कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
प्रथम अध्याय-३ ] [ ३६७ रूप-गन्ध-रस-स्पर्श-शब्दाद्या भूतपञ्चकाः । चरन्ति यदधिष्ठानात्सोऽद्य कल्कि. परात्मक ।२५। कल्किजी के वचन सुन कर म्लेच्छ-पत्नियां हँस पडी । उन्होने कहा—हे विभो ! जब तुम्हारे द्वारा हमारे पति ही नाश को प्राप्त हो गये, तब हम भी नष्ट हो चुकी । यह कह कर वे नारियाँ कल्किजी की मारने को तत्पर हुई । उन्होने जो अस्त्र छोडने चाहे, वे अस्त्र उनके हाथो मे ही रुके रह गये ।२१। खड्ग, शक्ति, धनुष-बाण, शूल, तोमर, यष्टि आदि शस्त्रास्त्रो के स्वर्ण-सज्जित देवता साक्षात् प्रकट हो कर उन म्लेच्छ-पत्नियो के प्रति बोले ।२२ देव रूपी अस्त्रो ने कहा—हे नारियो । हम जिस तेज के द्वारा जीवो का सहार करते रहते हैं, वह तेज हमे जिनसे प्राप्त हुआ है, वह सर्वमय ईश्वर यही हैं, यह समझ लो ।२३। हे स्त्रियो ! हम इन्ही परमात्मा की प्रेरणा प्राप्त कर गतिशील होते हैं तथा इनके द्वारा ही हम नाम-रूप को पाकर जाने जाते हैं ।२४। रूप, गन्ध, रस, स्पर्श तथा शब्दादि पचगुण के आश्रय रूप पञ्चभूत जिनके अधिष्ठान से अपने-अपने कार्य मे उद्यत रहते है, यह कल्किजी वही ईश्वर है ।२५। काल स्वभाव-सस्कार-नामाद्या प्रकृति परा । यस्येक्षया सृजत्यण्ड महदहङ्कारकादिकान् ।२६। य-मायया जगद्यात्रा सर्गस्थित्यन्तसञ्जिता । य एवाद्यः स एवान्ते तस्याय सोऽयमीश्वर ।२७। असौ पतिर्मे भार्याहमस्य पुत्राप्तबान्धवाः । स्वप्नोपमास्तु तन्निष्ठा विविधाश्चैन्द्रजालवत् ।२८। स्नेहमोनिबन्धना यातायात्वशा मतम् । न कल्किसेविना रागद्वेषविद्वेषकारिणाम् ।२६। कुतः कालः कुतो मृत्यु क्व यमः क्वास्तिदेवताः स एव कल्किर्भगवान्मायया बहुलीकृत. ।३०।
प्रथम अध्याय-३ ] [ ३६८ इन्ही की आज्ञा से काल, स्वभाव, सस्कार तथा सजा आदि की आश्रयभूता परा प्रकृति, महत्तत्त्व और अहकार आदि को उत्पन्न करने मे समर्थ होती है ।२६। सर्ग, स्थिति और प्रलयात्मक यह सम्पूर्ण विश्व जिनकी माया ही है, यह वही सबके आदि-रूप ईश्वर है । इनके द्वारा ही लोक मे शुभाशुभ का प्रवर्तन होता है ।२७। यह मेरा पति है और मै इसकी भार्या हूँ, यह मेरा पुत्र अथवा बान्धव है । ऐसे स्वप्न अथवा इन्द्रजाल के समान विविध प्रकार के व्यवहार की उत्पत्ति इन्ही के द्वारा होती है ।२८। स्नेह और मोहादि के बन्धन मे पड़े रह कर जो प्राणी इस विश्व के आवागमन मे रहे आते हैं अथवा जो राग, द्वेष एव विद्वे- षादि के आश्रय रहने वाले जीव तथा भगवान कल्कि की सेवा में अनु- राग न रखने वाले हैं, वही इस जगत को सत्य मानते हैं ।२६। काल कहा से आया ? मृत्यु कहाँ से उत्पन्न हुई ? यम तथा देवगण कौन हैं ? यह कल्किजी के अतिरिक्त अन्य कोई नही है, यही अपनी माया के द्वारा बहुरूप हो गए हैं ।३०। न शस्त्राणि वय नार्थः सप्रहार्या न च क्वचित् । शस्त्र प्रहर्तृ भेदोऽयमविवेक परात्मन. ।३१। कल्किदासस्यापि वय हन्तु नार्हा कथोद्भुनम् । हनिष्यामो दैत्यपते प्रह्लादस्य यथा हरिम् ।३२। इत्यस्त्राणा वच. श्रुत्वा स्त्रियो विस्मितमानसा. । स्नेहमोहविनिर्मुक्तास्त कल्कि शरण ययुः ॥३३॥ ताः समालोक्य पद्मेशः प्रणता ज्ञाननिष्ठया । प्रोवाच प्रहसन् भक्ति-योग कल्मषनाशनम् ।३४। हे स्त्रियो ! हम शस्त्र नहीं हैं, हम किसी पर आघात करने मे भी समर्थ नही हैं । यही परमात्मा स्वय शस्त्र हैं और यही आघात करने की शक्ति से सम्पन्न हैं । इनमे जो भेद प्रतीत होता है, वह सब इनकी माया ही है ।३१। दैत्यराज प्रह्ल.द की प्रार्थना पर जब भगवान् विष्णु,
