । इन्द्र देव ने कहा-जिसके कराने की इच्छा कर रहा हूँ हे मनोभव! आपसे जो भी कराना चाहता हूँ, वह आपका समुचित कर्म है । उसमें आप परिवृत हैं । आप उसमें कृतकर्मा हैं, आपको उस कर्म का अनुभव हैं। हे मनोभव! आप कृती हैं। आपको छोड़ कर अन्यों से वह कर्म दुस्साध्य है । इसी से मैं आपका नियोजन करता हूँ । यह सुना जा रहा कि हिमालय के प्रस्थ में वृषभध्वज ध्यान में स्थित हैं और वधू के लिए वे आकांक्षा से रहित हैं। पिता के वचन से काली सखियों के सहित नित्य ही हर की अनुमति में होकर अब सेवा किया करती है। वे शम्भु तपश्चर्या कर रहे हैं। यद्यपि वह समारूढ़ यौवन वाली युवती है, स्त्रियों में रत्न के समान परम दिव्य हैं और अत्यधिक सुन्दरी भी हैं किन्तु महादेवजी ध्यान में ऐसे आसक्त हैं कि उसको मन से भी नहीं चाहते हैं। अतः जिस रीति से भी आप यह कार्य करिये । इनमें देवों का और जगतों का परमहित हैं यही जानकर आप ऐसा करें । वृषभध्वज जिस प्रकार से भी उस सती के साथ अनुराग वाले होकर रमण करें, वैसा ही करें। उसके रमण करने पर हर का जो तेज प्रच्युत होगा और उससे जो भी पुत्र समुत्पन्न होगा वही हमारा इस तारक से उद्धार करेगा । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर कामदेव ने देवराज के वचन का श्रवण करके पहले ब्रह्माजी के दिये हुए शाप का काल प्राप्त हो गया है । यह स्मरण किया था । सन्ध्या करने वाले विधाता पर जिस समय अपने शस्त्र की परीक्षा की थी जो उस समय कामदेव ने पुष्प के वाणों से प्रहार किया था और उसी अवसर पर विधाता ने उसको शाप दे दिया था । हे द्विजोत्तमो ! विधाता ने कहा कि तू शम्भू के नेत्र की अग्नि से दग्ध हो जायेगा। जिस समय भगवान् हर गिरि की पुत्री को पाणिप्रणीता भार्या करेंगे उसी समय आप शरीर के द्वारा सम्पूर्णता को प्राप्त कर लेंगे । इस विधाता के शाप का स्मरण करके भयभीत कामदेव ने शुक्र के वचन से हर को काली के साथ योजित कर देने के कार्य को स्वीकार कर लिया था। और फिर उस काल के सदृश कामदेव से यह वचन कहा था।

൵ श्रीकालिका पुराण ൵ २५३ मदन ने कहा-हे इन्द्र देव! मैं आपके वचन को पूर्ण करूँगा और गिरिजा के साथ भगवान् शम्भु को संगत कर दूँगा जैसा कि पहले दाक्षायणी के साथ किया था। किन्तु शम्भु के मोहन करने में आप मेरी एक सहायता करें। जिस समय में सम्मोहन के द्वारा हर का सम्मोहन करूँ उस अवसर पर आप मेरी सहायता करें। मैं सुरभि के द्वारा प्रवेश करके अर्थात् शंकर के आश्रम में शीघ्र ही प्रविष्ट होकर सर्वप्रथम दर्पण के द्वारा मन से विकार समुत्पन्न करके फिर सम्मोहन के द्वारा दृढ़ता से वृषध्वज को मोहित कर दूँगा। आप काल के प्राप्त होने पर मेरा स्मरण करोगे और पालन का ध्यान रखोगे। हे बलसूदन! वह कार्य करने के लिए मैं जाता हूँ। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इतना कहकर वह कामदेव शंकर के आश्रम में गया। इन्द्र ने भी उस अवसर पर सब देवों से यह कहा था कि जहाँ पर कामदेव जाता है वहाँ पर आप लोग इसकी सहायता करें। वहाँ-वहाँ पर अनुगमन करके समय-समय पर मुझको बताओगे। जिस सम्मोहन के द्वारा यह कामदेव भगवान् शंकर को सम्मोहन करेगा हे सुरगणो! उस समय में मैं भी वहाँ पर जाऊँगा-ऐसा मुझको जान लो। इस प्रकार इन्द्रदेव द्वारा कहे गये देवगण कामदेव के पास चले गये थे। वह कामदेव भी गमन कर गया था जहाँ पर शम्भु गिरि के गंगावतरण स्थल में हिमाचल के शिखर पर थे। उसने सुरभि को नियोजित कर दिया था। इसके अनन्तर सुरभि के वहाँ पर पहुँचने पर जिसका कि वह लक्षण था कि शीघ्र ही भाँति-भाँति के तरु-लता और गुल्मों में पुष्प खिल गये थे। वहाँ पर किंशुक विकसित थे और मञ्जुल के तरु भी पुष्पित हो गये थे। सभी सरोवर खिले हुए पद्‌मों से शोभायमान हो गये थे तथा सभी तन्तुओं को विकार हो गया था। उस समय सुगन्धित वायु बहने लगी थी जिसमें पुष्पों के रेणु सम्मिलित थे। जो धीरे-धीरे सुखकर होकर मन को आकर्षित कर रहा था। सभी पक्षीगण, मृगवर्ग और जो भी प्राणधारी जीव थे और सिद्ध एवं किन्नरगण ने एकान्त भाव को विस्तृत किया था और वे नूतन बौरों के

