कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
१२८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ (जुकाम-सर्दी) श्वास और कास से समन्वित होता हुआ भी मैथुन को समाचरण किया करता है और श्लेष्मा (कफ) का उसी प्रकार वाला हुआ करता है उसमें ही आपका प्रवेश होना चाहिए। जो कृष्णनाम वाली मृत्यु की पुत्री है और आपके गुणों के ही तुल्य है वही आपकी भार्या होवेगी जो निरन्तर ही आपका अनुगमन किया करेगी। आपका कर्म भी यही है कि जो क्षीणता करें उसी को आप अपना विषय बना लेवें। अब आप बहुत ही शीघ्र चले जाइए और आप चन्द्र से विमुख हो जाइए। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस रीति से विधाता के द्वारा विदा किया गया महान रोग राजयक्ष्मा समस्त देवगणों के देखते हुए ही अन्तर्धान को प्राप्त हो गया था। उस महान रोग के अर्न्तधान हो जाने पर लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को पन्द्रह कलाओं के द्वारा समृद्धिपूर्ण कर दिया था। फिर ब्रह्माजी ने सुता से पूत और क्षीरोद से धौत उसके द्वारा तथा ज्योत्स्ना के सहित कलाओं के चूर्णों से पूर्व की ही भांति चन्द्रदेव को कर दिया था। जिस समय में सोलह कलाओं से परिपूर्ण चन्द्र पूर्व की ही भाँति शोभित था उस समय में समस्त देवगण उसके दर्शन से बहुत अधिक प्रसन्न हुए थे। इसके अनन्तर उस पूर्ण चन्द्र ने पितामह के लिए प्रणिपात किया था। अत्यन्त हर्षित न होते हुए सुरों ने सभा के मध्य में संस्थित होते हुए यह वचन कहा था। सोमदेव ने कहा-हे ब्रह्माजी! मेरे शरीर में पूर्व की ही भाँति श्यामलता नहीं है और न तो वैसा पराक्रम ही है और न वैसा उत्साह ही है। मेरे अंग की सन्धियाँ निषीदित हैं। मैं पहली की ही भाँति चेष्टायें करने के लिए सुनरा अर्थात् अपने आप ही उत्साहित नहीं होता हूँ। हे लोककृत! मैं निरन्तर चेष्टा से हीन होता हुआ किस कारण से रहता हूँ? ब्रह्माजी ने कहा-हे सोम! यक्ष्मा के द्वारा ग्रस्त आपकी जो अंग की सन्धियाँ हो गई हैं वे पूर्व में विकीर्ण हो गई हैं और अब वह पूर्णता को प्राप्त नहीं है। अब इस समय में मैंने आपसे देह का चूर्ण निकाल दिया है। राजयक्ष्मा के शरीर से अमृत की ज्योत्सना शीघ्र ही निकाल दी है। उनके प्रक्षालन की विधि में जो लव के रूप में जल
§०३ श्रीकालिका पुराण ०३ १२९ में स्थित है क्योंकि आप ज्योत्स्ना से और सुधा से उसी से हीन हैं । इसके उपरान्त आपकी अंग संधियां, हे राजन! इस समय में सीदित हो रही हैं। उपाय भी मैं करूँगा जिससे आप किसी पीड़ा को प्राप्त न होवें । पुर के अध्वर में प्राजापत्य पुरोडाश का हवन करना चाहिए। इसके उपरान्त ऐन्द्र और पीछे आग्नेय सभी ऋतुओं में देना चाहिए। इसके अनन्तर आपका भाग पुरोडाश मैंने किया है। उस भाग के भोग करने वाले जो नित्य ही यज्ञ के द्वारा कृत है पूर्व की ही भाँति आपका उत्साह और श्याम वीर्य हो जायेगा। जो आपके अमृत के कण क्षीरोद के जल में स्थित हैं अथवा आपके शरीर का चूर्ण और ज्योत्स्ना के जो लव हैं । हे विभो! वह सब आपकी ज्योत्स्ना योग से अनुदिन वृद्धि को प्राप्त होगा जो निरन्तर क्षीर सागर के गर्भ में गमन करने वाला है। द्वितीय स्वरोचिष के अन्तर के प्राप्त होने पर शंकर के अंश से जायमान दुर्वासा विप्र सूर्य की ही भाँति प्रचण्ड और चण्ड होगा। उसने देवेन्द्र के अविनय से सदारुण शाप दे दिया था। सुर और असुरों से सहित तीनों भुवनों को बिना श्री वाला कर देगा फिर लोक के श्री से हीन होने पर लोक में विप्लव हो जायेगा। हे सोम! जिस तरह से आपके क्षय होने से सबका विप्लव प्रवृत्त हो गया था। वह मनुष्य के प्रमाण से तीसरे कृत युग में होगा और जब तक चारों युग होंगे स्थित होगा। इसके अनन्तर देवों के साथ चतुर्थ कृतयुग के सम्प्राप्त होने पर मैं शम्भु और विष्णु क्षीरोद का निर्मन्थन करेंगे। मन्दराचल को मन्थन करके अर्थात् मथान करने का साधन बनाकर फिर वासुकि सर्प का नेतरा बनायेंगे। यज्ञ भागों के लीन होने पर देवान्न के लिए हम फिर देवों के साथ दानवों के साथ मिलकर क्षीरोद का मन्थन करेंगे। आपके शरीर का यह अमृत जो क्षीरसागर में स्थित है उसको प्रमथन करके हम राशिभूत तथा क्षय को ग्रहण करेंगे। उस समय में हम आपके शरीर को सर्वौषधियों के अनन्तर से करके हे विभो! आपके शरीर के लिए सागर के जल में प्रथिप्त कर देंगे। सागर का निर्मन्थन करके और पीछे जब अमृत का समुद्धरण करेंगे तो उस
