कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६८ ] [ कल्कि पुराण आप दोनो परम धर्मज्ञ राजा हैं। इस समय आप मेरे आदेश को मान कर राज्य ग्रहण कर उसका परिपालन करो ।२२-२३। मरो त्वामभिषेक्ष्यामि निजयोध्यापुरेऽधुना । हत्वा म्लेच्छानधर्मिष्ठान्प्रजाभूतविहिंसकान् ।२४। देवापे तव राज्ये त्वा हस्तिनापुरपत्तने । अभिषेक्ष्यामि राज्ये हत्वा पुक्कसकान्रणे ।२५। मथुरायामहं स्थित्वा हरिष्यामि तु वो भयम् । शय्याकर्णानुष्ट्रमुखानेकजङ्घान्विनोदरान् ।२६। हत्वा कृत युगं कृत्वा पालयिष्याम्यहं प्रजाः । तपोवेशं व्रतं त्यक्त्वा समारुह्य रथोत्तमम् ।२७। युवां शस्त्रास्त्रकुशलौ सेनागणपरिच्छदौ । भूत्वा महारथौ लोके मया सह चरिष्यथः ।२८। हे मरो ! अब मैं प्रजाओ का पीडन करने वाले, जीव-हिंसक अधर्मी म्लेच्छों का सहार करके आपको अपनी राजधानी अयोध्या मे अभिषिक्त करूंगा ।२४। हे देवापे ! हे राजन्ये ! युद्ध क्षेत्र मे पुक्कसो को मार कर मैं आपकी राजधानी हस्तिनापुर के राज्य पर आपको अभि- षिक्त करूँगा ।२५। मैं मथुरा नगरी मे निवास करता हुआ तुम्हारे भय को नष्ट करूँगा तथा शय्याकरण, उष्ट्रमुख और एकजघ आदि को मार कर सत्युग की स्थापना और प्रजा की रक्षा करूँगा । तुम अभी इस तपस्वी वेश का त्यागन करो और श्रेष्ठ रथ पर आरोहण करो ।२६-२७। तुम सभी शस्त्रास्त्र विद्या मे पारगत एव महारथी हो, अतः हमारे साथ ही विचरण करो ।२८। विशाखयूपभूपालस्तनयां भिनयान्विताम् । विवाहे रुचिरापाङ्गीं सुन्दरीं त्वा प्रदास्यति ।२६। साधो भूपाल लोकानां स्वस्तये कुरु मे वचः । रुचिराश्वसुतां शान्तां देवापे त्वं समुद्वह ।३०। इत्याश्वासकथां कल्केः श्रुत्वा तौ मुनिभिः सह । विस्मयाविष्टहृदयौ मेनाते हरिमीश्वरम् ।३१। इति ब्रुवत्यभयदे आकाशात्सूर्य्यसंन्निभौ ।