कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम अध्याय-३ ] [ ३६७ रूप-गन्ध-रस-स्पर्श-शब्दाद्या भूतपञ्चकाः । चरन्ति यदधिष्ठानात्सोऽद्य कल्कि. परात्मक ।२५। कल्किजी के वचन सुन कर म्लेच्छ-पत्नियां हँस पडी । उन्होने कहा—हे विभो ! जब तुम्हारे द्वारा हमारे पति ही नाश को प्राप्त हो गये, तब हम भी नष्ट हो चुकी । यह कह कर वे नारियाँ कल्किजी की मारने को तत्पर हुई । उन्होने जो अस्त्र छोडने चाहे, वे अस्त्र उनके हाथो मे ही रुके रह गये ।२१। खड्ग, शक्ति, धनुष-बाण, शूल, तोमर, यष्टि आदि शस्त्रास्त्रो के स्वर्ण-सज्जित देवता साक्षात् प्रकट हो कर उन म्लेच्छ-पत्नियो के प्रति बोले ।२२ देव रूपी अस्त्रो ने कहा—हे नारियो । हम जिस तेज के द्वारा जीवो का सहार करते रहते हैं, वह तेज हमे जिनसे प्राप्त हुआ है, वह सर्वमय ईश्वर यही हैं, यह समझ लो ।२३। हे स्त्रियो ! हम इन्ही परमात्मा की प्रेरणा प्राप्त कर गतिशील होते हैं तथा इनके द्वारा ही हम नाम-रूप को पाकर जाने जाते हैं ।२४। रूप, गन्ध, रस, स्पर्श तथा शब्दादि पचगुण के आश्रय रूप पञ्चभूत जिनके अधिष्ठान से अपने-अपने कार्य मे उद्यत रहते है, यह कल्किजी वही ईश्वर है ।२५। काल स्वभाव-सस्कार-नामाद्या प्रकृति परा । यस्येक्षया सृजत्यण्ड महदहङ्कारकादिकान् ।२६। य-मायया जगद्यात्रा सर्गस्थित्यन्तसञ्जिता । य एवाद्यः स एवान्ते तस्याय सोऽयमीश्वर ।२७। असौ पतिर्मे भार्याहमस्य पुत्राप्तबान्धवाः । स्वप्नोपमास्तु तन्निष्ठा विविधाश्चैन्द्रजालवत् ।२८। स्नेहमोनिबन्धना यातायात्वशा मतम् । न कल्किसेविना रागद्वेषविद्वेषकारिणाम् ।२६। कुतः कालः कुतो मृत्यु क्व यमः क्वास्तिदेवताः स एव कल्किर्भगवान्मायया बहुलीकृत. ।३०।