३६६ ] कल्कि पुराण विष्णु नृसिंह रूप हुए थे, उस समय हम जैसे उन पर आघात करने मे समर्थ नही हो सके थे, वैसे ही इन कल्किजी और उनके सेवको पर भी आघात करने मे पूर्णतया असमर्थ हैं।३२। अस्त्रो के यह वचन सुनकर स्त्रिया अत्यन्त विस्मित हुईं और तब वे स्नेह और मोह से युक्त होकर कल्किजी की शरण मे पहुँची । ३३। भगवान कल्कि म्लेच्छ-नारियो को ज्ञाननिष्ठा मे स्थित देखकर उनके प्रति पापो का नाश करने वाला भक्ति- योग हँसते हुए कहने लगे । ३४। कर्मयोगञ्चात्मनिष्ठं ज्ञानयोगं भिदाश्रयम् । नैष्कर्म्यलक्षणं तासा कथयामास माधवः ३५। ताः स्त्रियः कल्कि गदित ज्ञानेन विजितेन्द्रियाः । भक्त्या परमवापुस्तद्योगिना दुर्लभं पदम् । ३६। दत्वा मोक्ष म्लेच्छबौद्धपियारण कृत्वा युद्ध भैरव भीमकर्मा । हत्वा बौद्धान् म्लेच्छ सघाश्च कल्किस्तेषा ज्योति स्थानापूर्ण रेजे । ३७। येशृण्वन्ति वदन्ति बौद्धनिधन म्लेच्छक्षय सादराल्लोकाः शोकहर सदा शुभकर भक्तिप्रदं माधवे । तेषामेव पुनर्न जन्ममरण सर्वार्थसम्पत्कर माया मोहविनाशन प्रतिदिन ससारतापच्छिदम् ।३८। तदनन्तर उन्होने उन नारियो को कर्मयोग, आत्मनिष्ठात्मक ज्ञान- योग, भेदाश्रय, निष्कर्मत्व के लक्षण आदि का प्रसग सुनाया ।३५। इस प्रकार जब वे म्लेच्छ रमणियां कल्कि-प्रदत्त ज्ञानोपदेश से सचेत होकर इन्द्रियो का दमन करके, भक्ति करती हुई, योगियो को भी दुर्लभ मोक्ष पद को प्राप्त हो गई ।३६। इस प्रकार उन भीमकर्मा कल्किजी घोर युद्धमे बौद्ध और म्लेच्छो का सहार कर दिया, और उनकी स्त्रियो को मोक्षपद प्रदान करके मरे हुए म्लेच्छो और बौद्धो को ज्योतिर्मय स्थान में स्थित कर विराजमान हुए । ३७। जो इस बौद्धो के निधन एव म्लेच्छो के क्षीण होने की कथा को सुनेगे, वे सभी शोको से मुक्त होकर कल्याण को प्राप्त होगे । भगवान के प्रति उनके हृदय मे भक्ति का संचार होगा और वे जन्म- मरण के चक्र से छूट जाँयगे । इस कथा के सुनने से सर्व ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है और माया-मोह का विनाश होता है, तथा संसार के ताप का सदा उच्छेद करने मे समर्थ होता है ।३८। —❀—
तृतीयांश- द्वितीय अध्याय ततो बौद्धान् म्लेच्छगणान्विजित्य सह सैनिकैः । धनान्यदाय रत्नानि कीकटात्पुनरव्रजत् ।१। कल्किः परमतेजस्वी धर्माणां परिरक्षकः । चक्रतीर्थं समागत्य स्नानं विधिवदाचरत् ।२। भ्रातृभिर्लोकपालाभैर्बहुभिः स्वजनैर्वृतः । समायातान्मुनीं स्तत्र ददृशे दीनमानसान् ।३। समुद्भिभागतास्त परिपाहि जगत्पते । इत्युक्तवन्तो बहुधा ये तानोह हरि परः ।४। वालखिल्यादिकानल्पकायाञ्चीरजटाधरान् । विनयावनतः कल्किरतनानाह कृपणान्भयात् ।५ सूतजी बोले- हे ऋषियो ! बौद्धो और म्लेच्छो पर विजय प्राप्त करके भगवान कल्कि धन रत्नादि लेकर सेना के सहित उस कीकटपुरी से चल दिये ।१। फिर वे परम तेजस्वी एव धर्मवान् कल्किजी चक्रतीर्थ मे पहुचे और वहाँ उन्होंने विधिपूर्वक स्नान किया ।२। तदनन्तर वे अपने बन्धु-बाधव के साथ लोकपाल के समान सुशोभित होते हुए वही निवास करने लगे । कुछ समयोपरान्त उन्होंने दीनता पूर्वक आये हुए कुछ मुनियो को देखा ।३। वे भयभीत मुनिवरण कल्किजी की शरण मे पहुँच कर बोले- हे जगत्पते ! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो । इस पर भग- वान श्रीहरि बोले ।४। उन्होने अल्प देह वाले छिन्न वस्त्राभूषण और जटा धारण करने वाले बालखिल्यादि मुनियो से विनय और कृपा पूर्वक कहा ।५।
३७१ ] [ कल्कि पुराण कस्माद्यूयं समायाता केन वा भीषिता वत । तमहं निहनिष्यामि यदि वा स्यात्पुरन्दरः ॥६॥ इत्याश्रुत्य कल्किवाक्यं तेनोल्लासितमानसाः । जगदुः पुण्डरीकाक्ष निकुम्भदुहितुः कथाः ॥७॥ शृणुविष्णुयशःपुत्र ! कुम्भकर्णात्मजात्मजा । कुथोदरीति विख्याता गगनार्द्धसमुत्थिता ॥८॥ कालकञ्जस्य महिषी विकञ्जजननी च सा । हिमालये शिरः कृत्वा पादौ च निषधाचले । शेते स्तनं पाययन्ती विकञ्जं प्रस्तुतास्तनी ॥६॥ तस्या निःश्वासवातेन विवशा वयमागताः । दैवेनैव समानीताः सम्प्राप्तास्त्वत्पदास्पदम् । मुनयो रक्षणीयास्ते रक्ष सु च विपत्सु च ॥१०॥ आप कहाँ से आ रहे हैं ? किससे डरे हुए हैं ? यह सब वृतान्त मुझे बताओ, फिर यदि आपका अपकार करने वाला इन्द्र भी होगा, तो भी मै उसे नष्ट कर दूंगा ।६। पुण्डरीकाक्ष कल्किजी के वाक्य सुनकर आश्वस्त हुए मुनियो के हृदय प्रफुल्लित हो गये और तब उन्होंने दैत्यराज निकुम्भ की पुत्री की कथा सुनाई ।७। मुनियो ने कहा— हे विष्णुयश के पुत्र ! हे प्रभो ! सुनिये, कुम्भकर्ण का एक पुत्र निकुम्भ था, उसकी एक कन्या कुथोदरी नाम की है । उसका आकार गगनमँडल से भी ऊँचा है ।८। वह कालकञ्ज नामक दैत्य की पत्नी है, उसका पुत्र विकञ्ज है । वह राक्षसी अपना मस्तक हिमालय पर और पांव निषध पर्वत पर रखकर विकञ्ज को स्तन पिला रही है ।६। हे देव ! हम उसकी श्वासवायु से उत्पीडित होकर दैव-प्रेरणा वश यहाँ उपस्थित हुए हैं । अब हम आपके चरणाश्रय को प्राप्त हो चुके हैं अतः उससे हमारी शीघ्र रक्षा कीजिये ।१० इति तेषां वचः श्रुत्वा कल्किः परपुरञ्जयः ।