२५४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ गुच्छों से भूषित हो गये थे। अशोक, पाटल और नागकेशर सभी विकार से समन्वित थे। हे द्विजो! भगवान् शम्भु के गण भी प्रत्यक्ष में विकार वाले हो गये थे किन्तु शम्भु के भय से इधर-उधर भ्रमण कर रहे थे। उस अवसर पर वहाँ भ्रमर कुसुमों से अद्भुत रस का पान करते हुए गुञ्जार करने वाले थे। इस प्रकार से सुरभि के प्रवृत्त हो जाने पर श्रृंगार ने अपने गणों के साथ हाव-भावों से संयुत होकर हर के समीप प्रवेश किया था। वहाँ पर कामदेव तो अपने गणों के सहित चिरकाल तक निवास करने वाला हो गया था। उस समय कोई भी ऐसा छिद्र शम्भू में नहीं देखा था जिससे वह उस समय में वह भय से विमोहित हो गया था। मदन आगे गमन करने वाला नहीं हुआ था क्योंकि रति के द्वारा वह वारित कर दिया गया था। हे द्विजसत्तमो! इस प्रकार उसको बहुत सा समय व्यतीत हो गया था। उस समय उन यति शम्भू में उसने कोई भी छिद्र नहीं प्राप्त किया। प्रज्वलित अग्नि सदृश और लाखों सूर्यों के समान प्रभा वाले ध्यान में स्थित भगवान् शंकर के पास पहुँचने के लिए कौन समर्थ था अर्थात् किसी की भी ऐसी शक्ति नहीं थी। इसके अनन्तर एक बार गिरि की पुत्री काली उनके सामने हुई थी जो करने के योग्य सेवा थी उसे करके वह सखियों के साथ प्रणत होकर स्थित हो गई थी। भगवान् शंकर भी अपने ध्यान का त्याग करके उसी क्षण समास्थित हुए थे। कृत्य में अपने गणों को योजित करते हुए वे ज्योतिस्वरूप चिन्ता से रहित थे। कामदेव ने वहीं छिद्र प्राप्त करके सबसे प्रथम हर्षण बाण के द्वारा पार्श्व शम्भु को हर्षित किया था और शृंगार सुरभि के साथ में कामदेव की सहायता कर रहा था। हर्षिणी बाण के द्वारा वे अति हर्षित होते हुए शृंगार आदि के द्वारा निषेवित हुए थे। भगवान् शंकर ने विशेष अभिप्राय के सहित काली के मुख को अच्छी तरह से अवलोकन किया था। कामदेव ने उसी छिद्र को प्राप्त करके पुष्प को चाप में नियोजित किया था। पुष्प से वृत तथा पुष्पमाला सहित सम्मोहन को छोड़ा था। उस समय उसके

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २५५ दक्षिण पार्श्व में रति थी और वाम में पुष्प से वृत तथा पुष्प माला सहित प्रीति थी। पीछे की ओर सुन्दर बसन्त तूणीर और पौष्य का समाधान करके स्थित था। जिस समय कामदेव ने संयत होकर पुष्प चाप को कानों तक खींच कर प्रस्तुत था उसी समय उसके समीप में वायु समुपस्थित हो गया था और इन्द्रिय के विकार समुत्पन्न होने वाले होकर संगम के लिए ग्रहण करने की इच्छा वाले हो गये थे। इन्द्र के सहित सब देवगण उस अवसर पर उपस्थित थे। उन्होंने कामदेव को परम सभ्य माना था क्योंकि वह देवों के कृत्य में निवेशित हो रहा था। इसके अनन्तर महादेवजी ने संस्मरण करके और उस अवसर पर मानसिक विचार को रोककर जो कि इन्द्रिय का हुआ था उन्होंने तुरन्त ही यह चिन्तन किया था। गिरिराज योनिजा और तपोव्रत से रहित हैं। मैं बलपूर्वक इसको पकड़ने की कैसी इच्छा कर रहा हूँ और क्यों संगम की कामना करने वाला हो गया हूँ। तप के व्रत से पवित्र अंगों वाली और तप के समाचरण से संस्कृत सती को दाक्षायणी की ही भाँति मैं स्वयं ही ग्रहण कर लूँगा। मैं इस समय में इच्छा न करते हुए भी विकारयुक्त कामवासना वाला हो गया हूँ। मैं किसी के द्वारा संगमोद्भव करने की इच्छा वाले से समाकृष्ट हो गया हूँ। इस प्रकार से इन्द्रिय के विकार के हेतु की खोज करते हुए उन्होंने बाण को संहित किए हुए कामदेव को देखा था। इसी बीच में ब्रह्मा जी समय को विज्ञात करके सुरों को देखकर अनुग्रह से अपने स्थान से उस बाण समागत हो गये। इसके अनन्तर का सन्धान किये हुए कामदेव को देखकर के शम्भु अधिक कुपित हो गये थे। वे अग्नि के समान ही प्रज्वलित हो गये थे और सबको बलपूर्वक दग्ध कर देने की इच्छा वाले हो गये थे। यह काम समय का ज्ञान करने मुझको मोहित करने की इच्छा करता है। मेरे मन को अपने वश में करना चाहता है इसलिए इसको यम को पहुँचाता हूँ। इस प्रकार चिन्तन करते हुए भगवान् शम्भु के नेत्र से उपजा तेज से जो कि बढ़ रहा था उसने अग्नि

