भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 137

३६० ] कल्कि-पुराण समर्प्य रघुपूङ्गवे निजपुरी ययौ हर्षितः ॥४८॥ पुरन्दरकथादर सपदि तत्र रक्ष पतिम् । बिभीषणमभीषणं समकरोत्ततो राघव. ॥४६॥ दृगीश्वरगणावृतोऽवनिसुतायुत सानुजा रथे शिवसखेरिते सुविमले लसत्पुष्पके । मुनीश्वरगणार्च्चितो रघुपतिस्त्वयोध्या ययौ विवच्य मुमिलाञ्छन गुहगृहेऽतिसख्य स्मरन् ॥५०॥ फिर इन्द्र को त्रस्त करने वाला रावण जानकी जी के क्रोध से व्याप्त एव श्रीराम के अस्त्रानल से दग्ध होकर धराशायी हो गया । रावण की मृत्यु हो जाने पर वानर श्रेष्ठ हनुमान जानकीजी को शुद्ध करके लाये और उन्हें श्रीराम को समर्पित कर दिया । फिर प्रसन्न चित्त से अपने स्थान को गये ॥४८॥ फिर देवराज के कहने से श्रीराम ने रावण के भाई विभीषण को राक्षसो के राज्य पर अभिषिक्त किया ॥४६॥ फिर भगवान् रामचन्द्र जी वानर आदि तथा सीताजी और लक्ष्मण को साथ लेकर अत्यन्त सुशोभित पुष्पक यान पर चढ कर अयोध्या नगरी के लिए चले । मार्ग मे चलते हुए जब मध्य वन मे पहुँचे तब उन्हें अपने मुनिवेष और गुह के गृह तथा उसकी मित्रता का स्मरण हुआ । तभी मुनियो ने उनके समीप आकर उनका पूजन किया ॥ ५० ॥ ततो निजगणावृतो भरतमातुर सान्त्वयन् स्वमातृगणवाक्यतः पितृनिजासने भूपति । वसिष्ठमुनिपुङ्गवै कृतानिजाभिषेको विभु- समस्त जनपालक. सुरपतिर्यथा सबभौ ॥५१॥ नरा बहुधनाकरा द्विजवरास्तपस्तत्पराः स्वधर्म्मकृतनिश्चवाः स्वजनसङ्गता निर्भयाः । घनाः सुबहुवर्षिणो वसुमती सदा हर्षिता भवत्यतिबले नृपे रघुपतावभूत्सज्जगत् ॥५२॥