थम अध्याय- ३ ] [ ३७२ सेनागणै परिव्रतो जगाम हिमबद्गिरिम् ।११। उपत्यका समासाद्य निशामेका निनाय सः । प्रातर्जिगमिषुः सैन्यैर्ददृशे क्षीरनिम्नगाम् ।१२। शखेन्दुधवलाकारा फेनिला बृहती द्रुतम् । चलन्ती वीक्ष्यते सर्वे स्तम्भीता विस्मयान्विताः ।१३। सेनागणगजाश्वादिरथयोध्यैः समावृतः । कल्किस्तु भगवास्तत्र ज्ञातार्थोऽपि मुनीश्वरान् ।१४। पप्रच्छ का नदी चेयं कथ दुग्धवहाभवत् । ते कल्केस्तु वच श्रुत्वा मुनयः प्राहुरा दरात् ।।१५।। उनके यह वचन सुनकर शत्रु-नगरो को विजय करने वाले भगवान् कल्कि अपनी सेना के सहित हिमालय की ओर चले ।११। वहाँ पहुँच कर उन्होने एक रात्रि निवास किया और प्रात काल होते ही, जैसे ही सेना के सहित आगे चलने लगे, वैसे ही उन्हे एक दूध की नदी दिखाई दी ।१२। यह नदी शंख तथा चन्द्रमा के समान श्वेत थी, वह दीर्घाकार वाली फेनिल नदी वेगपूर्वक बह रही थी । सेना के सभी लोग उस दूध की नदी को देखकर आश्चर्य से चकित हो गये ।१३। यद्यपि भगवान् कल्कि उस नदी के विषय में सब कुछ जानते थे, फिर भी गज, अश्व, रथ तथा पदाति सैनिको से युक्त कल्किजी ने उन मुनीश्वरो से पूछा- 'इस नदी का नाम क्या है ? इसमे यह दुग्ध किस प्रकार प्रवाहित है ?' यह सुनकर वे मुनिगण आदरपूर्वक बोले ।१४-१५। शृणु कल्के पयस्वत्याः प्रभव हिमवद्गिरौ । समायाता कुथोदर्याः स्तनप्रस्रवनादिहि ।१६। घटिकासप्तकैश्चान्या पयो यास्यति वेगतम् । हीनसारा तटाकारा भविष्यति महामते ।१७। इति श्रुत्वा मुनीनान्तु वचन सैनिकैः सह । प्रहो किमस्या राक्षस्याः स्तनादेका त्वियं नदी ।१८
प्रथम अध्याय-२ ] [ ३७१ एक स्तनं पाययति विकुञ्जं पुत्रमादरात् । न जानेऽस्याः शरीरस्य प्रमाणं कति वा भवेत् ॥१९॥ बलं वास्या निशाचर्या इत्यूचुर्विस्मयान्विताः । कल्किः परात्मा सन्नह्य सेनाभि सहसा ययौ ॥२०॥ हे प्रभो ! हे कल्के ! इम पयस्विनी नदी की उत्पत्ति के विषय मे कहते है, इसे सुनिये । उस कुथोदरी नाम की राक्षसी के स्तनो स निकला हुआ दूध हिमालय पर्वत से गिरता हुआ नदी रूप मे बह रहा है ।। १६ ।। हे महामते ! सात घडी के पश्चात् इसी प्रकार को एक अन्य पयस्विनी नदी प्रवाहित होगी । इसके पश्चात् यह नदी सूख कर तटाकार मे परिवर्तित हो जायगी ।।१७।। सेना सहिन सुशोभित कल्कि जी मुनियो के वचन सुनकर बोले- अहो, कैसे विस्मय का विषय है कि राक्षसी के स्तनो से निर्गत हुए दुग्ध से इतनी बडी नदी उत्पन्न होकर बह रही है ।।१८।। वह अपना एक स्तन अपने पुत्र विकुन्ज को पिला रही है तो इसके देह का परिमाण क्या होगा ? यह किस प्रकार जाना जा सकता है ? ।।१९।। तब सभी आश्चर्य मे भर कर बोल उठे-- अहो ! इस राक्षसी मे कितना बल है ? तदनन्तर सेना से सुसज्जित हुए कल्कि जी उस राक्षसी की ओर चल पडे ।।२०।। मुनिदर्शितमार्गेण यत्रास्ते सा निशाचरी । पुत्रं स्तनं पाययन्ती गिरिमूर्द्धिनं घनोपमा ॥२१ः श्वासवातातिवातेन दूरक्षिप्तवनद्विपाः । यस्याः कर्णबिलावासं प्रसुप्ताः सिंहसुकुलम् ॥२२। पुत्रपौत्रपरिवृता गिरिगह्वरविभ्रमाः । केशमूलमुपालम्ब्य हरिणा शेरते चिरम् ।। २३ ।। यूका इव न च व्यग्रा लुब्धजातशङ्कया भृशम् ' तामालोक्य गिरेर्मूर्ध्नि गिरितत्परमाद्भुताम् ॥२४॥ कल्किः कमलपत्राक्षः सर्वांस्तानाह सैनिकान् । भयोद्विग्नान्बुद्धिहीनांस्त्यक्तोद्यमशमपरिच्छदान् ॥२५॥