२५६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ होकर नेत्र से क्रोध की उत्पत्ति की थी। क्रोध से निकलने वाली जातवेदा के स्वरूप वाली का ज्ञान प्राप्त करके कामदेव पुरुषों के भाग को निष्क्रमण करके कामदेव के वाणों को जान कर शक्ति से प्राणों को तथा आत्मा का आकर्षण करके विधाता ने पालन किया था और उन पितामह ने उस समय में बसन्त को उत्साहित किया था। उस समय अपनी शक्ति के द्वारा कामदेव को शम्भु के क्रोध से रक्षित करते हुए महेश्वर को क्रोधित देखकर देवगण जो आकाश में स्थित थे उन्होंने प्रार्थना की थी कि हे जगतों के नाथ! प्रसन्न होइए और कामदेव पर क्रोध का त्याग कर दीजिए। जिस प्रकार से पहले आपने शम्भुरूप में कर्म के द्वारा सृजन किया था और जिसने कर्म को आयोजित किया था उसी को कामदेव कर रहा है। इस कारण से हे शम्भो! कामदेव पर जो आपकी क्रोधाग्नि है उसका उपसंहार करिए। हे समस्त भूतों के स्वामिन्! आप प्रसन्न हो जाइए! हम लोग बड़ी ही भक्ति के भाव से आपके चरणों में प्रणत हुए हैं। इस भाँति वे देवगण कह रहे थे कि उनके कहते हुए हुओं के सामने ही शम्भु के ललाट की चक्षु से समुद्भूत अनल ने कामदेव को भस्म कर दिया था। ज्वालाओं की मालाओं से अत्यन्त दीप्त उस वह्नि ने कामदेव को दग्ध कर दिया था और वह फिर हर के समीप नहीं जा सका था। कामदेव ने भी कामदेव के शरीर से समुत्पन्न उस भस्म को लेकर अपने समस्त अंगों में उसी समय में भस्मे का लेप कर लिया था। जो लेपन करने से बची हुई भस्म थी उसका हर ने आदान कर लिया था। विधाता के द्वारा सम्मत होने पर शम्भु काली को त्याग कर गणों के सहित अन्तर्धान हो गये थे और ब्रह्माजी ने समस्त देवों को दहन करने वाली शम्भु की क्रोध की अग्नि को बड़वा कर रूप वाली देवों के आगे ही उस समय में कर लिया था। उस अवसर पर सौम्य, शुभ ज्वालामुखी बड़वा को देखकर पूर्व पीड़ित देवगण निर्विघ्न मन वाले हो गये थे। उसी समय विधाता उस ज्वालामुखी बड़वा को ग्रहण करके जगतों के स्वामी के लोकों के हित के लिए सागर में चले गये।

ब्रह्माजी सागर पर गमन कर वहाँ परिपूजित होते हुए बोले-हे विप्रेन्द्रो! महेश का क्रोध बड़कावा स्वरूप धारण करने वाला होवे और तुमको जब तक मैं विनय न करूँ तब तक ज्वालामुखी होकर सदा कार्य करना चाहिए। हे सरिताओं के स्वामिन्! जिस समय मैं समागत होकर कहूँ उस समय इस बड़वामुख क्रोध का आपको परित्याग करना चाहिए। आपका जल ही इसका भोजन होगा कि इसको यत्नपूर्वक नाप के धारण करना चाहिए कि यह किसी अन्तर को प्राप्त न होवे। इस तरह से ब्रह्मा के द्वारा कहे हुए सिन्धु ने उस समय उस क्रोध को अंगीकार कर लिया था। भगवान् शम्भु का अशक्य भी क्रोध को बड़वा के मुख में ग्रहण करने के लिए बड़वा का मुखपात्रक जलधि में प्रविष्ट हो गया था। ज्वाला की मालाओं से अत्यन्त दीपित उस अग्नि ने जल के समूहों का भली भाँति दाह करते हुए जिस समय में वह शम्भु के नेत्र से अद्भुत हुआ था उसी समय में उसने कामदेव को दग्ध कर दिया था। उस महान् शब्द से काम का दाह क्षण भर में करने वाले से समस्त आकाश परिपूरित हो गया था। ऐसा ही महान् शब्द उस समय में हुआ था। उस समय काली अपनी सखियों सहित शोक से संयुत होकर बहुत ही अधिक भयभीत हो गई थी। उस शब्द से हिमवान् भी अतीव विस्मित और चकित हो गया था। वह हिमवान् शीघ्र ही भगवान् शम्भु के आश्रम में गई हुई अपनी पुत्री काली के समीप गया। वहाँ पर पुत्री को भय और शोक से व्याकुल रुदन करती हुई अचलराज ने देखा जो शम्भु के विरह से बहुत ही आकुल हो रही थी। उस शोकाकुल दशा में अपनी पुत्री के समीप पहुँच कर हिमाचल ने अपने हाथ से उसके दोनों नेत्रों का मार्जन करते हुए कहा था-हे कालि! डरो मत और रुदन भी मत करो। यह कहकर उसको ग्रहण कर लिया था। अचलों के राजा हिमवान् उस अपनी पुत्री को अपनी गोद में बिठाकर अपने घर ले आये और उसको सान्त्वना दी। भगवान् शम्भु के अन्तर्धान हो जाने पर उनके विरह से युक्त होती

