कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
൏ श्रीकालिका पुराण ൏ ४४५ चौंसठ योगिनी नाचत संगा। मद्यपान कीन्हेउ रण गंगा ॥ कटि किंकिणी मधुर नूपुर धुनि। दैत्यवंश कांपत जेहि सुनि-सुनि ॥ कर खप्पर त्रिशूल भयकारी। अहै सदा सन्तन सुखकारी ॥ शव आरूढ़ नृत्य तुम साजा। बाजत मृदंग भेरि के बाजा ॥ रक्त पान अरिदल को कीन्हा। प्राण तजेउ जो तुम्हिं न चीन्हा ॥ लपलपति जिह्वा तव माता। भक्तन सुख दुष्टन दुःख दाता ॥ लसत भाल सेंदुर को टीको। बिखरे केश रूप अति नीको ॥ मुंडमाल गल अतिशय सोहद। भुजामाल किंकण मनमोहत ॥ प्रलय नृत्य तुम करहु भवानी। जगदम्बा कहि वेद बखानी ॥ तुम मशान वासिनी कराला। भजत तुरत काटहु भवजाला ॥ बावन शक्ति पीठ तव सुन्दर। जहाँ बिराजत विविध रूप धर ॥ विन्ध्यवासिनी कहूँ बड़ाई। कहूँ कालिका रूप सुहाई ॥ शाकम्भरी बनी कहूँ ज्वाला। महिषासुर मर्दिनी कराला ॥ कामाख्या तव नाम मनोहर। पुजवहिं मनोकामना द्रुततर ॥ चंड मुंड वध छिन महं करेउ। देवन के उर आनन्द भरेउ ॥ सर्व व्यापिनी तुम माँ तारा। अरिदल दलन लेहु अवतारा ॥ खलबल मचत सुनत हुँकारी। अगजग व्यापक देह तुम्हारी ॥ तुम विराट रूपा गुणखानी। विश्व स्वरूपा तुम महारानी ॥ उत्पति स्थिति लय तुम्हरे कारण। करहु दास के दोष निवारण ॥ माँ उर वास करहू तुम अंबा। सदा दीन जन की अवलंबा ॥ तुम्हरो ध्यान धरै जो कोई। ता कहँ भीति कतहूँ नहिं होई ॥ विश्वरूप तुम आदि भवानी। महिमा वेद पुराण बखानी ॥ अति अपार तव नाम प्रभावा। जपत न रहत रंच दुःख दावा ॥ महाकालिका जय कल्याणी। जयति सदा सेवक सुखदानी ॥ तुम अनन्त औदार्य विभूषण। कीजिये कृपा क्षमिये सब दूषण ॥ दास जानि निज दया दिखाबहु। सुत अनुमानित सहित अपनावहु ॥ जननी तुम सेवक प्रति पाली। करहु कृपा सब विधि माँ काली ॥ पाठ करै चालीसा जोई। तापर कृपा तुम्हारी होई ॥ दोहा:- जय तारा जय दक्षिणा, कलावती सुखमूल । शरणागत 'राजेश' है, रहहु सदा अनुकूल ॥ ॥ इति काली चालीसा समाप्त ॥
४४६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ आरती : श्रीकाली जी की मंगल की सेवा सुन मेरी देवा, हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े । पान सुपारी ध्वजा नारियल, ले ज्वाला तेरी भेंट करें ॥ सुन जगदम्बा कर न विलम्बा, सन्तन के भण्डार भरें । सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करें ॥१॥ 'बुद्धि' विधाता तू जगमाता, मेरा कारज सिद्ध करें । चरण कमल का लिया आसरा, शरण तुम्हारी आन पड़े ॥ जब जब भीड़ पड़े भक्तन पर, तब तब आप सहाय करें । सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करें ॥२॥ 'गुरु' के वार सकल जग मोहे, तरुणी रूप अनूप धरे । माता होकर पुत्र खिलावै, कहीं भार्या होकर भोग करें ॥ 'शुक्र' सुखदाई सदा सहाई, सन्त खड़े जय कार करें । सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करें ॥३॥ ब्रह्मा, विष्णु, महेश फल लिए, भेंट देन सब द्वार खड़े । अटल सिंहासन बैठी माता, सिर सोने का छत्र धरे ॥ वार 'शनिचर' कुमकुम वरणी, जब लुंगड़ पर हुक्म करे । सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे ॥४॥ खडग खप्पर त्रिशूल हाथ लिये, रक्तबीज को भस्म करे । शुम्भ निशुम्भ क्षणहि में मारे, महिषासुर को पकड़ दरे ॥ 'आदित' वारी आदि भवानी, जन अपने का कष्ट हरे । सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे ॥५॥