३७४ ] [ कल्कि पुराण वे मुनिगण उस मार्ग का दर्शन करने लगे जो राक्षसी के स्थान को जाता था । वहाँ पहुँच कर उन्होंने उस मेघाकार राक्षसी को गिरि शिखर पर अपने पुत्र को स्तन-पान कराते हुए देखा ॥२१॥ बन के हाथी उसकी श्वास-वायु के थपेडे खाकर दूर जा गिरते हैं तथा उसके कानों के छेदों में सिंह पडे सो रहे हैं ॥२२॥ उसके रोम छिद्रों को गिरि-गुहा समझ कर अपने पुत्र पौत्रों से युक्त हरिण गण भी उनमें घुस कर सो रहे हैं ॥२३॥ वहाँ रह कर व्याध के भय से बचे हुए हैं तथा लीख के समान स्थित हैं। पर्वत की चोटी पर अन्य पर्वत के समान स्थित उस राक्षसी को देख कर हत बुद्धि एवं भयभीत तथा शस्त्रास्त्र त्याग कर भागने को उद्यत अपने सैनिकों से भगवान् कल्कि बोले ॥ २४-२५ ॥ गिरिदुर्गंवह्निदुर्गं कृत्वा तिष्ठान्तु मामकाः । गजाश्वरथयोधा ये समायान्तु मया सह ॥२६॥ अह स्वल्पेन सैन्येन याम्यस्याः समुख शनैः । प्रहर्तुं बाणसन्दोहैः खङ्गशक्तिपरश्वधै, ।॥२७॥ इत्युक्त्वास्थाप्य पश्चात्तान्बाणैस्ता समहनद्बली । सा क्रुधोत्थाय सहसा ननर्द्द परमाद्भुतम् ॥२८॥ तेन नादेन महता वित्रस्ताश्चाभवञ्जनाः निपेतु सैनिका. सर्वे मूर्च्छिता धरणातले ॥२६॥ सा रथांश्च गजांश्चापि विवृत्तास्या भयानका । जघास प्रश्वासवातैः समानीय कुथोदरी ॥ ३०॥ उन्होंने कहा - इस पर्वतीय, दुर्ग में अग्नि दुर्ग बना कर तुम सब यही ठहरो तथा गजारूढ, अश्वारूढ और रथी वीर हमारे साथ आगे बढ़े ।। २६ ।। मैं अल्प सेना को साथ लेकर बाणों, तलवारों और फरसों के द्वारा प्रहार करने के लिए अग्रसर होता हूँ ॥२७॥ यह कह कर कल्कि जी ने सेना को तो पीछे छोडा और आगे बढ़ कर राक्षसी पर बाणों से प्रहार करने लगे । यह देख कर राक्षसी ने भी
प्रथम अध्याय-३ ] [ ३७५ क्रोध पूर्वक अद्भुत नाद किया ॥ २८ ॥ उस घोर निनाद को सुन कर सभी भयभीत हो गये तथा सब सेनापति मूर्च्छित एव धराशायी हो गये ॥२६॥ तब वह राक्षसी कुथोदरी अपने भयकर मुख को खोल कर अपने प्रश्वास के द्वारा ही रथ, अश्व, गजादि को खीच-खीच कर हडप करने लगी ॥ ३० ॥ सेनागणास्तदुदर प्रविष्टा' कल्किना सह । यथर्क्षमुखवातेन प्रविशन्ति पिपोलिकाः ॥३१॥ तद्दृष्ट्वा देवगन्धर्वा हाहाकारं प्रचक्रिरे । तत्रस्था मुनयः शेपुर्जपुश्चान्ये महर्षय ॥ ३२॥ निपेत्तुरन्ये दुःखार्त्ता ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः । रुरुदुः शिष्टयोधा ये जहृषुस्तन्निशाचरा ॥ ३३ ॥ जगता कदन दृष्ट्वा सस्मरात्मानमात्मना । कल्किः कमलपत्राक्षः सुरारातिनिषूदन ॥ ३४ ॥ बाणाग्नि चेलचर्माभ्या कर्म्मनेयॉनदारुभिः । प्रज्वाल्योदरमध्येन करवाल समाददे ॥ ३५ ॥ जैसे रीछ के प्रश्वास खींचने से चीटियां आकर्षित होकर उसके मुख मे पहुंच जाती है, वैसे ही अपनी सेना के सहित भगवान कल्कि उस राक्षसी के मुख मे प्रविष्ट हो गये ॥३१॥ यह देख कर सब देवता-गन्धर्व हाहाकार कर उठे, मुनिगण ने उस राक्षसी को शाप दिये और महर्षिगण कल्कि जी की कुशल के निमित्त मन्त्र-जप मे संलग्न हुए ॥३२॥ वेदज्ञ ब्राह्मण दुःख से अचेत हो गये, प्रभु-भक्त वीर रोने लगे और राक्षस गण आनन्द मे निमग्न हो गये ॥ ३३ ॥ देव शत्रुओ के नाशक भगवान् कल्कि ने जब सम्पूर्ण विश्व को इस प्रकार दुःखी देखा तो वे स्वय अपना ही स्मरण करने लगे ॥३४॥ फिर कल्कि जी ने राक्षसी के उस अन्धकार मय उदर मे अपने बाण द्वारा अग्नि उत्पन्न की और चर्म तथा रथ के काष्ठादि के द्वारा उस अग्नि को प्रज्वलित कर हाथ मे तलवार ग्रहण की ॥३५॥
३७६ ] [ कल्कि पुराण तेन खड्गेन महता दाक्ष्यं निर्भिद्य बन्धुभिः । बलिभिर्भ्रातृभिर्बाह्वैर्वृतः शस्त्रास्त्रपाणिभि ॥३६॥ बहिर्बभूव सर्वेश कल्कि. कलकविनाशनः । सहस्राक्षौ यथा वृत्रकुक्षित् दम्भोलिनेमिना ॥३७॥ यानि रध्राद्गजरथस्तुरगाश्चाभवन्बहिः । नासिकाकर्णविवरान्क र्दाप तस्या विनिर्गताः ॥३८ ॥ ते निर्गतास्ततस्तस्या सैनिका रुधिरोक्षिताः । ता विव्यधुर्निक्षिपन्ती तरसा चरणौ करौ ॥३६॥ ममार सा भिन्नदेहा भिन्नकुक्षिशिरोधरा । नादयन्ती दिशो घो. ख चूणयन्ती च पर्वतान् ॥४०॥ जैसे देवराज इन्द्र वृत्रासुर की कुक्षि को अपने वज्र से भेद कर बाहर आये थे, वैसे ही सर्वेश्वर एव पापो का नाश करने वाले कल्कि- जी ने अपनी वृहद् तलवार से राक्षसी की दक्षिण कुक्षि चीर डाली और अपने शस्त्रास्त्र धारी बाधवो के सहित बाहर निकल आये ॥ ३६- ३७ ॥ बहुत से गज, अश्व रथ और पैदल उसके अधो मार्ग मे और बहुत से उसके कानो तथा नासिका छिद्रो से होकर बाहर आ गये । ३८॥ फिर वे रक्त से भीगे हुए वीर गण राक्षमी के देह से बाहर निकल कर, को हाथ-पैर चलाती देख कर बाणो द्वारा उसका वेधन करने लगे ॥३६॥ जब उसके उदर मस्तक तथा अन्यान्ध अग छिन्न-भिन्न होने लगे तब उसकी घोर चीत्कार से दशों दिशाएं गूँज उठी । फिर वह पर्वतो पर गिर कर उन्हे चूर-चूर करती हुई मृत्यु को प्राप्त हुई ॥४०॥ करञ्जोऽपि तथा वीक्ष्य मातरं कातरोऽभवत् । स विकञ्ज क्रुधा धावन्सेनामध्ये निरायुध ॥४१॥ गजमालाकुलो वक्षोवाजिराजिविभूषण । महासर्पकृतोष्णीशः केसरीमुद्रिताङ्गुलिः ॥४२॥ ममद्द कल्किसेना ता मातुर्व्यसनकर्षितः । स कल्किरत्त ब्राह्ममस्त्र रामदत्त जिघासया ॥४३॥
प्रथम-अध्याय ] [ ३७७ धनुषा पञ्चवर्षीय राक्षसं शस्त्रमाददे । तेनास्त्रेण शिरस्तस्य छित्वा भूमावपातयत् ॥४४॥ रुधिराक्तं धातुचित्रं गिरिशृङ्गमिवद्भुतम् । सपुत्रा राक्षसी हत्वा मुनीना वचनाद्विभुः ।०४५:। जब विकज ने अपनी माता की यह दशा देखी तो वह क्रोध से कातर होकर निरस्त्र ही सेना में घुस पडा ॥ ४१ ॥ उसके हृदय मे हाथियो की माला, सब अंगो मे घोडो के आभूषण, मस्तक पर महा-सर्प का मुकुट और अंगुलियो मे सिंहो की मुद्रिकाएँ थी ॥ ४२ ॥ वह अपनी माता के शोक से व्याकुल होकर कल्किजी की सेना का उत्पीडन करने लगा । तब कल्किजीने उस पाँच वर्ष के राक्षस-बालक को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र ग्रहण किया और उससे उसका मस्तक काट कर पृथ्वी पर गिरा दिया ॥ ४३-४४ ॥ इस प्रकार मुनियो द्वारा निवेदन करने पर कल्किजी ने गेरू आदि से चित्रित किये के समान उस रक्ताक्त पर्वत पर पुत्र सहित राक्षसी को नष्ट कर दिया ॥४५॥ गङ्गातीरे हरद्वारे निवास समकल्पयत् । देवानां कुसुमासारैर्मुनिस्तोत्रैः सुपूजितः ॥४६॥ निनाय तां निशां तत्र कल्किः परिजनावृतः । प्रातर्ददर्श गङ्गायास्तीरे मुनिगणान्बहून् । तस्याः स्नानव्राजविष्णोरात्मनो दर्शनाकुजान् ॥४७॥ हरद्वारे गङ्गातटनिकटपिण्डारकवने । वसन्तं श्रीमन्तं निजगणवृतं तं मुनिगणाः । स्तवैः स्तुत्वा स्तुत्वा विधिवदुदितैर्जन्हुतनयां । प्रपश्यंतं कल्कि मुनिजलगणा द्रष्टुमगमन् ॥४८॥ तदनन्तर उन्होने देवताओ द्वारा पुष्प-वृष्टि और मुनियो के स्तोत्रो से भले प्रकार पूजित होते हुए वहाँ चल कर हरिद्वार मे गङ्गा जी के
३७८ ] कल्कि पुराण पावन तीर पर अपनी सेना सहित निवास किया ॥४६॥ अपने परिजनो के सहित कल्किजी ने वह रात्रि वही बिताई और प्रात काल उठने पर गगा स्नान के निमित्त आये हुए मुनिगण उनके दर्शनार्थ आते हुए दिखाई दिये ॥४७ ॥ वे हरिद्वार मे गगातट के समीप स्थित पिण्डारक बन मे अपनी सेना के सहित निवास करने लगे । एक दिन, जब वे कलिमल-नाशिनी भगवती जाह्नवी की स्तोत्रो के द्वारा स्तुति कर रहे थे, तभी मुनिगण उनके दर्शनार्थ वहां आये और विविध शब्दो से युक्त स्तोत्र करने लगे ॥ ४८ ॥
तृतीयांश— तृतीय अध्याय सुस्वागतान्मुनीन् दृष्ट्वा कल्किक परम धर्मवित् । पूजावित्वा च विधिवत्सुखासीनानुवा चतान् ॥१॥ कयूय सूर्यसङ्काशा मम भाग्यादुपस्थिताः । तीर्थाटनोत्सुका लोकत्रयाणामुपकारकाः ॥२॥ वय लोके पुण्यवन्तो भाग्यवन्तो यशस्विनः । यत कृपाकटाक्षेण युष्माभिरवलोकिताः ॥३॥ ततस्ते वामदेवऽत्रिवं सष्ठो गालवो भृगुः । पराशरो नारदोऽश्वत्थामा रामः कृपक्षितः ॥४॥ दुर्वासा देवलः कण्वो वेदप्रमितिरङ्गिराः । एते चान्ये च बहबी मुनय, सशितव्रताः ॥५॥ कृत्वाग्रे मरुदेवापी च चन्द्रसूर्यकुलोद्भवौ । राजानौ तौ महावीर्यौ तपस्याभिरतौ चिरम् ॥६॥ ऊचुः प्रहृष्टमनसः कल्कि कल्कविनाशनम् । महोदधेस्तोरगत विष्णु सुरगणा यथा ॥७॥ परम धर्मविद कल्किजी ने उन मुनिगण को सुखपूर्वक वहाँ आये हुए देखकर स्वागत, आसन और विधिवत् पूजन करके उनसे बोले ॥१॥ सूर्य के समान अत्यन्त तेजस्वी, तीर्थाटन मे उत्सुक एवं तीनो लोको के कल्याण रूप उपकार की कामना वाले आप कौन हैं ? जो मेरे सौभाग्यवश यहाँ पधारे हैं ॥२॥ आपके द्वारा कृपा-कटाक्ष पूर्वक देखे जाने से मैं आज इस लोक मे अपने को पुण्यवान्, भाग्यवान्