[Header] १३० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ समय आपका वपु पूर्व की ही भाँति सम्भूत होगा। ओज और वीर्य से अद्भुतकान्त अक्षय और सुधात्मक अर्थात् सुधा से परिपूर्ण हर अंग की सन्धियों वाला आपका शरीर परम सुन्दर हो जायेगा। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने इस प्रकार से सुधांशु (चन्द्रमा) से कहकर चन्द्र के क्षय के लिए और आधे मास तक वृद्धि के लिए यत्नों वाले हुए थे। जैसा प्रजापति दक्ष ने कहा था कि चन्द्रमा आधे मास तक क्षय और वृद्धि को प्राप्त होवे उस मासार्ध में विधाता ने यत्न किया था। फिर सुरों में ज्येष्ठ ने चन्द्रमा को सोलह प्रकार से विभक्त किया था और ऐसा विभाग करके समस्त देवों से वे यह उत्तम वचन बोले थे। चन्द्रमा की सोलह कलायें हैं उनमें एक भगवान् शम्भु के मस्तक में आज की अवधि पर्यन्त स्थित रहे और पराक्षय के बिना ही क्षय को प्राप्त होंवे। दक्ष के वाक्य से यदि क्षय रोग से मासार्ध तक क्षय के लिए चन्द्र प्रपीड़ित किया जाता है तो उस समय में उपशान्ति नहीं होगी किन्तु जिसकी जो कला शम्भु में है ज्योत्सना उसके ही प्रति गमन करे। हे सुरोत्तमो! प्रतिमास में चौदह कलाओं की संस्था है। आप लोग प्रतिपदा तिथि से आरम्भ करके चतुर्दशी पर्यन्त चतुर्दश की संस्थाओं से भी तथ्यों का पालन करें। तेजों के लोग चतुर्दशी तिथि में क्रम से सूर्य के विम्ब में प्रवेश करें। इस प्रकार से कृष्णपक्ष में चन्द्र का क्षय होता है। शेष कला हरित्यन्त्र में पलायित दर्श में जावें। उस तिथि में निशापति के प्रथम भाग में स्थित रहे। द्वितीय दर्श भाग में रोहिणी के मन्दिर में गमन करे। तीसरे भाग में तो सरस्वती में स्नान करके चन्द्र समुत्थित होता है। विभावस्तु के चतुर्थ तिथि भाग में वह बल से सम्पूर्ण होता है। विम्ब में स्थित घोटक के सहित यह चन्द्रमा मण्डल में जावे। जितने समय पर्यन्त प्रथमा कला क्षय को प्राप्त होवे इसी प्रकार से कृष्णपक्ष में तब तक वह प्रतिपदा होती है। द्वितीयादि में कृष्णपक्ष में उसी प्रकार की वृद्धि तथा ह्रास होता है। तिथियों की वृद्धि का हेतु शुक्ल और कृष्ण में उसी भाँति होता है। इसके अनन्तर फिर शुक्ल पक्ष में जब तक पूर्व
कला उचित होती है तब तक वृद्धि को नहीं जाती है और आदि से प्रतिपदा तिथि है । इसके अनन्तर द्वितीय भाग की जो ज्योत्स्ना भगवान् हर के मस्तक में है और जो स्थित है वह जावे और गयी हुई वह फिर आ जायेगी । आपके द्वारा दिन-दिन में अमृत पीने के योग्य होता है । हे सुरोत्तमो ! वह पूर्ण अन्त वाला द्वितीया आदि तिथियों से सदा ही चन्द्र स्वंय ही उत्पन्न होगा क्योंकि वहाँ पर ज्योत्स्ना का योग होता है उसी के उसी से उसकी समुत्पत्ति होगी । जिस प्रकार से दिन-दिन में भाग क्षण को प्राप्त होते हैं वे अनुचित चन्द्र की वृद्धि को प्राप्त होते हैं । हे सुरो ! शुक्ल पक्ष में भी प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त हुआ करते हैं । सूर्य के बिम्ब से तेज का भाग पुनः ही समागत होगा । जिस प्रकार से कृष्णपक्ष में उसी भाँति भाग के क्रम को प्राप्त होगा । भगवान् शम्भु के मस्तक में संस्थित चन्द्रमा से ज्योत्स्ना प्रति दिन पुनः आयेगी । सूर्य के बिम्ब से तेजोभाग स्वयं ही अमृत की वर्षा करता है । इसी प्रकार से शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की वृद्धि होगी । दोनों पक्षों में जो शुक्लत्व और कृष्णत्व के नाम हैं वे चन्द्रमा के क्षय और वृद्धि से ही हुआ करते हैं । जब चन्द्र वृद्धि को प्राप्त होता है तो उसे कृष्ण पक्ष पुकारा जाया करता है । जितने काल के द्वारा जो भाग क्षयं और वृद्धि को प्राप्त होगा उतने ही काल को अभिव्यक्त करके वह तिथि फिर स्थित रहेगी । चिरकाल में वृद्धि अथवा क्षय शीघ्रता से वृद्धि अथवा क्षय को द्रुत से अर्थात् शीघ्रता से तिथियों का सदा क्षय होता है और चिरकाल से तिथियों में प्रवेश में वृद्धि होती है । हव्य और कव्य चन्द्रदेव के बिना सम्भव नहीं होगा । इस कारण से उसकी वृद्धि के लिए हे देवताओं ! आप लोग चन्द्रदेव की रक्षा करें । 100 अनुमास से कला शेष चन्द्रदेव का आस्वादन करना चाहिए । अमावस्या के अपराध काल में तो वह पितृगणों के साथ रोहिणी के मन्दिर में रहता है । उसके ही आस्वादन से प्रतिदिन कला की वृद्धि हुआ करती है । उस कव्य से पितृगण भी परामृप्ति को प्राप्त होंगे । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर सभी
१३२ ६०(२ श्रीकालिका पुराण ५०(३ सुरगण जैसा भी विधाता ने कहा था वैसा ही उन्होंने चन्द्र की क्षय और वृद्धि के लिए लोक हित के स्वरूप चन्द्रमा के अर्धभाग को देवों सहित विधिपूर्वक अत्यन्त क्षुधित होकर शिर से ग्रहण किया था। जो तेज परनित्य अज, अव्यय और अक्षय है उस स्वरूप वाली ही चन्द्रमा की कला है जो प्राप्त हो गई थी। जिस समय योगी की आनन्दज, अजर और पर ज्योति प्रवेश किया करती है उस समय में उनका चिन्तन लीनता को प्राप्त हो जायेगा। महादेव के मस्तक में विराजमान सुधा निधि के होने पर चित्त की लीनता में चन्द्र के द्वारा मुक्ति हो जाया करती है। इस प्रकार से यह वैदिकी श्रुति है। महादेव जी ने इसका ज्ञान प्राप्त करके क्षय और वृद्धि के अनिवाकृत चन्द्र को लोकों के हित के लिए शिर के द्वारा ग्रहण किया था। चन्द्रमा की ज्योत्स्ना के समायोजन से औषधियाँ वृद्धि को प्राप्त हुआ करती हैं। सब औषधियों के प्रवृद्ध होने पर ही अध्वरों की प्रवृत्ति हुआ करती है। अध्वरों के प्रवृत्त हो जाने पर देवगण अपने-अपने भागों का परिग्रहण किया करते हैं और पितृगण बहुत से कव्यों को ग्रहण करते हैं। अमृत ब्रह्माजी ने देवगणों के लिए बहुत पुरातन सृजा था अब देवता लोग हव्यभाग से हीन हुये जो भी हैं वे उसके द्वारा ही तृप्ति का लाभ किया करते हैं। यज्ञ के आयातित भी वह ज्योत्स्नाओं से निश्चय ही वृद्धि को प्राप्त होता है और वह यज्ञों की ज्योत्स्ना के विनाशभूत अन्यथा क्षीण हो जाया करता है। अतएव यज्ञ के अमृत का कारण भी चन्द्रमा ही स्वयं होता है अतएव दक्ष प्रजापति के शाप से रक्षा के लिए चिकीर्षित होता है। आज भी कृष्णपक्ष में सुरगणों के द्वारा चन्द्र का पान किया जाया करता है। तेज तो सूर्य देव को चला जाता है और चन्द्र का अर्धभाग तथा उसकी ज्योत्सना भगवान् शम्भुदेव के समीप में चले जाया करते हैं और फिर शुक्ल पक्ष में शेष कला उदित हुआ करती है। ज्योत्सना का दूसरा भाग और द्वितीय तेज का भाग और अन्य भी शिव के मस्तक में संस्थित चन्द्रमा से और क्रम से सूर्य के बिम्ब से चन्द्र की
