कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६२ ] [ कल्कि पुराण ततो रघुपतिस्तु ता सुतयुता रुदन्ती पुरो जगाद दहने पुन प्रविश शोधनायात्मन. । इतीरितमवेक्ष्य सा रघुपते पदाब्जे नता विवेश जनोयुता मणिगणोज्वल भूतलम् ॥५६॥ फिर किसी कारण वश श्रीराम को अपना हृदय कठोर करना पडा और उन्होन जानकीजी को परित्याग का वन मे पहुँचा दिया । तब महर्षि बाल्मीकि अपने द्वारा रचित रामायण का स्मरण करके दु खित चित्त होते हुए जानकीजी का अपने आश्रम मे लिवा लाये ॥५४॥ फिर जानकीजी के कुश और लव नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए । इन दोनो राज पुत्रो ने श्रीराम के समीप पहुंच कर उनका यश गाया । फिर महर्षि वाल्मीकि ने अनिन्दित एव देव-पूजिता जानकीजी को इन दोनो पुत्रो के सहित श्रीराम को समर्पित कर दिया ॥५५॥ दोनो पुत्रो के सहित रोती हुई जानकी को अपने सामने खडी देख कर श्रीराम उनसे बोले— सीते ! तुम अपनी शुद्धि के लिये पुनः अग्नि-प्रवेश करो । उनके यह वचन सुन कर जानकीजी ने उनके चरणारविन्दो मे प्रणाम किया आदर अपनी माता पृथिवी के साथ पाताल मे प्रविष्ट हो गईं ॥५६॥ निरीक्ष्य रघुनायको जनकजाप्रयाण स्मरन् वन्शिष्ठगुरुयोगतोऽनुजयुतोऽगमरस्व पदम् । पुर.स्थितजन.स्वकै पशुभिरीश्वर सस्पृशन् मुदा सरयुजीवन रथवरे परीतो विभुः ॥५७॥ ये शृण्वन्ति रघूद्वहस्य चरित कर्णामृत सादरात् ससारार्णवशोषणाञ्च पठतामामोदद मोक्षदम् । रोगाणामिह शान्तये धनजनस्वर्गादिसम्पत्तये वंशानामपि वृद्धये प्रभवति श्रीशः परेश प्रभुः ॥५८.। जानकीजी को इस प्रकार पाताल में गई देख कर रामचन्द्र भी उनका स्मरण करते हुए अपने गुरु वसिष्ठ, अनुजगण तथा परिजनो