कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०० ] [ कल्कि पुराण लोकातीतो निजतनूमरुन्नाशिताऽधर्म्मसघ- स्तेजोराशि सनकसदृशो मस्करी पुष्कराक्षः ।३८। तभी कल्किजी ने कहा — यह सभी को विदित है कि तुम दोनो राजवंश मे विश्व-रक्षा और पृथिवी के पालनार्थ उत्पन्न हुए हो । तुम्हारी उत्पत्ति सूर्य, चन्द्र, यम और कुबेर के अंश से हुई है ॥३४॥ अब तक तुम अपने रूप को छिपाये रहे हो । परन्तु अब, जब यहाँ मेरे पास आये हो तो मेरी आज्ञा से इन्द्र द्वारा भेजे गये इन रथो पर आरूढ हो जाओ ॥३५॥ पद्मापति कल्किजी के द्वारा उक्त वचन कहे जाने पर आकाश से देवताओ ने पुष्पवृष्टि और मुनियो ने स्तुति की ॥३६॥ मन्द वायु प्रवाहित होने लगा । शिवजी के जटा जाल से उन्मुक्त गङ्गा- जल के मिलन से विभूति भीग गई । मन्द पवन ने उस विभूति के कण रूपी परागो को उडा कर पार्वती के अंगो मे लगाते हुए कल्याण गुण की प्राप्ति की ॥३७॥ तभी सनक मुनि के समान अत्यन्त तेजस्वी, धर्म भवन रूप सुरुचिर जटाओ को धारण किये और हाथ मे दण्ड लिये एक ब्रह्मचारी वहाँ आये । उनकी देह कान्ति तप्त स्वर्ण के समान चमचमा रही थी । मनोहर वस्त्रधारी उन कमललोचन दिव्य महापुरुष के मुख पर अक्षय भाव परिलक्षित हो रहा था । उनके तेजोमय शरीर का स्पर्श होते ही संसार के सम्पूर्ण पापो का क्षय हो रहा था ॥३८॥ —❀—