भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

३५८ ] [ कल्कि पुराण ऊसर मे बीज बोने पर भी अन्न उत्पन्न नही होता तथा अश्रोत्रिय को दिया हुआ दान निष्फल हो जाता है, अथवा साधुजनो का अनिष्ट चाहने वालो की हरि-भक्ति फलवती नही होती, वैसे ही 'जिन' के सभी अस्त्र निष्फलता को प्राप्त हो गये ।२२। फिर कल्किजी ने उछल कर वृषभ पर चढ़े हुए जिन क केश पकड लिए तथा दोनो ही पृथिवी क्रोधपूर्वक अरुण ज्वाल-शिखा के समान युद्ध मे गुंथ गये ।२३। धरती पर गिरे हुए जिन ने भी अपने एक हाथ मे कल्किजी के केश और दूसरे से हाथ पकड रखे थे ।२४। फिर जैसे चाणूर और श्रीकृष्ण के मध्य युद्ध हुआ था, उसी प्रकार दोनो पृथिवी से उठ कर परस्पर केश और हाथ पकड कर निरस्त्र उसी प्रकार लड़ने लगे, जैसे दो महाबली रीछ परस्पर मे युद्ध करते हैं ।२५। तत कल्की महायोगी पदाघातेन तत्कटिम् । विभज्य पातयामास ताल मत्तगछो यथा ।२६। जिन निपतित दृष्ट्वा बौद्धा हाहेति चक्रुशु । कल्केः सेनागणा विप्रा जहृषुनिहतारयः ।२७। जिने निपतिते भ्राता तस्या शुद्धोदनो बलो । पदाचारी गदापाणि कल्कि हन्तु द्रुत ययौ ।२८। कविस्तु त बाणावर्षै परिवार्य समन्ततः । जगज्ज परवोरघ्नो गजमावृत्य सिहवत् ।२६। गदाहरत नमालोक्य पति स धर्मवित्तकवि । पदातिगो गदापाणिस्तथौ शुद्धोदनाग्रत ।३०। जैसे मदमत्त गजराज ताल के वृक्ष को उखाड कर धराशायी कर देता है, वैसे ही कल्किजी ने पदाघात करके जिन की कमर तोड़ कर उसे धरती पर गिरा दिया ।२६। हे विप्रो ! उसको धराशायी हुआ देख कर बौद्ध सेना हाहाकार कर उठी तथा शत्रु का सहार हुआ देख कर कल्कि-सेना हर्षित हो गई ।२७। जिन को युद्ध स्थल मे गिरा देखते ही उसका भाई बलवान् शुद्धोदन गदा लेकर कल्किजी को मारने के लिए