३८० ] [ कल्कि पुराण और यशवान् ही मानता हूँ ॥ ३ । फिर वामदेव, अत्रि, वसिष्ठ, गालव, भृगु, पराशर, नारद, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, त्रित, दुर्वासा, देवल, कण्व, वेद प्रमिति और अंगिरा आदि यह सब तथा अन्यान्य श्रेष्ठ व्रत वाले मुनिगण चन्द्र सूर्यवंश मे उत्पन्न, महा वीर्यवान एव तपोनिष्ठ राजा मरु और देवापि उनको सामने देख कर, जैसे प्रसन्न मनसे देवताओ ने महोदधि के तीर पर भगवान् विष्णु से कहा था, वैसे ही पापो का नाश करने वाले कल्किजी के प्रति बोले ॥४-७ ॥ जयाशेषजगन्नाथ ! विदिताखिलमानस ! । सृष्टिस्थितिलयाध्यक्ष ! परमात्मन्प्रसीद नः ॥८॥ कालकर्मगुणावास प्रसारितनिजक्रिय ! । ब्रह्मादिनुतपादाब्ज ! पद्मानाथ प्रसीद नः ॥६॥ इति तेषा वच श्रुत्वा कल्किः प्राह् जगत्पति । कावेतौ भवतामग्रे महासत्वौ तपस्विनौ ॥१०॥ कथमत्रागतौ स्तुत्वा गङ्गा मुदितमानसौ । का वा स्तुतिस्तु जाह्नव्या युवयोर्नामनी च के ॥११॥ तयोर्मरुः प्रमुदितः कृताञ्जलिपुटः कृती । आदावुवाच विनयी निजवंशानुकीर्त्तनम् ॥१२॥ मुनियो ने कहा - हे सर्व विजयी जगदीश ! हे सम्पूर्ण विश्व के जीवो के घट-घट के ज्ञाता ! हे सृष्टि स्थिति और प्रलय के स्वामिन् ! हे परमात्मदेव ! प्रसन्न होइये ॥८॥ हे पद्मा के पते ! काल, कर्म और गुण के आप ही आश्रय हैं । ब्रह्मादि देवता भी आपके ही चरणार- विन्दो की पूजा किया करते हैं । आप हम पर प्रसन्न होइये ॥ ६ ॥ मुनियो के यह वचन सुन कर कल्किजी ने उनसे कहा- हे मुनियो ! आपके आगे यह महान् बल सम्पन्न एवं तपस्वी कौन हैं ? ॥१०॥ गगाजी की स्तुति करके अत्यन्त प्रसन्न हृदय से यह यहाँ क्यो पधारे हैं ? यह किस कारण भगवती जान्हवी की स्तुति मे लगे हैं ? इनके नाम क्या-क्या हैं ? ॥११॥ तब वे दोनो मरु देवादि प्रसन्न हृदयसे हाथ
प्रथम अध्याय ३ ] [ ३८१ जोड कर बिनय पूर्वक अपने वंश का यश-वर्णन करने लगे ॥ १२ ॥ सर्ववेत्तिस परात्मापि अन्तर्यामिन्हृदि स्थिति । तवाज्ञया सर्वमेतत्कथयामि श्रृणु प्रभो । १३॥ तव नाभेरभूद्ब्रह्मा मरीचिस्तत्सुतोऽभवत् । ततो मनुम्तत्सुतोऽभूदिक्ष्वाकु सत्यविक्रम ॥१४॥ युवनाश्व इति ख्यातो मान्धाता तत्सुतोऽभवत् । पुरुकुत्सस्तत्सुतोऽभूदनरण्यो महामतिः ॥१५॥ त्रसदस्यु. पिता तस्माद्धर्य्यश्वश्चायरुणस्तत । त्रिशङ्कुस्तत्सुतो धीमान्हरिश्चन्द्रः प्रतापवान् ॥१६॥ हरितस्तत्सुतस्तस्माद्भरुकस्तत्सुतो वृकः । तत्सुत सगरस्तस्मादसमञ्जास्तोऽशुमान् ॥१७॥ मनु बोले — हे प्रभो ! आप तो अन्तर्यामी एव घट-घट मे निवास करने वाले है, आपको सब कुछ ज्ञात है। मै आपकी आज्ञा के अनुसार सब कहता हूँ, उसे सुनिये ॥१३॥ आपके नाभि कमल से ही ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए हैं । ब्रह्मा के पुत्र मरीचि, मरीचि के मनु और मनु के सत्य विक्रम इक्ष्वाकु हुए । १४॥ इक्ष्वाकु का पुत्र युवनाश्व, युवनाश्व का मान्धाता, मान्धाता का पुरुकुत्स और पुरुकुत्स का पुत्र अनरण्य हुआ ॥१५॥ अनरण्य का त्रसदस्यु, त्रसदस्यु का हर्यश्व, हर्यश्व का अरुण, अरुण का त्रिशंकु हुआ तथा त्रिशंकु के पुत्र महा- प्रतापी राजा हरिश्चन्द्र हुए ॥ १६॥ राजा हरिश्चन्द्र का पुत्र हरित, हरित का भरुक, भरुक का वृक, वृक का सगर, सगर का असमजा और असमजा का पुत्र अं शुमान हुआ ॥१७॥ ततो दीलीपस्तत्पुत्रो भगीरथ इति स्मृतः । येनानीता जन्हवीयं ख्याता भागीरथी भुवि । स्तुता नुता पूजितेय तव पादमुसद्भवा ॥१८॥ भगीरथात्सुतस्तस्मान्नाभस्तस्मादभूद्बली । सिन्धुद्वीपसुतस्तस्मादायतायुस्ततोऽभवत् ॥१९॥
