भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 259 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 138

तृतीय अध्याय ३ ] [ ३६१ गतायुतसमाः प्रियैर्निजगणै प्रजा रञ्जयन् निजा रघुपति. प्रिया निजमनोभवैर्मोहयन् । मुनीन्द्रगणसयुतोऽप्ययजदादिदेवान्मखै- र्धनैर्विपुलदक्षिणैरतुलवाजिमेधैस्त्रिभि ।।५३।। फिर अपने जनो से आवृत्त होकर दुख से कातर हुए भरतजी को सान्त्वना दी और माताओ की आज्ञा से अपने पिता के राज्य सिहासन पर अभिषिक्त हुए । उस समय वसिष्ठ आदि महर्षियो ने उनका अभिषेक किया और तब वे लोको के स्वामी श्रीराम इन्द्र के समान शोभा पाने लगे ।।५१।। फिर प्रजाजन धन से सम्पन्न हो गए, द्विजवर तपस्या मे मग्न रहने लगे । सभी परस्पर प्रेम-भाव पूर्वक भय-रहित चित्त से रहते हुए अपने-अपने धर्म मे तत्पर हो गए । मेघो द्वारा समय पर वृष्टि होने से पृथिवी मुदित हो गई । इस प्रकार अत्यन्त पराक्रमी श्रीराम के राज्य को प्राप्त होने से सम्पूर्ण विश्व सत्पथ का अनुगामी हो गया । ५२। भगवान् श्रीराम अपने गुणो से प्रजा को प्रसन्न रखने और अपनी प्राणप्रिया सीताजी के मन को भी आनन्दित करने लगे । उन्होने महर्षियो के महयोग से बहुत प्रकार की दक्षिणा और दान-यज्ञादि के द्वारा देवताओ को प्रसन्न करते हुए तीन अश्वमेध यज्ञ निर्विघ्न रूप से पूर्ण किये । इस प्रकार उन्होने दस हजार वर्ष तक राज्य किया ।५३। तत किमपि कारण मनसि भावयन्भूपति- र्जहौ जनकजा वने रघुवरस्तदा निर्घृणः । ततो निजमत स्मरन्गमनयत्प्रचेत. सुतो निजाश्रममुदारधीरघुपते प्रिया 'दुःखिताम् ।।५४।। तत' कुशलवौ सुतौ प्रसुषुबे धरित्रीसुता महाबलपराक्रमौ रघुपतेर्यशोग़ायनौ । स तामपि सुतान्विता मुनिवरस्तु रामान्तिकॆ समर्पयदनिन्दिता सुरवरै सदा वन्दिताम् ।।५५।।