भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 259 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 103

३५६ ] [ कल्कि पुराण गर्ग्यो जघ्नु षष्टिशत भर्ग्य कोटिशतायुतम् । विशालास्तु सहस्राणा पञ्चाविश रणे त्वरन् ।१३। अयुते द्वे जघानाजौ पुत्राभ्या सहितः कवि । दशलक्ष तथा प्राज्ञ पञ्चलक्ष सुमन्त्रक ।१४। जिन प्राह हन्सकल्किस्तिष्ठाग्रे ममदुर्मते ! । दैव मा विद्धि सर्वत्र शुभाशुभफलप्रदम् ।१५। अश्व के भयंकर श्वास से उड कर कोई-कोई वीर तो अन्य द्वीपो मे जाकर गिर गये तथा कुछ वीर गज, अश्व एव रथादि से टक्कर खा कर युद्ध स्थल मे ही धराशायी हो गये ।१२। गर्ग्य ने अपने अनुगामियो को साथ लेकर बौद्धो की छ. हजार सेना का सहार कर दिया। भर्ग्य और उसकी सेना ने दस हजार सेना मार दी तथा विशाल और उसकी सेना ने पच्चीस हजार सेना नष्ट कर डाली ।१३। कवि और उनके दोनो पुत्रो ने बीस सहस्र सैनिक मार डाले । प्राज्ञ ने दस लाख और सुमन्त्रक ने पाँच लाख सेना का सहार कर दिया ।१४। फिर जिन को भागता देख कर कल्किजी ने हँस कर उससे कहा-अरे दुर्मते ! भाग कर न जा । तू मुझे अदृष्ट स्वरूप एव सभी शुभाशुभ फलो का देने वाला समझ कर मेरे सामने आ ।१५। मद्बाणजालभिन्नाङ्गो निःसङ्गो यास्यसि क्षयम् । न यावत्पश्य तावत्व बन्धूना ललित मुखम् ।१६। कल्केरितीरित श्रुत्वा जिन ग्राह हसन्बली । दैव त्वदृश्य शास्त्रे ते वधोऽयमुरीकृतः । प्रत्यक्षवादिनो बौद्धा वय यूय वृथाश्रमाः ।१७ यदि वा दैवरूपस्त्व तथाप्यग्रे स्थिता वयम् । यदि भेत्तासि बाणौघैस्तदा बौद्धैः किमत्र ते ।१८। सोपालम्भ त्वया ख्यातं त्वयेवास्तु स्थिरो भव । इति क्रोधाद्वाणजालै. कल्किं घोरै. समावृणोत् ।१६।

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद) · पृष्ठ 103, कुल 259 में से · BharatKosha