भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 131

प्रथम अध्याय-३ ] [ ३८४ श्रकार उररीनिज रघुपतौ महोग्र त्यजन् ॥३०॥ जिनकी महिमा से कामना पूर्ति वाले ससार मे पुर्नजन्म की प्राप्ति नही होती । वे महाबली, प्रभायुक्त तथा सम्पन्न शस्त्र विद्या- विशारद भगवान श्रीराम ससार को मोहित करने वाला रूप धारण किये हुए, लक्ष्मण और मुनियो के सहित जनक की राज सभा मे गये ॥२७॥ ब्रह्माजी के पीछे सुशोभित चन्द्रमा के समान तेज वाले श्री राम अपने भाई लक्ष्मण के सहित मुनिवर विश्वामित्र के पीछे बैठ गये । तब आदि देव जगदीश्वर को देख कर जनक सोचने लगे कि यह सीता के योग्य श्रेष्ठ वर हैं । तब उन्होने अपने द्वारा किये हुए प्रण की कठोरता देख कर अपनी भर्त्सना की और फिर श्री राम के समीप गये ॥२८॥ तब राजा जनक से आदर प्राप्त कर तथा सीता जी के कटाक्ष से प्रेम-पूजित होकर श्री राम ने उस घोर धनुष को हाथ मे उठाया और उसके दो टुकडे कर दिये । तब श्रीराम अत्यन्त शोभा को प्राप्त हुए और उनके जय-घोष से तीनो लोक व्याप्त हो गये ॥२६॥ ततः स्वपुरमागतो दशरथस्तु सीतापर्ति नृप सचिवसयुतो निजविचित्रसिंहासने । विधातुममलप्रभ परिजनै क्रियाकारिभिः समुद्यतमतिं तवा द्रुतमवारयत्कैकयी :।३१॥ ततो गुरुनिदेशतो जनकराजकन्यायुत. प्रयाणमकरोत्सुधीर्यदनुजः सुमित्रासुत. वनं निजगण त्यजन्गृहगृहे वसन्नादरात् विसृज्य नृपलाञ्छन रघुपतिर्जटाचीरभृत् ॥३२॥ तब राजा जनक ने अपनी चारो कन्या—सीता, उर्मिला, माण्डवी और श्रुतिकीर्ति सब प्रकार से अलंकृत करके दशरथ जी के चारो पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न को क्रमशः दान कर दी । विवाह के पश्चात् जब यह सब अयोध्या नगरी के लिए लोट रहे थे, तब मार्ग मे परशुरामजी मिले और उन्होने श्रीरामको अपना अपार बल