श्रीकालिका पुराण १३३ सोलह कलायें हैं उनमें एक भगवान् शम्भु के मस्तक में रहा करती है । शेष कलाओं के सित और असित अर्थात् शुक्ल और कृष्ण ये दोनों पक्ष उदय और क्षय वाले ही होते हैं । यह सब मैंने आपको बतला दिया है । जिस प्रकार से भी चन्द्रमा का विभाग किया गया है, जिस रीति से ब्रह्मा के द्वारा उस श्रेष्ठ पर्वत में चन्द्रमा समागत हुआ था । जिस कारण से यज्ञ भाग के स्थित होने पर विभु को देवों का अन्न किया था । जिस तरह से कव्य के स्थित होने पर भी पितृगण का अन्न तिथियों का क्षय और वृद्धि होता है । इस परम पुण्यतम आख्यान को जो भी कोई मनुष्य एक बार भी श्रवण कर लिया करता है उसके कुल में राजयक्ष्मा का महारोग कभी भी किसी को नहीं रहा करता है और न होता ही है । जो भी कोई मनुष्य राजयक्ष्मा से पराभूत है और विधाता के वचन का श्रवण कर लेता है तो उसका यक्ष्मा विनष्ट हो जाया करता है । यह आख्यान परमाधिक स्वस्ति अर्थात् कल्याण का स्थान है, पुण्यमय है और शुभ तथा गुह्य से भी अधिक गोपनीय है । जो भी कोई एकचित्त होकर इसको सुनता है वह महान् पुण्य का भागी होता है । ◎ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा--जहाँ पर सब महागिरि के शिखर पर देवों की सभा हुई थी वहाँ पर विधाता के वचन से सीता नाम वाली देव नदी समुत्पन्न हुई थी । जिस समय मनोहर सीता के जल से स्तवन कराकर उन सब देवगणों ने ब्रह्मा के वाक्य से चन्द्र का पान कर गये थे उस समय में सीता नदी का जल चन्द्रमा के स्नान के योग से वह अमृत होकर उस वृहल्लोहित संज्ञा वाले में निपातित हो गया था । उस समय में उसका जल बढ़ गया था और उस सरोवर में वह नहीं समाया था । उसको ब्रह्माजी ने स्वयं ही देखा था कि वह विशेष बढ़ा हुआ जल अमृत था । उसके देखने से उस जल से एक अत्युत्तम कन्या समुत्थित हुई थी । उस कन्या का नाम चन्द्रभागा था जिसको कि विधाता ने स्वयं ही रखा था । ब्रह्माजी की सहमति से सागर ने उसको अपनी भार्या बनाने के लिए ग्रहण कर लिया था । उसी के द्वारा अधिष्ठित जल को निशावर्ति ने गदा के अग्रभाग से भेदन करके
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पश्चिम पार्श्व में उस गिरि के प्रति समवाहित कर दिया था। उसके अमृत जल का भेदन करके वृहल्लोहित नाम वाला सरोवर कर दिया था और वह चन्द्रभाग नदी तो सागर को गमन करने वाली थी। उस समय सागर ने भी महानदी चन्द्रभाग भार्या को उस जल के प्रवाह से उसको अपने भवन में ले गया था। इसी रीति से उसमें चन्द्रभागा नाम वाली नदी समुत्पन्न हुई थी। वह चन्द्रभागा महान शैल में अपने गुणों के द्वारा सदा गंगा के ही समान थी। नदियां और सब पर्वत स्वभाव से ही दो रूपों वाले सदा हुआ करते हैं। नदियों का रूप तो उनका जल ही होता है तथा शरीर दूसरा ही हुआ करता है। पर्वतों का रूप को स्थावर ही होता है। इसी प्रकार से जल तथा उस समय में नदी और पर्वत का स्थावर होता है। उनका काम तो अन्तर में वास किया करता है और निरन्तर उत्पन्न नहीं होता है। पर्वत का शरीर तो स्थावर के द्वारा ही आप्यायित होता है। उसी भाँति नदियों का शरीर जल के द्वारा ही सदा आप्यापित हुआ करता है। नदियों का तथा पर्वतों का रूप कामरूपी होता है। भगवान् विष्णु ने यत्नपूर्वक पहले जगत् की स्थिति के लिए ही कल्पित किया था। हे सुरगणों! जल की हानि होने पर निरन्तर ही नदियों को महान् दुःख हुआ करता है और विकीर्ण हो जाने पर स्थावर गिरि के शरीर में उत्पन्न होता है। उस पर्वत पर जो कि चन्द्रभाग नाम वाला था बृहल्लोहित के तट पर गमन करने वाली सन्ध्या का अवलोकन किया था और वशिष्ठ मुनि ने उस समय में बड़े ही आदरपूर्वक उससे पूछा था। वशिष्ठ जी ने कहा-हे भद्रे! आप इस निर्जन महान् गिरि पर किस प्रयोजन के लिए आयी हैं। हे गौरि! आप किसकी पुत्री हैं? और आपका क्या चिकीर्षित है अर्थात् क्या करने की इच्छा रखती हैं। यदि आपकी कोई भी गोपनीय बात न हो तो मैं यही सुनना चाहता हूँ। आपका मुख तो चन्द्रमा के समान परमाधिक सुन्दर है किन्तु इस समय में वह निःश्री सा क्यों हो रहा है? उन महात्मा वशिष्ठ मुनि के इस वचन का श्रवण करके उन महात्मा का अवलोकन किया था जो