गौरी परीक्षा वर्णन

२५८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ हुई निरन्तर पिता के घर में निवास करती हुई भी बहुत चिन्तित हुई थी और मोह को प्राप्त हो गई। शैलों के राजा, मेनका, मैनाक और दोनों सखियों ने उस अदीनसत्व वाली को सान्त्वना दी थी तो भी उमा ने भगवान् शम्भु का विस्मरण नहीं किया था। गौरी परीक्षा वर्णन इसके बाद देवर्षि नारदजी जो अपनी इच्छा से ही परम गमन करने वाले थे इन्द्र के द्वारा नियोजित होते हुए उस अवसर पर हिमवान् के मन्दिर में समागत हुए थे। वे वहाँ पर अचलराज द्वारा पूजित हुए थे जो हिमवान् महान् आत्मा वाले थे। उसे हिमवान् को छोड़कर वे देवर्षि एकान्त में उस काली के समीप गये। उस मुनिवर ने काली के समीप पहुँच कर उस ज्ञानशालिनी को सम्बोधित करके समस्त जगतों का हित करने वाला परम तथ्य वचन कहा था। देवर्षि ने कहा- हे काली! मेरे इस वचन का श्रवण करो और उसको परम सत्य समझो। तुमने तपश्चर्या के बिना ही उन भगवान् शम्भु की सेवा की है। वे महादेव उससे अनुराग करनेवाले भी हैं किन्तु महादेव ने तुमको त्याग दिया था। तुम्हारे बिना वे शिव दूसरी किसी को भी ग्रहण नहीं करेंगे। इस कारण से आप तपश्चर्या से संयुक्त होकर चिरकाल पर्यन्त महादेव जी की आराधना करो। जब तुम तप से संस्कार वाली हो जाओगी तो वे तुमको अपनी पत्नी के रूप में ग्रहण करेंगे। हे सुभगे! उसका यह मन्त्र है, आप श्रवण करिये जिसके द्वारा शीघ्र ही प्राप्त होंगे। आराधना किए हुए वे महेश्वर आपको प्रत्यक्ष होकर दर्शन देंगे। 'ॐ नमः शिवाय' यह मन्त्र सर्वदा भगवान् शंकर का प्रिय है। आप इनके स्वरूप का चिन्तन करती हुई नियम में स्थित रहकर छह अक्षरों वाला इस मन्त्र का जप करिए। हे गिरिजे! इससे शिव सन्तुष्ट हो जायेंगे। महात्मा नारदजी द्वारा यह कंहने पर काली ने उस समय अपना कर्तव्य जान लिया था क्योंकि उनका वचन सर्वथा तथ्य और हितकर था। उस समय नारदजी काली को तपश्चर्या हेतु समुद्यत अनुमान कर

[Page Header] ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २५९ ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ

[Page Body] स्वर्ग गमन कर गये थे और उसकी बुद्धि व्रत करने में निश्चित हो गई । इसके अनन्तर देवर्षि के गमन करने पर काली मेनका के समीप पहुँची थी और मेनका से तप करने को बतलाया था । काली ने कहा-हे माता! मैं महेश्वर की प्राप्ति के लिए तप करने के लिए गमन करूँगी । आज तप के लिए तपोवन को गमन करने के लिए आप मुझे आज्ञा करिए । मेरे तप करने का निश्चय आप पिताजी से शीघ्र ही निवेदन कर दीजिए । हे जननि! जब तक मैं भूतेश्वर के विरह की अग्नि से दग्ध न होऊँ इससे पूर्व ही में तप करना चाहती हूँ । काली के इस वचन को श्रवण करके माता शोक से, कर्षित हो गयी थी । उसने अपनी पुत्री का आलिंगन करके उससे कहा था-हे वल्लभे! तपस्या मत करो । हे बेटी तुम्हारा शरीर बहुत ही कोमल है, तपश्चर्या जैसे कठोर कर्म करने के लिए गमन मत करो, तपस्या के कष्ट को सहन करने के लिए मुनियों का शरीर ही समर्थ होता है । तुम्हारा शरीर क्लेश को सहन करने की क्षमता नहीं रखता है । हे पुत्री! आपका वन में निवास करना तो शत्रुगणों को कभी अभीष्ट नहीं हैं । इसी कारण से वन में तप के विचार का परित्याग कर दो । तुम्हारे शरीर के जो अनुरूप हो वही तप करो जो हित के सम्पादन करने वाला होवे । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-उस गिरिजा ने माता के वचन का श्रवण किया और वह हीन मन वाली हो गई थी । और वे तपस्या के यत्न में परायण हुई उस समय उसने माता से यह वचन कहा था-मुझे निषेध मत करो । मैं आज तप के लिए तपोवन गमन करूँगी । यदि आपके द्वारा मुझे आज्ञा नहीं दी गई तो में छिपकर चली जाऊँगी । मेनका ने कहा-हे पुत्री! गृहों में ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवगण निरन्तर ही निवास किया करते हैं । इस कारण से तुम जो भी देव अभीष्ट हो उनका घर में ही अभ्यर्चन करो । अपने स्वामी के रहित होकर स्त्रियों की तपोवन में गति का होना कभी नहीं सुना गया है । इस कारण से हे पुत्री! वन की ओर गमन करके तपश्चर्या की यात्रा करना उचित नहीं प्रतीत होता है ।