३८२ ] [ कल्कि पुराण ऋतुपर्णास्तत्सुतोऽभूत्सुदासस्तन्सुतोऽभवत् । सौदासस्तत्सुतो धीमानश्मकस्तत्सुतो मत ॥२०॥ मूलकात्स दशरथस्तस्मादेडविडस्तत । राजा विश्वसहस्तस्मात्खट्वाङ्गो दीर्घबाहुकः ॥२१॥ ततो रघुरजस्तस्मात्सुतो दशरथःकृती । तस्माद्रामो हरिः साक्षादाविर्भूतो जगत्पति ॥२२॥ अंशुमान के पुत्र दिलीप, दिलीप के परम प्रसिद्ध पुत्र भगीरथ हुए । वही भगवती जाह्नवी को भूतल पर लाये थे इसी लिए गंगा उनके नाम से भागीरथी कहलाई । आपके चरणों से उत्पन्न होने के कारण ही प्राणी इन गंगा जी की स्तुति, प्रणाम तथा पूजन करने में तत्पर रहते हैं ।।१८।। भागीरथ का पुत्र नाभ हुआ । नाभ का महाबली सिन्धुद्वीप और सिन्धुद्वीप का पुत्र आयुतायु हुआ ।।१६।। अयुतायु का पुत्र ऋतुपर्ण हुआ । ऋतुपर्ण का सुदास, सुदास का सौदास और सौदास का पुत्र मेधावी अश्मक हुआ ॥२०॥ अश्मक से मूलक और मूलक का दशरथ हुआ । दशरथ का एडविड, और एडविड का विश्वसह, विश्वसह का खट्वाग और खट्वाग का पुत्र दीर्घबाहु हुआ था ॥२१॥ दीर्घबाहु के पुत्र रघु हुए, रघु के अज और अज के दशरथ हुए । इन्हीं दशरथ के पुत्र रूप मे साक्षात् जगदीश्वर विष्णु ने अवतार लिया ॥२२॥ रामावतारमाकर्ण्य कल्कि परमहर्षित । मरु प्राह विस्तरेण श्रीरामचरित वद ॥२३॥ सीतापते कर्म वक्तुं कः समर्थोऽस्ति भूतले । शेषः सहस्त्रवदनैरपि लालायितो भवेत् ॥२४॥ तथापि शेमुषी मेऽस्ति वर्णयामि तवाज्ञया । रामस्य चरितं पुण्यं पापतापप्रमोचम् ॥२५ ॥ अब्जादिविबुधार्थितोऽजनि चतुर्भिरंशैः कुले रवेरजासुतादजो जगति यातुधानक्षयः। शिशुः कुशिकजाध्वरक्षमकरक्षयो यो बला- द्दवलीललितकन्धरो जयति जानकीवल्लभः ॥२६॥
३८३ ] [ कल्कि पुराण रामावतार का प्रसग आने पर भगवान् कल्कि अत्यन्त हर्षित हुए और उन्होने मरु से कहा कि राम चरित्र का विस्तार सहित वर्णन करिये ॥२३॥ मरु बोले-सीतापति श्रीराम के कर्मों का वर्णन करने में समर्थ इस पृथिवी पर कौन है ? क्योकि सहस्रवदन शेष भी उनका यश वर्णन करने मे समर्थ नही है। फिर भी मैं आपकी आज्ञा के कारण भगवान् श्रीराम का पाप-ताप नाशक चरित्र को अपनी बुद्धि के अनुसार कहता हूँ ।।२४-२५ ।। पुराकाल की बात है—ब्रह्मादि देवताओ के द्वारा राक्षसो के विनाशार्थ प्रार्थना किये जाने पर राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न के रूप मे सीतापति भगवान् रामचन्द्र जी ने सूर्यवंश मे अवतार लिया था। अपने शिशु-काल मे ही उन्होने विश्वामित्र जी के यज्ञ मे विघ्न उपस्थित करने वाले राक्षसो का बलपूर्वक संहार किया था।।२६।। मुनेरनुसहानुजो निखिलशस्त्रविद्यातिगो । ययावतिवनप्रभो जनकराजराजत्सभाम् ॥२७॥ विधाय जनमोहनद्युतिमतीव कामद्रुहं । प्रचण्डकरचण्डिमा भवनभजने जन्मिनः ॥ तम प्रतिमतेजस दशरथात्मज सानुज मुनेरनु यथा विधे शशिवदादिदेव परम् । निरीक्ष्य जनको मुदा क्षितिसुतापत्ति समत निजोचितपणक्षम मनसि भत्स्यन्नाययौ ॥२८॥ स भूपपरिपूजितो जनकजेक्षितैरर्चितः करालकठिनं धनु करसोरुहे सहितम् । विभज्य बलहृढ जय रघूवद्हेत्युच्चकैर्ध्वनि त्रिजगतीगत र्पारविधाय रामो वभौ ॥२६॥ ततो जनकभूपतिर्दशरथात्मजेभ्यो ददौ चतस्र उषतीर्मुदा वरचतुर्म्य उद्वाहने । स्वलकृतनिजात्मजा. पथि ततो बल भार्गव-
द्वितीय अंश: अध्याय ४-७ (राजा शशध्वज भक्ति व रमा विवाह)
प्रथम अध्याय-३ ] [ ३८४ श्रकार उररीनिज रघुपतौ महोग्र त्यजन् ॥३०॥ जिनकी महिमा से कामना पूर्ति वाले ससार मे पुर्नजन्म की प्राप्ति नही होती । वे महाबली, प्रभायुक्त तथा सम्पन्न शस्त्र विद्या- विशारद भगवान श्रीराम ससार को मोहित करने वाला रूप धारण किये हुए, लक्ष्मण और मुनियो के सहित जनक की राज सभा मे गये ॥२७॥ ब्रह्माजी के पीछे सुशोभित चन्द्रमा के समान तेज वाले श्री राम अपने भाई लक्ष्मण के सहित मुनिवर विश्वामित्र के पीछे बैठ गये । तब आदि देव जगदीश्वर को देख कर जनक सोचने लगे कि यह सीता के योग्य श्रेष्ठ वर हैं । तब उन्होने अपने द्वारा किये हुए प्रण की कठोरता देख कर अपनी भर्त्सना की और फिर श्री राम के समीप गये ॥२८॥ तब राजा जनक से आदर प्राप्त कर तथा सीता जी के कटाक्ष से प्रेम-पूजित होकर श्री राम ने उस घोर धनुष को हाथ मे उठाया और उसके दो टुकडे कर दिये । तब श्रीराम अत्यन्त शोभा को प्राप्त हुए और उनके जय-घोष से तीनो लोक व्याप्त हो गये ॥