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १३५ प्रज्वलित अग्नि के ही समान थे। वे उस समय ऐसे ही प्रतीत हो रहे थे मानो शरीरधारी ब्रह्मचर्य के ही सदृश हों। उन जटाधारी को बहुत ही आदर के साथ प्रणिपात करके इसके पश्चात् उस संध्या ने उन तपोधन से कहा था। वशिष्ठजी द्वारा सन्ध्या को दीक्षा देना सन्ध्या बोली-जिस प्रयोजन की सिद्धि के लिए मैं इस शैल पर समागत हुई थी वह मेरा कार्य सिद्ध हो गया है। हे द्विजोत्तम! हे विभो! आपके दर्शन मात्र से ही वह कार्य पूर्ण हो जायेगा। हे ब्रह्मन्! मैं तपश्चर्या करने के लिए ही इस निर्जन पर्वत पर आई थी। मैं ब्रह्माजी के मन से समुत्पन्न हुई हूँ और मैं लोक में सन्ध्या इस नाम से प्रसिद्ध हूँ। यदि आपको कुछ गोपनीययुक्त होता हो तो आप मुझको उपदेश दीजिए। यही मेरा परम गुह्य चिकीर्षित है और दूसरा कुछ भी नहीं है। तपस्या के भाव का ज्ञान न प्राप्त करके ही मैंने इस तपोवन का उपाश्रय ग्रहण किया है। मैं चिन्ता से परिशुष्क हो रही हूँ और मेरा मन सदा ही काँपता रहता है। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-ब्रह्माजी के पुत्र वशिष्ठ जी ने उस संध्या के वचन को सुनकर उन स्वयं ही सम्पूर्ण तत्त्व के ज्ञाता मुनि ने उससे अन्य कुछ भी नहीं पूछा था। इसके अनन्तर उस समय वशिष्ठ मुनि ने उस नियत आत्मा वाली और तप के लिए अत्यन्त उद्यम धारण करने वाली उसको शिष्य-गुरु के ही समान वशिष्ठ ने मन्त्र दीक्षा दी थी। वशिष्ठ मुनि ने कहा-जो महान् तेज परम है, जो परम महान् तप है, जो परम समाराधना करने के योग्य है उन भगवान विष्णु को ही अपने मन में धारण करिए। जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन परम पुरुषार्थों का एक ही आदि कारण है उन जगतों के आद्य पुरुषोत्तम प्रभु का यजन करो। जो भगवान विष्णु शंख, चक्र, गदा और पद्म को धारण करने वाले हैं और उनके लोचन कमलों के ही समान परम सुन्दर हैं उनका वर्ण शुद्ध स्फटिक के तुल्य है और कहीं पर उनकी
छवि नीले मेघ के सदृश ही है। गरुड़ के ऊपर स्थल में चिह्न वाले, परमशान्त और वनमाला के धारी, हरि का भजन करो। जो केयूर और कुण्डलों को पहिने हुए हैं, जो किरीट और मुकुट से समुज्ज्वल हैं, जो बिना आकार वाले केवल ज्ञान के द्वारा ही जानने योग्य हैं, जो आकार के सहित देवधारी हैं, नित्य आनन्दस्वरूप, बिना अवलम्बन वाले और सूर्य मण्डल के मध्य में संस्थित हैं ऐसे देवेश्वर विष्णु की इस मन्त्र के द्वारा ही हे शुभानन वाली! आप यजन करो। वह मन्त्र ‘ॐ नमो वासुदेवाय ॐ’ यह है। इसी मन्त्र के जाप के द्वारा निरन्तर मौनी होकर तपश्चर्या का समारम्भ करो। उसमें कुछ नियम हैं उनका अब श्रवण करो। नित्य स्नान मौन होकर करना चाहिए और मौन व्रत के साथ ही पूजन करें। प्रथम तो छठवें दोनों कालों में पूर्ण और फलों का आहार करें और तीसरे षष्ठ काल में उपवास परायण ही होना चाहिए। इस प्रकार से तप की समाप्ति में षष्ठ काल की क्रिया होती है। वृक्षों के छालों के वस्त्र धारण करें और उस समय पर भूमि में ही शयन करें। इसी रीति से मौनी रहें और तपस्या नाम वाली व्रतचर्या फल के प्रदान करने वाली होती है। इस तरह के तप का उपदेश करके इच्छापूर्वक माधव भगवान का चिन्तन करो। वे प्रसन्न होकर आपके अभीष्ट को शीघ्र ही प्रदान कर देंगे। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर वशिष्ठ जी ने उस संध्या के लिए तप करने की क्रिया का उपदेश देकर और उससे न्याय के अनुसार सम्भाषण करके मुनि वहीं पर अन्तर्धान हो गये थे। उसने तपस्या के भाव का ज्ञान प्राप्त करके और परम आनन्द प्राप्त करके उसने वृहल्लोहित के तीर पर स्थित होकर तपश्चर्या करना आरम्भ कर दिया था। उसने वशिष्ठ मुनि ने जैसा कहा था उस मन्त्र को तथा तप के साधन को करके उसी व्रत से भक्तिभाव के द्वारा गोविन्द का पूजन किया था। परम एकान्त मन वाली को चारों युगों (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलियुग) का समय व्यतीत हो गया था। उसके इस अद्भुत तप को देखकर कोई भी विस्मय को प्राप्त हुए
௬०८ श्रीकालिका पुराण ௬०८ १३७ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ बिना नहीं रहा था कि उस तरह की तपश्चर्या अन्य किसी की भी नहीं होगी। इसके अनन्तर मनुष्यों के मान से चारों युगों की एक चौकड़ी व्यतीत हो गई थी। फिर अन्दर-बाहर और आकाश में अपना वपु दिखला कर उस रूप से परम प्रसन्न हुए जिस रूप को उसने चिन्तन किया था वहीं उसके सामने प्रत्यक्षता को प्राप्त हो गये थे जो भगवान् विष्णु इस जगत् के स्वामी थे। इसके अनन्तर अपने सामने अपने मन के द्वारा चिन्तन किए गए हरि को देखकर बहुत ही प्रसन्न हुई थी। उनका स्वरूप शंख, चक्र, गदा और पद्म के धारण करने वाला था तथा वे किरीट और मुकुट से परम समुज्ज्वल थे। पुण्डरीक के समान उनके नेत्र थे और वे गरुड़ पर विराजमान थे। उनकी छवि नीलकमल के समान थी। मैं भय के साथ क्या कहूँगी अथवा किस प्रकार से हरि भगवान का स्तवन करूँ इसी चिन्ता में परायण होकर उसने अपने नेत्रों को मूँद लिया था। मूँदे हुए लोचनों वाली के हृदय में भगवान् ने प्रवेश किया था और उसमें उस संध्या को परम दिव्य ज्ञान को प्रदान किया था और उसकी दिव्य वाणी बोलने की शक्ति दी थी तथा दिव्य चक्षु भी प्रदान किए थे। वह फिर परम दिव्य