कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 259 में से
संदर्भ में पढ़ें३८३ ] [ कल्कि पुराण रामावतार का प्रसग आने पर भगवान् कल्कि अत्यन्त हर्षित हुए और उन्होने मरु से कहा कि राम चरित्र का विस्तार सहित वर्णन करिये ॥२३॥ मरु बोले-सीतापति श्रीराम के कर्मों का वर्णन करने में समर्थ इस पृथिवी पर कौन है ? क्योकि सहस्रवदन शेष भी उनका यश वर्णन करने मे समर्थ नही है। फिर भी मैं आपकी आज्ञा के कारण भगवान् श्रीराम का पाप-ताप नाशक चरित्र को अपनी बुद्धि के अनुसार कहता हूँ ।।२४-२५ ।। पुराकाल की बात है—ब्रह्मादि देवताओ के द्वारा राक्षसो के विनाशार्थ प्रार्थना किये जाने पर राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न के रूप मे सीतापति भगवान् रामचन्द्र जी ने सूर्यवंश मे अवतार लिया था। अपने शिशु-काल मे ही उन्होने विश्वामित्र जी के यज्ञ मे विघ्न उपस्थित करने वाले राक्षसो का बलपूर्वक संहार किया था।।२६।। मुनेरनुसहानुजो निखिलशस्त्रविद्यातिगो । ययावतिवनप्रभो जनकराजराजत्सभाम् ॥२७॥ विधाय जनमोहनद्युतिमतीव कामद्रुहं । प्रचण्डकरचण्डिमा भवनभजने जन्मिनः ॥ तम प्रतिमतेजस दशरथात्मज सानुज मुनेरनु यथा विधे शशिवदादिदेव परम् । निरीक्ष्य जनको मुदा क्षितिसुतापत्ति समत निजोचितपणक्षम मनसि भत्स्यन्नाययौ ॥२८॥ स भूपपरिपूजितो जनकजेक्षितैरर्चितः करालकठिनं धनु करसोरुहे सहितम् । विभज्य बलहृढ जय रघूवद्हेत्युच्चकैर्ध्वनि त्रिजगतीगत र्पारविधाय रामो वभौ ॥२६॥ ततो जनकभूपतिर्दशरथात्मजेभ्यो ददौ चतस्र उषतीर्मुदा वरचतुर्म्य उद्वाहने । स्वलकृतनिजात्मजा. पथि ततो बल भार्गव-