२६० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ क्योंकि मेनका के द्वारा तपस्या के लिए वन में जाना निरस्त कर दिया था अर्थात् निषेध कर दिया गया था उस समय में सती उमा ने सोमा-यह नाम प्राप्त कर लिया था। उस अवसर पर हिमाचल की पुत्री ने माता की अवज्ञा करके सखियों के द्वारा तप करने का उद्यम पिता के ज्ञापित किया था। उस गिरियों के स्वामी ने तप के लिए समाचरित उद्यम का ज्ञान प्राप्त करके अत्यन्त प्रसन्न मन वाला न होते हुए ही अपनी पुत्री को अनुमति दे दी थी। उसी समय सती ने पिता को अनुज्ञापित करके जहाँ पर कामदेव शम्भु के द्वारा दग्ध किया था उसी गंगावतरण की ओर वह चली गयी। गंगावतरण को काली ने भगवान् हर के रहित ही देखा था। उस समय में उसकी चिन्तो से संयुत हो गई थी। पहले जहाँ स्थित होकर शम्भु बहुत ध्यान वाले हुए थे। वह काली वहाँ पर स्थित होकर विरह से पीड़ित हो रही थी। गिरि की पुत्री वहाँ पर 'हाहा' कहती हुई चिन्ता और शोक से समन्वित तथा अत्यन्त दुःख से पीड़ित हो विलाप करने लगी थी। क्षण भर तक काली ने विलाप किया था फिर उसी समय में उसको पूर्व उद्भव का स्मरण हो गया था। कमलों के समान नेत्रों वाली उमा ने हर के हार्द को और मोह को प्राप्त किया था। इसके पश्चात् चिरकाल उस भामिनी ने धीरता से मोह का संस्तम्भन किया था और वहीं पर नियम के लिए वह रुक गई थीं और हिमवान् की सुता नियम के लिए दीक्षित हो गई थी। उसका प्रथम नियम फलों का ही भोजन करके रहना था। पञ्च अग्नियों की तपस्या ही उसकी चर्या थी, शाम्भवी अर्थात् शम्भु से सम्बन्ध रखने वाली चिन्ता थी तथो सम्बन्धित जप था। यज्ञिय अर्थात् यज्ञ में काम आने वाले सूखे काष्ठों से चारों वह्नियों की स्थापना करके जो वैश्वानर की दृष्टि के द्वारा की गई थी। उनके मध्य में स्थित होती हुई वल्कलों के वस्त्रों वाली सूर्य के बिम्ब का वीक्षण करती थी। ग्रीष्म ऋतु को अग्नि के मध्य में और शिशिर में वह जल से वास करने वाली हुई थी। प्रथम समय फलों के द्वारा और द्वितीय समय केवल जल से व्यतीत किया था। तीसरा

६०८ श्रीकालिका पुराण ६०८ २६१ समय हिमवान् की पुत्री ने क्रम से से पर्णों को भी छोड़ दिया । बिना आहार के व्रत वाली होकर वह तपश्चरण से क्षीण हो गई क्योंकि हिमवान् की पुत्री ने आहार में पर्णों का भी त्याग कर दिया था । इसी से देवों ने पृथ्वी तल में उसको अपर्णा कहा था । पाँच अग्नियों के ताप व्रत से और जल में प्रवेशों के द्वारा उसने तप किया था । वह हिमाचल की पुत्री बसन्त में एक ही पाद से स्थित हुई थी । छःअक्षरों वाले मन्त्र का जप करती हुई उसने चिरकाल महान् तप का समाचरण किया था । वह चीरों और वल्कलों से शरीर को ढांपने वाली थी । वह जटा-जूटों के समूह रखने वाली थीं उसके सब अंग कृश हो गये थे परन्तु वह चिन्तन करने में शक्त थी । उसने ऐसा तप किया था कि मुनियों को भी जीत लिया । उस तपस्या के समाचरण में उसकी रक्षा स्वयं भगवान् शम्भु ने की थी । वे भगवान् शम्भु उसको सदा ही आप्यायित करते थे और हर्षित होकर उसकी भय से भी रक्षा किया करते थे । इस प्रकार से काली को तपोवन में तीन सहस्र वर्ष व्यतीत हो गये । तब वह स्वयं वीक्षण से संस्कृत हो गई थी और दैव के द्वारा वह देवी हर के योग्य हो गई थीं । तिरेसठ सहस्र वर्षों के अन्त में जहाँ पर भगवान शम्भु ने तपस्या की थी, वहाँ पर क्षण भर स्थित होकर भामिनी ने चिन्तन किया था । महादेव क्या इस समय नियमों में संस्थित मुझको नहीं जानते हैं कि कारण से बहुत अधिक काल पर्यन्त तप में रत हुई का मुझे अनुज्ञान नहीं किया है । क्या मुनियों के द्वारा स्तवन किये गये गिरीश लोक में यहाँ पर नहीं हैं । देवी के द्वारा तो हर सब कुछ के ज्ञान रखने वाले, सर्वस्त्र गमन करने वाले देव कहे जाया करते हैं । वह सर्वत्रगामी, सर्वज्ञाता, सबकी आत्मा, सबके हृदय में रहने वाले, सबके विभूति प्रदाता और सर्व भावनों के भी भगवान देव हैं । मैं सती और मेरी माता मेनका है । यदि मैं वृषभध्वज में अनुराग से युक्त हूँ और अन्य में मेरा अनुराग नहीं है तो वह शंकर मुझ पर प्रसन्न हो जावें । यदि नारद के मुख से निकला हुआ छः अक्षरों वाला मन्त्र भक्तिभाव से मैंने जप