ज्ञान, दिव्य लोचन और दिव्य वाणी को प्राप्त करने वाली हो गई थी। उसने प्रत्यक्ष में हरि को दर्शन कर उसका स्तवन किया था। सन्ध्या ने कहा-जो बिना आकार वाले हैं, जो ज्ञान के ही द्वारा जानने योग्य हैं, जो सबसे परे हैं, जो न तो स्थूल हैं और न सूक्ष्म ही हैं तथा जो उच्च भी नहीं हैं, जिनका रूप योगियों के द्वारा अन्दर ही चिन्तन करने के योग्य है उन आप भगवान् श्रीहरि के लिए मेरा नमस्कार है। जिनका स्वरूप शिव अर्थात् कल्याण स्वरूप है जो परम शान्त, निर्मल, विकारों से रहित, ज्ञान से भी परे सुन्दर प्रकार से युक्त, विसारी, रवि प्रख्य, ध्वान्त (अन्धकार) भाग से परे हैं उन परम प्रसन्न आपके लिए मैं प्रणाम करती हूँ। जो एक शुद्ध देदीप्यमान विनोद चित्त के लिए आनन्द, रूप, सत्य से समुत्पन्न, पापों का हरण करने वाला, नित्य ही आनन्दरूप, सत्य और बहुत ही अधिक प्रसन्न जिसका श्री का
१३८ श्रीकालिका पुराण प्रदाता यह रूप है उन प्रभु के लिए मेरा नमस्कार है। विद्या के आकार से उद्भावना करने के योग्य प्रकृष्ट रूप से भिन्नसत्व से छन्न-ध्यान करने के योग्य आत्मस्वरूप से समन्वित, सार, पार और पावनों को भी पवित्र करने वाला जिनका रूप है उनके लिए मेरा प्रणिपात है। योग मार्ग में युक्त पुरुषों के द्वारा गुणों के समूह आठ अंग वाले योग से जो नित्यार्चन और व्यय से हीन चिन्तन किया जाता है, जिसकी योगीजन अपने ज्ञान योग में व्यापी तत्त्व को प्राप्त करके परात्पर को प्राप्त हुए हैं, जो शुद्ध रूप वाले हैं और जो मनोज्ञ हैं, जो गरुड़ पर विराजमान हैं, जिनका प्रकाश नील मेघ के समान है, जो शंख, चक्र, गदा और पद्म को धारण करने वाले हैं उन योग से युक्त आपके लिए मेरा प्रणाम समर्पित है। जिनका गगन, भूमि, दिशायें, जल, ज्योति, वायु और काल स्वरूप है उनके लिए मेरा नमस्कार है। जिनके कार्यों के अगस्थ में प्रधान और पुरुष निवास किया करते हैं उन अव्यक्त रूप वाले गोविन्द के लिए नमस्कार है। जो स्वयं हैं और जो भूत हैं, जो स्वयं उसके गुणों से पर हैं, जो स्वयं ही इस जगत का आधार हैं उनके आपके लिए नमस्कार है तथा बारम्बार प्रणाम है। जो सबसे पर तथा पुराण हैं, जो पुराणपुरुष और जगन्मय परमात्मा हैं जो अक्षय और व्यथा से रहित हैं उस देश के लिए बारम्बार नमस्कार है। जो ब्रह्मा का स्वरूप धारण करके इस सृष्टि की रचना किया करते हैं और जो विष्णु से स्वरूप से इस जगत् का परिपालन करते हैं तथा जो रुद्र के रूप में होकर इस जगत् का संहार किया करते हैं उस आपकी सेवा में बारम्बार मेरा प्रणिपात समर्पित है। कारणों के भी कारण, दिव्य अमृतज्ञान और विभूति के प्रदाता, समस्त अन्य लोकों को मोह के दाता हैं उन प्रकाश स्वरूप वाले परात्पर के लिए बारम्बार नमस्कार हैं। जिसका महान प्रपञ्च जगत् कहा जाया करता है जो भूमि, दिशायें, सूर्य, चन्द्र, मनोजव, वह्नि, मुख, नाभि से अन्तरिक्ष है उन भगवान हरि आपके लिए नमस्कार है।
൵ श्रीकालिका पुराण ൵ १३९ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ आप पर परमात्मा हैं, हे हरे! आप विविध विद्या हैं, आप शब्दब्रह्म और विचार के पर से भी पर हैं। जिस जगत् के पति का न तो आदि है, न मध्य और अन्त ही होता है उन देव का मैं किस प्रकार से स्तवन करूँ जो देव वाणी, मन के गोचर से भी बाहिर अर्थात् पर हैं, जिनके स्वरूपों का ब्रह्मा आदि देवगण तथा तप के भी धनवाले मुनिगण भी विवरण नहीं किया करते हैं उनके रूप मेरे द्वारा किस प्रकार से वर्णन करने योग्य हो सकते हैं ? उन निर्गुण प्रभु के गुण मुझ स्त्री जाति वाली के द्वारा कैसे जानने के योग्य हो सकते हैं ? जिनके स्वरूप को इन्दु आदि सुर और असुर भी नहीं जानते हैं। हे जगत् के नाथ! आपके लिए नमस्कार है। हे तप से परिपूर्ण! आपके लिए नमस्कार है। हे भगवान्, आप प्रसन्न हो गए आपके लिए बारम्बार नमस्कार है। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर उसका शरीर वल्कल और अजिन (मृगचर्म) से संवृत था तथा बहुत ही क्षीण और मस्तक पर पवित्र जटा-जूटों में राजित था अर्थात् परम शोभित था। मादिनी में सर्जित कमल के सदृश मुख को देखकर भगवान हरि कृपा से समावष्टि होकर उस सन्ध्या से यह बोले । श्री भगवान ने कहा-हे भद्रे! आपकी इस परम दारुण तपश्चर्या से मैं अधिक प्रसन्न हो गया हूँ। हे शुभ प्रज्ञा वाली! मुझे आपकी स्तुति से अधिक प्रसन्नता हुई है। अब आप मुझसे वरदान जो भी अभीष्ट उसे प्राप्त कर लो। जिस वर से उनका मनोगत कार्य हो मैं उसको कर दूँगा, तुम्हारा कल्याण होवे, मैं तुम्हारे इन व्रतों में परम हर्षित हो गया हूँ। सन्ध्या ने कहा-हे देव! यदि आप मुझ पर परम प्रसन्न हैं और मेरी इस तपश्चर्या से आपको आह्लाद हुआ है तो अब मैंने प्रथम बार व्रत किया है उसी को आप करने की कृपा कीजिए। हे देवेश्वर! उत्पन्न मात्र ही प्राणी इस नभस्तल में क्रम से ही सकाम न होवें, वे सम्भव होवें। मैं तीनों लोकों में परम पतिव्रता प्रथित हो जाऊँगी जैसे कोई दूसरी न होवे। मैंने यह एक बार व्रत किया है। काम वासना से संयुत मेरी दृष्टि कहीं पर भी न गिरेगी। हे जगत् के स्वामिन्! पति को छोड़ कर कहीं
