भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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प्रथम अध्याय-३ ] [ ३७५ क्रोध पूर्वक अद्भुत नाद किया ॥ २८ ॥ उस घोर निनाद को सुन कर सभी भयभीत हो गये तथा सब सेनापति मूर्च्छित एव धराशायी हो गये ॥२६॥ तब वह राक्षसी कुथोदरी अपने भयकर मुख को खोल कर अपने प्रश्वास के द्वारा ही रथ, अश्व, गजादि को खीच-खीच कर हडप करने लगी ॥ ३० ॥ सेनागणास्तदुदर प्रविष्टा' कल्किना सह । यथर्क्षमुखवातेन प्रविशन्ति पिपोलिकाः ॥३१॥ तद्दृष्ट्वा देवगन्धर्वा हाहाकारं प्रचक्रिरे । तत्रस्था मुनयः शेपुर्जपुश्चान्ये महर्षय ॥ ३२॥ निपेत्तुरन्ये दुःखार्त्ता ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः । रुरुदुः शिष्टयोधा ये जहृषुस्तन्निशाचरा ॥ ३३ ॥ जगता कदन दृष्ट्वा सस्मरात्मानमात्मना । कल्किः कमलपत्राक्षः सुरारातिनिषूदन ॥ ३४ ॥ बाणाग्नि चेलचर्माभ्या कर्म्मनेयॉनदारुभिः । प्रज्वाल्योदरमध्येन करवाल समाददे ॥ ३५ ॥ जैसे रीछ के प्रश्वास खींचने से चीटियां आकर्षित होकर उसके मुख मे पहुंच जाती है, वैसे ही अपनी सेना के सहित भगवान कल्कि उस राक्षसी के मुख मे प्रविष्ट हो गये ॥३१॥ यह देख कर सब देवता-गन्धर्व हाहाकार कर उठे, मुनिगण ने उस राक्षसी को शाप दिये और महर्षिगण कल्कि जी की कुशल के निमित्त मन्त्र-जप मे संलग्न हुए ॥३२॥ वेदज्ञ ब्राह्मण दुःख से अचेत हो गये, प्रभु-भक्त वीर रोने लगे और राक्षस गण आनन्द मे निमग्न हो गये ॥ ३३ ॥ देव शत्रुओ के नाशक भगवान् कल्कि ने जब सम्पूर्ण विश्व को इस प्रकार दुःखी देखा तो वे स्वय अपना ही स्मरण करने लगे ॥३४॥ फिर कल्कि जी ने राक्षसी के उस अन्धकार मय उदर मे अपने बाण द्वारा अग्नि उत्पन्न की और चर्म तथा रथ के काष्ठादि के द्वारा उस अग्नि को प्रज्वलित कर हाथ मे तलवार ग्रहण की ॥३५॥