कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ-अध्याय-४ ] [ ३६६ रथौ नानमणिब्रातघटितौ कामगौ पुरः । समायातौ ज्वलद्दिव्यशस्त्रास्त्रैः परिवारितौ ।३२। ददृशुस्ते सदो मध्ये विश्वकर्म्मविनिर्मितौ । भूपा मुनिगणा सभ्या सहर्षा किमितीरिता ।३३। हे मरो ! विशाखयूप नरेश अपनी परम शीलवती तथा छविरागी कन्या को तुम्हे विवाह देगा । अत तुम ससार का कल्याण करने के उद्देश्य से मेरे वचनो का पालन करो । हे देवापे ! तुम भी रुचिराश्व की शान्त नाम्नी सुपुत्री से विवाह कर लो ॥३०॥ कल्किजी के यह आश्वासन युक्त वचन सुन कर मुनियो के सहित देवापि अत्यन्त विस्मित हुए और फिर सन्देह छोड़ कर यह विश्वास करने लगे कि कल्कि ही भगवान् विष्णु एव साक्षात् ईश्वर हैं ॥३१॥ कल्किजी ने जैसे ही यह अभयप्रद वचन कहे वैसे ही आकाश मार्ग से स्वच्छा पूर्वक चलने वाले अनेक रत्न दि से निर्मित दो रथ अवतीर्ण हुए । सूर्य के समान तेजोमय उन रथो मे उज्ज्वल दिव्य शस्त्रास्त्र भरे हुए थे ।।३२।। उस समय उपस्थित सभी मुनिगण और राजागण विश्वकर्मा द्वारा निर्मित रथो को उतरे हुए देख कर 'यह क्या' —'यह क्या' कहते हुए विस्मय एव हर्ष प्रकट करने लगे ।।३३।। युवामादित्यसोमेन्द्रयमवैश्रवणाङ्गजौ । राजानौ लोकरक्षार्थमाविर्भूतौ विदन्त्यमी ।३४। कालेनाच्छादिताकारौ मय सङ्गादिहोदितौ । युवा रथावारुहतां शकदत्त ममाज्ञया ।३५। एव वदति विश्वेशे पद्मनाथे सनातने । देवा बवर्षु कुसुमंस्तुष्टुतुर्मु नयोऽग्रतः ।३६। गङ्गावारिपरिक्लिन्नशिरोभूतिपरागवान् । शगे पर्व्वतजासङ्गशिववत्पवनो ववौ ।३७। तत्रायातः प्रमुदिततनुस्तप्तचामीकराभौ धर्मावासः सुरुचिरजटाचीरभृद्दण्डहस्तः