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किया है तो इससे हरि मुझ पर प्रसन्न हो जावें । यदि वास्तव में मैंने सत्य किया है सत्यतापूर्वक मैंने हरि की आराधना की है, यदि तप सत्य है तो इससे भगवान हर मुझ पर प्रसन्न हो जावें । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- वह काली इस प्रकार से विशेष चिन्तन करती हुई जब भगवान् के आश्रम में संस्थित हुई थीं जिसका मुख नीचे की ओर था, दीन वेश था और वह जटा तथा वल्कलों से मण्डित थे । उस समय में कृष्ण मृग की छाला के उत्तरीय से शोभित, कमण्डलु और दण्ड धारण किए हुए, ब्रह्माजी श्री ये देदीप्यमान और परम शोभित ब्रह्मचारी परिवीत जटाओं से उद्रिक तनु को धारण करनेवाला था। ब्राह्मण के स्वरूप को धारण करने वाले शम्भु उसी समय द्विज ने उससे सम्भाषण किया था। उस समय प्रत्यक्ष रूप से अनुराग का ज्ञान प्राप्त करने के लिए और उसके मुख से वचन का श्रवण करने के लिए इच्छा करते हुए उस वाग्मी ने विचित्र वाक्य के द्वारा गिरिजा से पूछा था । ब्राह्मण ने कहा- हे कल्याणी! आप कौन है और किसकी पुत्री हैं ? इस विजन वन में किस लिए प्रत्यतात्मा मुनियों के साथ वह दुर्धर्ष तप कर रही हैं ? आप न तो बाला हैं और न वृद्धा ही है। आप तो अत्यन्त शोभन तरुणी हैं, बिना पति के निरन्तर क्यों यह इस समय में तपस्या कर रही हैं ? हे भद्रे! अथवा क्या आप किसी तपस्वी की पत्नी हैं वह तपस्वी पुष्पादि का समाहरण करने के लिए यहाँ से अन्य स्थल में चले गये हैं ? यदि आपको कोई गोपनीयता न हो तो यह मुझे आप सब बतलाइए । मैं उसको हटाने के लिए समर्थ हूँ। उस विप्र के द्वारा इस रीति से कही हुई गिरिजा ने अपनी सखी को उसको उत्तर देने के लिए कटाक्ष के द्वारा नियोजित कर दिया था। विजया सखी, उस समय उसके वचन से गिरिजा के मुख को देखती हुई यथातथ्य से बोली । हे द्विजोत्तम! यह इसी गिरिजा की पुत्री है और यह पार्वती-नाम से प्रख्यात है और काली के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह किसी भी द्वारा कही नहीं गयी है। वह वृषभध्वज शंकर को अपना दयित पति चाहती

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २६३ ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ हुई तीव्र तप का समाचरण कर रही है । तीन सहस्त्र वर्ष हुए यह भामिनी तपस्या कर रही हैं किन्तु भगवान् शंकर इस गिरिजा की पुत्री को प्राप्त नहीं हो रहे हैं । भगवान् शंकर सर्वत्र गमन करने वाले परमेश्वर देवों, मुनिगणों और तपस्वियों के द्वारा कहे जाया करते हैं । क्या वे इसको नहीं जानते हैं । क्या वे पर्वत के शिखर पर विराजमान नहीं है ? यह आज इसी चिन्ता में दुःखित हैं और इसको सुख प्राप्त नहीं हो रहा है । हे सुव्रत! आप भगवान् शंकर से इसका संगम कर दीजिए । उस द्विज ब्रह्मचारी ने उस समय उसके इस वचन का श्रवण करके मुस्कराते हुए उस पार्वती को यह वचन बोला था । ब्राह्मण ने कहा-मैं अमोघ दर्शन वाला हूँ और मैं भगवान् हर को लाने के लिए भी समर्थ हूँ । किन्तु मैं आज एक बात कहता हूँ-मेरे निश्चित मत का श्रवण करिए । मैं महादेवजी का जानता हूँ, मैं उनको बोल भी दूँगा किन्तु मुझ से सुन लो, वृषभध्वज महादेव विभूति के वेष वाले हैं और जटाधारी हैं । वे बाघम्बर के वस्त्र धारण करने वाले, एकाकी और मृग के चर्म से ढके हुए रहते हैं । वे कपालों को धारण करते हैं तथा सर्पों के समुदायों से वेष्टित रहा करते हैं । उन शम्भु का गला विष से दग्ध हो रहा है उनके तीन नेत्र हैं-वे विरूपाक्ष हैं और विभीक्षण हैं अर्थात् विशेष रूप से भयंकर हैं । उनका जन्म भी अव्यक्त है अर्थात् उनके जन्म से विषय में कुछ भी किसी को ज्ञान नहीं है वे निरन्तर गृहस्थाश्रम के भोग से रहित हैं । शंकर ज्ञानिजन तथा बन्धुजनों से हीन हैं और भक्ष्य भोज्य से भी वर्जित हैं । शम्भु निरन्तर श्मशान में निवास करने वाले हैं और संग से परिवर्जित रहा करते हैं । गर्जन करने वाले, विकृत स्वरूपधारी और तीक्ष्ण भूत गणों से सदा घिरे हुए रहा करते हैं । शंकर श्रृंगार रस से रहित हैं तथा उनके न कोई भार्या है और न पुत्रादि ही हैं । किस कारण से आप उनको अपना भर्त्ता बनाना चाहती हैं । मैंने पूर्व में होने वाला भी उनका एक दूसरा कृत्य सुना है । आप उसका श्रवण करिये मैं आज आपको