१४० Ꮚൠ श्रीकालिका पुराण Ꮚൠ पर मेरी सकाम दृष्टि नहीं होवे । यह भी मेरा परम सुकृत होगा । जो कोई भी पुरुष कामवासना से युक्त होकर मुझे देखे उसका पुरुषत्व विनाश को प्राप्त हो जावेगा और वह क्लीव अर्थात् नपुंसक हो जावेगा । श्री भगवान् ने कहा-प्रथम तो शैशव भाव हुआ करता है और दूसरा कौमार नाम वाला भाव होता है, तीसरा यौवन का भाव है और चतुर्थ वार्द्धक भाव होता है। तीसरे भाव अर्थात् यौवन के भाव को सम्प्राप्त हो जाने पर जो एक शरीरधारी अवस्था का भाग है मनुष्य उसमें ही कामवासना से समन्वित हुआ करते हैं। कहीं-कहीं पर द्वितीय भाव के अन्त में भी हो जाते हैं। मैंने आपके तप से जगत् में मर्यादा स्थापित कर दी है कि उत्पन्न होते ही शरीर धारी सकाम नहीं होंगे और आप तो लोक में उस प्रकार का भाव प्राप्त करेंगी कि तीनों लोकों में अन्य किसी का भी ऐसा भाव नहीं होगा। जो भी कोई बिना आपके पाणिग्रहण करने के किए हुए कामवासना से युक्त होकर आपको देखेगा वह तुरंत ही क्लीवता अर्थात् नपुंसकता को प्राप्त करके अतीव दुर्बलता को पा लेगा। आपका पति तो बहुत बड़े भाग्य वाला होगा जो सुन्दर रूप लावण्य से और तप से समन्वित होगा। वह आपके ही साथ रहकर सात कल्पों के अन्त पर्यन्त जीवन के धारण करने वाला होगा। ये जो भी वरदान आपने मुझसे प्रार्थित किए थे व सब मैंने पूर्ण कर दिये हैं और अन्य भी मैं आपको बतलाऊँगा जो कि पूर्व में आपके मन में स्थित था। आपने पूर्व में ही अग्नि में अपने शरीर के परित्याग करने की प्रतिज्ञा की थी वह प्रतिज्ञा बारह वर्ष तक होने वाले मुनिवर मेधातिथि के यज्ञ में की थी। हुत से प्रज्जवलित अग्नि में शीघ्र ही आप गमन करें। उस पर्वत की उपत्यका में चन्द्रभागा नदी के तट पर तापसों के आश्रम में मेधातिथि महायज्ञ कर रहे हैं वहाँ पर जाकर स्वयं छत्र होती हुई जिसको मुनियों ने भी नहीं देखा है, मेरे प्रसाद से वह्नि से जलकर आप उसकी पुत्री होंगी। जो भी अपने मन के द्वारा अपने पति होने की थी वह जो भी कोई हो उसको अपने मन में धारण करके अपने शरीर
का त्याग वह्नि में कर दो । हे सन्ध्ये ! जब आप इस परम दारुण पर्वत में तपश्चर्या कर रही हो उस तप को करते हुए चारों युग व्यतीत हो गयें हैं तथा कृतयुग के व्यतीत होने पर त्रेता के प्रथम भाग में दक्ष की कन्या उत्पन्न हुई थी । उस प्रजापति दक्ष ने सत्ताईस अपनी कन्याओं को चन्द्रदेव के लिए दे दिया था । उन कन्याओं के लिए जिस समय में क्रोधयुक्त दक्ष के द्वारा चन्द्रदेव को शाप दिया गया था उस समय में आपके समीप में सभी देवगण समागत हुए थे । हे सन्ध्ये ! उसके द्वारा ब्रह्मा के साथ देवगण नहीं देखे गये थे क्योंकि आपने मुझमें ही अपना मन लगा रखा था । अतः आप भी उनके द्वारा नहीं देखी गई थीं । चन्द्रदेव को दिए हुए शाप को छुटकारे के लिए जिस प्रकार से विधाता ने चन्द्रभाग नदी की रचना की थी उसी समय में यहाँ पर मेधातिथि उपस्थित हो गया था । तप से उसके समान कोई भी अन्य नहीं है और न अब तक कोई हुआ ही है तथा भविष्य में ही कोई ऐसा तपस्वी नहीं होगा । उस मेधातिथि ने महान् विधि वाला ज्योतिष्टोम नामक यज्ञ का आरम्भ किया था । वहाँ पर जो वह्नि प्रज्वलित है उसी में अपने शरीर का त्याग करो । हे तपस्विनी ! यह मैंने तुम्हारे की कार्य के सम्पादन करने के लिए स्थापित किया है । हे महाभागे ! आप वह करिए और उस महामुनि के यज्ञ में गमन करिए । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा--भगवान् नारायण ने स्वयं ही अपने कर के अग्रभाग से इसके अनन्तर सन्ध्या का स्पर्श किया था । इसके पश्चात् एक ही क्षण में उसका शरीर पुरोडाश से परिपूर्ण हो गया था । इस प्रकार से करके जगत् के स्वामी वहाँ पर अन्तर्धान हो गये थे और वह सन्ध्या उस सत्र में गई थी जहाँ पर मेधातिथि मुनिवर विद्यमान थे । उसके अनन्तर भगवान विष्णु के प्रसाद से किसी के भी द्वारा उपलक्षित होती होई सन्ध्या देवी ने मेधातिथि मुनि के लिए उपदेश दिया था । उसी तपश्चर्या के उपदेश को मन में करने उस समय सन्ध्या ने पतित्व के रूप से ब्रह्मचारी ब्राह्मण का वरण रखा था । उस महायज्ञ में समिद्ध
१४२ ௵ श्रीकालिका पुराण ௵ अग्नि में मुनियों के द्वारा उपलक्षित न होती हुई उस समय में भगवान विष्णु ने प्रसाद से विधाता की पुत्री ने प्रवेश किया । फिर उसी क्षण में उसका शरीर पुरोडाश से परिपूर्ण हो गया था । दग्ध हुई पुरोडाश की गन्ध लक्षित होती हुई ही विस्तार को प्राप्त हो गई थी । वह्नि ने उसके शरीर का दाह करके पुनः भगवान् विष्णु की ही आज्ञा से शुद्ध को सूर्य मण्डल में प्रवृष्टि कर दिया था । सूर्य का दो भागों में विभाग करके उसके शरीर की उस समय में रथ में जो अपना था, पितृगण और देवों की प्रीति के लिए संस्थापित कर दिया था । उसका अर्धभाग हे द्विजोत्तमो! अर्थात् उसके शरीर का आधा हिस्सा प्रातः सन्ध्या हो गई थी जो अहोरात्र आदि के मध्य में रहने वाली थी । उसका शेष भाग था जो अहोरात्रान्त के मध्य में रहने वाली वही वह सायं सन्ध्या हो गयी थी । जो सदा ही पितृगणों की प्रीति को प्रदान करने वाली थीं । सूर्योदय से