कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 418, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें४२२ ൠ श्रीकालिका पुराण ൠ हरि ने सब कुछ यत्न किया था कि उनके असार और प्रसार को उस देव ने रोक दिया था । इसके अनन्तर वे प्रज्ञान से रहित हो गए तथा असार प्रसार से अर्थात् हिलने से भी डुलने से भी शून्य हो गए थे और गरुड़ के ही साथ से चिरकाल तक सागर के जल के तले में ही शीर्ण रहे थे । सृजन करने के लिए जब उनकी बहुत खोज की तो उनको सागर के तले में समवस्थित हुए हरि को पाया था और वे ऐसे विशीर्ण हो रहे थे और कोई साधारण प्राणी होता है । सृजन करने वाले लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने गरुड़ के सहित उनको प्राप्त करके उन्होंने अपने दोनों करों के द्वारा लाने की भी इच्छा की थी । किन्तु लोकों के पितामह भी उनको उत्प्लावित करने करने के समर्थ नहीं हुए थे और स्वयं भी देवी की माया से बुद्ध होकर विस्मय करते हुए ही स्थित रह गए थे । फिर समस्त देवगण जिनमें इन्द्र सबके नायक थे सबके सब खोज करते हुए बहुत अधिक समय में उन्होंने सागर के दूषित जल के मध्य में उन दोनों को प्राप्त किया था और फिर सब इन्द्र आदि देवों ने उनको से ऊपर लाने का बड़ा भारी प्रयत्न किया था किन्तु वे भी ऐसा न कर सके थे । इसके अनन्तर वे सब देवगण भी देवी की माया से अत्यधिक मोहित हो गए थे । जिस रीति से जल के तले में भगवान् विष्णु और ब्रह्माजी स्थित थे उसी प्रकार से वे सब भी वहीं पर संस्थित रह गए थे । उस समय में देवगुरु बृहस्पति भी सबकी खोज करते हुए चले गए थे और हिमालय की शिखा पर विराजमान महादेवी के समीप पहुँचे । देवों के द्वारा पूजित महादेवजी ने देवों का सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे पूछा था तब बड़े आदर के साथ देवगुरु ने उनको प्रणाम करके यथाविधि करके निवेदन किया था । देवगुरु ने कहा-हे महादेव! आप तो समस्त जगतों के धाम हैं तथा जगत् के प्रशमन के कारणस्वरूप हैं । मैं इन्द्र आदि देवों की खोज करता हुआ ही इस समय आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूँ । इस समय ब्रह्माजी और विष्णु भगवान् न तो ब्रह्मा सदन में हैं और न स्वर्ग में ही है । इनमें वे कहीं पर भी समवस्थित नहीं जाने जाते हैं । जैसे अन्य