बतलाता हूँ। यदि आपको अच्छे लगे तो ग्रहण कीजिए। प्रजापति दक्ष की पुत्री सती परम साध्वी थी उसने पहले वृषभध्वज को अपना पति वरण किया था। यह भाग्य की ही बात थी वह पति सम्भोग से रहित थे। यह कपाली की जाया है इसी से वह सती दक्ष के द्वारा परिवर्जित कर दी गई थी। यज्ञ में भाग लेने के लिए शम्भु को भी वर्जित कर दिया गया था। उसी अपमान के होने से सती अत्यधिक शोक से आकुल हो गई थी। उस सती ने अपने परम प्रिय प्राणों का परित्याग कर दिया था, भगवान् शंकर भी त्याग कर दिए गये थे। आप तो स्त्रियों में रत्न के ही समान अत्युत्तम हैं। अपका पिता हिमवान् सभी पर्वतों का राजा है। फिर किस कारण से उस प्रकार के पति के प्राप्त करने की इस उम्र में तप के द्वारा इच्छा कर रही हैं? देवों का स्वामी, धनेश, पवन, वरुण, अग्नि अथवा कोई अन्य देव अथवा सब वैद्य अश्विनीकुमार, विद्याधर, गन्धर्व, नाग अथवा मानुष जो भी रूप और यौवन से सुसम्पन्न आपका पति होने योग्य है। जिसके द्वारा आप बहुत रत्नों के समूह से पूरित बहुमूल्य माल्य प्रवरों से संयुत धूप के चूर्णों से सुवासित, कोमल आस्तारण से समन्वित, सुमनोहर, सुविस्मृत, सुरम्य प्रासाद के मध्य में स्थित सुवर्ण के द्वारा विशेष रूप से चित्रित शय्या के बल में समासादन करके संस्थित रहने वाला ही आपका योग्य पति होगा। हे सुभगे! इस भाँति ज्ञान प्राप्त करके भी यदि आप शंकर को ही अपना बनाना चाहती है तो फिर आपको इन तपस्याओं से क्या प्रयोजन है मैं अपने आप ही उनके साथ योजित किये देता हूँ। यह सुनकर काली क्रोधित हुई। इस ब्राह्मण को उसने उत्तर के रूप में बहुत ही अल्प और तथ्य कहा था। काली ने कहा-तुम देवेश्वर हर को नहीं जानते ही बल्कि व्यर्थ ही आपने कह डाला है। जिन प्रभु के भाव को इन्द्रादि और ब्रह्मा प्रभृति सुर भी नहीं जानते हैं। उनके भाव को तुम शिशु होते हुए, हे विप्रसुत! क्या जान सकोगे। आपने जो भी नीचों के मुख से भाषित सुना है वह बहुत तुच्छ हैं।

ᏋᏊ श्रीकालिका पुराण ᏋᏊ २६५ आप इधर-उधर से सुनकर ही ऐसा भाषण कर रहे हैं। आपने उनका कभी भी दर्शन नहीं किया है। इस कारण से मैं आपसे वरदान नहीं चाहती हूँ और न पति के विषय में जानना चाहती हूँ। गिरिजा ने उन विप्र को इतना ही कहकर अपनी सखी का मुख देखकर उस अवसर पर संशय में समारूढ़ होकर यह कहा था। इसलिए मैं इस समय स्तुति वाक्य के द्वारा उसका प्रायश्चित् करूँगी। जो भी कोई महान् आत्मा वालों की निन्दा का श्रवण करता है अथवा बुराई किया करता है उन दोनों का अपराध समान ही होता है, ऐसा मैंने अपने पिताजी के मुख से पूर्व में श्रवण किया है। इसी कारण से में इसको दूर करूँगी सो विप्र को निषेध कर दो अर्थात् रोक दो। उस काली ने यह सखी से कहकर अपराध के सम्मार्जन करने के लिए भगवान् शम्भु का स्तवन करना आरम्भ कर दिया। काली ने कहा-शान्त और कारणत्रय के हेतु अर्थात् सृष्टि स्थित और संहार इन तीनों के कारण स्वरूप शिव के लिए नमस्कार है। हे परमेश्वर! मैं अपने आपको निवेदन करती हूँ और आप ही मेरी गति हैं। विज्ञान, सौभाग्य और सुहृत में गत, प्रपञ्च से रहित हिरण्यबाहु, नारायण के नाभि पद्म से समुत्पन्न प्रधान बीज, जगत् के हितरूप आपके लिए नमस्कार। इस भाँति स्तवन करती हुई उसको यह द्विज पुनः उस समय कुछ कथन करने के लिए उद्यत होने वाला है यह समीक्षण करके काली को यत्न कर दिया था और गिरिराज की पुत्री ने समझ करके सखी से कहा था। यह द्विज कुछ कहना चाहता है और उग्र हर को नहीं जानता। अतएव यह उनकी निन्दा कर रहा है। किन्तु मैं प्राणों के हरण करने वाली शिव की निन्दा सुनने में समर्थ नहीं हूँ। हे सखी! इस समय जब तक इसके वचनों का श्रवण नहीं करूँ तब तक मैं दूर देश को गमन करती हूँ। हे मत्प्रिये! वहाँ पर दूर देश में समुपस्थित रहूँ। इतना कहकर वह काली हिमवान् की पुत्री उसी सखी के सहित प्रस्थान कर गई थी और द्विज को हठात् छोड़कर

