भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 417, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 417

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४२१ कामाख्या कवच माहात्म्य वर्णन आप दोनों श्रवण कीजिए मैं कामाख्या देवी के माहात्म्य का वर्णन करूँगा । हे वेताल! हे भैरव! अंगों के सहित उस रहस्य से युक्त को आप दोनों सुनिए । एक समय भगवान विष्णु शीघ्र ही अपने वाहन गरुड़ के द्वारा गमन करते हुए नीलपर्वत पर विराजमान कामाख्या देवी के समीप में प्राप्त हुए थे । उस परम श्रेष्ठ पर्वत पर पहुँचकर उनका ज्ञान प्राप्त करके उन भगवान् शिव ने गरुड़ को गमन करने की गति में 'चलो-चलो' इस प्रकार से प्रेरित किया था । समस्त जगतों को समुत्पन्न करने वाली महामाया कामाख्या देवी ने उन भगवान् श्री विष्णु को गरुड़ के साथ आते हुए जान कर आकाश में ही स्तम्भित कर दिया था । वे गमन करने के लिए समुद्यत थे किन्तु महामाया की भी माया से ऐसे मोहित हो गए थे कि न तो आगे गमन करने में और न वापिस आगमन करने में समर्थ हुए और विद्ध की ही भाँति वहीं पर स्थित रह गए थे । भगवान् गरुड़ध्वज गरुड़ को गमन करने में असमर्थ देखकर बहुत क्रुद्ध हुए थे और उस श्रेष्ठ पर्वत को उत्साहित करने के लिए समुद्यत हुए थे । इसके अनन्तर जगतों के स्वामी श्री विष्णु ने अपने करों के द्वारा उस पर्वत को हिलाने में समर्थ नहीं हुए थे अर्थात् तनिक भी न हिला सके थे । जिस समय में उस पर्वत को चालित करने की इच्छा और प्रयत्न करते हुए केशव भगवान को देखा था तो महादेवी कामाख्या बहुत ही क्रोधित हुई थीं और उस देवी ने सिद्धसूत्र के द्वारा भगवान् बैकुण्ठनाथ को गरुड़ के साथ बाँध दिया था । उनको सिद्धसूत्र से बाँधकर ग्राहाग्र क्षीर समुद्र में देवी ने वहीं से उनको प्रक्षिप्त कर दिया था और वे संक्षेपण करने से तल में प्रपतित हो गए थे । सागर के तले में प्राप्त हुए उन भगवान् केशव को फिर भी अपनी माया से मन्त्रित करके वहाँ पर समाक्रान्त होकर सागर के तल में स्थित हुए उनको ग्रहण कर लिया था । उन केशव प्रभु ने बड़ा भारी प्रयत्न किया था । सागर के तले से ऊपर और महान् प्रयत्न करते हुए भी रहें कि पुन: उन्मज्जित हो जायेंगे