कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठम अध्याय-२ ] [ ३५७ स तु बाणमयं वर्षं क्षयं निन्येऽर्कवद्धिमम् ॥२०॥ तू मेरे बाणो से आहत होकर अभी परलोक को प्राप्त होगा । तब तेरा साथ कोई भी नही देगा । इसलिए अब तू अपने बधु-बांधवो का सुन्दर मुख देख ले । १६। कल्किजी के वचन सुन कर वह बली जिन हँसा हुआ बोला--अदृष्ट कभी समक्ष नही हो सकता । हम बौद्ध गण प्रत्यक्षके अतिरिक्त अन्य कुछभी नही मानते । हमारा शास्त्र कहता है कि हम अदृष्ट को नष्ट कर देंगे ।१७। यदि तुम दैव रूप हो तो हम तुम्हारे सामने खडे हैं । यदि तुम हमे बाण से आहत करोगे तो क्या बौद्ध गण तुम्हे छोड देंगे ।१८। जो तुम हमारे प्रति तिरस्कार के वचन कहते हो, वे वचन तुम पर ही लौट जाएँगे, अब तुम सावधान होजाओ । यह कह कर जिन ने अपने तीक्ष्ण बाणो से कल्किजी को समावृत्त कर दिया ।१९। जैसे सूर्य के दिखाई देने पर हिमपात नाश को प्राप्त होता है, वैसे ही जिन द्वारा की गई बाण-वर्षा कल्किजी के स्पर्श से क्षीण होने लगी ।२०। ब्राह्म वायव्यमाग्नेय पार्जन्यं चान्यदायुधम् । कल्केर्दर्शनमात्रेण निष्फलान्यभवन्क्षणात् ।२१। यथोपरे बीजमुप्त दानमश्रोत्रिये यथा । यथा विष्णौ मता द्वेषाद्भक्तिर्येन कृताप्यहो ।२२। कल्किस्तु तं वृषारूढमवप्लुत्य कचेऽग्रहीत् । ततस्तौ पेततुर्भू मौ ताम्रचूडाविव क्रु धा ।२३। पतित्वा स कल्किकचं जग्राह कट्करं करे ।२४। तत. समुत्थितौ व्यग्रौ यथा चाणूरकेशवौ । धृतहस्तौ धृतकचौ ऋक्षाविव महाबलौ । युयुधाते महावीरो जिनकल्की निरायुधौ ।२५। जिन द्वारा प्रेरित ब्रह्मास्त्र, वायव्या, आग्नेयास्त्र, मेघास्त्र और अन्यान्य सभी अस्त्र कल्किजी के दर्शन मात्र फल-हीन हो गये ।२१। जैसे