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उठकर चली गयी थी। इसके अनन्तर निज रूप प्रकट होकर शंकर ने रूदन करती हुई हिमवान् की सुता के पीछे गमन किया था। शिव ने कहा-मैं ही महादेव हूँ और हर हूँ! क्या अब आप मेरा स्तवन नहीं करती है। हे काली! हे शांकरि!! मेरे सम्मुख होकर मुझे समाश्वासित करो। इतना कहकर वे महादेव काली के आगे गमन कर उपस्थित हो गये थे। उन्होंने दोनों हाथों को फैलाकर उस काली की गति का अवरोध किया था। वह गिरिराज की बेटी शम्भु के मुख को देख कर उसी क्षण बरबस नीचे की ओर मुख वाली हो गई थी जिस तरह से वायु से चकित तडित हो जाया करती है। प्रीति की लज्जा से मन्द नेत्रों वाली होते हुए उस समय में वह जड़ की ही भाँति हो गयी थी वह भामिनी बोलने की इच्छा वाली होती हुई भी बोलने में समर्थ न हो सकी थी। हे द्विजोत्तमो! मनोरथों की सिद्धि को जानने से उनका शरीर सुधा से पूरित के समान हो गया था और आनन्द से परिपूर्ण हो रहा था। नौ सहस्र वर्ष तक उस काली ने तपश्चर्या का क्लेश प्राप्त किया था। किन्तु उसी क्षण में उस सम्पूर्ण क्लेश का त्याग करके वह आनन्द से हर्षित हो गई थी। उस प्रकार से अवस्थित उसको प्रणय वाली देखकर वृषभध्वज भस्मीभूत कामदेव के द्वारा जो कि गात्र में विद्यमान था, मोहित हो गये थे। इसके अनन्तर विरह से उद्रिक्त होकर वृषभध्वज साथ में आकर सम्बोधन करते हुए आनन्द से यह चाटु वचन कहने लगे थे। हे सुन्दरी! क्या मुझसे कुछ भी कहना नहीं चाहती हैं ? तप के क्लेश का स्मरण करती हुई क्या इस समय में मुझ पर कुपित हो रही हैं। हे सुभगे! तुम्हारे बिना मैं परितप्त हो रहा हूँ। मेरे समय से जो आपने तप श्रर्या करने का सामारम्भ किया था। हे प्रिये! मैं अनुराग से युक्त हूँ। मैं संस्कार करके तुम्हारे साथ होऊँगा। मैंने जो प्राण किया था, व्यतीत हो गया। आप भी तप के लिए समुद्यत हुई थीं और उस तप से ही आप भली भाँति संस्कृत हो गई हैं। आपने भली-भाँति चिन्तन किया, तीव्र

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २६७ जप किया और सदा तप किया था । आपने यह सब करके बड़ी भारी कीमत के द्वारा मुझे खरीद लिया है । अब मैं आपका दास गया हूँ मुझे नियोजित कीजिए । आप अपने अंग-संस्कार करके जटाओं के प्रसाधन में मेरा नियोजन करें । शरीर से वल्कल को हटाकर सुन्दर वस्त्रों का निवेशन करने में, हार नूपूर और काञ्ची आदि के परिधान करने में, हे शुभे! शीघ्र ही नियोजित करिए । मैंने जो कामदेव को दग्ध कर दिया था वह भस्म रूप से मेरे शरीर में स्थित है । मेरा प्रतिकार करके ही मुझे तुम्हारे ही सामने दग्ध कर देना चाहता है । हे मनोवर! अपने अंग के अमृत के दान के द्वारा उस कामग्नि से मेरा उद्धार करिये । हे दरिते! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये । काली-हर समागम वर्णन मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- भगवान् शम्भु ने वचन का श्रवण कर गिरिजा अत्यन्त हर्षित हो गई थी और उसने उस समय में शम्भु को अपना प्राप्त हुआ पति मान लिया था । काली ने सखी के मुख से भगवान् शंकर से कहा था । जिस रीति से शम्भु सुनने की इच्छा करते हुए वाक्य का श्रवण कर रहे हैं। यहाँ पर सन्धि में अति भेद से सज्जक प्रवृत्त नहीं होते हैं । शंकर हर मर्यादा से मेरे उस पाणि का ग्रहण करें । कन्या पिता के द्वारा दत्त हुआ करती है तप से दत्त (दी हुई) नहीं होती है । इससे हिमवान् पिता की भली भाँति प्रार्थना करके भगवान् हर वैवाहिक विधि से ही मेरे पाणि का ग्रहण करें । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- इसके अन्तर काली लज्जा से समन्वित होती हुई विराम को प्राप्त हो गई थी । उस अवसर पर भगवान् शम्भु ने भी उसके वचन को सर्वथा सत्य और तथ्य एवं उचित ही ग्रहण किया था । इसके उपरान्त भगवान् शम्भु अपने गणों के सहित ही वहाँ निवास करने लगे थे । जिस प्रकार से पहले रहते थे उसी भाँति इस समय भी उस गंगावतरण शिखर पर रहते थे । वह काली अपनी सखियों के साथ घिरी हुई अपने पिता के घर में चली गयी । वह सती दीन होती हुई