२६॥ ततः स्वपुरमागतो दशरथस्तु सीतापर्ति नृप सचिवसयुतो निजविचित्रसिंहासने । विधातुममलप्रभ परिजनै क्रियाकारिभिः समुद्यतमतिं तवा द्रुतमवारयत्कैकयी :।३१॥ ततो गुरुनिदेशतो जनकराजकन्यायुत. प्रयाणमकरोत्सुधीर्यदनुजः सुमित्रासुत. वनं निजगण त्यजन्गृहगृहे वसन्नादरात् विसृज्य नृपलाञ्छन रघुपतिर्जटाचीरभृत् ॥३२॥ तब राजा जनक ने अपनी चारो कन्या—सीता, उर्मिला, माण्डवी और श्रुतिकीर्ति सब प्रकार से अलंकृत करके दशरथ जी के चारो पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न को क्रमशः दान कर दी । विवाह के पश्चात् जब यह सब अयोध्या नगरी के लिए लोट रहे थे, तब मार्ग मे परशुरामजी मिले और उन्होने श्रीरामको अपना अपार बल
प्रथम अध्याय-२ ] [ ३८५ दिखाने का निष्फल प्रयत्न किया ॥३०॥ फिर महाराज दशरथने अयोध्या पहुँच कर अपने मन्त्रियो के परामर्श से सीतापत्ति राम को अयोध्या के राज्य सिंहासन पर अभिषिक्त करने का विचार किया । अभिषेक के लिए सम्पूर्ण सामग्री एकत्र होकर जब पूर्ण तैयारी हो गई, तब श्रीराम का अभिषेक करने मे तत्पर राजा दशरथ को कैकेयी ने वरदान माँग कर रोक दिया ॥ ३१ ॥ तब महाराज की आज्ञा सुन कर जनक सुता और सुमित्रा पुत्र-लक्ष्मण सहित श्रीराम वन मे गये । साथ चलते हुए पुरवासियो को आगे चल कर छोड़ दिया तथा गुह के घर मे जाकर राजकीय वस्त्राभूषणो का परित्याग कर जटावल्कल धारण कर लिया ॥३२॥ प्रियानुजयुतस्ततो मुनिमतो वने पूजितः स पञ्चवटिकाश्रमे भरतमातुर सगतम् । नि-वार्य मरण पितु समवधार्य्य दुःखानुर- स्तपोवनगतोऽवसद्रघुपतिस्ततस्ता समाः ॥३३॥ दशाननसोदरा विषमबाणवेधातुरां- समीक्ष्य वररूपिणी प्रहसती सती सुन्दरीम् । निजाश्रयमभीप्सती जनकजापतिर्लक्ष्मणा- त्करालकरवालत समकरोद्विरूपा तत ॥३४॥ समाप्य पथि दानव खरशरै शनैर्नाशयन् चतुर्दशसहस्रक समहनन्खर सानुगम् । दशाननवशानुग कनकचारुच्छन्मृग प्रियाप्रियकरो वने समवधीद्बलाद्राक्षसम् ॥३५॥ सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ मुनिवेश धारी श्री राम पूजा-सम्पन्न होकर विविध मे वनो निवास करने लगे । इसके पश्चात् कातरता पूर्वक भरतजी वहाँ आये । उनसे पिता का मरण सुन कर श्रीराम को बडा दुःख हुआ और भरत जी को समझा कर लौटा दिया और तपोवन मे रहने लगे ॥३३॥ फिर कामबाण से बिद्ध
३८६ ] कल्कि पुराण सुन्दर रूप वाली, हास्यवदना, वर की कामना करती हुई रावण की बहिन शूर्पणखा को आते देख कर लक्ष्मण जी को सकेत किया, जिसके अनुसार लक्ष्मण जी ने तीक्ष्ण तलवार से उस राक्षसी का रूप भ्रष्ट कर दिया ॥३४॥ फिर उन्होंने मार्ग मे एक दानव का मार कर, चौदह हजार सेना के अधिपति एव रावण के अनुगामी खरदूषण को सेना सहित नष्ट कर दिया । फिर सीता जी की इच्छा से स्वर्ण-मृग रूपी राक्षस को मार डाला ॥३५॥ ततो दशमुखस्त्वरस्तमभिवीक्ष्य राम रुषा व्रजन्तमन्तुलक्ष्मण जनकजा जहाराश्रमे । ततो रघुपतिः प्रिया दलकुटीरसस्थापिता न वोक्ष्य तु विमूर्च्छितो वह विलप्य सीतेति ताम् ॥३६॥ वने निजगणाश्रमे नगतले जले पल्वले विचित्य पतित खग पथि ददर्श सौमित्रिणा । जटायुवचनोत्ततो दशमुखाद्दता जानकी विविच्य कृतवान्मृते पितरि वत्कृत्य प्रभु ॥३७॥ प्रियाविरहकातराऽनुजपुर सरो राघवो धनुर्धरन्धरो हरिबल नवालापिनम् । ददर्श ऋषभाचलाद्रविजवालिराजानुज- प्रिय पवननन्दनं परिणतं हित प्रेषितम् ॥३८॥ फिर राम लक्ष्मण को गया हुआ देख कर रावण ने उनके आश्रम से अकेली सीताजी का हरण कर लिया । तदनन्तर श्रीराम ने वहाँ आकर जब सीता को न देखा, तब वे 'हा सीते' 'हा सीते' आदि शोक युक्त शब्दो मे विलाप करते हुए मूर्च्छा को प्राप्त हो गये ॥ ३६ ॥ फिर वे ऋषियो के आश्रम, पर्वतो की गुफा, जल और स्थल आदि विविध स्थानो मे सीताजी को ढू ढने लगे । आगे चलने पर उन्हें माग मे जटायु पडा मिला । उससे उन्हे सीता हरण का समाचार प्राप्त हुआ । जटायु के मरने पर उन्होंने अपने पिता के समान उसका