कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७६ ] [ कल्कि पुराण तेन खड्गेन महता दाक्ष्यं निर्भिद्य बन्धुभिः । बलिभिर्भ्रातृभिर्बाह्वैर्वृतः शस्त्रास्त्रपाणिभि ॥३६॥ बहिर्बभूव सर्वेश कल्कि. कलकविनाशनः । सहस्राक्षौ यथा वृत्रकुक्षित् दम्भोलिनेमिना ॥३७॥ यानि रध्राद्गजरथस्तुरगाश्चाभवन्बहिः । नासिकाकर्णविवरान्क र्दाप तस्या विनिर्गताः ॥३८ ॥ ते निर्गतास्ततस्तस्या सैनिका रुधिरोक्षिताः । ता विव्यधुर्निक्षिपन्ती तरसा चरणौ करौ ॥३६॥ ममार सा भिन्नदेहा भिन्नकुक्षिशिरोधरा । नादयन्ती दिशो घो. ख चूणयन्ती च पर्वतान् ॥४०॥ जैसे देवराज इन्द्र वृत्रासुर की कुक्षि को अपने वज्र से भेद कर बाहर आये थे, वैसे ही सर्वेश्वर एव पापो का नाश करने वाले कल्कि- जी ने अपनी वृहद् तलवार से राक्षसी की दक्षिण कुक्षि चीर डाली और अपने शस्त्रास्त्र धारी बाधवो के सहित बाहर निकल आये ॥ ३६- ३७ ॥ बहुत से गज, अश्व रथ और पैदल उसके अधो मार्ग मे और बहुत से उसके कानो तथा नासिका छिद्रो से होकर बाहर आ गये । ३८॥ फिर वे रक्त से भीगे हुए वीर गण राक्षमी के देह से बाहर निकल कर, को हाथ-पैर चलाती देख कर बाणो द्वारा उसका वेधन करने लगे ॥३६॥ जब उसके उदर मस्तक तथा अन्यान्ध अग छिन्न-भिन्न होने लगे तब उसकी घोर चीत्कार से दशों दिशाएं गूँज उठी । फिर वह पर्वतो पर गिर कर उन्हे चूर-चूर करती हुई मृत्यु को प्राप्त हुई ॥४०॥ करञ्जोऽपि तथा वीक्ष्य मातरं कातरोऽभवत् । स विकञ्ज क्रुधा धावन्सेनामध्ये निरायुध ॥४१॥ गजमालाकुलो वक्षोवाजिराजिविभूषण । महासर्पकृतोष्णीशः केसरीमुद्रिताङ्गुलिः ॥४२॥ ममद्द कल्किसेना ता मातुर्व्यसनकर्षितः । स कल्किरत्त ब्राह्ममस्त्र रामदत्त जिघासया ॥४३॥