प्रथम जो अरुण का उदय जिस समय में होना है प्रातः सन्ध्या उसी समय में उदित हुआ करती है जो देवगणों की प्रीति को करने वाली हैं । सूर्यदेव के अस्ताचलगामी होने पर शोण (रक्त) पद्म के सदृश होती है वह सायं सन्ध्या भी समुदित हुआ करती है जो पितृगणों के मोद के करने वाली हुआ करती है । उनके प्राणों को प्रभु भगवान के द्वारा शरीरों के दिव्य शरीर से ही किये थे । महामुनि के यज्ञ के अवसान के अवसर प्राप्त करके हो जाने पर मुनि के द्वारा तपे हुए सुवर्ण की प्रभा के तुल्य पुत्री वह्नि के मध्य में प्राप्त हुई थी । उस समय में उस पुत्री को मुनि ने आमोद से समन्वित होकर ग्रहण कर लिया था । उस पुत्री को यथार्थ जल में संस्पनन कराकर कृपा से युत होते हुए अपनी गोद में रखा था और उनका नाम अरुन्धती, यह महामुनि ने रखा था । वे शिष्यों में परिवृत होते हुए वहाँ पर महान मोद को प्राप्त हुए थे । वह जिस किसी भी कारण से धर्म का विरोध नहीं करती थी अतएव त्रिलोकी में विदित नाम उसने प्राप्त किया था अर्थात् वह जैसा
Ꮚ श्रीकालिका पुराण Ꮚ १४३ करती थी वैसा ही नाम की प्राप्ति उसने की थी । उन मुनि ने यज्ञ को समाप्त करके कृतकृत्य भाव को प्राप्त किया था और तनया के प्रलम्भ से वे सम्मदयूत हुए थे । उस अपने आश्रम के स्थान में अपने शिष्य वर्गों के सहित महर्षि उसी अपनी तनया को प्यार किया करते थे और निरन्तर उसी को प्रिय बना लिया था । वशिष्ठ अरुन्धति विवाह मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर वह देवी उन मुनिवर के आश्रम में बड़ी हो गई थी जो कि चन्द्रभागा नदी के तट पर तापसारण्य नाम वाला था । जिस प्रकार से चन्द्रमा की कला शुक्लपक्ष में नित्य ही प्रवर्द्धित हुआ करती है जैसे ज्योत्सना बढ़ा करती है उसी भाँति वह अरुन्धती भी वृद्धि को प्राप्त हुई थी । उस समय में पाँचवा वर्ष के सम्प्राप्त होने पर गुण गुणों के द्वारा उस सती चन्द्रभागा ने भी उस ताप सारण्य को भी परम पवित्र कर दिया था । वहाँ पर मेधातिथि द्वारा निषेचित महापुण्य वाला तीर्थ था जो अरुन्धती की क्रीड़ा का स्थान था और उन अरुन्धती ने बाल्योचित कृत्य से पूत किया था । आज भी तापसारण्य में चन्द्रभागा नदी के जल में मनुष्य अरुन्धती तीर्थ के जल में स्नान करके अन्त में हरि की प्राप्ति किया करता है । कार्तिक के पूरे मास में चन्द्रभागा नदी के जल में स्नान करके विष्णु भगवान के लोक में प्राप्त होकर अन्त में मोक्ष की प्राप्ति किया करता है । माघ मास में पूर्णमासी अथवा अमावस्या में उसी भाँति चन्द्रभागा के जल में स्नान करता है और एक-एक बार ही किया करता है । उस पुरुष के वंश में महारोग कभी भी नहीं होगा । देह के अन्त में वह पुरुष चन्द्र भवन को जाकर फिर वह भगवान हरि के लोक में चला जाया करता हैं । जब पुण्य का क्षय हो जाया करता है तभी यहाँ संसार में आकर अर्थात् पुनः जन्म ग्रहण करके वेदों का ज्ञाता ब्राह्मण होता है । चन्द्रभागा नदी का जल पीकर वह मनुष्य चन्द्रलोक को प्राप्त किया करता है । विधि के साथ एक बार स्नान करके अयुत (दस
१४४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ हजार) वाजपेय यज्ञ के पुण्य को प्राप्त किया करता है। चन्द्रभागा के जल में स्नान करके बाल्य लीला से क्रीड़ा करती हुई पिता के समीप में उसके तट पर किसी समय में उस अरुन्धती को आकाश मार्ग से जाते हुए ब्रह्माजी ने अरुन्धती को उस काल में उपदेश में देखा। इसके उपरान्त उस समय में मुनियों के द्वारा परिपूजित जो कि मेधातिथि आदि थे ब्रह्माजी ने उस महामुनि से समुचित कहा था। ब्रह्माजी ने कहा-हे महामुनि! यह अरुन्धती के उपदेश का काल है। इस कारण इसको सती स्त्रियों के मध्य में सन्निधि वाली करो। बहुला सावित्री और सावित्री के समीप में आप पुत्री को स्थापित करिये। हे महामुने! आपकी पुत्री उन दोनों का संसर्ग प्राप्त करके महान् गुण गण और ऐश्वर्य से संयुत शीघ्र ही हो जायेगी। परमात्मा ब्रह्माजी ने वचन का श्रवण करके मेधातिथि से उस समय में ऐसा ही होगा, यह मुनिश्रेष्ठ ने कहा था। इसके अनन्तर सुर श्रेष्ठ के चले जाने पर मेधातिथि मुनि अपनी पुत्री को लेकर उसी क्षण में सूर्य भवन के प्रति गमन किया था। वहाँ पर सूर्य मण्डल के मध्य में विराजमान सावित्री को देखा था। जो कि पद्म के आसन पर संस्थित थी और वह देवी अक्षों की माला को धारण करने वाली एवं सितवर्ण वाली थी। रवि के मण्डल से निकलकर उस मुनि के द्वारा वह देखी गई थी। वह बहुला शीघ्र ही मानस पर्वत के प्रस्थ पर चली गयी थी। वहाँ पर प्रतिदिन सावित्री, गायत्री तथा बहुला, सरस्वती और द्रुपदा के पाँचों मानस अनल पर थी। वहाँ पर लोकों की हितकामना से परस्पर में धर्माख्याओं के द्वारा साध्वी कथाओं को कहकर फिर अपने-अपने स्थान को चली जाया करती थी। तप ही जिसका धन था। हे माता! आप तो समस्त लोकों की माता हैं मैं आपको पृथक-पृथक प्रणाम समर्पित करता हूँ। उस तपोधन ऋषि ने उन सबसे परम मधुर वचन कहा था और वह उन सबको एक ही स्थान में सम्मिलित हुई का दर्शन करके बहुत ही भयभीत और विस्मित हुआ था। मेधातिथि ने कहा-हे माता सावित्री!
൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ १४५ हे माता बहुले! यह मेरी महान् यज्ञ वाली पुत्री है। अब इसके उपदेश करने का समय आ गया है। उसी के लिए मैं यहाँ पर समागत हुआ हूँ। यह जगत् के सृजन करने वाले के द्वारा आज्ञा प्राप्त करने वाली हुई है कि यह आपकी शिष्यता को प्राप्त करे अर्थात् आपकी शिष्य हो जावे। इस कारण से यह मेरी पुत्री आपके समीप में लाई गई है। जिस प्रकार से इसकी सुचरित्रता होवे उसी प्रकार से इस मेरी बालिका को आप दोनों देवी बना देवें। हे माताओं! आप दोनों के लिए प्रणाम अर्पित है। इसके उपरान्त उस समय में देवी सावित्री मन्द मुस्कराहट के साथ बहुला के सहित उस मुनियों में श्रेष्ठ से कहा था और उस बालिका से भी कहा था। उन दोनों देवियों ने कहा-हे ब्राह्मण! भगवान विष्णु के प्रसाद से आपकी पुत्री बहुत ही चरित्र वाली है। हे मुने! यह तो पहले ही ऐसी सुयोग्य हुई है फिर इसको उपदेश देने से क्या लाभ है। तात्पर्य यही है कि जो यह आपकी पुत्री पहले ही से परम योग्य है तो फिर इसको उपदेश देने की कोई भी आवश्यकता नहीं है। किन्तु मैं और महासती बहुला ब्रह्मवाक्य के होने से आपकी धैर्य वाली सुता को विनीत बनायेंगी अर्थात् सदुपदेशों के द्वारा परम विनीत ऐसे ढंग से कर देंगी के उसमें विशेष विलम्ब नहीं होगा। यह पहले ब्रह्माजी की पुत्री थी आपके तपोबल के कारण से तथा भगवान विष्णु के प्रसाद से यह अरुन्धती आपकी सुता हुई है। यह सती आपके कुल को पवित्र करती है और उसकी वृद्धि की करेगी। यह लोकों को और देवों का कल्याण ही करेगी। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर यह मेधातिथि मुनि के द्वारा विदा होकर उसने अपनी पुत्री अरुन्धती को आश्वासन दिया था और फिर उनको प्रणाम करके वह अपने आश्रम को चले गये थे। उस मुनिवर के चले जाने पर अरुन्धती उन दोनों के साथ माताओं की ही भाँति निडर पाली हुई थीं और उसने भी आनन्द प्राप्त किया था। किसी समय में रात्रि में सावित्री के साथ वह रतिदेव के गृह को जाया करती थी और किसी समय में बाहुल्य के साथ इन्द्रदेव के घर में जाती थी।
१४६ श्रीकालिका पुराण इसी रीति से वह देव उन दोनों के साथ सुरों के आलय में अर्थात् स्वर्गलोक में विहार करती उसने दिव्यमान से अर्थात् वेदों की गणना के हिसाब से सात परिवत्सर व्यतीत कर दिये थे। उन दोनों के साथ ये बैठी हुई उस सती ने शीघ्र ही स्त्री धर्म को सम्पूर्णता से जान गयी थी अर्थात् स्त्रियों का पूरा धर्म का ज्ञान उसने प्राप्त कर लिया था और वह सावित्री तथा बहुला से भी अधिक ज्ञानवती हो गयी थी। इसके अनन्तर उसको उस समय समुचित काल के सम्प्राप्त होने पर यौवन का उद्भेद हो गया था अर्थात् यौवनावस्था के चिह्न प्रकट हो गये थे जिस प्रकार से पद्मिनीयों की रुचि हुआ करती है। उद्भूत यौवन वाली उसे मानस अचल में विहार करती हुई अकेली ही ने सुन्दर तेज वाले वशिष्ठ मुनि को देखा था। उस सती ने उस समय में उस मुनि का अवलोकन करके कामवासना की भावना से बालसूर्य के तुल्य प्रभा वाले सुन्दरतम रूप ब्राह्मण की श्री से समन्वित इसकी इच्छा की थी अर्थात् उसे प्राप्त करने की लालसा उसको हो गयी थी। इसके उपरान्त महान तेज वाले उन वशिष्ठ मुनि ने भी उस परवर्णिनी का अवलोकन करके अद्भुत काम वाला होते हुए उस अरुन्धती को देखा था। हे द्विज श्रेष्ठों! इस रीति से परस्पर में एक दूसरे का अवलोकन करके महान काम की वृद्धि हो गई थी। जिस तरह से किसी प्राकृत अर्थात् साधारण व्यक्ति को बिना ही मर्यादा के कामदेव समुत्पन्न हो जाया करता है। तात्पर्य यह है कि सामान्य की ही भाँति कामवासना उद्भूत हो गई थी। इसके अनन्तर उस प्रकार उस मेधातिथि की पुत्री ने धीरज का आलम्बन किया था और अपनी आत्मा को तथा मदन (कामदेव) से प्रेरित मन को धारण किया था अर्थात् अपने आपको मन को संयत रखा था। महान् तेजस्वी वशिष्ठ मुनि ने भी अपनी आत्मा में धैर्य रखकर कामवासना से उन्मथित मन को स्तम्भित किया था। इसके अनन्तर देवी अरुन्धती ने मुनि की सन्निधि का त्याग करके अपने मनोरथ की बुराई करती हुई जहाँ पर सावित्री थी वहाँ पर ही वह चली गई थी। वह महासती मानस दुःख की अधिकता से बाध्यमाना होती हुई
൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ १४७ मैंने सती का भाव परित्याग कर दिया है, यही वह चिन्तन कर रही थी। उसका कामवासना के द्वारा समुत्पन्न दुःख से मुख कान्तिहीन हो गया था उसका सम्पूर्ण शरीर भी म्लान हो गया था और गति भी मलिन हो गयी थी और उसने यह विचार किया था और अपने मन की गर्हणा (बुराई) करती थी कि यह मन की वृत्ति मृणाल के तन्तु के ही समान परम सूक्ष्म है और उस क्षण में छिन्न हो जाया करती है। सतियों की स्थिति अत्यन्त अल्प चलपता से ही विनष्ट हो जाया करती है। यही सती के धर्म को पढ़ाकर मुझे चरित्र व्रत वाली सावित्री ने कहा था। सावित्री देवी ने धर्म को यह सार उद्धृत किया था अर्थात् मुझे बतलाया था यह आज परकीय पुरुष में मनोरथ से नष्ट कर दिया है। तात्पर्य यह है कि दूसरे पुरुष में रम जाने ही से वह नष्ट हो गया है। उस समय उस मेधातिथि की पुत्री अरुन्धती क्या वहाँ पर पराये में मेरा मन होगा इसी विचार को बढ़ाते हुए यही वह चिन्तन कर रही थी। दुःख से आर्त्त वह बहुला और सावित्री देवी के समीप पहुँच गयी थी। उस प्रकार से परम चिन्तित होती हुई, कान्तिहीन मुख वाली उस सती को देखकर ध्यान के चिन्तन में परायण होकर सावित्री ने विचार किया था और दिव्य ज्ञान के द्वारा विचार करती हुई उस सती को पूरा ज्ञान हो गया। जिस प्रकार से वशिष्ठ मुनि ने साथ अरुन्धती का अवलोकन हुआ था और जैसा उन दोनों में अत्यन्त दुःसह कामवासना प्रवृद्ध हुई थी। दिव्य दर्शन करने वाली सावित्री ने अरुन्धती के मुख की कान्ति की हीनता का हेतु भी जान लिया था। इसके अनन्तर उस सावित्री के मेधतिथि की पुत्री के मस्तक पर हाथ रखकर उस महादेवजी ने जो चरित्र व्रत वाली सावित्री थी यही कहा था-हे बेटी! किस कारण से तुम्हारा मुख भिन्न वर्ण वाला हो गया है ? हे गुणोत्तमे! जिस प्रकार से नाल से छिन्न होने वाला पद्म जो सूर्य के ताप ते तापित हुआ होता है उसी भाँति तेरा शरीर कैसे म्लान हो गया है। जिस तरह से चन्द्र का बिम्ब छोटे से काले बादल के द्वारा सवृत होकर मलिन हो जाया करता है वैसे ही तुम्हारा मुख हो गया है।